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कोरोना के दौर में धर्म और मज़हब कहां है?

पूरी दुनिया में कोरोना फैल चुका है इस दौरान सब से बड़ा सवाल यह है कि धर्म और मज़हब कहां है? और उसकी भूमिका क्या है?

कोरोना के फैलाव और उसकी तबाही देख कर पूरी दुनिया में लोग भय व चिंता में डूबे है और कोरोना के परिणाम में तरह तरह के संकट सामने आ रहे हैं। इन्ही में से एक अहम संकट धर्म का भी है। कुछ लोग कोरोना को ईश्वर की तरफ से आने वाला प्रकोप समझते हैं और उनका मानना है कि ईश्वर इस तरह से दुनिया वालों को यह बताना चाह रहा है कि वह उनसे अप्रसन्न है। इन लोगों के अनुसार कोरोना चीन से ही इस लिए शुरु हुआ क्योंकि चीन वह देश है जहां धर्म को बिल्कुल ही महत्व नहीं दिया जाता और इस देश के अधिकांश लोग नास्तिक हैं। यही वजह है कि ईश्वर ने कोरोना संकट इसी देश से शुरु किया विशेष कर इस लिए भी कि चीन एगोर मुसलमानों पर बहुत अत्याचार कर रहा है।

जब यह बीमारी युरोप विशेषकर इटली और हालैंड तक पहुंच गयी तो अधिक स्पष्ट रूप से धर्म के आइने में इसे देखा जाने लगा और कहा जाने लगा कि इन देशों में चूंकि नैतिकता का पतन हो चुका है और मानवीय मूल्यों को भुला दिया गया है इस लिए इटली जैसे देशों की हालत बुरी हो गयी है बल्कि कुछ लोगों ने तो दुनिया के अंत की भविष्यवाणी भी कर दी।

लेकिन जैसे जैसे मुस्लिम देशों में विशेष सुन्नी बाहुल्य मुस्लिम देशों में कोरोना फैलने लगा, धार्मिक अर्थ निकालने की प्रक्रिया धीमी पड़ गयी हालांकि बहुत से लोग यह कहते रहे कि चूंकि इन देशों में तानशाही व्यवस्था है इस लिए ईश्वर ने इन देशों को भी अपने प्रकोप का निशाना बनाया है।

जैसे जैसे कोरोना फैलता गया धार्मिक रंग कम होता गया अलबत्ता धर्मगुरुओं ने साफ सफाई उपासना और नैतिकता आदि को कोरोना से मुक़ाबले के लिए ज़रूरी बताया लेकिन इसके साथ ही धार्मिक हल्कों से जनता से यह मांग की जाने लगी कि वह सामूहिक उपासना से दूर रहें यहां तक कि वेटिकन जैसे धार्मिक नगर में सन्नाटा पसर गया, यहूदियों ने भी अपने सभी धार्मिक कार्यक्रम स्थगित कर दिये, मुसलमानों ने भी यही किया और सऊदी अरब ने उमरा पर रोक लगा दी मस्जिदों को बंद कर दिया और कहा जा रहा है कि यह भी संभव है कि अगले साल हज ही न हो।

इन हालात में रोचक स्थिति उस समय पैदा होती है जब हम देखते हैं कि लॉक डाउन के दौरान पश्चिमी नेता लोगों से अपील करते हैं कि वह कोरोना से बचाव के लिए सामूहिक प्रार्थना करें जैसा कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ट्वीट किया कि मेरे लिए ये बड़े गर्व की बात है कि मैं 15 को राष्ट्रीय प्रार्थना दिवस घोषित करूं, हमारा वह देश है जिसने पूरे इतिहास में इस प्रकार की कठिन घड़ियों में हमने अपनी आध्यात्मिक शक्ति से ईश्वर की मदद मांगी है।

ट्रम्प की तरफ से इस तरह के एलान और ईश्वर से मदद की बात के बाद बहुत से इस्लामी धर्मगुरुओं को बहाना मिल गया और वह कहने लगे कि देखो ट्रम्प तो ईश्वर से मदद की बात कर रहे हैं हम ने मस्जिदें बंद कर दी हैं और जमाअत की नमाज़ पर प्रतिबंध लगा दिया है।

इस सिलिसले में कुछ बातों पर ध्यान देना ज़रूरी हैः

राजनीतिक अपने उद्देश्यों के लिए हर चीज़ को प्रयोग करती है और अब कोरोना के काल में धर्म को भी अपने लिए इस्तेमाल करना चाहती है इस लिए धार्मिक हल्कों को सचेत रहना चाहिए।

जो हालात हैं उसके बाद यह लगता कि धर्म के खिलाफ बड़ा प्रोपगंडा शुरु पूरी दुनिया में शुरु किया जाएगा और हर देश में लगभग हर धर्म को निशाना बनाया जाएगा।

कोरोना के काल में और कोरोना के बारे में जो धर्मगुरुओं और धार्मिक हल्कों से अलग अलग और परस्पर विरोधी बयान सामने आ रहे हैं उसकी अस्ल वजह राजनीति है और यह लोग धर्म की शिक्षाओं के बजाए हालात और राजनीति से प्रेरित होकर बयान दे रहे हैं।

कोरोना के संकट ने विशेषकर अरब सरकारों में मौजूद बहुत से विरोधाभास को सामने ला दिया है। यह सरकारों कोरोना के नाम पर धार्मिक आयोजनों को तो रोक रही हैं मगर अन्य सामाजिक कार्यक्रम उसी प्रकार से चल रहे हैं जहां धार्मिक आयोजनों से भी अधिक भीड़ जुटती है।

हर संकट से गलत फायदा उठाने वाले लोग पैदा हो ही जाते हैं। कोरोना संकट से भी कुछ मुफ्तियों , पुजारियों, पादरियों और धार्मिक लोगों ने गलत फायदा उठाने की कोशिश की है और अपने अनुयाइयों की धार्मिक भावनाओं को भड़काया है इस लिए इस बारे में किसी एक धर्म के धर्मगुरुओं को कटधरे में खड़ा नहीं किया जा सकता।

कोरोना के समय में धार्मिक हल्क़ों को काफी गहरायी से ईश्वरीय नियमों और प्रक्रियाओं को आम जनता के लिए स्पष्ट करना चाहिए।

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