दुनिया

अब नहीं लगता कि कोरोना से बिगड़े हालात पहले जैसे बहाल हो पाएंगे : पूरी अरब दुनिया बहुत बड़े बदलाव की कगार पर!

इस समय विश्व स्तर पर फैले तेल संकट के तीन बड़े कारण हैं। संकट इतना बढ़ गया है कि अमरीका के टेक्सास आयल की क़ीमत ज़ीरों से 37 डालर नीचे चली गई है। यानी तेल बेचने वाला ख़रीदने वाले को रक़म अदा करने पर मजबूर है।

इस दुर्दशा का पहला कारण सऊदी अरब और रूस का विवाद है जिसके नतीजे में बाज़ार में तेल की सप्लाई बहुत ज़्यादा बढ़ गई। दूसरा कारण कोरोना के चलते दुनिया भर में लाक डाउन और अर्थ व्यवस्थाओं का बंद हो जाना है। तीसरा कारण तेल भंडारण के प्रतिष्ठानों का न होना है। तेल को टैंकरों के भीतर रखने की मजबूरी आ गई है जिसका ख़र्च काफ़ी ज़्यादा होता है।

यह बात सही है कि रूस और सऊदी अरब के बीच समझौता हो गया है और मई से तेल की कटौती शुरू होगी और जून में हवाले किए जाने वाले तेल की क़ीमत लगभग 20 डालर है मगर इस की भी गैरेंटी नहीं है, वह क़ीमत भी दस डालर के नीचे आ सकती है।

तेल की क़ीमतों में इतनी बड़ी गिरावट का नतीजा यह है कि अमरीका की 533 कंपनियां बहुत जल्द अपने दीवालिया हो जाने की घोषणा करेंगी जबकि आने वाले महीनों में यदि तेल की क़ीमत 10 डालर प्रति बैरल रहती है तो 1100 कंपनियां दीवालिया हो जाएंगी।

हालात बहुत जटिल हैं क्योंकि हमारे सामने आईएमएफ़ का यह बयान भी है कि विश्व में तेल की मांग में लगभग 2 करोड़ 90 लाख बैरल की कमी आने वाली है। ओपेक कुल लगभग 3 करोड़ बैरल तेल का उत्पादन करता है। इसका मतलब यह है कि अगर रूस और सऊदी अरब के समझौते के अनुसार तेल के उत्पादन में 1 करोड़ बैरल की कमी कर दी जाती है तब भी बाज़ार में 1 करोड़ 90 लाख बैरल अतिरिक्त तेल मौजूद रहेगा। यानी तेल की क़ीमतों लगातार गिरेंगी।

आने वाले दिनों में तेल निकालने का ख़र्च उसकी क़ीमत से ज़्यादा हो जाएगा। इसके नतीजे में बहुत सी कंपनियां बंद होंगी और लोग बेरोज़गार होंगे। अरब देशों को बजट घाटे का सामना होगा। सऊदी अरब, इमारात, क़तर और कुवैत के सामने बहुत कठिन हालात आने वाले हैं। वैसे कुवैत की हालत बेहतर है क्योंकि उसे एक अच्छी इनकम संप्रभु कोष की तरफ़ से किए गए निवेश से हो जाती है।

यदि तेल की क़ीमत 20 डालर प्रति बैरल रही तो सऊदी अरब को 100 अरब डालर से अधिक का बजट घाटा होगा। शायद इसी लिए सऊदी अरब ने 7 अरब डालर का क़र्ज़ लिया है। इमारात भी इसी रास्ते पर जा रहा है और बहरैन ने एक अरब डालर का क़र्ज़ा लिया है। ओमान ने अपने ख़र्चों में लगभग डेढ़ अरब डालर की कटौती की है।

तेल की क़ीमतों में इतनी बड़ी गिरावट के बाद अरब देशों का भविष्य ख़तरे में पड़ गया है। कारण यह है कि ओपेक का अब दुनिया में कोई असर ही नहीं रह गया है। दुनिया में वैसे भी तेल का प्रयोग कम हो रहा है।

आईएमएफ़ ने कहा था कि 2034 तक फ़ार्स खाड़ी के अधिकतर अरब देश दीवालिया हो जाएंगे। उन्हें विदेशों से क़र्ज लेना पड़ेगा, अपने नागरिकों पर अलग अलग प्रकार के टैक्स लगाने पड़ेंगे। मगर हम यह समझते हैं कि यह हालात 2034 में नहीं बल्कि इसी वक्त पैदा हो गए हैं।

अगर तेल का उत्पादन करने वाले देश आर्थिक संकट में फंसते हैं तो यह भी तय है कि करोड़ों की संख्या में लोग बेरोज़गार होंगे जो दुनिया के अलग अलग देशों से आकर इन देशों में काम करते हैं। ईरान, सीरिया और यमन जैसे देश तो पहले से ही अमरीकी नाकाबंदी का सामना कर रहे हैं और उन्होंने कठिन हालात का सामना करने के लिए खुद को तैयार कर लिया है।

कोरोना की महामारी पूरी दुनिया को और ख़ास तौर पर मध्यपूर्व को बदल कर रख देगी। अब शायद अमरीका के प्रभाव से बाहर आकर बहुत से देश अपना अलग एलायंस बनाने की कोशिश करेंगे। हम अरब देशों से चाहते हैं कि वह तत्काल ख़ुद को नए हालात के अनुसार बदल लें।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार

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