देश

नेपाल-भारत के बीच टकराव की पूरी कहानी : रिपोर्ट

 

सीमा विवाद पर भारत और नेपाल के बीच तनातनी चल रही है, इस दौरान नेपाल निवासी भारतीय फिल्म अभिनेत्री मनीषा कोइराला ने ट्विटर के ज़रिये अपने देश का समर्थन किया है साथ ही उन्होंने इस मामले में चीन को भी तीसरा पक्ष बनाने की बात कही है, भारत इस समय विदेश निति के लिहाज़ से बुरी तरह विफल हुआ है, चीन को लेकर सिक्किम और लद्दाख में चीनी सेना के सिलसिले से खबरें आ रही थीं वहीँ पाकिस्तान को लेकर कश्मीर सीमा पर युद्ध जैसी इस्थिति है अब नेपाल से भी रिश्ते बिगड़ते नज़र आ रहे हैं, यह इस्थिति भारत के लिए असहज करने वाली है क्यूंकि नेपाल भारत का बहुत पुराना मित्र देश है जो कि अब भारत को आँखें दिखा रहा है साथ ही नेपाल के रिश्ते चीन से बहुत ज़ियादा गहरे हो गए हैं, आने वाले समय में चीन नेपाल में अपने बेस बना सकता है, बीजिंग से काठमांडू तक सड़क निर्माण और रेल यातायात पर पहले से ही काम चल रहा है

अमेरिका और इस्राईल की दोश्ती में भारत पडोसी देशों से मामलात बिगड़ रहे हैं, अमेरिका भारत को चीन के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए दोस्ती गांठ रहा है तो इस्राइल से आरएसएस के दशकों पुराने सम्बन्ध हैं, दोनों का मिशन ‘एंटी इस्लाम-एंटी मुस्लिम’ है, इस्राइल ग्रेटर इस्राईल बनाना चाहता है तो आरएसएस अखंड भारत, बतादें कि आरएसएस के मुख्य कर्ताधर्ता यहूदी नस्ल के लोग हैं जिनका निकास किनान यानी फिलिस्तीन से हुआ था और तब ये लोग भारत के गुजरात प्रान्त में आ कर बस गए थे…

नेपाल और भारत के सीमा विवाद की लड़ाई सोशल मीडिया में भी लड़ी जा रही है, एक तरफ नेपाल के पक्षधर ट्विटर पर ट्वीट कर रहे हैं तो दूसरी तरफ भारतीय लोग अपनी भड़ास निकाल रहे हैं, अपनी बात कहने का सभी को अधिकार है लेकिन बात कहते वक़्त लिहाज़ ज़रूर रहना चाहिए, यहाँ ट्विटर पर लिहाज़ का ख्याल नहीं रखा जा रहा है, बाकायदा लोग गन्दी भाषा, गालियां तक इस्तेमाल कर रहे हैं

सुगौली संधि और नेपाल-भारत के बीच बंटवारे की गाथा

Rupesh Kumar Jha

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जब भी बंटवारे का जिक्र आता है, जेहन में पाकिस्तान बनने की तस्वीर उभरती है. इसके साथ ही इतिहास को याद करते हुए आज की पीढ़ी बंगाल और पंजाब की विभीषिका को याद कर लेती है.

बता दें कि बंटवारे का दंश बंगाल और पंजाब के लोगों से बहुत पहले मिथिला के लोगों ने भी झेला, जिसे इतिहास ने भी कहीं किसी पन्ने पर दफना रखा है.

तो आइए आज उस विभीषिका पर नज़र डालते हैं, जिसका जिक्र बहुत ही कम हो सका है!

‘सुगौली संधि’ से शुरु होती है कहानी
4 मार्च 1816 को ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के राजा ने सुगौली संधि का अनुमोदन कर दिया, जो 2 दिसम्बर 1815 को हस्ताक्षरित था. इसके साथ ही ब्रिटिश और नेपाल शासन के बीच युद्ध विराम की घोषणा हो गई.

दो साल लंबे चले युद्ध के बाद हुए इस संधि में बंटवारे की ‘बू’ आ रही थी. जिसे दोनों शासकों ने बड़े ही चालाकी पूर्वक राजनीतिक इत्रों से पाट दिया था.

बहरहाल घाव तो घाव होते हैं. यही कारण है कि वे आज भी यदा-कदा दर्द दे जाते हैं.

सुगौली संधि के दो सौ साल पूरे होने पर नेपाल सीमा से लगे उत्तर बिहार (मिथिला) से इसके खिलाफ आवाजे उठीं. नेपाल से भारत के मैत्री संबंध को देखते इन आवाजों को कभी तरजीह नहीं दी गई.

इस संधि के तहत अंग्रेजों ने मिथिला (तराई) का एक बड़ा भू-भाग नेपाल के अधीन कर दिया था. लिहाजा मिथिला की राजधानी जनकपुर अब नेपाल में अवस्थित है, जहां हाल ही में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी होकर आए हैं.

 

…और मिथिला को शर्तों ने बांट दिया
नेपाली राजा विस्तारवादी सोच के पोषक थे. उन्होंने उत्तर में चीन और हिमालय के होने की वजह से दक्षिण की ओर बढ़ना शुरू कर दिया था. दशकों से नेपाल भारत की भूमि को अपने कब्जे में ले रहा था.

जब ईस्ट इंडिया कंपनी को इसकी भनक लगी तो गोरखा युद्ध छिड़ गया.

सुगौली संधि के फलस्वरूप नेपाल ने अपने कब्जे वाली भारतीय भूमि को मुक्त किया, तो मैत्री को बढ़ाने के एवज में अंग्रेजों ने उसे मिथिला (तराई) के भू-भाग को ईनाम के तौर पर दे दिया.

1816 की इस संधि पत्र पर नेपाल की ओर से राजगुरु गजराज मिश्र और अंग्रेज़ों की ओर से लेफ़्टिनेंट कर्नल पेरिस ब्रैडशॉ ने हस्ताक्षर किए थे.

इसके बाद काठमांडू में एक ब्रिटिश प्रतिनिधि की नियुक्ति हुई और ब्रिटेन की सेना में गोरखाओं की भर्ती की जाने लगी.

सुगौली में सुलगी 1857 के विद्रोह की आग
उन दिनों सुगौली में ब्रिटिश सेना की छावनी रहा करती थी. मंगल पांडे द्वारा शुरू किया गया विद्रोह छावनी दर छावनी सुगौली तक पहुंच गया था. नेपाल के राजा त्वरित सैन्य मदद पहुंचाकर इस विद्रोह को दबाने में कंपनी की मदद करने लगे.

ये भी कहा जा रहा है कि नेपाल की तत्कालीन मजबूरी ने उसे अंग्रेजों की कठपुतली बना दिया था. लिहाजा वह ब्रिटिश शासन को मदद पहुंचाने की तनिक कोताही नहीं करता था. इस बात से खुश होकर ब्रिटिश ने उसे फिर से मिथिला की भूमि दान में दी.

क्षेत्र के लोगों में जो विखंडन का दुःख था, वो फिर से हरा और बड़ा हो गया.

प्राचीन मिथिला की राजधानी जनकपुर सहित एक बड़ा भू-भाग एक अलग देश में चला गया. उल्लेखनीय है कि इस बार-बार के बंटवारे के बावजूद क्षेत्र के लोगों ने किसी भी प्रकार का विरोध नहीं किया.

गौरतलब हो कि अंग्रेजों ने महज अपने खजाने को भरने के लिए भारत का रुख किया था. उसे यहां की जनता और जनभावना से कोई मतलब नहीं था. उनके अंदर तो चालाकी कूट-कूट कर भरी थी.

यही कारण रहा कि नेपाल के साथ संधि के तहत जब मिथिला को बांटा जा रहा था, तो जनविरोध की आहट को भांपते हुए सीमांकन से उन्होंने परहेज किया गया. इसके तहत भारतीय मिथिला के लोग नेपालीय भू-भाग पर आ-जा सकते थे. लिहाजा जनसामान्य को किसी प्रकार की समस्या नहीं हुई. लोग व्यापार और संबंध-सरोकार के लिए निर्बाध आते-जाते रहे.

संधि से सामान्य जनजीवन हुआ बहाल
मिथिला के लोग प्राचीन काल से ही शांतिप्रिय रहे हैं और यहीं वेद और दर्शन लिखे गए. वैदिक संस्कृति की नींव तक रखी गई. इतिहास खंगालें तो भी यहां सत्ता-संघर्ष नगण्य ही रहे हैं. इन्हीं सब कारणों से मिथिला के राजा जनक राजर्षि कहलाते थे.

सुगौली संधि से पहले क्षेत्र के लोग गोरखा आक्रमण से आक्रांत रहा करते थे, तो ब्रिटिश सेना के हस्तक्षेप से अशांति का सृजन हो रहा था. स्थानीय रजवाड़े अंग्रेजों के आगे नतमस्तक हो गए थे.

संधि के तहत भले ही मिथिला का भू-भाग नेपाल के अधीन चले गए, लेकिन जनसामान्य के लिए आवाजाही में कोई रोक-टोक नहीं था. कोई भी सीमा-बंधन नहीं रखा गया. लिहाजा लोगों को धरातल पर बंटवारे जैसा कुछ लगा ही नहीं.

यह व्यवस्था आज भी कायम है…लेकिन दरारें दिख रही हैं!

अब दोनों तरफ लोकतंत्र है लेकिन…
भारत से जब अंग्रेजों की विदाई हुई तो लोकतांत्रिक सरकार ने नेपाल के साथ 1950 में शांति-मैत्री संधि की और किसी भी प्रकार की आशंका से दोनों तरफ के लोगों को मुक्त कर दिया.

लेकिन इधर कड़े माओवादी संघर्ष के बाद नेपाल से राजशाही का खात्मा हो गया. वहां भी लोकतांत्रिक सरकार का गठन हुआ है. मूल नेपाल और भारत के मध्य ये जो ‘दान दिए भूमि’ पर जो लोग हैं, उन्हें नेपाल में मध्यदेशी या मधेसी कहा जाता है.

इनमें आज भारत के विभिन्न हिस्सों से आए लोग भी शामिल हैं.

नेपालीय लोकतंत्र में मधेसी अपने अधिकार को लेकर संघर्षरत हैं, तो वहीं भारत सरकार अपने संबंधों को साधने को लेकर सजग दिख रही है. ऐसे में यदा-कदा सुगौली की याद ताजा हो जाती है.

सैकड़ों साल पहले भू-दान के फलस्वरूप नेपाल को जो भी लाभ हुआ हो, भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र के लोगों को यह बात आज भी कष्ट देती है. बावजूद इसके यहां के लोग भारत-नेपाल के लिए अंतर्राष्ट्रीय संबधों में ‘स्नेहक’ की भूमिका निभा रहे हैं.

बहरहाल, सूरत जो भी हो इस पूरे प्रकरण से जो सामाजिक क्षति हुई है उसे पाटना कतई सहज नहीं है.

देखें कुछ ट्वीट

आचार्य 𝙎𝘼𝙃𝙄𝙇
@AacharySahiL
70 साल में ये पहली बार हो रहा है कि वायरस मीडिया वाले नेपाल से भारत का तुलनात्मक DNA कर रहा है…

कहाँ से कहाँ आ गए
अब जल्द ही विश्वगुरु में प्रवेश करेंगे..!!!

subashpaudelofficial
@subashpaudel28
We do have proofs to claim our land. Don’t bully yourself without stats & fact check.
@ZeeNews

@ABPNews

@narendramodi

#backoffindianmedia
जय नेपाल

Jago Bharat Jago
@germanhitechhe1
नेपाल has to be part of India !!

OpIndia.com
@OpIndia_com
How Sikkim, once a different country like Nepal, became a state of India

shanakar basnet
@basnet_shanakar
we would like to recommend fellow Indian Journalists to check the history,collect the evidences read them all , until you understand the fact & truth then enter to your studios
भारतीय मिडिया हाेसियार नेपाल देश छोटे है भा्इ नहि तुम्हारा बाप हे साले भारतीय मिडिया Raised fistRaised fist

Acharya Pramod
@AcharyaPramodk
आज़ादी के पूर्व से लेकर आज़ादी के बाद के सत्तर सालों के इतिहास में कहीं ये ज़िक्र नहीं मिलता कि “नेपाल” कभी भारत के ख़िलाफ़ हुआ हो,लेकिन आज हो गया…….क्या इसके लिये भी नेहरु को ज़िम्मेदार ठहराओगे

Samajwadi Party
@samajwadiparty
सरकार की विफल विदेश नीति ने नेपाल जैसे भारत के विश्वासपात्र और सबसे पुराने साथी को दूर कर दिया है।
नौबत यहां तक आ गई है कि नेपाल के PM संसद में भारत के खिलाफ बयान दे रहे हैं।

केंद्र सरकार को अस्पष्टता और भ्रमित करने वाली नीति छोड़ नेपाल से मधुर संबंधों पर जोर देने की जरूरत।

 

भावना सुवेदी
@bhawana_subedi1
नेपालFlag of Nepal-भारतFlag of India सीमामा सरकारले पर्खाल लगाउने हिम्मतFlexed biceps गरोस्, म १० लाख सहयोग गर्न तयार छुHugging face
किनकी मलाइ थाहा छ, पर्खाल लगाउने कुनै नेताको हिम्मत छैन!Winking face with tongueFace with tears of joyFace with tears of joy


दुर्लभ शिवलिंगम Herb #पशुपतिनाथ_मंदिर
काठमांडू, नेपाल

Light of QueenFlag of Nepal
@lightofqueen
Writing handWriting hand
एक जमाना थियाे पुलिस नेपाल बन्द गर्नेलाई खाेजि खाेजि पकड्थ्याे अहिले अाफै नेपाल बन्द गर्न प्रत्येक चाेक-चाेक गल्ली गल्लिमा बसेकाे छ त्याे पनि भाटा लिएर Face with tears of joyRolling on the floor laughing !!

@lightofqueen
Padam Prasad Paudel
एकजना साथीलाई प्रश्न आयो “नेपाल कहाँ पर्छ?”
उहाले भन्नुभयो, “पहिला मेरो ढुकढुकिमा थियो तर चोरहरुले मेरो ढुकढुकि नै बेचिदिए ।”
मैले सोधे, “कसको सम्पत्ति हो यो?”
उहा निशब्द हुनुभयो ।
सायद बेच्ने वालाको नै थियो कि ?
कतै हामीले धुर्तहरूलाई विश्वास गरेर ढुकढुकी नै सुम्पिएका त छौनौँ ?


BBC News Nepali
@bbcnepali
भारतमा रहेका हजारौँ नेपालीहरू भारतका विभिन्न स्थानमा सीमामा आउने क्रम जारी छ। कतिपय सीमापारी नै रहे पनि केही लुकीछिपी नेपाल छिर्दा कोरोनाभाइरस फैलिने जोखिम झन् बढेको विवरण आएका छन्। सीमासम्म आइपुग्ने नेपालीहरूलाई व्यवस्थित र सुरक्षित तरिकाले देशभित्र ल्याउन के गर्नुपर्छ?

राजेश
@r91931418
श्री कृष्ण मंदिर 1637 में बनाया गया था।

किंवदंती कहती है कि यह एक सपने के कारण बनाया गया था। एक रात, राजा सिद्धि नरसिंह मल्ल ने सपना देखा कि भगवान कृष्ण और देवी राधा महल के सामने खड़े थे। इस प्रकार राजा ने उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण किया। ।
स्थान- पाटन, नेपाल। । ।

राष्ट्रसंघ दस्ताबेजमा काली नदीवारि नेपाल

अनिल अधिकारी

०२ जेठ २०७७

न्युयोर्क : नेपालले सन् १९५५ डिसेम्बर १४ मा संयुक्त राष्ट्रसंघमा सदस्यता पाएको हो। नेपालले सन् १९४९ मा सदस्यताका लागि आवेदन दिएको भए पनि तत्कालीन सोभियत संघको कारण नेपालले सदस्यता पाउन ६ वर्ष संघर्ष गर्नुपरेको थियो। राणाकालीन अवस्थामै पठाइएको उक्त पत्रमा तत्कालीन डाइरेक्टर जनरल (परराष्ट्रमन्त्रीको हैसियत) को रूपमा विजयशमशेर राणाले तत्कालीन मेजर पदमबहादुर खत्रीलाई प्रतिनिधिका रूपमा पठाएका थिए। मोहनशमशेर प्रधानमन्त्री रहँदैमा उक्त प्रक्रिया अघि बढेको थियो। नेपालले सदस्यता प्राप्त गर्दा राजा त्रिभुवनकै प्रत्यक्ष शासन थियो।

त्यतिबेला बुझाएको उक्त डकुमेन्ट राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद्मार्फत अन्नपूर्ण पोस्ट्लाई उपलब्ध छ। काली नदीलाई पश्चिम सीमा र मेची नदीलाई पूर्वी सीमा भनिएकाले यसमा छिमेकीले धेरै विवाद गरिरहनु नपर्ने राष्ट्रसंघीय एक उच्च अधिकारीले बताए। राष्ट्र संघमा सदस्यताका लागि बुझाइएको पत्रमा, यूएन चार्टरको सदस्यतासम्बन्धी प्रावधानको धारा ४ अनुसार नक्सा बुझाउने स्पष्ट व्यवस्था भए पनि तत्कालीन अवस्थामा नेपालले राष्ट्रसंघमा सदस्यता लिँदा नेपालको नक्सा बुझाएको प्रमाण भेटिँदैन। तत्कालीन समयमा सदस्यता लिँदा नक्सा नै नबुझाए पनि नेपालले आफ्नो भूभाग र सिमानाबारे नक्साकै जस्तै स्पष्ट हुने गरी लेखेर प्रमाणहरू बुझाएको थियो।

नेपाल–भारतबीच सीमा विवाद जारी रहँदै यो मुद्दा अन्तर्राष्ट्रिय अदालतसम्म पुगेमा यस्ता प्रमाण बलिया आधार हुनेछन्। नेपाल–भारतबीच सीमा विवाद जारी रहेमा इन्टरनेसनल कोर्ट अफ जस्टिस (आइसीजे) ले नदीको मुहानलाई केन्द्र मान्ने स्पष्टै देखिन्छ। अर्थात् काली नदीको मुहानलाई नेपालको आधिकारिक सिमाना कायम गर्ने अन्तर्राष्ट्रिय कानुनका विज्ञहरूको धारणा छ। यसैलाई आधार मान्दा पनि अहिले भारतले निर्माण गरेको सडकको १९ किमि सडक नेपाली भूभागमा परेको परराष्ट्रमन्त्री प्रदीप ज्ञवालीले नै स्पष्ट पारिसकेका छन्।

विगतका सन्धिलाई आधार मान्दा सुगौली सन्धिअनुसार धारा ५ मा नेपालले कुमाउ गढवाललगायत क्षेत्र गुमाएको भनेर लेखिएको छ। जसको अर्थ हुन्छ काली नदी पूर्वको नेपालको भूभाग हो। राष्ट्रसंघमा बुझाइएको उक्त पत्रमा पनि काली पश्चिमको भूभागमा नेपालका राजा वा उसको सन्ततिले कुनै अधिकार राख्दैनन् भन्ने सुगौली सन्धिको धारा ५ का बुँदा पनि उल्लेख छ।

नेपालले ६५ वर्षअघि संयुक्त राष्ट्रसंघमा सदस्यता लिन बुझाएको दस्ताबेजमै नेपालको पश्चिमी सिमाना काली (महाकाली) नदी रहेको प्रस्ट उल्लेख छ। राष्ट्रसंघमा सदस्यता लिँदा नेपालले पश्चिममा काली नदी र पूर्वमा मेची नदीलगायत अन्य भूभागसहितको स्पष्ट आँकडा दिएको छ।

राष्ट्रसंघको सदस्यता लिँदा मुलुकको विगतको प्रमाणित इतिहास, सीमा, जनसंख्या, वैदेशिक सम्बन्ध, मुलुकको क्षेत्रफल, जनसंख्या, स्थापना भएको वर्ष, अन्य देशसँगको सम्बन्ध, छुट्टै राज्य हो भन्ने यथेष्ट प्रमाणलगायत विषय स्पष्ट किटान गरेर लेख्नुपर्ने प्रावधानअनुसार सबै प्रमाणित कागजात नेपालले उपलब्ध गराएको थियो। कालापानी, लिम्पियाधुरा र लिपुलेक क्षेत्र नेपालको रहेको भन्दै सरकारले भारतलाई पटक–पटक कूटनीतिक नोट दिइसकेको छ। भारतले पनि त्यस क्षेत्रलाई विवादित क्षेत्र भन्दै वार्ताबाटै सल्टाउने बताइरहेका बेला नेपालको अर्को छिमेकी चीन जोड्ने सडक निर्माण गरी उद्घाटन गरेको हो।

 

राजा र इस्ट इन्डिया कम्पनीबीच सम्झौता हुँदा ३ नम्बर धारामा नेपाल र इस्ट इन्डिया कम्पनीबीच अबउप्रान्त सीमा विवाद हुने छैन र शान्ति कायम हुनेछ समेत लेखिएको छ। नेपाल सरकारसँग तत्कालीन सम्झौता रहे पनि अहिले भारतले चीनको तिब्बत जाने मानसरोवर मार्गको उद्घाटन गरेपछि नेपाल–भारतबीच सीमा विवादले उत्कर्षमा पुगेको हो। नेपालले लगातार वार्ताबाट समाधानका लागि मिति माग गरेको र भारतले यसमा बेवास्ता गर्दै आएको छ।

नेपालले त्यतिबेला सदस्यता लिँदा नेपाल निकै पुरानो मुलुकका रूपमा व्याख्या गरेको उपलब्ध डकुमेन्टमा छ। नेपाल कुनै पनि मुलुकको अधीनमा रहन नपरेको तर आफ्ना केही भूभाग युद्धमा गुमाउनुपरेको विषयसमेत उल्लेख छ। सन् १७९२ मै अहिलेको उत्तरी छिमेक तर त्यतिबेला तिब्बतपारिको मुलुक चीनसँग लडाइँ लडेको विषय पनि उल्लेख छ। १८१५ मा तत्कालीन इस्ट इन्डिया कम्पनी (ब्रिटिस) सँग र १८५५ मा तत्कालीन तिब्बत (हाल चीनको स्वशासित क्षेत्र) सँग लडाइँ लडेको उल्लेख छ।

ती सबै लडाइँको शान्तिपूर्ण निकासमा नेपालले त्यतिबेला तत्परता देखाएको पनि प्रस्तुत डकुमेन्टमा लेखिएको छ। विदेशीको संलग्नताविहीन वार्ता गरेर ती मुलुकसँग दुईपक्षीय सम्बन्धसमेत राम्रो राखेको उल्लेख छ। यसरी प्रस्तुत विषयमा ब्रिटिससँगको लडाइँ र उनीहरूसँगको दुईपक्षीय हार्दिकतालाई निकै महŒवसाथ राखिएको छ। लडाइँपछि सुगौली सन्धिमा नेपालको गुमेको भूभागको किटान पनि गरिएको छ।

डिस्क्लेमर : इस आलेख/post/twites में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. लेख सोशल मीडिया फेसबुक पर वायरल है, इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति तीसरी जंग हिंदी उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार तीसरी जंग हिंदी के नहीं हैं, तथा तीसरी जंग हिंदी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है

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