विशेष

पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफ़्ग़ानिस्तान के CAA वाले हिंदू भाई पूछ रहे है कि तुम्हारे मजदूर घर पहुंच गए हो तो हम आ जाएं क्या!

Skand Shukla
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अँगरेज़ जिस ‘डिवाइड एण्ड रूल’ के साथ भारत पर शासन करने में सफल रहे , वह राजनीतिक मन्त्र कदाचित् उन्हें विज्ञान ने दिया था।

‘डिवाइड एण्ड रूल’ या ‘डिवाइड एण्ड कॉन्कर’ पिछले पाँच-सौ सालों से विज्ञान के मूल में रहते रहे हैं। तोड़-तोड़ कर समझो। तोड़ते जाओ , समझते जाओ। जितना तोड़ सकोगे , उतना समझ सकोगे। विज्ञान की दृष्टि में तोड़कर समझना ही जीतना है। जितना जो समझा गया , उतना वह जीत लिया गया। यही विज्ञान-नीति है।

उपनिवेशवादियों ( विशेषकर अँगरेज़ों की ) की राजनीति में जब यह पद आया , तब इसने राजनीतिक चाल-ढाल अपना ली। विज्ञान तोड़कर-फोड़कर चीज़ें समझता था / है , उपनिवेशवादियों की राजनीति फूट डालकर लोगों को समझती है। अन्ततः विज्ञान को भी केवल समझना नहीं है , राजनीति भी लोगों को समझकर नहीं रुकने वाली। दोनों पहले तोड़ेंगे-फोड़ेंगे , फिर समझेंगे और अन्त में अपने-अपने ढंग से जीतकर शासन करेंगे।

यह तरीक़ा अवव्याख्यावाद या रिडक्शनिज़्म है। आधुनिक विज्ञान अब-तक इसी ढंग पर चलता रहा है। जानवरों और इंसानों को बायलॉजिकल इकाई की तरह देखते हैं , उन्हें रसायनों में तोड़ते हैं। रसायनों के इन पुलिन्दों को हम तत्त्वों में और तत्त्वों को उप-पारमाण्विक कणों में तोड़ते चले जाते हैं। रासायनिक तत्त्व से परमाणु , उप-पारमाण्विक कण और फिर क्वार्कों तक की यह यात्रा दरअसल रसायनविज्ञान का भौतिकी में टूटते जाना है।

बायलॉजी टूटकर केमिस्ट्री बने , केमिस्ट्री टूटकर फ़िज़िक्स — यही मुख्य धारा का विज्ञान अब-तक करता आया है। इंसानों को मशीन कहने के पीछे भी यही विचारधारा ज़िम्मेदार रही है। मशीन फ़िज़िक्स से चलती है , इंसानी देह भी उसी से चलती है। इंसान एक मशीन ही तो है। इस तरह से ज्यों हम मशीन तोड़ कर पुनः बना लेते हैं , इंसान भी बना लेंगे।

पेड़ों को समझकर हम जंगल समझ लेंगे — रिडक्शनिज़्म के इस विज्ञान-मन्त्र के साथ हम कई सौ साल चल लिये। हमने तरह-तरह की दवाएँ बनायीं ; संक्रमणों व कैंसरों पर हम जीतने लगे। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक लेकिन दो बातें धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगी थीं। इस रिडक्शनिस्ट तरीक़े की हम सीमा तक पहुँच चुके हैं और इस पर निर्भर रहकर हम सारे संक्रमणों और सभी कैंसरों पर विजय नहीं पा सकेंगे। दरअसल यह तोड़फोड़ का तरीक़ा मानव-देह को जितना सरल ढंग से समझता-समझाता है , वैसा मामला है नहीं। बायलॉजी को केमिस्ट्री में ढालने से और केमिस्ट्री को फ़िज़िक्स में तोड़ने से मानव-शरीर की सभी समस्याएँ हल नहीं की जा सकतीं। मानव-देह कम-से-कम मशीन की तरह की मशीन नहीं है , न ही वैज्ञानिक और डॉक्टर मेकैनिक हैं। पेड़ों को समझने लेने से जंगल को समझ सकने का दम भरना केवल नादानी है , और कुछ नहीं।

‘फूट डालो और समझ लो’ का यह तरीक़ा भौतिकी और रसायन-विज्ञान में चल सकता है , किन्तु जीव-विज्ञान में नहीं। मेडिकल साइंस में हम केवल मरीज़ के शरीर को अंगों में , अंगों को ऊतकों में , ऊतकों को कोशिकाओं में , कोशिकाओं को रसायनों में , रसायनों को तत्त्वों में, तत्त्व-परमाणुओं को उप-पारमाण्विक कणों में और इन कणों को क्वार्कों में बदल कर कदाचित् यह न बता पाएँ कि बरखू की फ़सल नष्ट होने पर उसके मन में आत्महत्या का विचार क्यों आया और राम सिंह के शरीर में बैठे टीबी के जीवाणु उसमें रोग क्यों नहीं पैदा कर रहे। इसके लिए विज्ञान को सर्वथा नये तौर-तरीक़े से सामान्य और समस्यापरक को समझना होगा। और इस तौर-तरीके में हमारी मदद करेंगे कम्प्यूटर और गणित। अब हम शरीरों को तोड़कर उन्हें नहीं समझेंगे , उन्हें शरीर बने रहेंगे देंगे और फिर समझने की कोशिश करेंगे। शरीर को शरीर के रूप में समझना शरीर ही को बेहतर समझना होगा।

सिस्टम्स बायलॉजी और नैनोटेक्नोलॉजी जैसे विषय मानव-चिकित्सा का सन्निकट भविष्य हैं। आज जब हम एक नये कोरोनावायरस से जूझ रहे हैं , तब पारम्परिक रिडक्शनिस्ट तरीक़े के अलावा कई वैज्ञानिक इन नये तरीक़ों से भी इस विषाणु पर विजय पाने में लगे हुए हैं। विषाणु और जीवाणु हमारे रसायनों का जवाब रसायनों से दे रहे हैं। यह दरअसल रसायनों की रसायनों से लड़ाई है। किन्तु परम्परागत ढंग से हम कितने रसायन बना सकते हैं ? कितनी एंटीबायटिक बनाएँगे ? कहाँ-कहाँ कैंसर-कोशिकाओं को रासायनिक युद्धों में मात देंगे ? नैनोतकनीकी के माध्यम से हमें जीवाणु या विषाणु को किसी दवा से नहीं हराना है , बल्कि नैनोकणों के माध्यम से उनमें त्रुटि पैदा कर देनी है। जिस तरह से विषाणु जीवाणु की सतह में छेद कर देता है , उसी तरह हमारे नैनोकण भी करेंगे। इसी तरह विषाणुओं के साथ भी जूझा जाएगा। दिलचस्प बात यह कि इन तरीक़ों के खिलाफ़ प्रतिरोध विकसित कर पाने का इन कीटाणुओं को समय ही न मिल सकेगा।

मस्तिष्क में चेतना कैसे रहती है ? इस प्रश्न का उत्तर रिडक्शनिस्ट तरीक़ा दे सके , मुझे संशय है। आपको भी होगा। मस्तिष्क को तोड़ते जाइए और चेतना खोज कर दिखाइए। बहुत मुश्किल मामला है। यहाँ भी सिस्टम्स बायलॉजी जैसे तरीक़ों का योगदान महत्त्वपूर्ण हो सकता है। सम्पूर्णता को नष्ट किये बिना उसे समझते हुए शरीर के रहस्य बूझिए। सिस्टम्स बायलॉजी में सिद्धान्त भी होंगे , प्रयोग भी , मॉडलों का भी स्थान होगा। किन्तु इसमें अनेक क्षेत्रों के वैज्ञानिक संग बैठकर किसी पहेली को सुलझाने का बेहतर प्रयास करेंगे।

‘डिवाइड एण्ड रूल’ को विज्ञान अब त्यागने के क्रम में है। फूट डालकर आप कुदरत को एक सीमा के बाद समझकर राज नहीं कर सकते। आप पूछेंगे कि क्या विज्ञान के इस समन्वयीकरण को आधुनिक राजनीति भी अपनाएगी ? अपना ही रही है। हमारे-आपके आँकड़ों को जमा करके कम्प्यूटरों द्वारा उनसे पैटर्न निचोड़े ही जा रहे हैं। हमें समझा जा रहा है , ताकि हमें रिझाया-भरमाया जा सके। राजनीति समन्वय से और चतुर होकर फूट डालना बेहतर सीखेगी। इस काम में कम्प्यूटरीय एल्गोरिद्म उसकी मदद करेंगे।

विज्ञान और राजनीति ने तरीका चाहे बदल दिया हो, जीतने की इच्छा नहीं त्यागी। उसके त्याग के बाद तो विज्ञान और राजनीति की पहचान का संकट खड़ा हो जाएगा ! जब तक जन-संख्या पर सत्ता की निर्भरता है , आँकड़ों का अध्ययन बढ़ता और बेहतर होता जाएगा। जनसंख्या को समझो , उनसे ट्रेंड निकालो , फिर लोगों को व्यक्तिगत स्तर पर बदलने की कोशिश करो। कम्यूटरीय एलोगोरिद्मों द्वारा जन-मन की हैकिंग करो। हैकीकृत जनता फिर जनता रहेगी ही नहीं : जिस समुदाय की विभिन्नता पहले से पता हो और जिसे बदला जा सकता हो , वह तो मानवीय होने का अधिकार ही कदाचित् खो देगा।

— स्कन्द।

 

Shanu Lala Flag of India شانو لالا
@lala_shanu
पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान के CAA वाले हिंदू भाई पूछ रहे है की तुम्हारे मजदूर घर पहुंच गए हो तो हम आ जाएं क्या,Thinking face

Shamsher Ali Khan
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जब मुगलों ने पूरे भारत को एक किया तो इस देश का नाम कोई इस्लामिक नहीं बल्कि “हिन्दुस्तान” रखा , हाँलाकि इस्लामिक नाम भी रख सकते थे , कौन विरोध करता ?

जिनको इलाहाबाद और फैजाबाद चुभता है वह समझ लें कि मुगलों के ही दौर में “रामपुर” बना रहा तो “सीतापुर” भी बना रहा। अयोध्या तो बसी ही मुगलों के दौर में।

आज के वातावरण में मुगलों को सोचता हूँ , मुस्लिम शासकों को सोचता हूँ तो लगता है कि उन्होंने मुर्खता की। होशियार तो ग्वालियर का सिंधिया घराना था , होशियार मैसूर का वाडियार घराना भी था और जयपुर का राजशाही घराना भी था तो जोधपुर का भी राजघराना था।

टीपू सुल्तान थे या बहादुरशाह ज़फर सब बेवकूफी कर गये और कोई चिथड़े चिथड़ा हो गया तो किसी को देश की मिट्टी भी नसीब नहीं हुई और सबके वंशज आज भीख माँग रहे हैं।

अँग्रेजों से मिल जाते तो वह भी अपने महल बचा लेते और अपनी रियासतें बचा लेते , वाडियार , जोधपुर , सिंधिया और जयपुर राजघराने की तरह उनके भी वंशज आज ऐश करते।

उनके भी बच्चे आज मंत्री विधायक बनते।

यह आज का दौर है , यहाँ “भारत माता की जय” और “वंदेमातरम” कहने से ही इंसान देशभक्त हो जाता है , चाहें उसका इतिहास देश से गद्दारी का ही क्युँ ना हो।

बहादुर शाह ज़फर ने जब 1857 के गदर में अँग्रैजों के खिलाफ़ पूरे देश का नेतृत्व किया और उनको पूरे देश के राजा रजवाड़ों तथा बादशाहों ने अपना नेता माना। भीषण लड़ाई के बाद अंग्रेजों की छल कपट नीति से बहादुरशाह ज़फर पराजित हुए और गिरफ्तार कर लिए गये।

ब्रिटिश कैद में जब बहादुर शाह जफर को भूख लगी तो अंग्रेज उनके सामने थाली में परोसकर उनके बेटों के सिर ले आए। उन्होंने अंग्रेजों को जवाब दिया कि

“हिंदुस्तान के बेटे देश के लिए सिर कुर्बान कर अपने बाप के पास इसी अंदाज में आया करते हैं।”

बेवकूफ थे बहादुरशाह ज़फर , आज उनकी पुश्तें भीख माँग रहीं हैं।

अपने इस हिन्दुस्तान की ज़मीन में दफन होने की उनकी चाह भी पूरी ना हो सकी और कैद में ही वह “रंगून” और अब वर्मा की मिट्टी में दफन हो गये।

अंग्रेजों ने उनकी कब्र की निशानी भी ना छोड़ी और मिट्टी बराबर करके फसल उगा दी , बाद में एक खुदाई में उनका वहीं से कंकाल मिला और फिर शिनाख्त के बाद उनकी कब्र बनाई गयी।

सोचिए कि आज “बहादुरशाह ज़फर” को कौन याद करता है ? क्या मिला उनको देश के लिए दी अपने खानदान की कुर्बानी से ? आज ही के दिन 7 नवंबर 1862 को उनकी मौत हुई थी , किसी ने उनको श्रृद्धान्जली भी दी ? कोई नहीं। किसी ने उनको याद भी किया ? कोई नहीं।

ना राहुल ना मोदी

ऐसा इतिहास और देश के लिए बलिदान किसी संघी का होता तो अब तक सैकड़ों शहरों और रेलवे स्टेशनों का नाम उनके नाम पर हो गया ।
साभार
रतन सिंह मानव !!

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