इतिहास

#IqbalDay : इस पेंटिंग में इक़बाल अपने वालिदैन के साथ हैं!

Syed Faizan Siddiqui
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#IqbalDay

इस पेंटिंग में इक़बाल अपने वालिदैन के साथ हैं ।

अल्लामा इक़बाल की पैदाइश से पहले उनके वालिद ने ख़्वाब में देखा कि एक कबूतर आसमान में उड़ रहा है और नीचे लोगों का मजमा है. हर कोई ये चाह रहा है कि ये कबूतर उसके पास आ जाए. थोड़ी देर में ये कबूतर अल्लामा के वालिद के पास आ कर बैठ गया.

अल्लामा के वालिद शैख नूर मुहम्मद बेहद मुफ़लिस और ख़स्ता हाल थे. बाजार में उन की टोपियों की दुकान थी. वो ख़ुद अपने हाथ से टोपी ( बुर्के वाली भी ) सी कर बेचते थे.

अल्लामा बचपन में अपने बड़े भाई अता मुहम्मद के साथ अपने घर के पास एक काग़ज़ के कारख़ाने में काग़ज कूटने जाते थे.

किसे ख़बर थी कि चंद पैसों के एवज़ काग़ज़ कूटने वाला ये बच्चा एक दिन अपनी शाइरी से एक आलम को जीत लेगा.

इक़बाल की शाइरी की घन गरज सुनकर ही दुनिया के लोग उर्दू के अदब की तरफ मुतवज्जे हुए. उन्होंने देखा कि एक बिल्कुल नई ज़बान में किस आला दर्जे की शाइरी मौजूद है. ये बात बिल्कुल ठीक है कि अपनी शाइरी के एतबार से उर्दू बर्रे सग़ीर की सब से मालदार ज़बान है. जैसी शाइरी उर्दू में की गई वैसी किसी और भारतीय भाषा में नहीं है.

उर्दू को बैनुल अक़वामी (international) सतह पर रूशनास अल्लामा ने ही कराया. जब उनका कलाम उनकी ही ज़िंदगी में यूरोपीय भाषाओं में तर्जुमा हुआ.

अपने सियासी नज़रियात की वजह से भले ही वो कुछ लोगों के निशाने पर रहे हों लेकिन इक़बाल अपनी शाइरी और खालिस इस्लामी फ़िक्र की वजह से दुनिया में एक अज़ीम शाइर तस्लीम किए गए हैं और आइंदा भी ये यक़ीन है कि जैसे जैसे कलाम ए इक़बाल नए ज़हनों पर खुलता रहेगा वैसे उनकी शायराना अज़मत में ईज़ाफ़ा होता रहेगा ।।

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