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नेहरू ने जो अमेरिका-रूस के दबाव में नहीं किया वो मोदी RSS के दबाव में कर गए!

 

Arham Zuberi
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जब सन 1939-45 में द्वितीय विश्व युद्ध हुआ जिसमें 70 देशों की जल -थल -वायु सेनाओं के 10 करोड़ सैनिकों ने भाग लिया। इस के बाद दुनियां दो धड़ों धुरी राष्ट (जर्मनी, इटली, जापान ) और मित्र राष्ट्र (अमेरिका, ब्रिटेन, रूस ) में बंट गयी थी। पूरी दुनियां के देशों को दो में से एक साइड लेनी थी। भारत को 1947 में तुरँत आजादी मिली थी और आजादी के बाद बहुत अभावों में था। भारत के सामने युद्ध कि बजाय देश को रोटी -कपड़ा मकान से लेकर हर चीज शुरुआत से बना कर देनी थी। भारत को अच्छी उपज के लिए अमेरिका से अनाज-बीज भी लेने थे, रूस से हथियार भी और अरब के शेख से तेल और विश्वविद्यालय के लिए चंदा भी। भारत ने नेहरू के नेतृत्व में ऐतिहासिक कदम उठाया और दोनों में से किसी भी देश की साइड लेने के बजाय अलग स्टेण्ड लेते हुए 120 देशों को साथ लेकर 1955 में एक संगठन बनाने पे सहमति बना ली। दस साल पहले बने संयुक्त राष्ट्र संघ में अमीर देशों का बोलबाला था लेकिन इस संघ में नेहरू ने विकासशील देशों को इकठ्ठा किया था। 1961 में बेल्ग्रिड में NAM (Non Allying Movement) देशों का संगठन आधिकारिक हो गया ये उस समय कि वैश्विक उपलब्धि थी। विश्व में भारत का डंका बजा था। इन देशों पर कोई बाहरी देश हमला करता है तो बाकी देश मदद करेंगे लेकिन खुद किसी पे हमला नहीं करेंगे ना दूसरे देश पे हमले में भाग लेंगे।

इस चीज से विश्व उद्योग जगत में मेसेज गए कि भारत में विश्व लेवल का नेतृत्व सरकार में है, भारत शांति व अमन पसंद देश है। भारत की सरकार फिलहाल देश के डेवलपमेंट पे फोकस कर रही है। नेहरू ने उस समय की तात्कालिक दूसरी “पंच वर्षीय योजना” (1956-61) का आधार औद्योग केंद्रित रखा। व्यापारियों को भारत में उद्योग लगाने में सामाजिक खतरा नहीं था। सिर्फ पॉलिसी, टैक्स और पेपरवर्क का एनालिसिस करना था क्योंकि भारत 51 मिनरल, जूट, कपास (कॉटन ) के रॉ मेटेरियल का शुरू से बड़ा स्रोत रहा था। जब 1959 में चीन ने तिब्बत पे कब्ज़ा किया तब वहाँ से भागे बौद्धों को भारत ने शरण दी व उनके धर्म गुरु दलाई लामा को रहने की व्यवस्था दी। पूरे विश्व में इन चीजों से भारत की धर्म निरपेक्ष छवि मजबूत हुईं। बाद में ईरान और इराक आपस में कट्टर दुश्मन होने के बाद भी, भारत दोनों को चावल बेचता रहा और तेल खरीदता रहा। और इस धर्म निरपेक्षता के कारण ही किसी देश ने भारत को एक साइड लेने को नहीं कहा।

भारत की धार्मिक स्वतंत्रता में रैंकिंग गिर गयी है। इसका गिरना देश के लिए कितनी बड़ी बात होनी चाहिए इसका अंदाजा शायद अब आपको होगा, इसके गहरे प्रभाव किसी विदेश नीति के जानकार से पूछिए। वर्तमान में विश्व में अतिवादिता छायी हुईं है, सरकारें नियम कठोर कर रही हैँ, ट्रंप दीवाल बना रहा है। फिर भी देशों के राष्ट्रपति -प्रधानमंत्री ओपन स्पेस में धार्मिक टिप्पड़ी नहीं करते। किसी मौलाना, किताब या धर्म विशेष पर स्टेटमेंट नहीं देते। क्योंकि कोई भी देश अपनी सालों की इमेज़ और कूटनीति को एक क्षण में बर्बाद करने के नुकसान जानता है। लेकिन 1945-50 की तरह किसी महाशक्ति का दबाव नहीं है। लेकिन नेहरू ने जो अमेरिका -रूस के दबाव में नहीं किया वो मोदी जी RSS के दबाव में कर गए। अब ऐसे में भारत की धार्मिक स्वतंत्रता में रैंकिंग गिरना कितना दुखद है?
#कालचक्र

– लक्ष्मी प्रताप सिंह
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