साहित्य

क़ैद में उदास ज़िन्दिगियां और सदी के मुहाने पर सिनेमा की औरत!

Ashish Kumar 

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कैद में उदास जिंदगियां और सदी के मुहाने पर सिनेमा की औरत !
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अभी नीद की आगोश में ही था कि देखता हूं एक असमा प्त कथा मुझे जगा रही है । आजकल रातें मुझे सम्मोहित कर रही है ।टुकड़ों – टुकड़ों में जिंदगी बीत रही है । इन दिनों सिनेमा पर लिखते – पढ़ते कई तरह की फिल्मों से साबका हो रहा है ।वैसे तो,लाइफ इन अ मेट्रो बरसो पहले देख लिया था लेकिन कुछ सूत्र शिनाख्त के लिए जब इसके कुछ अंशों को दोबारा देखा तो एक साथ चलती कई ज़िंदगियों में मेरा ध्यान शिल्पा शेट्टी और के के मेनन वाले रोल पर आकर रुक गया । मै विवाहितो का जीवन देख रहा हूं।सुहागिन औरतें । जिनके लिए पति के अलावा और कोई भी प्रेम वर्जित है ।लेकिन पति के लिए ऐसा कोई भी नियम लागू नहीं होता ।वह ऑफिस के अपनी कुलीग के साथ रिलेशन में है ।संयोग से भावनाओ का ज्वार उमड़ता है और पति इस रिश्ते के बारे में पत्नी से बता भी देता है ।आवेग में आकर पत्नी भी अपनी बात पति से कह देती है कि वह भी पिछले कुछ दिनों से अपने एक पुराने दोस्त से मिल रही है ।अब पति का रुख बदल गया ।उनके संवाद देखिए –
‘ सोई हो उसके साथ ?’

Did u use my bedroom ?
बच्ची तो मेरी हैं न ?

इतना सुन लेना ही पत्नी के लिए काफ़ी है । जबकि उसकी तरफ़ से कोई सवाल नहीं ?ये इक्कीसवीं सदी की औरत है ।जिसने अपने पति और बच्ची के लिए अच्छी -खासी नौकरी छोड़कर हाउस वाइफ बनना कुबूल किया है ।सही बात बताने पर ऐसे कमेंट सुनने को मिलते हैं । दरअसल,हमारे समाज में पितृ सत्ता की बनावट ही एकतरफा है । ज्यादातर कायदे अपने हितों को लेकर ही बनाए गए है ।सच है,विवाह जैसी संस्था में ज्यादातर औरतें पिस रही हैं ।इधर जब मैंने वैशाली की आत्मकथा ‘ बारबाला ‘ पढ़ी तो उसका भी अलग चेहरा खुलकर सामने आया ।विवाह उसके लिए भी आतंकी साबित हुआ ।जब बृहदारण्यक उपनिषद् में लिख दिया गया,”सर्वेषानाम् आनंदम उपस्थ एक अयनम ” तो फिर कहां तक बच निकलती औरत ?

बहरहाल,सिनेमा की दुनिया का सच भी इससे अछूता नहीं है ।मुझे बेतरह सारा शगुफ्ता की याद आती हैं !
‘ औरत का बदन ही उसका वतन नहीं होता,वह कुछ और भी है !’

(सिनेमा की स्त्री पर सोचते हुए कुछ टीप )

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