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सअदा की गुफाओं से काले धुएं का इंतेज़ार कीजिए!

जो भी यमन के लोगों से परिचित है, उनके साथ उठता बैठता है वह मुमकिन ही नहीं कि उनसे प्यार न करे। फिर वह चाहे कोई भी राजनैतिक स्टैंड रखते हों।

यमनी दिन में लड़ पड़ते हैं रात में गपशप कर रहे होते हैं। रियाज़ में उनके बीच लड़ाई हो जाती है तो लंदन में, क़ाहेरा में और कभी बैरूत में फिर मिल बैठते हैं। उनके बीच हर चीज़ के बारे में विवाद हो सकता है बस एक चीज़ को छोड़कर और वह है देश से गहरा प्रेम।

मेरे एक यमनी मित्र ने बैरूत से मुझे फ़ोन किया। एक तो वह मेरा हाल चाल लेना चाहते थे और दूसरे यह सवाल पूछना चाहते थे कि सऊदी गठबंधन ने यमन युद्ध के बीच दो सप्ताह के जिस संघर्ष विराम का एलान किया है वह जारी रह पाएगा या नहीं? इस संघर्ष विराम का यमन के मामलों में संयुक्त राष्ट्र संघ के विशेष दूत मार्टिन ग्रीफ़िथ्स ने बढ़ चढ़ कर स्वागत किया था।

मैंने उनको जो जवाब दिया वह चौंका देने वाला था। वह मुझसे कोई सकारात्मक जवाब चाहते थे जिससे संघर्ष विराम के बारे में जताया जाने वाला संदेह दूर हो जाता। मैंने उनसे साफ़ शब्दों में कहा कि अब युद्ध रोकना एक ही व्यक्ति के हाथ में है, अलबत्ता अगर वह चाहें तब, मगर वह चाहेंगे नहीं और वह व्यक्ति हैं सैयद अब्दुल मलिक अलहौसी अंसारुल्लाह के प्रमुख जो सअदा के पहाड़ों की गुफाओं में रहते हैं। इस समय यमन युद्ध में उनकी पोज़ीशन सबसे ज़्यादा मज़बूत है। पांच साल की लड़ाई के बाद अब मोर्चों की हालत यह है कि सब कुछ उनके पक्ष में दिखाई दे रहा है। न मंसूर हादी की कोई हैसियत रह गई है और न ही संयुक्त राष्ट्र संघ के विशेष दूत मार्टिन ग्रीफ़िथ्स की बात सुनने का किसी का मूड है।

अब्दुल मलिक अलहौसी का फ़ायदा इसमें नहीं है कि इस समय युद्ध रुक जाए क्योंकि जौफ़ प्रांत को वह अपने नियंत्रण में ले चुके हैं और मारिब प्रांत भी बहुत जल्द उनके नियंत्रण में आने वाला है। सऊदी अरब का पूरा दक्षिणी इलाक़ा उन्हीं के रहमोकरम पर है यानी जब चाहें इस इलाक़ें में जिस बिंदु को भी अपने मिसाइलों और ड्रोन विमानों से ध्वस्त कर दें। तो जब सब कुछ उनके फ़ेवर में है तो युद्ध विराम के लिए जल्दबाज़ी की क्या ज़रूरत है? अगर कोरोना की हम बात करें तो क्या यह उस कालेरा से बहुत अलग है जिसने यमन में हज़ारों जानें ले लीं और पूरी दुनिया में कोई भी शक्ति संघर्ष विराम कराने नहीं आई?

यह लड़ाई अंसारुल्लाह ने शुरू नहीं की लेकिन जब शुरू हो गई तो फिर उसने अपनी क्षमताओं का प्रयोग करके इस लड़ाई में अपनी पोज़ीशन बेहद मज़बूत कर ली।

यमनियों के लिए कोरोना वायरस उतना भयावह नहीं है जितना दूसरों के लिए है। दूसरों के पास खोने के लिए बहुत कुछ है। ध्वस्त हो चुके यमन में यह कोरोना क्या बिगाड़ लेगा जहां न पानी है, न बिजली है, न खाना है और न दूसरी सुविधाएं हैं। क्या इस स्थिति में यमनियों को सऊदी अरब का दो हफ़्ते का संघर्ष विराम धोखा दे पाएगा जिसने बार बार साबित किया है कि उसका संघर्ष विराम किसी भरोसे के क़ाबिल है और न ख़ुद सऊदी सरकार पर कोई विश्वास किया जा सकता है।

हमें मालूम है कि हमारा यह जवाब बहुत से लोगों को पसंद नहीं आएगा लेकिन हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। हम अपने सारे यमनी भाइयों को बहुत अच्छी तरह पहचानते हैं। हम पहले दिन से यमन के साथ हैं और हमेशा रहेंगे।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार, अतवान फ़िलिस्तीनी मूल के हैं और लंदन में रायुल यौम अख़बार के चीफ़ एडीटर हैं।

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