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पिछले दो महीनों में ख़बरें पढ़ते और फिर झेलते यही सबक़ पाया है कि…डा. Skand Shukla का आलेख, ज़रूर पढ़िये!

Rahul Vikas
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डा. Skand Shukla भैया का आलेख – जरूर पढ़िये |
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कोविड 19 से पहले उसे दुनिया इतनी भीड़भाड़-भरी और भयावह नहीं दिखती थी। पिछले दो महीनों में मीडिया में ख़बरें पढ़ते और फिर साक्षात् आपदा झेलते उसने यही सबक पाया है कि संसार में हमारे अलावा भी हमारी ढेरों अदृश्य शत्रुताएँ विद्यमान् हैं।

“शत्रुता एक व्यक्तिनिष्ठ भाव या क्रिया है। जिसे आप शत्रु समझ रहे हैं , वह स्वयं के तो हित में ही काम कर रहा है। स्वयं के अहित में तो काम किया ही नहीं जा सकता। हाँ , हित की परिभाषा में भेद-प्रभेद हो सकता है। सो विषाणु भी अपने जीवन और प्रजनन के लिए लड़ रहा है और मनुष्य भी। यह दो विरोधी अस्तित्वों के बीच का महाभारत है।”

“पर कोरोना-विषाणु के विषय में पहले कभी सुना-पढ़ा नहीं। कहीं कोई चेतावनी या फिर कोई चिन्तातुर समाचार। चार महीनों में ऐसी शत्रुता सामने आ सकती है ? इतनी वृहद् ? इतनी विभीषक ?” वे विस्मित हैं।

“स्थूल जगत् से इतर सूक्ष्मताओं को ज़्यादतर लोगों ने टूथपेस्ट या टॉयलेट-क्लीनर से अधिक कहाँ समझा है ? टीवी पर आते वे विज्ञापन जिसमें बाएँ गोल छल्ले में सामान्य तौर पर कीटाणु कुलबुलाया करते हैं और दाहिने में रासायनिक प्रहार से न के बराबर। बस इतना ही तो परिचय आपने कीटाणुओं का पाया है।”

“मनुष्य इतना स्वार्थी है कि वह सूक्ष्म शत्रुओं को पहचानने में चूका करता है। वह इतना मूर्ख है कि वह धर्म, जाति, नस्ल, देश और लिंग के नाम पर लड़ा-भिड़ा करता है। सूक्ष्मताओं से साथ एक समस्या है : उनके साथ आप राजनीति सीधे तौर पर नहीं खेल सकते। लेकिन राजनीति खेलना तो सबसे उन्नत टाइमपास है। सो सूक्ष्म शत्रुओं के छत्र-तले मनुष्य परस्पर स्थूल शत्रुताओं को जिया करते हैं। वे साझे सूक्ष्म शत्रु को ढाल बना लेते हैं और आपस में स्कोर सेटेल किया करते हैं। पर साझी सूक्ष्म शत्रुता को तवज्जो न देकर आपस में स्थूल अव्यवहारिक शत्रुता को इतना समय देना ही क्यों ?”

“प्रकृति एक ऐसा कॉन्सेप्ट है, जिसके साथ आप पक्ष-विपक्ष बनाकर जूझ नहीं सकते। प्रकृति में रहस्यमय दैव-भाव है, यह सभी लोग प्रत्यक्ष-परोक्ष भाव से स्वीकार करते हैं। अन्दर वे उसके अनिश्चित बर्ताव से डरते हैं, भीतर-ही-भीतर जानते हैं कि वह कभी भी उसे पटक सकती है। प्रकृति से लड़कर न एलॉन मस्क जीत सकते हैं और न बिल गेट्स। प्रोटीन के खोल में मौजूद एक नन्हा आरएनए भीतर प्रविष्ट होता है और व्यक्ति मरणासन्न होकर आईसीयू में पहुँच जाता है। इसलिए व्यक्ति को अपने अहंकार के पोषण के लिए साथी-मनुष्यों का शिकार करना होता है। मानव-अहम् की तुष्टि मानव-दलन से ही होती है, किसी और को लूटखसोट कर वह तुष्ट और महान् महसूस करता ही नहीं।”

“और जो लोग शेर को मारकर मूँछें ऐंठते थे ? या फिर जंगलों को काटकर उनपर शॉपिंग-मॉल खोलकर अपना रौब गाँठते हैं ? वे तो प्रकृति का दोहन करके ही तृप्त महसूस किया करते हैं न !”

“नहीं। शेर का शिकार करने वाला भी चेतावनी साथी-मनुष्य को ही दे रहा है कि मैं शेर को मार सकता हूँ, तो तुम्हारी क्या बिसात है। मुझसे बचकर रहना। जंगल-नाशक मॉल-निर्माता भी अपने धन को फ्लॉन्ट करके दूसरे ढंग से यही बताना चाह रहा है। मनुष्य के सारे दलन-उपक्रम अन्य मनुष्यों के लिए उसके अहंकार की ललकार हैं, आशंकित युद्ध के उद्घोष हैं।”

“सार्स-सीओवी 2 विषाणु को अगर जीता गया और जब जीता जाएगा, तब भी यह बर्ताव चलेगा?”

“बिलकुल चलेगा। न चला, तो हम-आप मिल कर सुखद आश्चर्य मनाएँगे।”

— स्कन्द।

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