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कोरोना वायरस ने अच्छों-अच्छों की पोल खोल दी है : अमरीका के बाद अब ब्रिटेन की औक़ात सामने आयी : रिपोर्ट

ब्रिटिश सरकार ने स्वीकार किया है कि उसने ब्रिटेन की प्रयोगशालाओं में परिचालन संबंधी मुद्दों के बाद प्रसंस्करण के लिए अमेरिका में लगभग 50 हज़ार नमूने कोरोनावायरस परीक्षण के लिए भेजे।

ब्रिटेन के स्वास्थ्य विभाग ने कहा कि विदेशों में सैंपल भेजना शुरुआती समस्याओं से निपटने की ज़रूरत थी।

संडे टेलीग्राफ ने एक रिपोर्ट में कहा कि नमूने स्टैन्स्टेड हवाईअड्डे से चार्टेड उड़ानों द्वारा अमरीका भेजे गए थे।

इन रिपोर्टों को ब्रिटेन में मान्य किया जाएगा और जितनी जल्दी हो सके इन्हें रोगियों को भेजा जाएगा। स्वास्थ्य और सामाजिक निरिक्षण विभाग के एक प्रवक्ता ने कहा कि ब्रिटेन के वायरस परीक्षण नेटवर्क का विस्तार करने के लिए और पूरी तरह से नया लैब नेटवर्क स्थापित करना के लिए नूमने जांच के लिए भेजना ज़रूरी था।

यह तब पता चली जब सरकार, स्वास्थ्य सचिव मैट हैनकॉक द्वारा तय किए गए निर्धारित 1 लाख दैनिक परीक्षण लक्ष्य को पूरा करने में सातवें दिन भी विफल रही।

ज्ञात रहे कि प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने कहा है कि उनकी महत्वाकांक्षा इस महीने के अंत तक 2 लाख परीक्षणों को हिट करने की थी और फिर उससे भी बड़े लक्ष्य को छूने की थी।


ट्रम्प और नेतनयाहू ने ईरान, सीरिया और हिज़्बुल्लाह के ख़िलाफ़ रची है नई साज़िश लेकिन इसका नाकाम होना तय, पोम्पेयो की बैतुल मुक़द्दस यात्रा का भी है कनेक्शन

अमरीका के विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो ने कोरोना वायरस के कारण 2 महीने के विराम के बाद अपनी विदेश यात्रा शुरू की और पहले पड़ाव के रूप में बैतुल मुक़द्दस का चयन किया है। यह यात्रा दक्षिणी लेबनान में इस्राईल की बड़ी पराजय की 20वीं वर्षगांठ के अवसर पर हो रही है।

इस्राईल को दक्षिणी लेबनान में हिज़्बुल्लाह के हमलों से भारी जानी नुक़सान उठाने के बाद बिना शर्त एकपक्षीय रूप से बाहर निकलना पड़ा था।

लक्ष्य तो यह बताया गया है कि पोम्पेयो बैतुल मुक़द्दस में नेतनयाहू को नई सरकार के गठन की मुबारकबाद देने जा रहे हैं मगर असली मक़सद उस साज़िश को आख़िरी टच देना है जो लगभग एक साल से अमरीका और इस्राईल रच रहे हैं मगर इस्राईल में राजनैतिक संकट जारी रहने की वजह से इस पर अमल नहीं हो पा रहा था। यह साज़िश सीरिया, ईरान और हिज़्बुल्लाह पर अमरीका में नवम्बर महीने में राष्ट्रपति चुनाव से पहले हमला करने की है।

इस्राईल और अमरीका दोनों को इस बात का बहुत दुख है कि सन 2000 और फिर 2006 में हिज़्बुल्लाह के हाथों इस्राईल की बहुत बुरी पराजय हुई जिसके बाद पूरे इलाक़े में इस्राईल की ताक़त का हौवा ख़त्म हो गया है। चार मुख्य कारण हैं जिन्होंने इस्राईली नेतृत्व की नींद हराम कर दी है।

पहला कारण है ईरान की सैनिक ताक़त में लगातार विस्तार जिसकी नई कड़ी है नूर नामक ईरानी सैनिक सैटेलाइट का अंतरिक्ष में 440 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित हो जाना। यह सैटैलाइट पूरे इलाक़े में अमरीका और इस्राईल की सैनिक गतिविधयों पर नज़र रखने में सक्षम है।

दूसरा कारण है ईरान के नेतृत्व में बने इस्लामिक रेज़िस्टेंन्स फ़्रंट का तीन दिशाओं से इस्राईल को घेर लेना। उत्तरी सीमा पर हिज़्बुल्लाह आंदोलन है जिसने अपनी मिसाइल शक्ति बहुत विस्तृत कर ली है और सीरिया युद्ध में हर तरह की झड़पों का महत्वपूर्ण अनुभव हासिल कर लिया है। पूर्वी सीमा पर सीरिया है जहां ईरान की मज़बूत सैनिक उपस्थिति है और दक्षिणी सीमा पर फ़िलिस्तीनी संगठन हैं जो आए दिन इस्राईल पर मिसाइल बरसाते हैं।

तीसरा कारण है उन अरब देशों की स्थिति का बहुत कमज़ोर हो जाना जो इस्राईल से दोस्ती की वकालत करने लगे थे। इन अरब देशों का नेतृत्व सऊदी अरब के हाथ में था और अब ख़ुद सऊदी अरब अनगिनत आंतरिक समस्याओं में फंस गया है।

चौथा कारण है लाल सागर के तट पर एक अनपेक्षित ताक़त का उदय जिसका नाम है अंसारुल्लाह आंदोलन। यमन के इस संगठन के पास अब बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन विमानों सहित हथियारों का बड़ा भंडार और बड़े जुझारू लड़ाके हैं।

दो दिन पहले इस्राईल के युद्ध मंत्री नफ़ताली बेनेत ने एक बयान दिया कि सीरिया के भीतर इस्राईल के हमले तब तक जारी रहेंगे जब तक ईरान की सारी फ़ोर्सेज़, सलाहकार और ईरान समर्थक संगठन सीरिया से बाहर नहीं निकल जाते। यह बयान शायद अमरीका और इस्राईल की साज़िश की ओर स्पष्ट संकेत है।

नेतनयाहू, पोम्पेयो और ट्रम्प को जिस बात का एहसास नहीं है वह यह है कि विजय हमेशा ज़्यादा हथियारों और ज़्यादा सैनिकों से नहीं मिलती। क्योंकि अगर एसा होता तो 20 साल पहले दक्षिणी लेबनान से इस्राईल को अपमानित होकर बाहर न निकलना पड़ता।

इस्राईल इस समय वेस्ट बैंक के इलाक़ों को हड़पने की योजना बना रहा है। यदि नेतनयाहू ने यह हरकत की तो वेस्ट बैंक में भी इंतेफ़ाज़ा शुरू हो जाएगा और फिर शायद व्यापक लड़ाई ही शुरू हो जाएगी। इस लड़ाई का अंजाम क्या होगा? ईरान के हाथों अमरीकी ड्रोन ग्लोबल हाक को मार गिराए जाने की घटना, इराक़ में अमरीका की एनुल असद छावनी पर ईरान के मिसाइलों की बरसात, यमन के अंसारुल्लाह या अलहौसी आंदोलन के मिसाइलों का सऊदी अरब के भीतर तेल व सेना के प्रतिष्ठानों पर बरसना और अमरीकी पैट्रियट मिसाइलों का नाकाम हो जाना यह सारी घटनाएं साबित करती हैं कि अमरीका और इस्राईल की साज़िश को नाकाम कौन करेगा और साज़िश रचने वालों को भारी ख़मियाज़ा भुगतने पर मजबूर कौन करेगा?

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार
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