इतिहास

भारत का इतिहास : पाषाण युग – 70000 से 3300 ई.पू : पार्ट 3

भारत में इस समय राष्ट्रवाद का बोबाला है, लोगों को भरमा कर राजनीती की जा रही है, अनजाने में जनता फ़ासिस्ट ताक़तों के छल का शिकार हो रही है, पिछले तीन दशक भारत की राजनीती के लिहाज़ से सबसे बुरे रहे हैं, ये वो समय था जब यहाँ धर्म, जाति आधारित राजनीती के ज़रिये समाज को बिखराव की तरफ धकेल दिया गया, इन तीन दशकों में भारत के राजनेताओं ने एक से बढ़ कर एक अपराध खुले आम किये और उन अपराधों को उन्होंने सरवजयनिक मंचों पर खड़े होकर स्वीकार किया, इन अपराधी नेताओं ने देश पर राज किया, बड़े बड़े पदों पर आसीन रहे और देश के अंदर नफरत फैलाने का काम करते रहे, धर्म की राजनीती का असर हर जगह देखने को मिला, बहुसंखयक वर्ग अपनी संख्या के बल पर अपनी मनमानी करता रहा, देश की छोटी से लेकर सर्वोचय न्यायलय तक इन के प्रभाव, दबदबे के आगे बहुत ‘छोटी’ साबित होती रहीं, अदालतों में न्याय, संगठन विशेष के आदेश के मुताबिक दिए गए, अब देश के हालात जहाँ पहुँच गए हैं वो किसी से छुपे नहीं हैं, सरकार ने पहले NIA कानून में संशोधन कर असीमित ताक़तें एक संस्था को दीं, ताकि जनता को भयभीत कर उनको बोलने से रोका जा सके, NIA कानून में संशोधन के बाद एजेंसी किसी भी नागरिक को बिना किसी कारण/अपराध के गिरफ्तार कर अपने पास रख सकती है, उसे आतंकवादी घोषित कर सकती है, उस के बारे में कोई भी अदालत सवाल नहीं कर सकती है और न ही गिरफ्तार किये गए वयक्ति को कहाँ, किस हाल में रखा गया है मालूम करने का अधिकार किसी को होगा, यह वयक्ति मरे तो मर जाये, उसकी मौत के लिए कोई भी ज़िम्मेदार नहीं होगा

नागरिकता कानून में संशोधन कर पडोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में रहने वाले अलप्संख्यों को भारत की नागरिकता दी जाएगी, जबकि NRC के तहत लोगों से मालूम किया जायेगा कि वो साबित करें कि वो ‘भारत’ के नागरिक हैं, जो भी वयक्ति अपनी नागरिकता साबित नहीं कर सकेगा उसे ‘विदेशी नागरिक’ मान लिया जायेगा, यहाँ सरकार की बुरी नियत सामने आती है, जो NRC में संदिघ्द, विदेशी करार दिए जायेंगे उनमे से ‘मुसलमानों’ को छोड़कर अन्य सभी को नागरिकता संसोधन कानून के तहत नागरिकता दे दी जायेगी जबकि ‘मुसलमाओं’ के लिए सैंकड़ों की तादाद में ‘डिटेंशन सेण्टर’ बन कर तैयार हो रहे हैं, उन्हें पकड़ इनमे हमेशा के लिए क़ैद कर दिया जायेगा और जो मुस्लमान नागरिक मान लिए जायेंगे उनके अधिकारों में कटौती कर उन्हें दोयम/निम्न स्तर पर ला दिया जायेगा, इनके वोट देने, उच्च शिक्षा, धार्मिक आज़ादी, सामाजिक आज़ादी को ख़तम कर ग़ुलामों जैसी हालात में पहुंचा दिया जायेगा

भारत विशाल देश है, यह देश न होकर महादीप के सामान है, भारत दुनियां के उन इलाकों में से एक है जो सबसे सुरक्ष्गित और जीवन यापन के लिए सबसे शानदार जगह है, भारत के परिवार में अनेक देश आते हैं जिन्हें हम इंडियन/सिंधु/इंडस फैमिली कहते हैं, इनमे मलेशिया, इंडोनिशया, जावा, सुमात्रा, थाईलैंड, हांगकांग, मालदीव, श्रीलंका, मारीशश शामिल हैं, हिन्द महासागर एक मात्रा सागर है जो किसी देश अथवा सभ्यता के नाम पर है, भारत के तरफ विशाल हिमालिया है, दूसरी तरफ विशाल समुद्र है, केवल सिंध का एक रास्ता है जहाँ से भारत में लोग आ सकते थे, यहाँ नदियों, जंगलों, वनों, जलाशयों, प्राकृतिक संशाधनों की भरमार है, हर तरह के खनिज यहाँ बड़ी तादाद में मौजूद हैं, उपजाऊ ज़मीन है, इन वजहों से भारत हमेशा से दुनियांभर के लोगों के लिए अहमियत वाला इलाका रहा है, लोग यहाँ आते रहे, बसते गए, और धीरे धीरे ये धरती ‘चमन’ बन गयी, आज भारत वो ‘गुलदस्ता’ है जिसमे हर तरह की खूबसूरती लिए तमाम रंग मौजूद हैं, संगीत, ज्ञान, विज्ञानं, कला, भाषा, खान-पान, लिबास, ज़बान,,,यही वो ज़मीं जिसकी दुनियां दीवानी,,,,ऐसा खूबसूरत देश कहीं नहीं है, यहाँ आबशार हैं, कश्मीर की हसीन वादियां, चश्मे और झीलें हैं, केरल के पकवान हैं, बंगाल, असम, पूर्वोत्तर की बेमिसाल सुंदरता है, पंजाब का भंगड़ा है, राजिस्थान के रेत का बड़ा ‘सहरा’ है, गुजरात के साहिल हैं, क्या कुछ नहीं है यहाँ, दुनियांभर में जितने भी धर्म हैं सभी के मानने वाले लोग भारत में हैं, संगीत, गायकी भारत से बेहतर कहीं नहीं है, यहाँ चिनार के दरखत हैं, संदल, केसर,. खुबानी, अफ़लातून, घेबर, इमरती, जलेबी, कोरमा, बियानी, हलीम, शेरवानी, अलीगढ कट पजामा, चुंडीदार पजामा, अचकन, रेशम, मख़मल, ताज महल, चार मीनार, क़ुतुब मीनार, गोल गुम्बद हैं, लाल किला, अमेर का किला, चित्तौड़ का किला, हवा महल है, दिलीप कुमार, रहमान, राज कपूर, गुरु दत्त, नगरिस, मधुबाला, धर्मेंद्र, शारुख़ खान, सलमान ख़ान, सैफ अली खान, आमिर खान, अजय देवगन, रणवीर सिंह और रणवीर कपूर हैं, करीना कपूर ख़ान, आलिया भट्ट हैं, कपिल देव, गावस्कर, मंसूर खान पटौदी, फारुख इंजीनयर, लाला अमरनाथ, महेंद्र सिंह धोनी, अज़हरुद्दीन, इरफ़ान, युसूफ, ज़हीर खान, रोहित,जडेजा हैं, ज्ञानी ज़ैलसिंह, कलाम, प्रतिभा हैं, मस्जिद, मंदिर, गुरुदावरे, चर्च हैं,,,,सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा,,,,parvez

भारत में मानवीय कार्यकलाप के जो प्राचीनतम चिह्न अब तक मिले हैं, वे 4,00,000 ई. पू. और 2,00,000 ई. पू. के बीच दूसरे और तीसरे हिम-युगों के संधिकाल के हैं और वे इस बात के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं कि उस समय पत्थर के उपकरण काम में लाए जाते थे। जीवित व्यक्ति के अपरिवर्तित जैविक गुणसूत्रों के प्रमाणों के आधार पर भारत में मानव का सबसे पहला प्रमाण केरल से मिला है जो सत्तर हज़ार साल पुराना होने की संभावना है। इस व्यक्ति के गुणसूत्र अफ़्रीक़ा के प्राचीन मानव के जैविक गुणसूत्रों (जीन्स) से पूरी तरह मिलते हैं।इसके पश्चात् एक लम्बे अरसे तक विकास मन्द गति से होता रहा, जिसमें अन्तिम समय में जाकर तीव्रता आई और उसकी परिणति 2300 ई. पू. के लगभग सिन्धु घाटी की आलीशान सभ्यता (अथवा नवीनतम नामकरण के अनुसार हड़प्पा संस्कृति) के रूप में हुई। हड़प्पा की पूर्ववर्ती संस्कृतियाँ हैं: बलूचिस्तानी पहाड़ियों के गाँवों की कुल्ली संस्कृति और राजस्थान तथा पंजाब की नदियों के किनारे बसे कुछ ग्राम-समुदायों की संस्कृति। यह काल वह है जब अफ़्रीक़ा से आदि मानव ने विश्व के अनेक हिस्सों में बसना प्रारम्भ किया जो पचास से सत्तर हज़ार साल पहले का माना जाता है।

भारत का इतिहास पाषाण काल

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समस्त इतिहास को तीन कालों में विभाजित किया जा एकता है-

– प्राक्इतिहास या प्रागैतिहासिक काल Prehistoric Age
– आद्य ऐतिहासिक काल Proto-historic Age
– ऐतिहासिक काल Historic Age
– प्राक् इतिहास या प्रागैतिहासिक काल

प्रागैतिहासिक काल
इस काल में मनुष्य ने घटनाओं का कोई लिखित विवरण नहीं रखा। इस काल में विषय में जो भी जानकारी मिलती है वह पाषाण के उपकरणों, मिट्टी के बर्तनों, खिलौने आदि से प्राप्त होती है।

आद्य ऐतिहासिक काल
इस काल में लेखन कला के प्रचलन के बाद भी उपलब्ध लेख पढ़े नहीं जा सके हैं।

ऐतिहासिक काल
मानव विकास के उस काल को इतिहास कहा जाता है, जिसके लिए लिखित विवरण उपलब्ध है। मनुष्य की कहानी आज से लगभग दस लाख वर्ष पूर्व प्रारम्भ होती है, पर ‘ज्ञानी मानव‘ होमो सैपियंस Homo sapiens का प्रवेश इस धरती पर आज से क़रीब तीस या चालीस हज़ार वर्ष पहले ही हुआ।

पाषाण काल
यह काल मनुष्य की सभ्यता का प्रारम्भिक काल माना जाता है। इस काल को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है। –

– पुरा पाषाण काल Paleolithic Age
– मध्य पाषाण काल Mesolithic Age एवं
– नव पाषाण काल अथवा उत्तर पाषाण काल Neolithic Age

पुरापाषाण काल
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यूनानी भाषा में Palaios प्राचीन एवं Lithos पाषाण के अर्थ में प्रयुक्त होता था। इन्हीं शब्दों के आधार पर Paleolithic Age (पाषाणकाल) शब्द बना । यह काल आखेटक एवं खाद्य-संग्रहण काल के रूप में भी जाना जाता है। अभी तक भारत में पुरा पाषाणकालीन मनुष्य के अवशेष कहीं से भी नहीं मिल पाये हैं, जो कुछ भी अवशेष के रूप में मिला है, वह है उस समय प्रयोग में लाये जाने वाले पत्थर के उपकरण। प्राप्त उपकरणों के आधार पर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि ये लगभग 2,50,000 ई.पू. के होंगे। अभी हाल में महाराष्ट्र के ‘बोरी’ नामक स्थान खुदाई में मिले अवशेषों से ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि इस पृथ्वी पर ‘मनुष्य’ की उपस्थिति लगभग 14 लाख वर्ष पुरानी है। गोल पत्थरों से बनाये गये प्रस्तर उपकरण मुख्य रूप से सोहन नदी घाटी में मिलते हैं।

सामान्य पत्थरों के कोर तथा फ़्लॅक्स प्रणाली द्वारा बनाये गये औजार मुख्य रूप से मद्रास, वर्तमान चेन्नई में पाये गये हैं। इन दोनों प्रणालियों से निर्मित प्रस्तर के औजार सिंगरौली घाटी, मिर्ज़ापुर एंवं बेलन घाटी, इलाहाबाद में मिले हैं। मध्य प्रदेश के भोपाल नगर के पास भीम बेटका में मिली पर्वत गुफायें एवं शैलाश्रृय भी महत्त्वपूर्ण हैं। इस समय के मनुष्यों का जीवन पूर्णरूप से शिकार पर निर्भर था। वे अग्नि के प्रयोग से अनभिज्ञ थे। सम्भवतः इस समय के मनुष्य नीग्रेटो Negreto जाति के थे। भारत में पुरापाषाण युग को औजार-प्रौद्योगिकी के आधार पर तीन अवस्थाओं में बांटा जा एकता हैं। यह अवस्थाएं हैं-

 


पुरापाषाण कालीन संस्कृतियां
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काल अवस्थाएं
1- निम्न पुरापाषाण काल हस्तकुठार Hand-axe और विदारणी Cleaver उद्योग
2- मध्य पुरापाषाण काल

शल्क (फ़्लॅक्स) से बने औज़ार

3- उच्च पुरापाषाण काल
शल्कों और फ़लकों (ब्लेड) पर बने औजार

पूर्व पुरापाषाण काल के महत्त्वपूर्ण स्थल हैं –

स्थल क्षेत्र
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1- पहलगाम कश्मीर
2- वेनलघाटी

इलाहाबाद ज़िले में, उत्तर प्रदेश

3- भीमबेटका और आदमगढ़
होशंगाबाद ज़िले में मध्य प्रदेश

4- 16 आर और सिंगी तालाब
नागौर ज़िले में, राजस्थान

5- नेवासा
अहमदनगर ज़िले में महाराष्ट्र

6- हुंसगी
गुलबर्गा ज़िले में कर्नाटक

7- अट्टिरामपक्कम
तमिलनाडु

मध्य पुरापाषाण युग के महत्त्वपूर्ण स्थल हैं –
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भीमबेटका
नेवासा
पुष्कर
ऊपरी सिंध की रोहिरी पहाड़ियाँ
नर्मदा के किनारे स्थित समानापुर

पुरापाषाण काल में प्रयुक्त होने वाले प्रस्तर उपकरणों के आकार एवं जलवायु में होने वाले परिवर्तन के आधार पर इस काल को हम तीन वर्गो में विभाजित कर सकते हैं।-
निम्न पुरा पाषाण काल (2,50,000-1,00,000 ई.पू.)
मध्य पुरापाषाण काल (1,00,000- 40,000 ई.पू.)
उच्च पुरापाषाण काल (40,000- 10,000 ई.पू.)

 


पाषाण युग इतिहास (पुरापाषाण काल – मध्यपाषाण काल – नवपाषाण काल)

पुरापाषाण काल (Paleolithic Era) 

पुरापाषाण काल (Palaeolithic) प्रौगएतिहासिक युग का वह समय है जब मानव ने पत्थर के औजार बनाना सबसे पहले आरम्भ किया। यह काल आधुनिक काल से 25-20 लाख साल पूर्व से लेकर 12,000 साल पूर्व तक माना जाता है। इस दौरान मानव इतिहास का 99% विकास हुआ। इस काल के बाद मध्यपाषाण युग का प्रारंभ हुआ जब मानव ने खेती करना शुरु किया था।

भारत में पुरापाषाण काल के अवशेष तमिल नाडु के कुरनूल, कर्नाटक के हुँस्न्गी, ओडिशा के कुलिआना, राजस्थान के डीडवानाके श्रृंगी तालाब के निकट और मध्य प्रदेश के भीमबेटका में मिलते हैं। इन अवशेषो की संख्या मध्यपाषाण काल के प्राप्त अवशेषो से बहुत कम है।
भारत मे इसके अवशेष सोहन, बेलन तथा नर्मदा नदी घाटी मे प्राप्त हुए है।
भोपाल के पास स्थित भीमबेटका नामक चित्रित गुफाए, शैलाश्रय तथा अनेक कलाकृतिया प्राप्त हुई है।
विशिष्ट उपकरण- हैण्ड-ऐक्स (कुल्हाड़ी), क्लीवर और स्क्रेपर आदि।

मध्यपाषाण काल (Mesolithic Era) 
मध्यपाषाण काल (Mesolithic) मनुष्य के विकास का वह अध्याय है जो पुरापाषाण काल और नवपाषाण काल मे मध्य मे आता है। इतिहासकार इस काल को 12,000 साल पूर्व से लेकर 10,000 साल पूर्व तक मानते है।
12,000 साल से लेकर 10,000 साल पूर्व तक। इस युग को माइक्रोलिथ (Microlith) अथवा लधुपाषाण युग भी कहा जाता है।

नवपाषाण काल (Neolithic Era) 
10,000 साल से 3300 ई.पू. तक इस काल मे मानव कृषि करना सिख गया था

पुरापाषाण काल
औजार- हाथ से बने अथवा प्राकृतिक वस्तुओ का हथियार/औजार के रूप मे उपयोग – भाला, कुल्हाड़ी, धनुष, तीर, सुई, गदा
अर्थव्यवस्था- शिकार एवं खाद्य संग्रह
शरण स्थल- अस्थाई जीवन शैली – गुफ़ा,
समाज- अस्थाई झोपड़ीयां मुख्यता नदी एवं झील के किनारे 25-100 लोगो का समुह (अधिकांशतः एक ही परिवार के सदस्य)

 

मध्यपाषाण काल
मध्यपाषाण काल (known as the Epipalaeolithic in areas not affected by the Ice Age (such as Africa))
औजार- हाथ से बने अथवा प्राकृतिक वस्तुओ का हथियार/औजार के रूप मे उपयोग- धनुष, तीर, अर्थव्यवस्था- मछली के शीकार एवं भंडारण के औजार, नौका
समाज- कबिले एवं परिवार समुह
धर्म- मध्य पुरापाषाण काल के आसपास मृत्यु पश्चात जीवन में विश्वास के साक्ष्य कब्र एवं अन्तिम संस्कार के रूप मे मिलते है।

 

नवपाषाण काल
औजार- हाथ से बने अथवा प्राकृतिक वस्तुओ का हथियार/औजार के रूप मे उपयोग- चिसल (लकड़ी एवं पत्थर छिलने के लिये),खेती मे प्रयुक्त होने वाले औजार, मिट्टी के बरतन, हथियार
अर्थव्यवस्था- खेती, शिकार एवं खाद्य संग्रह, मछली का शिकार और पशुपालन
शरण स्थल- खेतों के आस पास बसी छोटी बस्तीयों से लेकर काँस्य युग के नगरों तक
समाज- कबीले से लेकर काँस्य युग के राज्यो तक

 

काँस्य युग
औजार- तांबे एवं काँस्य के औजार, मिट्टी के बरतन बनाने का चाक
अर्थव्यवस्था- खेती, पशुपालन, हस्तकला एवं व्यपार

 

लौह युग
औजार- लोहे के औजार
अर्थव्यवस्था- खेती, पशुपालन, हस्तकला एवं व्यपार

 

 

मध्य पाषाण युगीन संस्कृति के महत्त्वपूर्ण स्थल

बागोर
बागोर राजस्थान में भीलवाड़ा के निकट कोठारी नदी के किनारे प्रागैतिहासिक आवास स्थल था। यहाँ से मध्य पाषाण काल के पाँच मानव कंकाल मिले हैं, जो सुनियोजित ढंग से दफ़नाए गये थे।

बनास सभ्यता के इस उल्लेखनीय स्थल से पाषाण युग की सर्वाधिक सामग्री प्राप्त हुई हैं। इनमें स्क्रेपर (लम्बा आयताकार एवं गोल औजार), पोइंट (त्रिभुजाकार अर्थात् नोंक वाला) आदि प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त तक्षणी, खुरचनी, तथा बेधक भी बड़ी मात्रा में प्राप्त हुए हैं।
इस समय तक मानव संगठित सामाजिक जीवन से दूर था। यहाँ से नवीन पाषाणकालीन संस्कृति के भी अवशेष मिले हैं।
बागोर से इस बात के भी साक्ष्य मिले हैं कि इस स्थल पर फर्श बनाने के लिए पत्थर लाये गये थे और यहाँ फूस के वातरोधी पर्दे भी बनाये गये।
यहाँ के उद्योग में बहुत ही छोटी-छोटी वस्तुओं का निर्माण होता था और वे ज्यामितीय प्रारूपों की दृष्टि से अत्यंत उन्नत थीं।

आदम गढ़ में पत्थरों पर की गई चित्रकारी

लंघनाज
भारत में मध्य पाषाण युग (25000 ई.पू. से 5000 ई.पू.) की सबसे प्रसिद्ध स्थली गुजरात में लंघनाज स्थित है।
इस बस्ती की उत्खनिज सामग्री से मध्यपाषाण तथा प्रारम्भिक नवपाषाण काल में आदि मानव की जीवन प्रणाली पर प्रकाश पड़ता है।
उत्खननों ने यह दिखलाया है कि उस समय प्रयुक्त मुख्य उपकरण पत्थर के फलक और नियमित ज्यामितीय आकार के सूक्ष्माश्म थे, जिनका बाणाग्रों की तरह प्रयोग किया जाता था।
पुरातत्त्वज्ञों ने लंघनाज के इतिहास को दो पृथक् कालों में विभक्त किया है।
पहले काल के मृद्भाण्ड हस्तनिर्मित हैं, जबकि दूसरे काल के पूर्व-नवपाषाण कालीन मृद्भाण्ड चाक पर बनाये गये हैं और अलंकृत हैं।
पहले काल में शिकार और मछली पकड़ना लोगों के मुख्य उद्यम थे, जबकि दूसरे काल की विशेषता कृषि में संक्रमण थी।
लंघनाज क्षेत्र में हरिणों, बारहसिंगों, गैण्डों, जंगली सुअरों और बैलों की हड्डियाँ मिली हैं। वे सम्भवतः इनका शिकार कर उन्हें खाते थे।

सराय नाहरराय
सराय नाहरराय नामक मध्य पाषाणिक पुरास्थल उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जनपद मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर गोखुर झील के किनारे पर स्थित है। इस पुरास्थल की खोज के.सी.ओझा ने की थी। यह पुरास्थल लगभग 1800 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है।

सराय नाहर राय में कुल 11 मानव समाधियाँ तथा 8 गर्त चूल्हों का उत्खनन इलाहाबाद विश्वविद्यालय की ओर से किया गया था। यहाँ की क़ब्रें (समाधियाँ) आवास क्षेत्र के अन्दर स्थित थीं। क़ब्रें छिछली और अण्डाकार थीं।
यहाँ संयुक्त रूप से 2 पुरुषों एवं 2 स्त्रियों को एक साथ दफ़नाये जाने के प्रमाण हमें सराय नाहर राय से मिले हैं।
सराय नाहरराय से जो 15 मानव कंकाल मिले हैं, वे ह्रष्ट-पुष्ट तथा सुगठित शरीर वाले मानव समुदाय के प्रतीत होते हैं।
सराय नाहर राय के पुरुष तथा स्त्रियाँ दोनों ही अपेक्षाकृत लम्बे क़द के थे।
गर्त चूल्हों से हिरण, बारहसिंगा, जंगली सुअर आदि पशुओं की अधजली हड्डियाँ मिली हैं।
यहाँ पर चूल्हों का उपयोग पशुओं के मांस को भूनने के लिए भी किया जाता था।
सराय नाहरराय से लघु पाषाण उपकरणों में समानांतर एवं कुण्ठित पार्श्व वाले ब्लेड, बेधक, चान्द्रिक, खुरचनी, समबाहु तथा विषम बाहु आदि ज्यामितीय उपकरण हैं, जो चर्ट, चाल्सेडनी, जैस्पर आदि के बने हुए हैं।
सराय नाहरराय से मृद्भाण्ड के कोई अवशेष नहीं मिले हैं। वैसे भी मध्य गंगा घाटी में स्थित मध्य पाषाण काल के किसी भी उत्खनित पुरास्थल से मृद्भाण्ड के अवशेष अभी तक नहीं मिले हैं।

आदम गढ़

आदम गढ़ एक अति प्राचीन स्थान है। यहाँ स्थित प्राचीन पत्थरों पर की गई चित्रकारी (Petroglyph) के लिये आदम गढ़ बहुत प्रसिद्ध है।

आदम गढ़ मध्य प्रदेश राज्य के होशंगाबाद नगर से 2 कि.मी. दूर नर्मदा नदी के पास स्थित है।
आदम गढ़ पहाड़ी की गुफ़ाओं में की गई चित्रकारी में पाषाण युगीन सभ्यता के अवशेष आसानी से देखे जा सकते हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के नियंत्रण के तहत प्राचीन स्थानों में से एक आदम गढ़, विश्व प्रसिद्ध भीमबेटका गुफ़ाओं से क़रीब 40 कि.मी. दूर है।
आदम गढ़ में 20 चट्टानी आश्रय चित्रकारी से सजे हैं जो लगभग 4 कि.मी. के क्षेत्र में फैले हुए हैं।
आदम गढ़ की पहाड़ियों में बने चित्रित चट्टानी आश्रय पाषाण काल तथा मध्यपाषाण काल के हैं।
इस कला स्थल का खुदाई सामग्री से पता लगाया गया है।

 

 

 

मध्य पाषाण काल
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इस काल में प्रयुक्त होने वाले उपकरण आकार में बहुत छोटे होते थे, जिन्हें लघु पाषाणोपकरण माइक्रोलिथ कहते थे। पुरापाषाण काल में प्रयुक्त होने वाले कच्चे पदार्थ क्वार्टजाइट के स्थान पर मध्य पाषाण काल में जेस्पर, एगेट, चर्ट और चालसिडनी जैसे पदार्थ प्रयुक्त किये गये। इस समय के प्रस्तर उपकरण राजस्थान, मालवा, गुजरात, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश एवं मैसूर में पाये गये हैं। अभी हाल में ही कुछ अवशेष मिर्जापुर के सिंगरौली, बांदा एवं विन्ध्य क्षेत्र से भी प्राप्त हुए हैं। मध्य पाषाणकालीन मानव अस्थि-पंजर के कुछ अवशेष प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश के सराय नाहर राय तथा महदहा नामक स्थान से प्राप्त हुए हैं। मध्य पाषाणकालीन जीवन भी शिकार पर अधिक निर्भर था। इस समय तक लोग पशुओं में गाय, बैल, भेड़, घोड़े एवं भैंसों का शिकार करने लगे थे।

जीवित व्यक्ति के अपरिवर्तित जैविक गुणसूत्रों के प्रमाणों के आधार पर भारत में मानव का सबसे पहला प्रमाण केरल से मिला है जो सत्तर हज़ार साल पुराना होने की संभावना है। इस व्यक्ति के गुणसूत्र अफ़्रीक़ा के प्राचीन मानव के जैविक गुणसूत्रों (जीन्स) से पूरी तरह मिलते हैं। यह काल वह है जब अफ़्रीक़ा से आदि मानव ने विश्व के अनेक हिस्सों में बसना प्रारम्भ किया जो पचास से सत्तर हज़ार साल पहले का माना जाता है। कृषि संबंधी प्रथम साक्ष्य ‘साम्भर’ राजस्थान में पौधे बोने का है जो ईसा से सात हज़ार वर्ष पुराना है। 3000 ई. पूर्व तथा 1500 ई. पूर्व के बीच सिंधु घाटी में एक उन्नत सभ्यता वर्तमान थी, जिसके अवशेष मोहन जोदड़ो (मुअन-जो-दाड़ो) और हड़प्पा में मिले हैं। विश्वास किया जाता है कि भारत में आर्यों का प्रवेश बाद में हुआ। वेदों में हमें उस काल की सभ्यता की एक झाँकी मिलती है।

मध्य पाषाण काल के अन्तिम चरण में कुछ साक्ष्यों के आधार पर प्रतीत होता है कि लोग कृषि एवं पशुपालन की ओर आकर्षित हो रहे थे इस समय मिली समाधियों से स्पष्ट होता है कि लोग अन्त्येष्टि क्रिया से परिचित थे। मानव अस्थिपंजर के साथ कहीं-कहीं पर कुत्ते के अस्थिपंजर भी मिले है जिनसे प्रतीत होता है कि ये लोग मनुष्य के प्राचीन काल से ही सहचर थे।

बागोर और आदमगढ़ में छठी शताब्दी ई.पू. के आस-पास मध्य पाषाण युगीन लोगों द्वारा भेड़े, बकरियाँ रख जाने का साक्ष्य मिलता है। मध्य पाषाण युगीन संस्कृति के महत्त्वपूर्ण स्थल हैं –

मध्य पाषाण युगीन संस्कृति के महत्त्वपूर्ण स्थल
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स्थल क्षेत्र
1- बागोर राजस्थान
2- लंघनाज
गुजरात

3- सराय नाहरराय, चोपनी माण्डो, महगड़ा व दमदमा
उत्तर प्रदेश

4- भीमबेटका, आदमगढ़
मध्य प्रदेश

नव पाषाण अथवा उत्तर पाषाण काल
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साधरणतया इस काल की सीमा 3500 ई.पू. से 1000 ई.पू. के बीच मानी जाती है। यूनानी भाषा का Neo शब्द नवीन के अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसलिए इस काल को ‘नवपाषाण काल‘ भी कहा जाता है। इस काल की सभ्यता भारत के विशाल क्षेत्र में फैली हुई थी। सर्वप्रथम 1860 ई. में ‘ली मेसुरियर’ Le Mesurier ने इस काल का प्रथम प्रस्तर उपकरण उत्तर प्रदेश की टौंस नदी की घाटी से प्राप्त किया। इसके बाद 1872 ई. में ‘निबलियन फ़्रेज़र’ ने कर्नाटक के ‘बेलारी’ क्षेत्र को दक्षिण भारत के उत्तर-पाषाण कालीन सभ्यता का मुख्य स्थल घोषित किया। इसके अतिरिक्त इस सभ्यता के मुख्य केन्द्र बिन्दु हैं – कश्मीर, सिंध प्रदेश, बिहार, झारखंड, बंगाल, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, असम आदि।

ताम्र-पाषाणिक काल
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जिस काल में मनुष्य ने पत्थर और तांबे के औज़ारों का साथ-साथ प्रयोग किया, उस काल को ‘ताम्र-पाषाणिक काल’ कहते हैं। सर्वप्रथम जिस धातु को औज़ारों में प्रयुक्त किया गया वह थी – ‘तांबा’। ऐसा माना जाता है कि तांबे का सर्वप्रथम प्रयोग क़रीब 5000 ई.पू. में किया गया। भारत में ताम्र पाषाण अवस्था के मुख्य क्षेत्र दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग, पश्चिमी महाराष्ट्र तथा दक्षिण-पूर्वी भारत में हैं। दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में स्थित ‘बनास घाटी’ के सूखे क्षेत्रों में ‘अहाड़ा’ एवं ‘गिलुंड’ नामक स्थानों की खुदाई की गयी। मालवा, एवं ‘एरण’ स्थानों पर भी खुदाई का कार्य सम्पन्न हुआ जो पश्चिमी मध्य प्रदेश में स्थित है। खुदाई में मालवा से प्राप्त होने वाले ‘मृद्भांड’ ताम्रपाषाण काल की खुदाई से प्राप्त अन्य मृद्भांडों में सर्वात्तम माने गये हैं।

पश्चिमी महाराष्ट्र में हुए व्यापक उत्खनन क्षेत्रों में अहमदनगर के जोर्वे, नेवासा एवं दायमाबाद, पुणे ज़िले में सोनगांव, इनामगांव आदि क्षेत्र सम्मिलित हैं। ये सभी क्षेत्र ‘जोर्वे संस्कृति‘ के अन्तर्गत आते हैं। इस संस्कृति का समय 1,400-700 ई.पू. के क़रीब माना जाता है। वैसे तो यह सभ्यता ग्रामीण भी पर कुछ भागों जैसे ‘दायमाबाद’ एवं ‘इनामगांव’ में नगरीकरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गयी थी। ‘बनासघाटी’ में स्थित ‘अहाड़’ में सपाट कुल्हाड़ियां, चूड़ियां और कई तरह की चादरें प्राप्त हुई हैं। ये सब तांबे से निर्मित उपकरण थे। ‘अहाड़’ अथवा ‘ताम्बवली’ के लोग पहले से ही धातुओं के विषय में जानकारी रखते थे। अहाड़ संस्कृति की समय सीमा 2,100 से 1,500 ई.पू. के मध्य मानी जाती है। ‘गिलुन्डु’, जहां पर एक प्रस्तर फलक उद्योग के अवशेष मिले हैं, ‘अहाड़ संस्कृति’ का केन्द्र बिन्दु माना जाता है।

इस काल में लोग गेहूँ, धान और दाल की खेती करते थे। पशुओं में ये गाय, भैंस, भेड़, बकरी, सूअर और ऊँट पालते थे। ‘जोर्वे संस्कृति’ के अन्तर्गत एक पांच कमरों वाले मकान का अवशेष मिला है। जीवन सामान्यतः ग्रामीण था। चाक निर्मित लाल और काले रंग के ‘मृद्‌भांड’ पाये गये हैं। कुछ बर्तन, जैसे ‘साधारण तश्तरियां’ एवं ‘साधारण कटोरे’ महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में ‘सूत एवं रेशम के धागे’ तथा ‘कायथा’ में मिले ‘मनके के हार’ के आधार पर कहा जा एकता है कि ‘ताम्र-पाषाण काल’ में लोग कताई-बुनाई एवं सोनारी व्यवसाय से परिचित थे। इस समय शवों के संस्कार में घर के भीतर ही शवों का दफ़ना दिया जाता था। दक्षिण भारत में प्राप्त शवों के शीश पूर्व और पैर पश्चिम की ओर एवं महाराष्ट्र में प्राप्त शवों के शीश उत्तर की ओर एवं पैर दक्षिण की ओर मिले हैं। पश्चिमी भारत में लगभग सम्पूर्ण शवाधान एवं पूर्वी भारत में आंशिक शवाधान का प्रचलन था।

इस काल के लोग लेखन कला से अनभिज्ञ थे। राजस्थान और मालवा में प्राप्त मिट्टी निर्मित वृषभ की मूर्ति एवं ‘इनाम गांव से प्राप्त ‘मातृदेवी की मूर्ति’ से लगता है कि लोग वृषभ एवं मातृदेवी की पूजा करते थे। तिथि क्रम के अनुसार भारत में ताम्र-पाषाण बस्तियों की अनेक शाखायें हैं। कुछ तो ‘प्राक् हड़प्पायी’ हैं, कुछ हड़प्पा संस्कृति के समकालीन हैं, कुछ और हड़प्पोत्तर काल की हैं। ‘प्राक् हड़प्पा कालीन संस्कृति’ के अन्तर्गत राजस्थान के ‘कालीबंगा’ एवं हरियाणा के ‘बनवाली’ स्पष्टतः ताम्र-पाषाणिक अवस्था के हैं। 1,200 ई.पू. के लगभग ‘ताम्र-पाषाणिक संस्कृति’ का लोप हो गया। केवल ‘जोर्वे संस्कृति‘ ही 700 ई.पू. तक बची रह सकी। सर्वप्रथम चित्रित भांडों के अवशेष ‘ताम्र-पाषाणिक काल’ में ही मिलते हैं। इसी काल के लोगों ने सर्वप्रथम भारतीय प्राय:द्वीप में बड़े बड़े गांवों की स्थापना की।


ताम्र पाषणिक संस्कृतियां
संस्कृति काल

1- अहाड़ संस्कृति लगभग 1700-1500 ई.पू.
2- कायथ संस्कृति
लगभग 2000-1800 ई.पू.

3- मालवा संस्कृति
लगभग 1500-1200 ई.पू.

4- सावलदा संस्कृति .
लगभग 2300-2200 ई.पू

5- जोर्वे संस्कृति
लगभग 1400-700 ई.पू.

6- प्रभास संस्कृति
लगभग 1800-1200 ई.पू.

7- रंगपुर संस्कृति
लगभग 1500-1200 ई.पू.

प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति

1. मानव का प्राचीनतम इतिहास किस काल से सम्बनिधत हैं?— पाषाण युग से
2. मानव जाति के विकास के जिस काल का कोई लिखित प्रमाण नहीं मिलता, उसे कहते हैं?— प्रागैतिहासिक काल या प्राक इतिहास काल
3. पूर्व-पाषाण काल के मनुष्य कहाँ रहते थे?— पहाड़ की कंदराओं में
4. पूर्व-पाषाण युग के मानव की जीविका का मुख्य आधार क्या था?— शिकार
5. पूर्व-पाषाण युग के हथियार किस चीज के बने होते थें?— पत्थर, हडडी एवं लकड़ी के
6. मध्य पाषाण युग के मनुष्य के जीविका का मुख्य साधन क्या था?— शिकार व पशुपालन
7. पूर्व-पाषाण काल का प्रथम आविष्कार क्या था?— आग
8. नव पाषाण युग में मानव ने किस पशु को पालतू बनाया था?— कुत्ता को
9. वमषि के आविष्कार को मानव ने किस युग में पूरी तरह अपना लिया था?— नव-पाषाण युग में
10. मनुष्यों में स्थायी निवास की प्रवृत्ति किस युग में आयी थी?— नव-पाषाण युग में
11. नव-पाषाण युग का सर्वप्रथम औजार क्या था?— पत्थर की कुल्हाड़ी
12. पहिए का आविष्कार किस काल में हुआ था?— नव-पाषाण काल में
13. नव-पाषाण युग में मानव अपने मृतकों का अंतिम संस्कार कैसे करते थे?— शव को दफनाकर
14. नव-पाषाण युग में मृत व्यक्तियों को किन-किन चीजों के साथ कब्रों में दफनाया जाता था?— हथियार, मिटटी के बर्तन, खाने पीने की चीजें
15. नव-पाषाण युग में कब्रगाहों में बड़े-बड़े पत्थर लगा दिये जाते थे। उन पत्थरों को क्या कहते हैं?— महा पाषाण
16. मिटटी के बर्तन का प्रयोग सर्वप्रथम किस युग में किया गया था?— नव-पाषाण युग में
17. मनुष्य ने वस्त्र बुनने की कला कब शुरू की थी?— नव-पाषाण काल में
18. आदि मानव ने सबसे पहले क्या सीखा था?— आग जलाना
19. आदि मानव प्राय: किन दो चीजों से डरता था?— मौसम और जंगली जानवरों से
20. आदि मानव की अत्यधिक महत्वपूर्ण खोज कौन-सी थी?— चक्र या पहिया
21. प्राचीन काल के धातुओं का संग्रह कौन-सा विभाग करता हैं?— पुरातत्व विभाग
22. ताम्र-पाषाण युग के मनुष्य का मुख्य पेशा क्या था?— खेती
23. किस काल में मनुष्य ने पत्थर और ताँबे के औजारों का साथ-साथ प्रयोग किया?— ताम्र-पाषाणिक काल
24. ताम्र-पाषाणिक काल में किस धातु को सर्वप्रथम औजारों में प्रयुक्त किया गया था?— तांबा
25. ताम्र-पाषाण युग की स्त्रियाँ किस धातु के आभूषण पहनती थी?— कांसा धातु
26. भारत की प्राचीन भाषाएँ कौन-कौन सी हैं?— 26. पाली और प्रावमत
27. भारत के सबसे प्राचीन नगर कौन थे?— मोहनजोदड़ों
28. मोहनजोदड़ों का क्या अर्थ होता है?— मृतकों का नगर अथवा मुर्दों का टीला
29. मोहनजोदड़ों किस नदी के किनारे स्थित था?— सिन्धु नदी के
30. ‘विशाल स्नानागार’ कहाँ स्थित है?— मोहनजोदड़ों में
31. मोहनजोदड़ों और हड़प्पा की खोज के पूर्व विद्वान भारतीय इतिहास का प्रारम्भ किस महत्वपूर्ण घटना से मानते थे?— आर्यों के आगमन से
32. हड़प्पा नगर की खोज किसने और कब की थी?— 1921 ई० में सर जान मार्शल और राय बहादुर दयाराम सहनी ने
33. सिन्धु घाटी सभ्यता को आजकल किस नाम से पुकारा जाता है?— हड़प्पा संस्कृति
34. भारत की प्रथम सभ्यता कौन है?— सिन्धु घाटी सभ्यता ( हड़प्पा संस्कृति )
35. भारतीय उपमहाद्वीप में प्रथम सभ्यता किस क्षेत्र में विकसित हुई थी?— पशिचमी क्षेत्र में
36. सिन्धुघाटी सभ्यता के निर्माता कौन थे?— द्रविड़
37. सिन्धुघाटी सभ्यता का काल कब से कब तक था?— डॉ. बी. ए. सिमथ के अनुसार, 2500 ई. पूर्व से 1500 ई. पूर्व तक
38. हड़प्पा-संस्कृति कितने वर्ष जीवित रही?— लगभग 1000 वर्ष
39. सिन्धुघाटी सभ्यता को क्या कहा जाता है?— नगरीय सभ्यता
40. सिन्धु घाटी सभ्यता किन नदियों के किनारे विकसित हुई थी?— सिन्धु व उसकी सहायक नदियों के किनारे
41. सिन्धु सभ्यता के अधिकांश नगर कहाँ स्थित थे?— नदियों के किनारे
42. सबसे पहले सिन्धु सभ्यता के दो प्रमुख स्थल कहाँ मिले थे?— पंजाब में हड़प्पा और सिंघ में मोहनजोदड़ों
43. हड़प्पा नगर किस नदी के किनारे स्थित था?— रावी नदी
44. हड़प्पा कहाँ स्थित है?— पाकिस्तान ( साहिवाल )
45. हड़प्पा वासी कहाँ के मूल निवासी थे?— फिनीशिया के
46. मोहनजोदड़ों किस नदी के किनारे स्थित हैं?— सिन्धु नदी
47. सैंधव स्थलों के उत्खननों से प्राप्त मुहरों पर किस पशु का सर्वाधिक उत्कीर्णन हुआ है?— बैल
48. सिन्धु घाटी सभ्यता का प्रधान बंदरगाह कौन था?— लोथल बंदरगाह
49. सिन्धु सभ्यता का विस्तार क्षेत्र कहाँ-कहाँ था?— जम्मू, पंजाब, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, बलूचिस्तान ( पाकिस्तान ), सिन्घु ( पाकिस्तान )
50. सिन्धु घाटी सभ्यता में समाज कितने वर्गों में विभाजित था?— चार-विद्वान, योह, व्यवसायी तथा श्रमजीवी
51. सिन्धु घाटी सभ्यता में मनुष्य किस प्रकार का भोजन करते थे?— शाकाहारी तथा मांसाहारी
52. सिन्धुसभ्यता के लोग किस प्रकार के वस्त्र पहनते थे?— ऊनी तथा सूती
53. सिन्धुवासी किसकी उपासना करते थे?— मातृदेवी और शिव लिंग
54. सिन्धुवासी किस पशु को पवित्र मानते थे?— साँड
55. सिन्धुवासी आवागमन के लिए किसका प्रयोग करते थे?— बैलगाडियों तथा इक्के गाडियों का
56. सिन्धुवासी किससे मनोरंजन करते थे?— शतरंज, संगीत, नृत्य, जुआ
57. किस स्थल पर हड़प्पा संस्कृति के लोगों को घोड़े का ज्ञान था?— सुरकोटदा
58. पैमानों की खोज ने यह सिह् कर दिया है कि सिन्धु घाटी के लोग माप और तौल से परिचित थे। यह खोज कहाँ पर हुई?— लोथल
59. हड़प्पीय नगरों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्षण क्या हैं?— योजनाबह्, विन्यास
60. सिन्धुवासी किस धातु का प्रयोग ज्यादा करते थे?— ता°बा
61. सिन्धु सभ्यता के निवासी किस धातु से परिचित नहीं थें?— लोहा
62. सिन्धुघाटी के लोगों द्वारा प्रयुक्त भाषा कौन-सी थी?— आज तक पढ़ा नहीं जा सका
63. मोहनजोदड़ों की मुख्य सड़क की लम्बाई-चौड़ाई क्या थी?— 400 मी. लम्बाई तथा 10 मीटर चौड़ाई
64. हड़प्पा निवासी किस देश के व्यापारियों के साथ व्यापार करते थे?— सुमेर
65. सिन्धुवासियों का प्रमुख पेशा क्या था?— वमषि तथा पशुपालन
66. सिन्धु घाटी सभ्यता के विनाश के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया गया है?— बाढ़, सूखा, विदेशी आक्रमण ( आर्यों का आगमन )
67. चीन की प्राचीन सभ्यता को किस नाम से पुकारते थे?— पीली नदी घाटी सभ्यता
68. चीन की बड़ी दीवार का निर्माण किसके शासनकाल में पूर्ण किया गया?— शी- आंग टी
69 चीन की सभ्यता का विकास किस नदी के किनारे हुआ था?— हवांग्ह्यो
70. प्राचीन चीनियों की सबसे लोकप्रिय प्रथा किसकी पूजा थी?— पूर्वजों को

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