इतिहास

#IqbalDay : ये थे ‘इक़बाल’

Syed Faizan Siddiqui
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“इक़बाल” कौन थे ?

इस सवाल के जवाब में अगर मैं ग़ालिब का एक शेर दोहराऊं तो बाइस-ए-लुत्फ़ होगा | ग़ालिब का शेर है :

पूछते हैं वो कि ‘ग़ालिब’ कौन है ।
कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या ।।

तो ग़ालिब तो एक शायर की हैसियत से थे | अल्लामा इक़बाल के बारे में अगर कोई सवाल करे कि इक़बाल कौन थे तो उसका जवाब यही है कि इक़बाल कौन नहीं थे और क्या नहीं थे |

इक़बाल मिल्लत को एक देखना चाहते थे :

एक हो मुस्लिम हरम की पासबानी के लिए ।
नील के साहिल से ले कर ता-ब-ख़ाक-ए-काश्ग़र ।।

अल्लामा इक़बाल ने एक मायूस क़ौम को जो ग़ुलामी के असरात में जकड़ी हुई थी और हाली ने भी कहा था :

चलो तुम उधर को हवा हो जिधर की

और अकबर ने भी कहा था :

न हाली के मुनाजातो की परवाह की ज़माने की ।
न अकबर की ज़राफ़त से रुके याराने ख़ुद आरा ।।

और पूरा कलाम जो था मायूसी का था | अकबर तक कहते है जो सब से बड़े मुख़ालिफ़ थे मग़रिबी तहज़ीब के, कि :

अब कोशिश रायगा है कुछ हासिल नहीं है

तड़पोगे जितना जाल के अंदर ।
जाल घुसेगा खाल के अंदर ।।

इस मायूसी की कैफ़ियत में अल्लामा इक़बाल ने उम्मीद की शमा लोगों के ज़ेहन और दिलों में रौशन की । और कहा कि :

अब तेरा दौर भी आने को है फ़क़्र-ए-गयूर ।
खा गई रूह ए फरंगी को हवा ए ज़र ओ सीम ।।

और चैलेंज किया :

तुम्हारी तहज़ीब अपने खंज़र से आप ही ख़ुद-कुशी करेगी ।
जो शाख-ए-नाज़ुक पे आशियाना होगा ना पाएदार होगा ।।

दयार-ए-मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकां नहीं है ।
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र-ए-कम-अयार ।।

और अपने ऊपर एतमाद इतना था :

मैं ज़ुल्मत-ए-शब में ले के निकलूंगा अपने दर-माँदा कारवां को ।
शरर-फ़िशां होगी आह मेरी नफ़स मिरा शोला-बार होगा ।।
निकल के सहरा से जिस ने रूमा की सल्तनत को उलट दिया था ।
सुना है ये क़ुदसियों से मैं ने वो शेर फिर होशियार होगा ।।

‘इक़बाल’ वो है जिनके बारे में अब्दुल मुग़नी बडे अदीब है तनक़ीद निगार है कहते है कि दुनिया में इस से बड़ा शायर कोई नहीं गुज़रा. और दलाइल दी हैं. ये थे ‘इक़बाल’ |

ये तमाम अल्फ़ाज़ प्रोफेसर इनायत अली खान के हैं ।

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