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बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ : ‘आम आदमी’ सत्ता में है

Nazia Khan
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नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ आंदोलन करने वाले जामिया छात्रों को दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया जा रहा है। छात्र नेता मीरान हैदर से शुरु हुईं ये गिरफ्तारियां अभी तक थमने का नाम नहीं ले रहीं हैं। दिल्ली पुलिस किस तरह बेलगाम हुई है इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि जामिया की छात्रा सफूरा जरगर जो प्रेगनेंट भी हैं, उन्हें भी दिल्ली पुलिस ने नहीं छोड़ा। यह उन लोगों के साथ हो रहा है जिन्होंने विवादित नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ आवाज़ बुलंद की थी।

इसके अलावा सोशल मीडिया के साईबर गुंडों द्वारा बीते तीन दिनों से जिस तरह सफूरा के चरित्र को लिंच किया गया है वह बताता है कि समाज का एक बड़ा हिस्सा महिलाओं के प्रति कैसी घटिया मानसिकता रखता है। सफूरा की प्रेगनेंसी के बहाने लेकर भाजपा के कई नेता और उनके गुर्गे एक होनहार छात्रा का चरित्र हनन करने में लगे हैं। ये सब उसी गैंग का हिस्सा हैं जो गैंग तीन तलाक के बहाने मुस्लिम महिलाओं को ‘इंसाफ’ देने का दंभ भर रहा था। लेकिन बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसे नारा देने वाले अब एक बेटी के चरित्र हनन करने में तमाम सीमाएं लांघ चुके हैं।

विडंबना देखिए यह सब दिल्ली में हो रहा है। वह दिल्ली जहां ‘आम आदमी’ सत्ता में है, जिसके पास स्वाती मालीवाल जैसी ‘जुझारु एक्टिविस्ट’ महिला आयोग की अध्यक्ष है। स्वाती लगभग हर एक जानकारी ट्वीट करके देती हैं। मसलन किन महिलाओं के लिये धरना दिया, कितने भूख हड़ताल की, महिलाओं को इंसाफ दिलाने के लिये अनशन किया वग़ैरा वग़ैरा, लेकिन हैरानी देखिए कि तीन दिन से एक एक होनहार छात्रा के चरित्र का तमाशा बना दिया गया लेकिन मंजाल भला जो स्वाती मालीवाल का कोई बयान, कोई ट्वीट इस पर भी आया हो. क्या उन्होंने अपने मोबाईल से ट्वीटर डिलीट कर दिया है? क्या उन्हें सफूरा के चरित्र को लिंच करने वाले गैंग की एक्टिविटी नज़र नहीं आईं?

एक छात्रा के चरित्र हनन पर अगर महिला आयोग एक्शन नहीं ले रहा है तो फिर ऐसे आयोग का महत्तव ही क्या है? फिर आयोग किसलिये है? फिर महिला सशक्तीकरण का नारा किसलिये? महिला सम्मान की बातें किसलिये? जब महिला आयोग एक महिला स्कॉलर की सम्मान की लड़ाई नहीं लड़ सकता तो फिर किसकी लड़ाई लड़ेगा? किसी महिला से किसी के भी वैचारिक मतभेद हो सकते हैं/होते हैं, लेकिन क्या यह मतभेद उस महिला के चरित्र को लिंच करने की आज़ादी दे देते हैं? सफूरा दिल्ली में रहती है इसलिये दिल्ली महिला आयोग की खामोशी सवालों के घेरे में है। स्वाती मालीवाल अगर अपनी चुप्पी नहीं तोड़तीं हैं तो फिर समझ लीजिये कि दिल्ली महिला आयोग भी बाक़ी के संस्थानों की तरह दोहरा चरित्र रखता है।

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