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बेहतर हो कि कश्मीर के साथ जो किया जा रहा है वो पूरे हिन्दोस्तान के साथ किया जाये : video

 

इस वक़्त हालात बहुत खराब हैं, कोरोना ने दुनियां की तस्वीर बदल दी है

2014 के लोकसभा चुनावों के समय को याद करें, टीवी चैनलों, रैलियों, सभाओं में सिर्फ ‘अबकी बार मोदी सरकार’ का नारा था, तब मोदी ने हर साल दो करोड़ नौकरियां देने की बात कही थी
– 100 नए शहर, स्मार्ट सिटी बसाने का वादा था
– एक साल के अंदर तमाम आपराधिक रिकॉर्ड वाले नेताओं के मुकद्ममों को स्पेशल कोर्ट में चलवाकर समापन कराया जायेगा
– काला धन, विदेशों से बाहर लाया जायेगा
– हर सांसद एक गॉंव को ”आदर्श ग्राम’ बनाये
– हाई स्पीड ट्रेन चलना थीं
-बुलेट ट्रैन, चलना थीं
– वाराणसी को क्यूटो बनाया जाना था
– सबका साथ सबका विकास करना था ”विकास”
– FDI आने वाली थी
– और भी बहुत कुछ था

अब कोरोना फैला हुआ है, दुनियांभर में तबाही मची है, भारत में लाखों मजदुर, ग़रीब सड़कों पर पैदल निकल पड़े हैं, उन्हें घर जाना है
– अप्रैल 2020 में भारत में 12 करोड़ 15 लाख लोगों का रोज़गार छिन गया है
– दस में से 6 लोग ग्रामीण इलाकों में बेरोज़गार हैं
– मनुफैक्टरिंग सेक्टर में 21 फीसद की गिरावट हुई है
– GDP ग्रोथ 2020-21 में निगेटिव रहेगा, RBI
– इंडस्ट्रियल सेक्टर में 17 फीसद की गिरावट आयी है
– नौकरीपेशा लोगों में एक करोड़ 78 लाख लोगों की नौकरियां ख़त्म हो गयी हैं
– 9 करोड़ 30 लाख शहरी श्रमिकों की नौकरियां चली गयी हैं
– कोर सेक्टर में 6.5 फीसद की गिरावट

साल 2019 की गर्मियां ख़त्म हो चुकी थीं, नवम्बर दिसंबर के महिने की सर्दियों में लाखों महिलाएं अपने घर छोड़कर सड़कों पर थीं, छोटे-छोटे मासूम बच्चे उनके साथ थे, घाना कोहरा, कड़ाके की ठण्ड, सर्द हवाएं, बारिश,,,और फिक्र में डूबे करोड़ों लोग, फिर दंगों में अपने लोगों को हथियार देकर ‘ख़ास’ निशान वालों को मारना, घरों को, बाज़ारों को जलाना,,,देशभर में बन रहे ‘डिटेंशन सेंटरों’ में भरे जाने वाले लोगों की खोज के लिए नागरिकता साबित करने की आफ़त,,,

CAA जब संसद में पास होने के बाद कानून बना तो मेने उसे पूरा पढ़ा, समझा, उसके बाद NRC के बारे में तफ्सीली जानकारी हासिल कीं, तब मै कई दिन तक गुमसुम सा रहा, खबरें भी नहीं की, और जो काम थे उनमे भी मन नहीं लगा,,,मै हैरान था कि संघ ने बड़ी क़ाबलियत के साथ हर तरफ से ”’मुसलमानों”’ की घेराबंदी की है, सुप्रीम कोर्ट आख़िरी एक ‘दर’ और बाकी था जहाँ से राहत मिलने की उम्मीद रह गयी थी,,,CAA, NRC, NRP को लेकर मुसलमानों की महिलाओं ने मोर्चा संभाला और जिस तरह से मुल्क के तमाम धर्मों के लोगों ने सामने आ कर कमान संभाली, तब सरकार और जनता के आमने सामने आने की नौबत आने ही वाली थी,,,,कि कोरोना आ गया,,,,कोरोन नज़र तो आता नहीं है मगर उसकी मौजूदगी के निशान पूरी दुनियां में नज़र आ रहे हैं, बड़े बड़े ज़ालिमों को गिरेबां से पकड़ लिया है,,,

कश्मीर में सरकार ने 370 ख़त्म किया था तब ‘लॉक डाउन’ शब्द चलन में आया था, सरकार ने कश्मीर को हर तरफ से पैक कर दिया, हर जगह सैनिकों की तैनाती कर दी गयी, हुकुम हुआ कि कोई भी आदमी, औरत, बच्चा घरों से बाहर नहीं आयेगा, कर्रा वाला कर्फ्यु लगा दिया गया,,,कश्मीर और नागरिकता कानून की उलझनों से परेशान लोगों की परेशानी और बढ़ाने के लिए कोरोना आ गया,,,,,

कहते हैं ”वो” जो कुछ भी करता है उसमे कोई मस्लिहत ज़रूर होती है, अब CAA, NRC, NRP की बात कहीं भी सुनाई नहीं दे रही हैं, कश्मीर का लॉक डाउन कैसा  होगा,,,,देखो पूरा देश, पूरी दुनियां ही ”कश्मीर” बन गयी है, हर जगह ‘लॉक डाउन’ है,,,

पुराने लेख
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सेकुलरिज्म का ज़माना गुज़र चुका है

अब मुल्क में कट्टरपन, नफरत, बटवारे, क़त्ल, आगज़नी, लोगों को जानवरों की तरह पीटे जाने, दमन, अत्याचार का बोलबाला है, सदियों पुरानी सभ्यतों की अच्छाइयाँ मिटाई जानी हैं, आपसी भाईचारे को दुश्मनी में बदलना है, मनुिसमिरीति देश का कानून बनने वाला है

2014 का लोकसभा चुनाव बीजेपी/मोदी ने विकास के नारे पर लड़ा था, जनता को हर साल दो करोड़ नौकरियां देने की बात की थी, 100 नये स्मार्ट सिटी बनने का वादा किया गया था, हर सांसद को अपने इलाके के एक गॉंव को ”आदर्श ग्राम” बनाना था, एक साल के अंदर तमाम आपराधिक रिकॉर्ड वाले नेताओं के मुकदद्मों की स्पेशल कोर्ट में सुनवाई होना थी, हर आदमी को काला धन में से पंद्रह लाख मिलने थे, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ की बात की थी, महिला सुरक्षा पर काम करने का वादा किया गया था, सरस्वती नदी को हरियाणा में खोज लिया गया था, उसका पानी राजिस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश पहुँचने वाला था जिससे किसानों को फायदा होता, गंगा की सफाई, अन्य नदियों की सफाई और उन्हें आपस में जोड़ना था, सड़कों का जाल बिछाया जाना था, मेट्रो चलना थी, हाई स्पीड रेल का ट्रेल दिल्ली से आगरा तक हो गया था और देशभर के सभी लम्बे मार्गों पर हाई स्पीड रेल चलायी जानी थी, गंगा के अंदर शिप चलने थे,,,,पांच साल बाद जब चुनावों का वक़्त आया तो सरकार के पास रिपोर्ट कार्ड में ”शुन्य’ था, कोई एक भी वादा ये सरकार पूरा नहीं कर सकी थी,,,तभी पुलवामा में आतंकवादी हमला होता है और फिर पाकिस्तान के खिलाफ बालाकोट की कार्यवाही,,,2019 के लोकसभा चुनावों में न तो पांच साल का हिसाब था न विकास की बात अब चुनाव ”पाकिस्तान’ ‘पुलवामा’ के मुद्दे तक रखा गया, चुनाव आयोग ने अपना जितना रोल हो सकता था सरकार के पक्ष में अदा किया, चुनावों में बीजेपी को कामयाबी मिली और विपक्ष हार गया,,,,कश्मीर से 370 ख़त्म होने के बाद भारत की सरकार अंतरष्ट्रीय मीडिया और सरकारों के निशाने पर थी, ऐसे में CAA लाया गया, कश्मीर की बात कहीं खो गयी, वहां की खबरें तो वैसे भी दिल्ली का संघी मीडिया नहीं दिखा रहा था, नागरिकता कानून को लाने के बाद NRC का मसला और बाद में NRP का लाया जाना,,,जनता का भारी विरोध, प्रदर्शन, पुलिस को खुली छूट का दिया जाना, पुलिस के दमनकारी कार्यों के बावजूद विरोध रोज़ हो रहे हैं, जितना दमन, अत्याचार पुलिस के ज़रिये हुआ है सड़कों पर लोगों की तादाद बढ़ी है, यहाँ सरकार का मानना है कि जनता कुछ दिन प्रदर्शन करने के बाद थक हार कर घर बैठ जायेगी, संघ नागरिकता कानून को वापस नहीं होने देगा इसके लिए चाहे ”कुछ भी” करना पड़े, नागरिकता कानून का विरोध भी थमने वाला नहीं है, ये करोड़ों लोगों और उनकी आने वाली नस्लों का मसला है, ये वजूद का मुद्दा है,,,

विरोध, प्रदर्शन और विश्व में हो रही फजीयत से बचने के लिए सरकार के पास जो रास्ते हैं, उनमे से एक है सॉफ्ट टारगेट पाकिस्तान, पाकिस्तान के खिलाफ कोई बड़ी कार्यवाही शुरू होने की सूरत में देश के अंदर हो रहे प्रदर्शन खुद बंद हो जायेंगे, लेकिन ये तरीका कामयाब होगा ही इसकी गारंटी नहीं है, जंग के मैदान में नतीजा किसके हक़ में आयेगा ये कोई नहीं कह सकता है, अगर युद्ध लम्बा चल गया तो देश के अंदर जनता सरकार के खिलाफ विद्रोह भी कर सकती है, बाज़ारों में खाने पीने की चीज़ों की भी तंगी हो जाएगी, साथ ही कारोबार तबाह हो जायेंगे, इसलिए अन्य रास्तों पर भी ग़ौर करना पड़ेगा, और दूसरा तरीका है ‘आपातकाल’, जिस तरह से कश्मीर से 370 हटाया गया और सेना लगा कर सबको ‘बंधक’ बना लिया गया था ठीक उसी तरह से ‘आपातकाल’ लगा कर जनता के विरोध प्रदर्शनों को रोका जा सकता है, ये आपातकाल लम्बे समय तक रहेगा ताकि NRC की प्रक्रिया को उसी दौरान पूरा कर लिया जाये और जिस किसी को ‘डिटेंशन सेण्टर’ भेजना हो, भेजा जा सके, इस काम को करने में सरकार को अब कोई मुश्किल भी नहीं होगी, सेना की सयुंक्त कमान चीफ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ के पास आ चुकी है, सेना को सरकार के आदेशों का पालन करना ही होता है,,,

नागरिकता कानून और NRC का मसला आसनी से हल नहीं होने वाला है,इस मसले पर सिर्फ सुप्रीम कोर्ट ही अकेला जरिया है जो सरकार के बढ़ते क़दमों को रोक सकता है, अगर फैसला सरकार के हक़ में आता है तो देश के अंदर जो होगा वो न तो लिखा जा सकता है, न फिलहाल बोला जा सकता है, हज़ारों सालों के बदले, गढ़े मुर्दों, कब्रों से लाशें,,,,

मुसलमानों के हाथ से सब कुछ निकल चुका है : अब तैय्यारी कर लेना चाहिए उस वक़्त के लिए जब डंडे के ज़ोर पर हाँके जायेंगे!

इस वक़्त रात के 2 बज कर 37 मिनट हुए हैं, बुधवार का दिन है और 28 अगस्त 2019 है, आज मेरे बाप को इस दुनिया से गुज़रे हुए पूरे दस बरस हो गए हैं, माँ का इन्तिक़ाल हुए 11 बरस और एक महिना हो चुका है, मुझे रात में जागने की आदत 9 क्लास से है, तब पढ़ाई के लिए जागना होता था और अब ‘फ़िक्र’ में जागता रहता हूँ, मेरे हाथ में कुछ करने का है नहीं फिर भी सोचता रहता हूँ,,,आप यक़ीन जानिए अब भारत में मुसलमानों के हाथ से सब कुछ निकल चुका है, अब सबको मिलकर तैय्यारी कर लेना चाहिए उस वक़्त के लिए जब डंडे के ज़ोर पर ग़ुलामों की तरह हाँके जायेंगे, गोली मार कर मार दिए जायेंगे, ज़िंदा क़ब्रों/गढ़ों/नालों/नहरों/दरिया में बहा दिए जायेंगे

स्पेन में भारत की तरह मुसलमानों की 800 बरस हुकूमत रही थी, वहां के मौलवी रात -रात भर बहस करते कि ‘सुई के नाक़े’ में से ऊँट को कैसे निकाला जा सकता है, मौलवी ऊँट को सुई के नाके से निकालने में लगे रहे उधर हुकूमत ही हाथ से निकल गयी, भारत में भी मुसलमानों ‘सुन्नी’ मुसलमानों के ओलिमा झूठे और मक्कार हैं, इनकी बदमाशियों की वजह से आज क़ौम ‘अंधी गली’ में जा पहुंची है

भारत के बटवारे के बाद से ही मुसलसल एक संगठन सरकारों के साथ मिल कर मुसलमानों के खिलाफ षड्यंत्र/जाल बिछाता रहा जो बिलकुल साफ़ नज़र आता था मगर मुसलमानों के सड़ियल बुद्धिजीवी और उलिमाओं ने जान कर भी आने वाले ख़तरे से कैसे निपटा जाये की तरफ नहीं सोचा, अब कहा सकते हैं ”अब पछताए क्या होये जब चिड़िया चुग गयीं खेत’,,,सांप निकल गया लकीर को पीटते रहने से कुछ नहीं होने वाला,

देश में बिलकुल शुरू से ही मुस्लिम दुश्मनी का एजेंडा चलाया गया, जो आज तक जारी है, अब सरकार ने जो तै एजेंडा ‘संघ परिवार’ का है को अंजाम तक पहुंचाने का बीड़ा उठा रखा है, उनको हर मुस्लमान से समस्या है, सारे मुस्लमान उनको दुश्मन नज़र आते हैं, सारे मुसलमानों को सबक सिखाना उनका मकसद है, और अब इनके पास तमाम तरह की ताक़तें हैं जिनके दम पर ये जो चाहें कर सकते हैं

मुसलमाओं के ओलिमा/मौलवी पहले तो खुद ही अनट्रेंड, नजानकार हैं दूसरे इनको सिर्फ नमाज़ पढ़लेना ही दीन मालूम होता है, एक एक मोहल्ले में कई कई मस्जिदें बनी हैं मगर कोई एक भी लाइब्रेरी, पार्क आप को ढूंढे नहीं मिलेगा,

बहुत सारे मौलाना लोग मदरसे चला रहे हैं, इन मदरसों से इनका मक़सद किसी को तालीम देना नहीं है बल्कि अपना ‘हिल्ला’ है, बदमाश किस्म के लोगों की वजह से आज मुस्लमान ‘बर्बादी’ के कगार पर खड़ा है

किसी भी शहर में चले जाईये, किसी भी मुस्लिम इलाके में चले जाइये वहां हर तरह का नशे का सामान आप को बहुत आसानी से मिल जायेगा, नौजवान नशे में हैं और बुद्धिजीवी, ओलिमा हज़रत मज़े कर रहे हैं


बहुत बार आप को अपनी हैसियत/ताक़त से ज़यादा दम लगाना पड़ता है, मुझे चूँकि बचपन से कुश्ती लड़ने, घुड़सवारी करने, कबड्डी खेलने,,,आदि का मौक़ा मिला है तो कह सकता हूँ कि हम पांच मिनेट की ‘कुश्ती/फाइट’ के लिए घंटों मेहनत करते थे, 6 – 7 km की दौड़ लगाते, तब जा कर ‘सिर्फ़’ पांच, दस मिनट लड़ने लायक़ हो पाते थे, बैठ कर देखने में हर चीज़/काम बहुत आसान सा लगता है, मैदान में जो खेलते हैं, वो जानते हैं कि कब कैसे खेलना है, दर्शक होना मज़े की बात है, खिलाडी होने के लिए मेहनत करना पड़ती है

मुसलमानों को क्या कभी ये अहसास होता है कि जितना मेहनत उन्हें राजनीती आदि के हल्क़ों में करना चाहिए थी की है, हम जिन लोगों को अपना लीडर/क़ायद मानते रहे हैं क्या उनके ग़लत फ़ैसलों पर हम खुद बोले हैं, कभी उन पार्टियों में जिनमे हमारे नेता ‘ठेकेदार’ बन कर बैठे होते हैं उनसे उनकी नाकामियों की बात की है

इबने मरियम हुआ करे कोई
मेरे दर्द की दवा करे कोई

जब बाबरी मस्जिद को शहीद कर दिया गया था, उस वक़्त भी कांग्रेस व् अन्य पार्टियों में मौजूद मुसलमानों में से किसी, प्रधान, सभासद, विधायक, सांसद, मंत्री ने इस्तीफा नहीं दिया था, 26 जनवरी, 1993 को अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के प्रोग्राम में शामिल होने के लिए उस वक़्त के केंद्रीय मंत्री ‘सलमान खुर्शीद’
अमुवि में आये थे, कैंनेडी हाल में उनकी तक़रीर होना थी,,,मजबूरन और तैश में उनको धक्के मार कर बाहर किया था

जून या जुलाई 1995 में कांग्रेस के सदर सीताराम केसरी अमुवि में किसी प्रोग्राम में शामिल होने आये थे, आये तो थे पर लुंगी लपेट कर भागना पड़ा था
2004 के लोकसभा चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश में एक ‘आवामी फ्रंट’ बना था, तब मौलाना अरशद मदनी से लोगों ने उसमे शामिल होने की बड़ी खुशामदें कीं थीं, मदनी ने ये कह कर कि मै एक मज़हबी रहनुमा हूँ राजनीती से मेरा वास्ता नहीं है खुद को अलग कर लिया था, बाद में वो अजित सिंह की लोकदल से राजयसभा सदस्य बन गए थे

Kashmiri women grieve after hearing rumours of the death of Yasir Rafiq Sheikh in Srinagar on August 31, 2010. Sheikh was injured with four others on August 30, when police allegedly opened fire on a group of residents in the city. The Muslim-majority Kashmir valley has been rocked by unrest since a teenage student was killed by a police tear-gas shell on June 11. Since then, 65 people have been killed as the security forces regularly opened fire to control angry separatist demonstrations triggered by each civilian death. AFP PHOTO/ Sajjad HUSSAIN (Photo credit should read SAJJAD HUSSAIN/AFP/Getty Images)

2006 में उत्तर प्रदेश में असम की तर्ज़ पर एक बड़ा फ्रंट बनाने की कोशिशें हो रही थीं, दिल्ली में मौलाना अहमद बुखारी की मौजूदगी में कई मीटिंग हुईं, कोई फ़ैसला हो पाता उससे पहले ही आल इंडिया मुस्लिम फ़ोरम के सदर निहालुद्दीन ने अप्रैल महिने में UP-PDF के बनजाने का एलान कर दिया, उसके अध्यक्ष बनाए गए मौलाना कल्बे जव्वाद,

दिल्ली में मीटिंग अभी भी जारी रही और फिर 5 जुलाई 2006 को लखनऊ के एक हाल में ”नाम अब याद नहीं’ बड़ा कार्यक्रम हुआ, जिसमे मौलाना अहमद बुखारी, उनके भाई तारिक़ बुख़ारी, पूर्व केंद्रीय मंत्री सी.एम.इब्राहिम, खान आतिफ ख़ान, नईमुल्लाह अंसारी, डॉ अरशद, अहमद सलीम ख़ान पीरज़ादा, युसूफ कुरैशी जैसे और कई नेता मंच पर नज़र आये, यहाँ उस दिन UDF (यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) का गठन हुआ, सी.एम.इब्राहिम राष्ट्रीय अध्यक्ष बने, युसूफ कुरैशी को उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष बनाया गया, पीरज़ादा राष्ट्रीय महासचिव, व् अन्य को भी ज़िम्मेदारियाँ दे दी गयीं, प्रोग्राम के ख़त्म होने के बाद अहमद बुखारी ने मीडिया से बात की, शानदार बयान दिए,,,6 जुलाई की सुबह हम लोग वापस अलीगढ आ गए,,,7 को गिरफ़्तारी हो गयी और 10 जुलाई को जेल पहुंचना हो गया,,,एक दिन जेल में ख़बर पढ़ी कि UDF बिखर गया, बिना किसी को बताये युसूफ कुरैशी ने उसको अपने नाम से एक पार्टी के तौर पर रजिस्ट्रड करवा लिया था, जब ये जानकारी बाक़ी लोगों को हुई तो ‘डॉग्स फाइट at स्ट्रीट’ शुरू हो गयी,,,युसूफ कुरैशी ने अपने कुछ कैंडिडेट खड़े किये, पीरज़ादा वी.पी.सिंह के जन मोर्चा में शामिल हो गए, बाकियों ने अभी अपनी अपनी राह पकड़ी,,,चुनावों के नतीजे 2007 अप्रैल/मई में जब आये तो सभी हार गए सिर्फ एक सीट याक़ूब कुरैशी ने UDF के कैंडिडेट की हैसियत से जीती,,,बाद में युसूफ कुरैशी घर बैठ गए और UDF का विलय बसपा में कर दिया गया,,,32 महिनों के बाद 27 फ़रवरी 2009 को मेरा जेल से रिहा होना hua, जिस पार्टी के लिए उस वक़्त ”मैंने’ अपनी पूरी जान लगा दी थी, उस पार्टी के अध्यक्ष/उपाध्यक्ष/व् अन्य नेता एक दो जोकि मेरे निजी साथी/दोस्त थे के आलावा अलीगढ में ही रहने के बावजूद कभी कोई एक बार भी मिलने नहीं आया,,,,

2017 में मैंने अलीगढ की कोल विधान सभा सीट से AIMIM के टिकट पर चुनाव लड़ा, नॉमिनेशन से एक दिन पहले तक मै ‘rest position’ में रहा, वजह कि मुझे उम्मीदवार बना देने के बाद भी पार्टी के कई नेता ”हिल्ला” तलाश रहे थे, कोई मिल जाये ‘जिससे कुछ मिल जाये’ वाला मामला था, एक शाम को हम लोग पार्टी के जिला अध्यक्ष के घर पर बैठे थे, अध्यक्ष मेरे बराबर में ही बैठे हुए थे, उनके मोबाइल पर कई कॉल आये, उन्होंने रिसीव नहीं किये, बाद में रिसीव किया तो ‘उधर’ से कोई साहब ‘उनका नाम’ नहीं लुंगा, कह रहे थे कि ‘आप कैसे भी कर के इनका टिकट कटवा दो, मै पार्टी फण्ड में भी देने को तैयार हूँ, आप ने ऐसे आदमी को टिकट दिया है ,,जो ‘रात भर जागता है और दिन भर ”पी” कर सोता है’,,,मेरी हंसी छूट गयी,,,सारी बात मुझे मैच कमेंट्री की तरह सुनाई दे रही थी,,,कॉल कट के बाद अध्यक्ष भी हंसने लगे,,,’बोले परवेज़ भाई’,,,लोग अभी तक पीछे पड़े हैं, मगर कुछ भी हो चुनाव तो आप ही लड़ोगे

24 फ़रवरी 2017 को नॉमिनेशन दाखिल हुआ, 25 को असदुद्दीन ओवैसी की अलीगढ में क़ामयाब मेटिंग हुई,,,प्रचार का काम होने लगा,,,शेर आया शेर आया का नारा जब पहली बार गूंजा तो मै खुद को ‘कम्फर्टेबल’ नहीं कर पा रहा था, उसमे जोश था यकीनन मगर ‘मुझे न पसन्द’ था,,,

चुनाव के वक़्त सर्दियाँ थीं, और मै कभी भी उजलत/जल्दबाज़ी में नहीं रहता हूँ, आराम से एक, दो बजे दिन के प्रचार के लिए निकलते और देर रात तक मिलना मिलाना होता रहता,,,पार्टी के जो कम उम्र साथी थे उन्होंने बहुत काम किया, जी जान से पूरे चुनाव में मेहनत की, जो नेता और बड़े नेता थे उनका हाल बयान करना भी बेकार है, कुछ नेता जो बुद्धिजीवी प्रजाति के थे वो प्रचार/प्रोग्राम/मीटिंगों में हमारे साथ होते और लेट नाईट में ‘दूसरे’ उम्मीदवार के यहाँ जा कर ‘क़ोरमा’ खींचते,,,कई बार ‘गुप्तचरों’ ने उनके फ़ोटो ‘व्हाट्सअप’ पर मेरे पास भेजे,,,मज़े की बात अब सुनिये

चुनाव से पहले ही दो/तीन ‘कलाकारों’ ने अपनी कला दिखाई और सारा खेल बिगाड़ दिया, मुझे पूरा भरोसा था उन लोगों पर, उनकी बातें, उनकी क़ौम के लिए तकलीफ सुन कर मेरा कलेजा भी तड़प उठता था,,,मीटिंगों में अल्लाह, रसूल, हदीस ऐसा लगता जैसे ‘मीलाद’ पढ़ा जा रहा हो, आला दर्ज़े के नेक/शरीफ लोगों ने ‘मुझे’ ‘बेच’ दिया,,,

चूँकि मै ये भरोसा किये हुए था कि सब कुछ ‘सही’ चल रहा है, उनके फ़रेब को न पहंचान सका, मुझे उम्मीद थी कि आख़िर के तीन, चार दिन में ‘मै’ चुनाव का रुख बदल लुंगा, लेकिन उन ‘तीन नेक’ सिफ़त लोगों ने सब ख़राब कर दिया,,,नतीजा ये हुआ कि कुल 400 – 500 के क़रीब वोट मिले, जबकि इस सीट को AIMIM कम से कम 50 हज़ार वोटों से जीतती,,,

मै स्पोर्ट्समैन हूँ इसलिये ‘वो’ टेम्परामेंट जो खिलाडी में होना चाहिए रखता हूँ, मुस्लिम लीडरशिप और मुस्लिम वर्कर्स ”untraind” लोगों की भीड़ है, छः साल तक NCC का कैडिट रहा हूँ, वहां ‘यूनिटी एंड डिसिपिलीन’ ‘ सीखा, जब इस्लाम को पढ़ा तो पाया कि दीने इस्लाम का दारोमदार ही ‘यूनिटी एंड डिसिपिलीन’ पर है,

क़लमा, नमाज़, रोज़ा, ज़कात, हज ये मुस्लमान की ड्यूटीज हैं जिनको हर हाल में ‘पूरा’ करना है, जैसे कोई सरकारी मुलाज़िम अपनी ड्यूटी अंजाम देता है, दीने इस्लाम मस्जिद के बाहर समाज की जिंदिगी है, जहाँ हमें अपने काम से ज़ाहिर करना होता है, अपनी ज़बान से साबित करना होता है कि हां हम दीन पर क़ायम हैं/दीनदार हैं, जो कारोबार हम करते हैं उसमे सच्चाई होना चाहिए, जब हम नाप तोल करें तो सही होना चाहिए, कम न हो, ये दीन है, जब हम कोई बात कहीं तो सच हैं, ये दीन है, कोई वादा करें तो पूरा करें, ये दीन है,,,मुसलामनों ने तहक़ीक़ करना छोड़ रखा है

Kashmiri people shout pro freedom slogans during a protest march in Srinagar, Indian controlled Kashmir, Friday, Aug. 26, 2016. Curfew and protests have continued across the valley amidst outrage over the killing of a top rebel leader by Indian troops in early July, 2016. (AP Photo/Mukhtar Khan)

हम मज़हब और दीन को नहीं समझते हैं, हम मस्जिद में पांच वक़्त जा कर इमाम के पीछे खड़े होकर नमाज़ पढ़ने को दीन समझते हैं, हम इतिहाद से वाकिफ नहीं हैं, एक भीड़ का समूह रह गए हैं

याद रहे नमाज़ का असल सन्देश ‘यूनिटी एंड डिसिपिलीन’ है, मस्जिदें सजदों के लिए नहीं हैं वो ‘शिक्षा/राजनीती/समाजशात्र/विज्ञानं’ को जानने/समझने/सीखने का केंद्र हैं, अल्लाह को अगर सिर्फ नमाज़ ही पढ़वाना होती तो, कोई भी कहीं भी पढ़े, जमायत से नमाज़ का आदेश नहीं होता, मस्जिदों को बनाने की ज़रूरत नहीं होती,

जब कोई मुसलमान इमाम के पीछे खड़ा होता है तब वो अपनी मनमानी कर के दिखा दे, इमाम रुकू में जाए तो खुद सजदे में जा कर दिखा दे, ऐसा नहीं कर सकता है कोई भी, यही है ‘यूनिटी एंड डिसिपिलीन’, जो आदेश इमाम/लीडर का होगा उसका पालन करना होगा, नमाज़ियों की सफों को देख कर हज़रत उमर ने सेना को ‘सफों/लाईनों’ में खड़ा करना शुरू किया, जैसे मस्जिद का इमाम आगे खड़ा हो कर कमांड देता है, वैसे ही सेना में सेना का नायक आदेश देता है,,,

मुस्लिम राजनीती और मुस्लिम राजनेता राजनीती के असल उदेश या तो जानते/समझते नहीं हैं या वो उनको अमल में लापाने की सलाहियत नहीं रखते हैं,,,AIMIM के 36 कैंडिडेट उत्तर प्रदेश में 2017 में चनाव लड़े थे, चनावों के बाद कभी एक बार भी पार्टी के सदर असद ओवैसी ने उनको बुला कर नहीं पूंछा कि हार की क्या वजह थीं, प्रदेश की इकाई के लोग सदर से भी बड़े लीडर हैं,,,

किसी की तनक़ीद करना मेरा कोई मक़सद नहीं है, लेकिन इस वक़्त जो देश के राजनैतिक हालात बने हुए हैं उसमे आप बे तरतीब भीड़ को भाषण देकर ‘गर्म’ कर के उनका नुक्सान करेंगे, कौम तो लीडर के इन्तिज़ार में कब से बैठी है, उसे कभी किसी ने धोखा दिया कभी किसी ने, बार बार धोखे पर धोखा खाते-खाते यहाँ पहुँच गए हैं कि 20 साल से कम उम्र के बड़ी संख्या में बच्चे नशा करने लगे हैं, टाइगर गुल्ला, मुनक्का, शिव बूटी, हितकारी, ativan, कम्पोज़, natrabat, कोरेक्स, स्लोचन, हथु, भांग, चरस, स्मैक, गांजा,,,ये सारे नशे के सामान आप को मुस्लिम आबादियों में जहाँ चाहिएं मिल जायेंगे,,,

लीडरशिप सिर्फ ज़ोरदार भाषण देना नहीं होता, लोगों के ज़ज़्बात को उभार कर उनको कब तक कोई संभाल सकता है, गाड़ी से उतरे, मंच पर पहुंचे और तक़रीर शुरू,,,ये लीडरशिप है,,,आप अपने लोगों से मिलेंगे नहीं, उनकी तरबियत नहीं करेंगे, उनको कैसे काम करना चाहिए बताएँगे नहीं, उनकी क्या ग़लतियाँ हैं आप जानते नहीं,,,सिर्फ भाषण,,,ये काम तो कितने ही मौलाना भी करते हैं, मीलाद में देखें, नीचे से ऊपर तक का ज़ोर लगा देते हैं, बिना माईक के ही उनकी आवाज़ कोसों तक जाती है,,,


इस वक़्त देश में लोगों में गुस्सा देखने को मिल रहा है, उस कई वजह हैं, दो अहम् वजहें ख़ास हैं

– एक तो संघ परिवार ने लोगों के अंदर नफ़रत पैदा की है

– दूसरे लोगों के पास काम नहीं है, लोग खाली हाथ बैठे हैं, डिग्रियां हैं मगर नौकरी नहीं है, सुबह को जागते हैं, माँ -बाप ताने देने लगते हैं, लड़का उलटे सीधे कपडे पहने और बाहर फालतू के लोगों के साथ टाइम पास करता है, वो वहां ख़राब हो जाता है, उसका भविष्य ख़त्म हो जाता है, वो पुरानी फिल्म के किसी हीरो की तरह रातों रात अमीर बनने की तरकीबें अपनाने लगते हैं और मुजरिम तक बन जाते हैं

लोगों को बहुत ईमानदारी और संजीदगी के साथ सोचना होगा, सिर्फ़ ज़बानीं भाषणबाज़ी के भरोसे रहे तो मुस्लिम समाज को भारी नुक्सान उठाने पड़ेंगे, 30 करोड़ से ज़यादा आबादी मुसलमानों की भारत में है, उनका कोई ‘एक’ भी लीडर नहीं है, जो कुछ हैं भी तो सिर्फ और सिर्फ हो हल्ला, करनवाने के लिए,,,,,,

– परवेज़ ख़ान

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”क्या वाकई पोटा का दुरुपयोग नहीं हुआ था. 2002 में अक्षरधाम आतंकी हमले के मामले में 6 लोगों को गिरफ्तार किया गया था. इन सभी को पोटा के तहत गिरफ्तार किया था. 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया. कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसियों की तरफ से इन सभी को फंसाने के गंभीर प्रयास किए गए थे. इनमें से लोअर कोर्ट ने दो आरोपियों को फांसी की सज़ा दी थी. 11 साल जेल रहने के बाद मोहम्मद सलीम, अब्दुल मियां, अल्ताफ मलिक, अदम भाई अजमेरी, अब्दुल कयूम, चांद खान बरी हुए. अगर पोटा का दुरुपयोग नहीं हुआ था तो ये क्या था. मोहम्मद सलीम ने बरी होने के बाद कहा था कि गुजरात पुलिस ने उससे पूछा था कि गोधरा कांड, हरेन पांड्या हत्याकांड या अक्षरधाम आतंकी हमले में से किसमें बंद करें. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन्हें फंसाया गया लेकिन हम और आप कभी नहीं जान सकेंगे कि इन्हें किसके इशारे पर फंसाया गया और उन लोगों को क्या राजनीतिक लाभ मिला. गृहमंत्री को वाइको का केस भी याद दिलाना चाहिए जो वाजपेयी सरकार के सहयोगी थे. 11 जुलाई 2002 को वाइको पोटा के तहत गिरफ्तार कर लिए गए. एमडीएमके एनडीए की सहयोगी थी….. ”

बड़े लोगों का हर ‘एक्ट’ बहुत अहम् होता है, लोग उनकी तरफ देखते हैं और जब उनका समर्पण/आत्मसमर्पण देखते हैं तो ग़रीब/कमज़ोरों की हिम्मत टूटने लगती है,,,इस समय देश में ‘गरम हवा’ बह रही है, बड़ा राजनैतिक पलायन हो रहा है, अन्य दलों के नेता ‘भगवा’ की तरफ भाग रहे हैं, हवा के खिलाफ कम ही खड़े नज़र आ रहे हैं,,,ये पलायन आने वाले समय में और भी बढ़ सकता है,,,मैडम अगर अपने ‘मदरसे’ में मंदिर बनवाती हैं तो क्या हर्ज है,,,

एक बच्चा पैदा होता है, वो नौजवान, जवान होता है फिर बुढ़ापे को जा पहुँचता है और एक दिन पता चलता है कि वो ‘चल’ निकला,,,इंसान के जीवन का मक़सद क्या है, आखिर वो क्या हासिल करना चाहता है,,,’कुछ भी नहीं’,,,जो लोग गुमराह हो चुके हैं या गुमराही में पड़े हुए हैं उनको देख कर डरना चाहिए, ये अपने साथ न जाने कितनों को दुनियां की ‘भूख’ की खोज में उलझा देंगे,,,

जिनका मंसूबा ‘अलग राष्ट्र’ ‘भारत माता’ का है क्या उनके देश के बन जाने के बाद इंसान सोने – चाँदी को खाने लगेंगे, या दरियाओं में दूध -शहद बहने लगेगा या जो पैदा होगा वो हमेशा के लिए अमर हो गा,,,मुर्ख लोग ऐसे रास्ते चुनते बनाते हैं जिसमे तमाम रास्ते ख़ार, खड़्डे हों,,,इंसान जिस ज़मीन पर पैदा होता है वो खुद हमेशा रहने वाली नहीं हैं,,,आज़ादी के साथ जीना चाहिए, लोगों को बंधक बना कर नहीं रखा जा सकता है, जब भी ऐसी कोशिशें होती रही हैं तब अशांति ने जनम लिया है,,,

’ धर्मेंद्र और सायरा बनो की एक फ़िल्म है जिसका नाम है ”फंदेबाज” न देखी हो तो एक बार देख 

उभरेंगे एक बार अभी दिल के वलवले
माना कि दब गए हैं ग़मे ज़िन्दिगी से हम……

परवेज़ ख़ान

 

कुछ तस्वीरें कारगिल से, कारगिल में मेरा बहुत लम्बे वक़्त तक रहना हुआ है, कारगिल के ”बरु” गॉंव में,,,वहां की एक एक चीज़, लोग याद हैं, क्रांति बीड़ी, ख़लील चरसी, टैक्सी स्टैंड पर अनिल की रेडियो की दुकान, हाजी साहब का मेडिकल स्टोर, कश्मीरी बाज़ार, डाकघर, अस्पताल, अपना मुत्तहरी पब्लिक स्कूल, स्कूल के बच्चे नियाज़, अकबर, अली, हसन, फ़ातिमा,,,,,जमीला अलमी बमो ला जमीला,,,,

Kargil town wrapped in white blanket of snow

 

Suru river

 

Mt. Kun and Mt. Nun in Kargil Ladakh

Beautiful Hussainiya at Akchamal Kargil

 

 

Frozen waterfall somewhere in Zanskar

 

 

 

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