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कपिल मिश्रा, अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा, रागिनी तिवारी, अभय वर्मा को क्यों नहीं किया अभी तक गिरफ़्तार?


Satyam Varma

Studied at Banaras Hindu University
Went to Govt. Jubilee Inter College Gorakhpur
Lives in Lucknow, Uttar Pradesh
From Gorakhpur

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दिल्ली में हिंसा भड़काने वाले असली दंगाइयों को छोड़कर लॉकडाउन के दौरान राहत कार्य कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं और अल्पसंख्यक युवाओं का गृह मंत्रालय के निर्देशों पर दिल्ली पुलिस द्वारा उत्पीड़न बन्‍द करो!

कपिल मिश्रा, अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा, रागिनी तिवारी, अभय वर्मा को क्यों नहीं किया अभी तक गिरफ्तार? क्यों नहीं लिया गया उन्हें हिरासत में? क्यों नहीं की गयी उनसे पूछताछ?

साथियो, हम जानते हैं कि सीएए-एनआरसी के विरोध में देशभर में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों से भाजपा सरकार बुरी तरह बौखलाई हुई थी। इसीलिए लॉकडाउन के दौरान अमित शाह के इशारों पर दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा की स्पेशल सेल उन सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं का खुलेआम उत्पीड़न कर रही है जो उस आन्दोलन में शामिल थे। बहाना है दिल्ली में हुए दंगों की जाँच।

इन दंगों के बाद पुलिस ने दो एफआईआर दर्ज की हैं: एफआईआर संख्या 59/20 और एफ़आईआर संख्या 49/20। इन प्राथमिकियों के आधार पर दिल्ली पुलिस लॉकडाउन के दौरान, जब देश की जनता इतने संकट से गुज़र रही है, सामाजिक कार्यकर्ताओं की मनमानी गिरफ्तारी में लगी हुई है।

ग़ौरतलब है कि इन प्राथमिकियों के आधार पर दंगों के ठीक पहले साम्प्रदायिक और भड़काऊ बयान देने वाले भाजपा, बजरंग दल, दुर्गा वाहिनी, विहिप आदि के नेताओं में से पुलिस ने एक को भी अभी तक न तो हिरासत में लिया है, न गिरफ़्तार किया है और न ही पूछताछ के लिए बुलाया है। इससे भी अहम बात यह है कि जिन सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया गया है या हिरासत में लेकर पूछताछ की गयी है, या पुलिस रिमांड पर भेजा गया है, उनके खिलाफ फ़ि‍लहाल पुलिस के पास कोई प्रमाण या गवाह नहीं है।

दूसरी ओर कपिल मिश्रा, अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा, रागिनी तिवारी जैसे भाजपा व उसके अनुषंगी संगठनों के नेताओं के खिलाफ़ बाकायदा वीडियो प्रमाण मौजूद हैं, जिनमें वे भड़काऊ व साम्‍प्रदायिक भाषण या बयान दे रहे हैं। इनमें से कुछ तो बाकायदा हिंसा के लिए भीड़ को उकसा रहे हैं। कई मौक़ों पर तो ख़ुद दिल्ली पुलिस के अधिकारियों के सामने ये बयान दिये गये हैं।

लेकिन इन खुले दंगाइयों के ऊपर दिल्ली पुलिस ने उक्त प्रा‍थमिकियों के आधार पर अभी तक कोई भी कार्रवाई नहीं की है। वैसे तो खुद प्रधानमन्त्री मोदी ने “कपड़ों से दंगाइयों को पहचानने” का साम्‍प्रदायिक भड़काऊ बयान दिया था और अगर दिल्ली पुलिस की मंशा वाकई दंगे और दंगाइयों की जाँच करना और दोषियों की पहचान करना है, तो कायदे से उसे कपिल मिश्रा, रागिनी तिवारी, अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा समेत प्रधानमन्त्री मोदी को भी पूछताछ के लिए कम-से-कम एक दिन स्पेशल सेल में ज़रूर बुलाना चाहिए।

लेकिन हम सभी जानते हैं कि दिल्ली पुलिस की असली मंशा क्या है। उसका मकसद है कि लॉकडाउन के दौरान ही, जबकि लोगों को वकील आदि की सुविधा ढंग से मिल ही नहीं सकती, सभी आन्दोलनकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अल्पसंख्यक समुदाय के युवाओं को हिरासत में लेना, गिरफ्तार करना, उनके ऊपर झूठे केस लगाकर उन्हें लम्बे समय के लिए जेलों में डाल देना, ताकि जब मोदी-शाह सरकार लॉकडाउन व कोरोना संकट के समाप्त होने के बाद दोबारा एनआरसी-एनपीआर की अपनी साज़ि‍शाना कार्रवाई को शुरू करे तो जनता फिर से अपने आन्दोलन को संगठित न कर पाये।

कहने की ज़रूरत नहीं है कि सरकार का यह इरादा शेखचिल्ली का सपना है। जहाँ दमन होता है, वहाँ प्रतिरोध होता ही है। दमनकारी का यही अभिशाप होता है कि जब तक जनता उसकी कुर्सी को ठोकर मार कर गिरा नहीं देती, तब तक वह कभी चैन से नहीं बैठ सकता है, क्योंकि दमन-उत्पीड़न नैसर्गिक प्रक्रिया में जनता के प्रतिरोध को भी जन्म देता है। बहरहाल, अभी अमित शाह का मंसूबा यही है कि दिल्ली दंगों का आरोप किसी तरह से सामाजिक कार्यकर्ताओं व मुसलमानों पर मढ़कर कुछ समय के लिए उन्हें सलाखों के पीछे डाल दिया जाय, ताकि वह एनआरसी-एनपीआर की अपनी साज़ि‍श को कामयाब बना सके।

नतीजतन, भाजपा व संघ परिवार के खुलेआम भड़काऊ साम्‍प्रदायिक बयान व भाषण देने वाले दंगाई नेता और गोदी मीडिया के साम्प्रदायिक दंगाई व दलाल न्यूज एंकर व पत्रकार तो खुलेआम घूम रहे हैं, रोज़ साम्प्रदायिक व दंगाई बयान दे रहे हैं, कोरोना वायरस का मज़हब तक उन्होंने खोज निकाला है, और मोदी सरकार की लापरवाही से महामारी बन गये कोरोना संक्रमण का दोष भी मुसलमानों पर डाल रहे हैं और लॉकडाउन के दौरान भी उनकी लिंचिंग व उत्पीड़न की ज़मीन तैयार कर रहे हैं; लेकिन दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा की स्पेशल सेल अपने आका अमित शाह के हुक्म की तामील करते हुए दंगों की जाँच के नाम पर अभी तक इनमें से एक किसी को भी पूछताछ के लिए हिरासत में लेने या गिरफ़्तार करने की बजाय, बेगुनाह सामाजिक कार्यकर्ताओं व मुसलमान युवाओं को हिरासत में लेने व गिरफ़्तार करने व उन पर झूठे मुक़दमे डालकर उन्हें फँसाने के काम में मेहनत से लगी हुई है।

16 अप्रैल को इसी सिलसिले में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में ज़रूरतमन्दों को भोजन-राशन पहुँचाने के काम में एक पखवाड़े से जुटे हुए नौजवान भारत सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष साथी योगेश स्वामी को दिल्ली पुलिस ने करावल नगर स्थित नौभास के केन्द्रीय कार्यालय से ग़ैर-क़ानूनी ढंग से उठा लिया। पुलिसकर्मियों ने न अपने आई कार्ड दिखाये, न उठाने का कोई नोटिस दिखाया और न ही वारण्ट जैसा कोई दस्तावेज़ ही दिखाया। पूछे जाने पर कहने लगे कि सम्बन्धित दस्तावेज़ व्हाट्सएप्प पर भेज दिया जायेगा। यह पुलिस-प्रशासन द्वारा किया गया सीधा-सीधा अपहरण था।

बाद में, वकीलों के दबाव के चलते आनन-फ़ानन में एक क़ानूनी नोटिस पुलिस ने योगेश स्‍वामी को दिया। योगेश खजूरी में श्रीराम कॉलोनी में चल रहे एनआरसी-सीएए-विरोधी आन्दोलन में भी शामिल थे।

योगेश स्वामी के साथ ही 18 अप्रैल को नौभास के एक अन्य कार्यकर्ता विशाल को भी स्पेशल सेल ने पूछताछ के लिए बुलाया है। ज्ञात हो कि नौभास के इन्हीं कार्यकर्ताओं ने खजूरी में अमन कमेटी का गठन कर वहाँ दंगों को फैलने से रोकने व साम्प्रदायिक सौहार्द्र कायम करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यानी, दिल्ली पुलिस दंगा फैलाने वालों को नहीं पकड़ रही है, बल्कि उन लोगों को पकड़ रही है, जिन्‍होंने संघ परिवार द्वारा सुनियोजित तरीके से कराए जा रहे दंगों को कई इलाकों में रोक दिया और असफल बना दिया। अचरज की कोई बात नहीं है, कि अमित शाह जैसे व्यक्ति के गृह मंत्री रहते और नरेन्‍द्र मोदी जैसे व्यक्ति के प्रधानमन्त्री रहते दिल्ली पुलिस यह घृणित काम कर रही है।

हम कतई इस बात का समर्थन करते हैं कि दंगों की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए और उस जाँच में पुलिस किसी का भी सहयोग चाहती है, तो उचित क़ानूनी प्रक्रिया के ज़रिये उसे उसका सहयोग भी लेना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि यह कैसी जाँच है जिसमें जिनके खिलाफ वीडियो प्रमाण तक मौजूद हैं, जिन्होंने न्यूज़ चैनलों को अपने साक्षात्कार तक में साम्प्रदायिक बयान दिये, जिन्होंने कैमरे के सामने साम्प्रदायिक भीड़ को दंगे और क़त्लेआम के लिए भड़काया वे तो पुलिस संरक्षण में घूम रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ जिनके ख़ि‍लाफ़ कोई प्रमाण मौजूद नहीं है, उन्हें सरकार की नीतियों का विरोध करने के कारण पूछताछ के नाम पर जेलों में या हिरासत में डाला जा रहा है और तरह-तरह से प्रताड़ि‍त किया जा रहा है? यह जाँच नहीं है बल्कि उत्पीड़न और ‘विच हंट’ है ताकि फासीवादी मोदी-शाह सरकार हर प्रकार के राजनीतिक विरोध को कुचल सके।

आइये उन दंगाइयों में से कुछ प्रातिनिधिक नामों की बात कर लें, जिनके खिलाफ स्पष्ट प्रमाण मौजूद हैं और जो पुलिस द्वारा निष्पक्ष कार्रवाई होने पर सीधे जेल जाएंगे।

1. कपिल मिश्रा — पूरे देश ने दिल्ली में 22 फरवरी को उत्तर-पूर्वी दिल्ली के मौजपुर चौक पर मिश्रा द्वारा दिये गये भड़काऊ भाषण का वीडियो देखा। नीचे वीडियो का लिंक है। इस वीडियो में कपिल मिश्रा के साथ उत्तर पूर्वी दिल्ली के एसीपी भी मौजूद हैं। वीडियो जारी होने के बाद सीलमपुर डीसीपी कार्यालय में स्थानीय लोगों द्वारा कपिल मिश्रा पर भड़काऊ भाषणा के ख़ि‍लाफ़ एक शिकायत पत्र दिया था। परन्तु दो महीने बीतने के बाद भी कपिल मिश्रा पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। आज भी आए-दिन कपिल मिश्रा महामारी के संकट के दौरान भी धार्मिक नफ़रत फैलाने की दुकान चला रहा है। लेकिन दंगों के लिए इस स्पष्ट रूप से जिम्मेदार व्यक्ति पर दिल्ली पुलिस द्वारा दंगों की “निष्पक्ष जाँच” की अभी तक नज़र नहीं गयी है।

2. रागिनी तिवारी – अपने आपको भाजपा कार्यकर्ता बताने वाली रागिनी तिवारी ने दिल्ली में मौजपुर घौंडा चौक पर लाइव फेसबुक वीडियो और भाषण के जरिये हिंसा भड़काने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। नीचे इनके नफ़रत फैलाने वाले वीडियो के लिंक हैं। इस दंगाई औरत पर भी दिल्‍ली पुलिस की नज़रे-इनायत बनी हुई है, हालाँकि निश्चित तौर पर दिल्‍ली पुलिस के आईटी सेल ने इनका भाषण देखा ही होगा, जो कि इंटरनेट पर उन दिनों वायरल था।

3. सांसद प्रवेश वर्मा (बाहरी दिल्ली) – दिल्ली चुनाव प्रचार में शाहीन बाग के नाम धार्मिक नफ़रत फैलाने में भाजपा का यह सांसद नम्बर एक पर था। खुलेआम उन्होंने आन्दोलनकारियों को बलात्कारी व लुटेरों की संज्ञा दे दी और उनके ख़ि‍लाफ़ जनता को भड़काने का प्रयास किया। नीचे वीडियो का लिंक हैः-

4. सांसद अनुराग ठाकुर – दिल्ली चुनाव में संसद अनुराग ठाकुर ने रिठाला चुनावी रैली में भड़काऊ नारे लगवाये जिसमें आन्दोलनकारियों व एनआरसी विरोधियों को “देश का ग़द्दार” बताते हुए सीधे तौर ‘गोली मारो सालों को‘ जैसी हिंसात्मक कार्रवाई का आह्वान था। इस भड़काऊ नारे के बाद ही शाहीन बाग और जामिया में कपिल गुर्जर और गोपाल शर्मा ने गोलीकांड को अंजाम दिया। क़ानूनन ऐसी हिंसा भड़काने वाले नारे के बाद केस दर्ज होना चाहिए था लेकिन इस मामले में दिल्ली पुलिस धृतराष्ट्र बनी रही। नीचे वीडियो का लिंक है।

5. अभय वर्मा, लक्ष्मी नगर से भाजपा विधायक ने अपने इलाके में ‘गोली मारो सालों को‘ नारे के सौ से ज्यादा लोगों के साथ रैली निकाली। नीचे इनका भी वीडियो है-

अब आते है दिल्ली पुलिस की हिंसा पर। इसकी जाँच कौन करेगा, इसका जवाब सिर्फ दिल्ली पुलिस ही दे सकती है। जब पुलिस ही दंगाई की भूमिका में आ जाये तो दंगों की निष्‍पक्ष जाँच की उससे उम्‍मीद कैसे की जा सकती है? नीचे दिल्ली पुलिस के वीडियो का लिंक है जिसमें वह भजनपुर चौक पर दंगाई भीड़ का नेतृत्व कर रही है। दूसरे वीडियो में पुलिस सीसीटीवी कैमरे तोड़ रही है ताकि उसके दंगाई चरित्र का खुलासा न हो सके। तीसरा वीडियो भी पुलिस क्रूरता की कहानी बयान करता है जिसमें सड़क पर नौजवानों को बर्बर तरीके से पीटकर तमाशा बनाया जा रहा है।

अब हमारा सवाल यह है:

1. स्पष्ट प्रमाण के बावजूद कपिल मिश्रा, अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा, रागिनी तिवारी, अभय वर्मा जैसे दंगाई नेताओं को दिल्ली पुलिस ने दिल्‍ली दंगों की अपनी तथाकथित ‘’निष्पक्ष जाँच’’ में अभी तक हिरासत में क्यों नहीं लिया, गिरफ्तार क्यों नहीं किया या कम-से-कम पूछताछ के लिए क्यों नहीं बुलाया?

2. जिन वीडियो में दंगा करने वालों के चेहरे साफ़ तौर पर देखे जा सकते हैं, या जो वीडियो स्वयं दंगाइयों ने अपने ‘’पौरुष प्रदर्शन’’ के लिए बनाये थे, उनके आधार पर दंगाइयों की पहचान करके पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया है?

3. स्वयं दंगाइयों के समान बर्ताव करने वाले पुलिसकर्मियों को बर्खास्त कर उन पर मुक़दमे क्यों नहीं चलाये गये?

4. उपरोक्त सबसे पहले उठाये जाने वाले क़दमों की जगह दिल्ली पुलिस जाँच के नाम पर सामाजिक कार्यकर्ताओं व मुसलमान युवाओं का उत्पीड़न क्यों कर रही है?

अगर इन सवालों का जवाब दिल्ली पुलिस नहीं दे सकती, तो उसे अपनी जाँच को दंगों की निष्‍पक्ष जाँच नहीं कहना चाहिए, बल्कि इसे मोदी-शाह सरकार की शह पर उनके सभी राजनीतिक विरोधियों को कुचलने की और उनका उत्पीड़न करने की कार्रवाई करार दिया जाना चाहिए।

Delhi Police
Supreme Court Of India
Ministry of Home Affairs, Government of India
PMO India
Arvind Kejriwal

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