साहित्य

मेरे भीतर कहीं पर कोई है, जो जागता है…

Krishna K Tripathi
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मेरे भीतर कहीं पर
कोई है, जो जागता है
बुला लेने की देर भर है
वह उठता है
और चला आता है
चुपचाप, बिन चाह और बिन कुछ पूछे

मैंने जागकर बिताई हैं
प्रतीक्षा की कितनी ही रातें
अधीरता के कितने दिन
अधछोड़ा घुट गया है मेरे भीतर
कसके; फिर उसकी ओर लौटे
मेरे ही शब्द कुछ नव-अर्थ लिए

और वह!
अपनी ही तहों में मुड़ा झाँकता
कुछ उभरा तो उचककर ताक लेता
उसकी साँस और अनगुना सा ध्यान
उनींदा ही सही किन्तु देख जाता
चिर परिचित मुस्कान धरे स्वयम में गहभरे

मैंने रख दिया था सिरहाने
परिणाम के कुछ टुकड़े निकालकर
कि कल को भरोसा जो टूटे
तो भी कुछ टुकड़े गिनने को बच जाँय
परिणाम के टुकड़े इच्छित भी नहीं
वह हैं;
अनिच्छित को निकाल देने के यत्न

मैंने कुछ न कहा
और न जानने को ही रहा
वह बेबूझ परिचित सा लगा;
ज्यों अतीत का कोई कोना वर्तमान हो गया हो
अब भविष्य रेंगता है
मेरे ही वर्तमान के अनन्तर

वह जागता कि मैं?
कि उसमें ही जीता हूँ मैं
मैं खोया कि खो गईं उसकी ही परतें
या खिसक गया है वह धीमे-धीमे मुझमें
वह जो जागता है;मुझमें भर आँखों से
मेरा ही अधूरा-पूरा हिस्सा है

कृष्ण

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