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दर्दनाक और कठोर उपायों की चेतावनी क्यों दे रहे हैं सऊदी वित्तमंत्री?

यह कभी नहीं हुआ कि कोई वरिष्ठ सऊदी अधिकारी इस तरह दो टूक शब्दों में आंकड़े बयान कर दे और सारी जानकारियां सामने रख दे जैसा सऊदी अरब के वित्त मंत्री मुहम्मद अलजदआन ने शनिवार को अलअरबिया टीवी चैनल के साथ साक्षत्कार में देश की आर्थिक हालत के बारे में किया।

जदआन ने साफ़ साफ़ कह दिया कि हम कोरोना से संघर्ष के तहत कड़े और दर्दनाक क़दम उठाने जा रहे हैं हमें बजट खर्च में भारी कटौती करनी होगी, बहुत सी सरकारी परियोजनाओं को स्थगित करना होगा। वित्त मंत्री ने बताया कि 60 अरब डालर क़र्ज़ लिया जा रहा है जबकि अन्य 32 अरब डालर का भी बंदोबस्त किया जा रहा है ताकि बजट घाटा पूरा किया जा सके जो 112 अरब डालर तक पहुंच गया है।

सऊदी वित्त मंत्री ने यह तो नहीं बताया कि सरकार क्या क़दम उठाने जा रही है मगर इतना तय है कि आम सऊदी नागरिक इसकी भेंट चढ़ेगा। जब सरकार अपने ख़र्चे कम करने और बड़ी परियोजनाएं रोकने की बात कर रही है तो इसका मतलब यह है कि अर्थ व्यवस्था सिकुड़ने लगी है, बेरोज़गारी बढ़ रही है, शायद तनख़्वाहों में भी कटौती की जाएगी, सार्वजनिक सेवाओं की क़ीमतें बढ़ेंगी, बिजली पानी और स्वास्थ्य संवाएं महंगी हो जाएंगी और टैक्स भी बढ़ाया जाएगा।

फ़ार्स खाड़ी के अधिकतर देशों और विशेष रूप से सऊदी अरब के सामने इस समय सबसे बड़ा संकट यह है कि तेल का निर्यात आधे से भी कम रह गया है और ग़ैर पेट्रोलियम पदार्थों का निर्यात भी इसी मात्रा में घट गया है क्योंकि कोरोना की वजह से सारी दुनिया में लाक डाउन चल रहा है। नतीजे में सऊदी अरब के शेयर की क़ीमत रविवार को 6.8 प्रतिशत कम हो गई।

सऊदी अरब के लिए आर्थिक समृद्धि, बेहिसाब ख़र्च, हथियारों की ख़रीदारी पर सैकड़ों अरब डालर की रक़म लुटाने, यमन, सीरिया और लीबिया के युद्ध में आंख बंद करके कूद पड़ने का समय अब इस तरह गया है कि वापस नहीं आएगा और इसका इस्लामी और अरब जगत में सऊदी अरब की राजनैतिक और आर्थिक पोज़ीशन पर भी गहरा असर पड़ेगा।

सऊदी अरब के सामने इस समय दो बड़े ख़तरे हैं। पहला ख़तरा दिवालया हो जाने और विदेशी मुद्रा भंडार तेज़ी से ख़त्म होने का है और दूसरा ख़तरा अमरीका से कई दशकों से जारी एलायंस टूट जाने का है।

सऊदी अरब ने दो बार बहुत बड़ी ग़लती कर दी। पहली ग़लती ईरान और रूस की अर्थ व्यवस्था को नुक़सान पहुंचाने के लिए 2014 में तेल का उत्पादन बढ़ने की थी जिसके नतीजे में तेल की क़ीमतें 110 डालर प्रति बैरल से गिरकर 30 डालर प्रति बैरल तक पहुंच गईं और दूसरी ग़लती हालिया महीनों में रूस से तेल का युद्ध छेड़ने की थी। सऊदी सरकार बिल्कुल सामने की बात समझ नहीं पाई कि तेल की क़ीमतें बुरी तरह गिरेंगी तो ख़ुद उसकी अपनी आमदनी ख़त्म हो जाएगी और यही आमदनी उसकी सबसे बड़ी ताक़त है।

इसी पैसे की ताक़त की वजह से सऊदी अरब को महत्व दिया जाता रहा है। जब सऊदी अरब आर्थिक मुश्किल में है तो अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प बेशर्मी में इस हद तक गिर गए कि उन्होंने सऊदी क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान के साथ होने वाली हालिया टेलीफ़ोनी वार्ता में कही गई बातों को भी लीक कर दिया और बताया कि उन्होंने बिन सलमान को धमकी दे दी कि तेल का उत्पादन कम न किया तो अमरीका सऊदी अरब से अपने सारे सैनिक और सारे सैन्य उपकरण बाहर निकाल लेगा और सऊदी अरब की रक्षा करना बंद कर देगा।

अमरीका और सऊदी अरब के एलायंस का अब इतना ही अर्थ रह गया है कि सऊदी अरब का पैसा हथियारों की ख़रीदारी और निवेश के नाम पर अमरीका के ख़ज़ाने में पहुंचता रहे, अमरीकी बेरोज़गारों को रोज़गार मिलता रहे, जब भी इस गाय का दूध सूख गया उसी दिन एलायंस ख़त्म हो जाएगा।

आजकल सऊदी सरकार के भीतर से बार बार ख़बरें लीक की जा रही हैं कि बड़े पैमाने पर सुधार कार्य किए जा रहे हैं। इसका मक़सद सऊदी अरब की छवि सुधारना है जो वरिष्ठ पत्रकार जमाल ख़ाशुक़जी की हत्या और एक लाख से अधिक यमनी नागरिकों के नरसंहार की वजह से बहुत ख़राब हो चुकी है। कोड़े मारने की सज़ा ख़त्म करने और कम आयु के लोगों की मौत की सज़ा कारावास की सज़ा में बदलने जैसे काम इसी लिए किए जा रहे हैं।

सुधार के यह सारे काम इस समय सऊदी सरकार की मदद नहीं कर पाएंगे। इस समय सवाल यह है कि कड़े आर्थिक फ़ैसले लागू करने के बाद सऊदी सरकार अपने नागरिकों की सुविधा के लिए क्या क़दम उठाएगी।

सऊदी अरब का शाही ख़ानदान इससे पहले सऊदी जनता से एक ही बात कहता था कि हम आपको सुरक्षा, विलासितापूर्ण जीवन, शांति और स्थिरता देंगे और इसके बदले आप देश के संचालन के सारे मामले हमारे ऊपर छोड़ दीजिए। मगर अब हालत बिलकुल बदल गई है। अब तो शांति सुरक्षा और आर्थिक विलासिता सब कुछ दांव पर लग गया है। यमन के मिसाइल रियाज़ और दूसरे शहरों तक पहुंच रहे हैं।

हमें नहीं पता कि सऊदी नेतृत्व के सलाहकार कौन लोग हैं लेकिन हमें इतना ज़रूर पता है कि उनके आर्थिक, राजनैतिक और प्रचारिक परामर्शों से इस्लामी व अरब जगत में सऊदी अरब की पोज़ीशन डावांडोल हो चुकी है। इसका एक कारण इस्राईल की ओर तेज़ी से बढ़ते सऊदी अरब के क़दम भी हैं जिनकी ओर सऊदी वित्त मंत्री ने कोई संकेत नहीं किया।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार

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