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देश में अदालतों के फ़ैसलों के ख़िलाफ़ केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा निर्णय लिया जाना, संयोग या प्रयोग!

भारत में हालिया दिनों में जिस तरह अदालतों के फ़ैसलों के ख़िलाफ़ जाकर इस देश की केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने निर्णय लिया है उससे ऐसा लगने लगा है कि इस देश की न्यायिक प्रणाली को कमज़ोर करने की कोई साज़िश रची जा रही है।

प्राप्त रिपोर्ट के मुताबिक़, इसी वर्ष फरवरी के अंत में दिल्ली में हुई हिंसा पर, दिल्ली हाईकोर्ट के जज एस. मुरलीधरन दुवारा भड़काऊ भाषण देने वालों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने के निर्देश को जहां इस देश की केंद्र सरकार न सिर्फ़ अन्देखा किया बल्कि स्वयं इस आदेश को देने वाले न्यायधीश का रातो-रात ट्रांसफर कर दिया गया वहीं उत्तर प्रदेश की योगी सरकार भी अदालतों के फ़ैसले पर अपने द्वारा लिए गए निर्णयों को अधिक महत्व दे रही है। यही कारण है कि, यूपी सरकार द्वारा कथित उपद्रवियों की होर्डिंग लगाने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ पहले योगी सरकार सुप्रीम कोर्ट जाती है और फिर जब वहां भी उसे मुंह की ख़ानी पड़ती है तो वह और ऊंची बेंच में मामले को लेकर जाने का फ़ैसला करती है और केवल यही नहीं इस बीच जब यह मामला अदालत में विचाराधीन है ऐसी स्थिति में वह इसपर क़ानून भी बना लेती है।

भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में दंगों के कथित आरोपियों की विवादास्पद होर्डिंग लगवाने वाली उत्तर प्रदेश की योगी सरकार अब जुलूसों, विरोध प्रदर्शनों के कार्यक्रमों आदि में निजी तथा सार्वजनिक सम्पत्ति के नुक़सान की भरपाई के लिए अध्यादेश लाई है। योगी मंत्रिमंडल ने इस संबंध में शुक्रवार को ‘उत्तर प्रदेश रिकवरी ऑफ डैमेज टू पब्लिक एंड प्राइवेट प्रॉपर्टी अध्यादेश-2020’ के प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी है। यूपी सरकार ने कथित दंगाइयों के पोस्टर राजधानी लखनऊ में जगह-जगह लगाए जाने को एक पुराने शासनादेश के अनुरूप क़रार दिया और कहा कि इससे पहले किसी भी सरकार ने इस शासनादेश के तहत कार्यवाही नहीं की थी।

इस बीच कई जानकारों और टीकाकारों का कहना है कि जिस अंदाज़ में भारत की केंद्र सरकार और बीजेपी शासित राज्य सरकारें इस देश की अदालतों के फ़ैसलों के विपरीत जाकर अपनी मन-मर्ज़ी के निर्णय ले रही हैं उससे न केवल भारत की न्यायिक प्रणाली कमज़ोर होगी बल्कि इस देश की आम जनता का अदालतों पर से विश्वास भी उठ जाएगा और फिर वह कोशिश करेगी कि किसी नेता या मंत्री द्वारा ही अपने मामलों का समाधान निकाल ले। जानकारों का यह भी कहना है कि इस समय देश की अदालतों का यह हाल है कि उनके द्वारा लिए जा रहे निर्णयों से भी राजनीति की बू आने लगी है और यह भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के लिए बहुत ही चिंता की बात है। टीकाकारों का कहना है कि अदालतों के फ़ैसले जो सरकार के पक्ष में होते हैं उसका तो सरकार ख़ूब प्रचार-प्रसार करती है लेकिन जब कोई फ़सला उसकी मर्ज़ा का नहीं आता तो वह उन निर्णयों के ख़िलाफ़ हर तरह के हथकंड़े अपनाती नज़र आती है

सोर्स : पारस टुडे हिंदी 

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