सेहत

#कोविड-19 : यह तय करिए कि आप किसके विरोधी हैं : वैज्ञानिकों के अथवा दवा-कम्पनियों के?

Skand Shukla
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कोविड-19 के इस दौर में रेमडेसिवीर नामक दवा की कार्यशैली-उपयोग-बिक्री, तीनों को समझना ज़रूरी हो जाता है।

वर्तमान कोविड-19-पैंडेमिक का कारण विषाणु सार्स-सीओवी 2 नामक विषाणु है। विषाणु जीवाणुओं से भिन्न होते हैं, इनके पास अपनी वृद्धि की पर्याप्त कोशिकीय सामग्री नहीं होती। बल्कि ये कोशिका ही नहीं हैं, उससे भी कहीं छोटे हैं। एक विषाणु प्रोटीन-खोल में आरएनए या डीएनए का एक टुकड़ा-भर लिये हैं। विषाणु जिस कोशिका को संक्रमित करता है, पहले उसकी सतह से चिपकता है। इस चिपकाव के बाद विषाणु व कोशिका की सतह पर मौजूद प्रोटीनों में अनेक बदलाव होते हैं। फिर विषाणु अपने डीएनए या आरएनए को कोशिका के भीतर प्रविष्ट करा देता है, जहाँ कोशिका में मौजूद तरह-तरह के रसायनों के सहयोग से विषाणु के डीएनए या आरएनए की प्रतियाँ बनती जाती हैं। फिर कोशिका नष्ट होती है और नयी विषाणु-प्रतियाँ इस कोशिका को छोड़कर अगली कोशिका की तलाश में आसपास या दूर फैलने लगती हैं। यही क्रम चलता जाता है और इसी के कारण व्यक्ति में रोग के लक्षणों का जन्म होता है।

सार्स-सीओवी 2 विषाणु एक आरएनए-विषाणु है। ( यानी इसके पास प्रोटीन-खोल में आरएनए है, डीएनए नहीं। ) यह विषाणु कोशिकाओं के भीतर प्रवेश करके कोशिकीय रासायनिक मशीनरी का उपयोग करके अपनी प्रतियों का निर्माण करता जाता है। कोशिका के भीतर नये-नये विषाणु बनते हैं। फिर कोशिका नष्ट होती है और ये विषाणु उससे बाहर निकल कर फैलने लगते हैं।

आरएनए ( और डीएनए भी ) तीन मूल रसायनों से बने होते हैं : नायट्रोजन-बेस, शर्करा और फॉस्फेट। डीएनए की बात अभी हम नहीं करते हैं, क्योंकि कोरोनावायरस के भीतर यह होता नहीं। आरएनए बनाने के लिए चार प्रकार के नायट्रोजन-बेसों एडिनीन, गुआनीन, सायटोसीन और यूरासिल की ज़रूरत पड़ती है। एक ख़ास शर्करा रायबोज़ भी चाहिए होती है। और फिर फॉस्फेट तो चाहिए ही होते हैं। ये तीनों प्रकार के रसायन ख़ास ढंग से परस्पर जुड़ते हैं, तब जाकर आरएनए का निर्माण होता है।

नायट्रोजन-बेस जुड़ता है रायबोज़ शर्करा से। इस जोड़े को कहते हैं न्यूक्लियोसाइड। आरएनए के लम्बे लड़ीनुमा अणु में ढेरों-ढेर न्यूक्लियोसाइड लगे होते हैं क्रमबद्ध ढंग से। हर न्यूक्लियोसाइड से फॉस्फेट जुड़ा होता है। एडिनीन, गुआनीन, सायटोसीन और यूरासिल—चार प्रकार के नाइट्रोजन-बेसों से, ज़ाहिर है — चार प्रकार के न्यूक्लियोसाइड बनेंगे। इन चारों के नाम हैं : एडिनीन+रायबोज़ से बना एडिनोसीन, गुआनीन+ रायबोज़ से बना गुआनोसीन, सायटोसीन+ रायबोज़ से बना सायटिडीन और यूरासिल+ रायबोज़ से बना यूरिडीन। मानव-आरएनए में ये चारों मिलते हैं। सार्स-सीओवी 2 के आरएनए में भी ये चारों मिलते हैं। अब यहाँ एंट्री होती है रेमडेसिवीर नामक दवा की, जिसकी संरचना एडिनोसीन से मिलती-जुलती है।

डॉक्टर मरीज़ को रेमडेसिवीर का इंजेक्शन देते हैं, यह दवा दरअसल एक प्रोड्रग है। प्रोड्रग वे दवाएँ होती हैं, जिन्हें पहले शरीर में जाकर अपने सक्रिय स्वरूप यानी ड्रग में बदलना होता है। मानव-कोशिकाओं में रेमडेसिवीर सक्रिय होकर प्रवेश करती है। यहाँ कोरोनावायरस अपनी प्रतियाँ बनाने में लगा है। अपने एक ख़ास एन्ज़ाइम आरएनए-पॉलिमरेज़ की मदद से यह अपने विषाणु-आरएनए की नयी-नयी प्रतियाँ बना रहा है। रेमडेसिवीर चूँकि एडिनोसीन-जैसी लगती है, इसलिए विषाणु इससे चकमा खा जाता है। वह इसे एडिनोसीन की जगह इस्तेमाल कर लेता है। फिर विषाणु के एन्ज़ाइम आरएनए-पॉलिमरेज़ का कामकाज भी इस दवा के कारण रुक जाता है। इस तरह से नवीन विषाणु-आरएनए का निर्माण नहीं हो पाता। जब विषाणु का नवीन आरएनए ही नहीं बनेगा, तब नयी विषाणु-प्रतियाँ कैसे बनेंगी ? नतीजन सार्स-सीओवी 2 की कोशिकीय वृद्धि रुक जाती है।

अब-तक पाये नतीजों के अनुसार कोविड-19 में रेमडेसिवीर के करुणामय ( कॉम्पैशनेट ) प्रयोग की बात की गयी है। यह एकदम रामबाण दवा नहीं है, लेकिन कुछ लाभ इन रोगियों को ज़रूर पहुँचाती है। दरअसल रेमडेसिवीर कुछ ही महीनों से निर्मित दवा नहीं है : इसका प्रयोग पहले भी अनेक विषाणुओं के खिलाफ़ किया जाता रहा है। इस दवा की निर्मात्री अमेरिकन कम्पनी जिलियेड है, जो अनेक दवाओं का पहले भी निर्माण करती रही है।

रसायन को दवा को बनाकर बाज़ार में लाने में बिलियनों डॉलर लगते हैं। ख़ूब समय भी ख़र्च होता है। रेमडेसिवीर को भी जिलियेड ने हेपेटाइटिस-सी और रेस्पिरेटरी सिनसीशियल विषाणु के लिए एक दशक पहले बनाया था , पर मार्केटिंग का अप्रूवल नहीं मिला। इबोला, मारबर्ग, सार्स, मर्स के खिलाफ़ भी इसे इस्तेमाल किया गया, पर पर्याप्त ढंग से कारगर नहीं पायी गयी। फिर कोविड-19 फैला। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने इसे ब्रिटिश प्रधानमन्त्री को बॉरिस जॉनसन को भी लेने को कहा था, जब उन्हें यह संक्रमण हुआ था। यह अप्रैल 2019 की बात है : तब तक जिलियेड ने भी कोई विश्वसनीय दावा दवा के सन्दर्भ में नहीं किया था।

फिर धीरे-धीरे ट्रायलों के नतीजे आने शुरू हुए। इन ट्रायलों की अपनी कमियाँ थीं, इनसे परिपक्व नतीजे निकाल पाना सम्भव नहीं था। लेकिन जिलियेड के शेयर ऊपर-ऊपर चढ़ते चले गये। सत्रह अप्रैल को न्यूयॉर्क टाइम्स में ब्रेट स्टीफ़ेंस लिखते हैं कि दवा-कम्पनियों से घृणा करने से कोई लाभ नहीं। जाँचें, दवाएँ और टीके दवा-कम्पनियों की ज़बरदस्त प्रतिस्पर्धा से ही निकलेंगे। पर क्या एक वैश्विक महामारी के समय ऐसी लाभ-लोभी प्रतिस्पर्धा करने की सचमुच ज़रूरत है ? इस बीच रेमडेसिवीर-सम्बन्धित शोध आते जा रहे थे : इनकी अपनी कमियाँ थीं और ये कई तरह से अधूरे और अपरिपक्व थे। इस दौरान जिलियेड ने रेमडेसिवीर के लिए ऑर्फ़न ड्रग का लेबल यूएस-एफडीए से माँगा और उसे दे भी दिया गया। ऑर्फ़न दवाएँ वे दवाएँ होती हैं , जो विरले रोगों के इलाज में इस्तेमाल होती हैं। बाद में जब जिलियेड की आलोचना हुई, तब उसने इस लेबल को हटाने की माँग की।

फ़ार्म-कम्पनी दवा का विकास ज़रूर करती है, पर इसमें लगने वाले धन की बड़ी मात्रा जनता वहन करती है। दवा-कम्पनियाँ दवाओं के मनमाने महँगे दाम तय करती हैं और फिर उन्हें बेचती हैं। जिलियेड ने पहले भी हेपेटाइटिस-सी के लिए दवा सोफोसबुविर के अत्यधिक महँगे दाम तय किये और यह कहकर उसे उचित ठहराया कि दवा पैसा-वसूल है। बाद में अनेक अन्य दवाएँ हेपेटाइटिस-सी के लिए बना ली गयीं और वे अपेक्षाकृत कम दामों पर उपलब्ध करायी गयीं।

यह तय करिए कि आप किसके विरोधी हैं : वैज्ञानिकों के अथवा दवा-कम्पनियों के ? यह सच है कि दवा-कम्पनियों में अनेक वैज्ञानिक बेहतरीन ढंग से लगातार काम कर रहे हैं। यह सच है कि दवा भी एक सामान है और उसे बेचने के लिए बाज़ार चाहिए। पर क्या यह भूल जाया जाए कि जनता का हित व्यापारी से पहले आता है ? क्या इसे बिसारा जा सकता है कि स्वास्थ्य के ऊपर मुनाफ़े को तरजीह किसी को नहीं देनी चाहिए ?

व्यापारी आसमान से पैसा पैदा करके निवेश नहीं करता। यहीं का पैसा यहीं घूमता है, तब निवेश में लगता है। लोग जाने-अनजाने अपना धन सामाजिक कार्यों में लगा रहे होते हैं : ऐसे में क्या उन्हें इसका वापस लाभ सही ढंग से नहीं मिलना चाहिए ?

रेमडेसिवीर का कॉम्पैशनेट प्रयोग चाहे कोविड-19 में किया जाने लगे, पर इस दवा पर और अधिक बेहतर व निष्पक्ष शोध की ज़रूरत है। तब तक यह एक ऐसी दवा है, जो सटीक रोग की तलाश में अभी भटक ही रही है।

( इस लेख का एक महत्त्वपूर्ण आधार डॉक्टर समीर मल्होत्रा के विचारों पर आधारित है, जो पीजीआई चण्डीगढ़ में फार्माकोलॉजी-विभाग में कार्यरत हैं। )

— स्कन्द।

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