देश

भारत से भिड़ने को तैयार है नेपाल : नेपाल में संसद से सड़क तक भारत का विरोध हो रहा है : रिपोर्ट

सीमा विवाद पर भारत और नेपाल के बीच तनातनी चल रही है, इस दौरान नेपाल निवासी भारतीय फिल्म अभिनेत्री मनीषा कोइराला ने ट्विटर के ज़रिये अपने देश का समर्थन किया है साथ ही उन्होंने इस मामले में चीन को भी तीसरा पक्ष बनाने की बात कही है, भारत इस समय विदेश निति के लिहाज़ से बुरी तरह विफल हुआ है, चीन को लेकर सिक्किम और लद्दाख में चीनी सेना के सिलसिले से खबरें आ रही थीं वहीँ पाकिस्तान को लेकर कश्मीर सीमा पर युद्ध जैसी इस्थिति है अब नेपाल से भी रिश्ते बिगड़ते नज़र आ रहे हैं, यह इस्थिति भारत के लिए असहज करने वाली है क्यूंकि नेपाल भारत का बहुत पुराना मित्र देश है जो कि अब भारत को आँखें दिखा रहा है साथ ही नेपाल के रिश्ते चीन से बहुत ज़ियादा गहरे हो गए हैं, आने वाले समय में चीन नेपाल में अपने बेस बना सकता है, बीजिंग से काठमांडू तक सड़क निर्माण और रेल यातायात पर पहले से ही काम चल रहा है

अमेरिका और इस्राईल की दोश्ती में भारत पडोसी देशों से मामलात बिगड़ रहे हैं, अमेरिका भारत को चीन के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए दोस्ती गांठ रहा है तो इस्राइल से आरएसएस के दशकों पुराने सम्बन्ध हैं, दोनों का मिशन ‘एंटी इस्लाम-एंटी मुस्लिम’ है, इस्राइल ग्रेटर इस्राईल बनाना चाहता है तो आरएसएस अखंड भारत, बतादें कि आरएसएस के मुख्य कर्ताधर्ता यहूदी नस्ल के लोग हैं जिनका निकास किनान यानी फिलिस्तीन से हुआ था और तब ये लोग भारत के गुजरात प्रान्त में आ कर बस गए थे…
नेपाल और भारत के सीमा विवाद की लड़ाई सोशल मीडिया में भी लड़ी जा रही है, एक तरफ नेपाल के पक्षधर ट्विटर पर ट्वीट कर रहे हैं तो दूसरी तरफ भारतीय लोग अपनी भड़ास निकाल रहे हैं, अपनी बात कहने का सभी को अधिकार है लेकिन बात कहते वक़्त लिहाज़ ज़रूर रहना चाहिए, यहाँ ट्विटर पर लिहाज़ का ख्याल नहीं रखा जा रहा है, बाकायदा लोग गन्दी भाषा, गालियां तक इस्तेमाल कर रहे हैं

Deepak Chaurasia
@DChaurasia2312
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री
@ChouhanShivraj
का कहना है कि तब्लीगी जमात के सदस्यों ने विशेष रूप से इंदौर और भोपाल में कोरोना वायरस संक्रमण का प्रसार किया। उन्होंने कहा कि सदस्यों ने जिम्मेदाराना व्यवहार नहीं किया। #tabligijamaat

Deepak Chaurasia
@DChaurasia2312
जामा मस्जिद के ठीक सामने मटिया महल बाजार में सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। ईद से पहले बड़ी संख्या में खरीदारी करने के लिए लोग सड़कों पर निकले हुए हैं। आप सभी से अनुरोध है कि लॉकडाउन के नियमों का पालन करें और घर में नमाज़ अदा करें..#EidUlFitr

Deepak Chaurasia
@DChaurasia2312
#HistoricOneYearOfModi2 को 370, तीन तलाक़ और राम मंदिर बनाने का रास्ता खोलने के लिए याद किया जाएगा। इसी साल दुनिया में कोरोना महामारी के तौर पर सामने आई है।चुनौतियों को अवसर में बदलने में माहिर
@narendramodi
की असली परीक्षा इस संकट काल के बाद #AatmaNirbharBharatAbhiyan की होगी।

Deepak Chaurasia
@DChaurasia2312
#tabligijamaat फिर से शक के दायरे में, मुस्लिम नाम से मरकज में रहते मिला हिंदू युवक,
पिता का कहना है कि उनका बेटा कुछ दिनों से अजीब व्यवहार करने लगा था. उसने घर पर नमाज पढ़ना और इस्लाम की बातें करता है. पुलिस को शक कि कहीं यह ब्रेन वॉश का मामला तो नहीं, जांच का एक बिंदू यह भी।

Dr. Udit Raj
@Dr_Uditraj
नेपाल में संसद से सड़क तक भारत का विरोध हो रहा है। संभावना है कि भविष्य में नेपाल युद्ध करने का दुःसाहस करे।यही विदेश नीति है कि एक दोस्त दुश्मन बन गया।
@INCIndia

नेपाली रञ्जन
@koiralaranjan
नेपाल का दल र नेता हरु सजक रहनु

We are a single strong united stone when it comes to sovereignty or border disputes or any national interest

राष्ट्रिय ट्विटे ( NATIONAL TWITEE)Flag of NepalFlag of NepalFlag of Nepal
@NationalTwitee
Counter steps that Nepal has to initiate to solve burning issue with India:
1.Create environment to hold dialogue
2.Technical preparedness & accumulation of proof in favour
http://3.Search for solution through political channel
4.Constant dialogue


पिंकू शुक्ला
@shuklapinku
चीन और भारत का युद्ध निश्चित है आज नही तो कल …भारत को तैयार रहना चाहिए क्योकि नेपाल और पाकिस्तान उसके बहकावे में सीधी लड़ाई नही कर सकते हा गाल भले बजा ले मजबूरन चीन को ही लड़ना होगा और चीन को बिना रौंदे भारत विश्व का प्रतिनिधित्व नही कर सकता यह भी सच है..!!

Purushottam Agrawal
@puru_ag
“राष्ट्रवादी” चैनलों से निवेदन –नेपाल के साथ बिगाड़ का पाप न करें। विशिष्ट हैं नेपाल के साथ संबंध, नेपाल की स्थिति।
मनीषा कोइराला को गरियाने से, सैन्य-क्षमता की तुलना से किसी का भला नहीं।
सोचना चाहिए कि हमारे संबंधों में ऐसा उतार क्यों? जबान पर काबू रखना देशहित में होगा।

Ravish Kumar FC
@SirRavishFC
पहले का PM कमजोर था, इसलिए चीन और अमेरिका डरता था
अभी का PM इतना मजबूत है कि दो टके का नेपाल भी आंख दिखा रहा है

डॉ सीमा
@bghwa02
सदियों से भारत और #नेपाल का रिश्ता सौहार्दपूर्ण चलता आ रहा था।
लेकिन नेपाल की सत्ता जैसे ही #वामपंथीयों के हाथों में आयी, संबंधों में जहर घोलने का षडयंत्र आरम्भ हो गया।

इसिलिये कहते हैं कि यदि सांप और वामपंथी का एकसाथ सामना हो जाये तो सबसे पहले वामपंथी को मार देना चाहिए।
Angry faceAngry face


Routine of Nepal banda
@RONBupdates
After watching yesterday’s special episode of “Sidha Kura Janata Sanga”, we can asume that both side have logic and evidence (But Nepali side was more stronger) and the only solution is peaceful table talk and mutual re-search.

नयाँ कम्युनिष्ट पार्टी,नेपाल I New Communist Party
@nayanepal2020
Easier said than done.Nepal has been requesting India for dialogue for more than a year. Three diplomatic protest notes have been sent already.And India keeps ignoring. Diplomacy is a two-way process. India is not interested in diplomacy. Nepal should internationalize this issue.

Ashish Sahu
@its_ashishsahu
Today I have Seen One News Anchor Who is threatening on live Tv Vikas Sharma .
भारत पूरे नेपाल को कब्ज़ा कर ले और अपने नक़्शे में दिखा दे तो।
Is he doing journalism or what , he is anchor not anyone official who is threatening on live Tv like an Gangster.
From R.bharat

Flag of Nepalनमस्ते नेपालFlag of Nepal
@Namaste_NEPAL__
Nepal was officially formed in September 25, 1768 and India was officially formed in August 15, 1947, here you can clearly see the fact that Nepal is 178 years, 10 months, 21 days older than India

Suman Ghimire
@SumanGh63187895
When all Corona cases existing from the people came n still coming from India.. then why we can not say, In Nepal maximum cases of Corona virus came from India?? It is fact that we have freedom of talking in public and in this case the topic is 100% real Clapping hands sign✊🏻
जय नेपाल ✊🏻✊🏻

पिंकू शुक्ला
@shuklapinku
मनीषा कोइराला को भारत ने इज्जत ,शोहरत, पैसा सब दिया उन्हें अपने देश की बात रखने का पूरा हक है लेकिन भारत और नेपाल के द्विपक्षीय मामले में चीन का नाम लेकर उन्होंने अपने मानसिक दिवालियापन का परिचय दिया है उन्हें यह नही भूलना चाहिए कि लौटकर काम के लिए मुम्बई ही आना है..!
@mkoirala

Rabi Lamich2ane
@hamrorabi
आजको कार्यक्रमको विशेष तयारीमा छौ।भारतीय मिडिया जस्तो बकम्फुसे हल्ला हैन,तथ्य र प्रमाणमा बोल्ने प्रयासमा छौ,I recommend fellow Indian Journalists to check the history,collect the evidences,read them all until you understand the fact and then enter to your studios.Or STOP NONSENSE

पिंकू शुक्ला
@shuklapinku
नेपाल जानता है कि लिपुलेख कोई मुद्दा नही है असल मुद्दा है पहले कैलाश मानसरोवर यात्रा नेपाल से होकर होती थी जिससे नेपाल को काफी आमदनी होती थी लोगों को रोजगार मिलता था अब इस सड़क से हम उत्तराखंड से हि कैलाश मानसरोवर यात्रा कर पायेंगे जिससे नेपाल को आर्थिक घाटा हो सकता है ..!

भारत से भिड़ने को तैयार है नेपाल?

अविनाश राय
एबीपी न्यूज़

18 May 2020

8 मई, 2020 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उत्तराखंड में 90 किलोमीटर लंबी धारचूला लिपुलेख सड़क का उद्घाटन किया. ये सड़क पिछले कई साल से बन रही थी, जिसे बना रहा था बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन. सड़क के बनने से उत्तराखंड के पिथौरागढ़ का धारचुला हिमालय के लिपुलेख दर्रे से जुड़ जाएगा. धारचुला-लिपुलेख रोड के लिए बनी ये नई सड़क पिथौरागढ़-तवाघाट-घाटियाबागढ़ रूट का विस्‍तार है. नई सड़क घाटियाबागढ़ से शुरू होकर लिपुलेख दर्रे पर ख़त्म होती है जो कैलाश मानसरोवर का प्रवेश द्वार है. इस सड़क के बनने के बाद से कैलाश मानसरोवर के यात्रियों को सहूलियत हो जाएगी. अभी तक भारत के यात्री सिक्किम के नाथूला या फिर नेपाल के जरिए कैलाश मानसरोवर की यात्रा तक जाते थे जिसमें तीन से चार हफ्ते का वक्त लगता था. लेकिन अब इस सड़क के बनने के बाद से कैलाश मानसरोवर यात्रा का समय घटकर एक हफ्ता रह जाएगा. इसके अलावा इस सड़क के बनने के बाद से भारतीय सेना की पहुंच भी इस इलाके में आसान हो जाएगी.

कैलाश मानसरोवर यात्रियों को होगा फायदा

भारत, नेपाल और तिब्बत के बीच जहां सीमा है, उसे कहते हैं लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल. भारत ने जो नई सड़क बनाई है वो लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल तक जाती है. भारत से जो यात्री कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जाएंगे, वो लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल को पार करके लिपुलेख दर्रे के जरिए तिब्बत में दाखिल होंगे और फिर इसी रास्ते से कैलाश मानसरोवर की यात्रा करके भारत लौट आएंगे. ये सड़क बन गई है, लेकिन अब भी करीब 4 किलोमीटर लंबी सड़क बननी बाकी है, जिसके लिए कुछ पहाड़ काटे जाने हैं. 17,060 फीट की ऊंचाई पर बनी इस सड़क के बनने से दिल्ली से लिपुलेख की यात्रा महज दो दिनों में पूरी हो सकती है. ये नई सड़क पिथौरागढ़ के घटियाबाघड़ से शुरू हो रही है और लिपुलेख तक जा रही है. इससे सबसे बड़ा फायदा ये है कि अभी तक कैलाश मानसरोवर के यात्रियों को अपनी यात्रा का 80 फीसदी हिस्सा चीन में तय करना पड़ता था और महज 20 फीसदी हिस्सा भारत में होता था, वो अनुपात अब बदल जाएगा. भारतीय यात्री अब अपनी यात्रा का करीब 84 फीसदी हिस्सा भारत में तय करेंगे और 16 फीसदी हिस्सा चीन का होगा.

भारतीय सेना के लिए ज़रूरी थी ये सड़क?

चीन से लगती सड़क बनाने के लिए भारत सरकार ने 1990 में ही एक प्रस्ताव रखा था. 1999 में जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तो कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी ने इस सड़क को बनाने की मंजूरी दी थी. लेकिन फिर मामला आगे बढ़ गया और सड़क नहीं बनी. 2017 में जब भारत का चीन के साथ डोकलाम मुद्दे पर करीब 70 दिन लंबा विवाद चला तो भारत सरकार को ये समझ आया कि सड़कें बनानी कितनी ज़रूरी है. इसके बाद 2017-18 में रक्षा मंत्रालय की स्टैंडिंग कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि देश कुछ ऐसे पड़ोसियों से घिरा है, जिनसे रिश्ते संभालने में काफी मुश्किल होती है. ऐसे में सीमावर्ती इलाके में सड़कें बनाना और विकास के कुछ काम करवाना बेहद ज़रूरी है. सड़क बनने के बाद सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि ये पहली बार होगा, जब सीमावर्ती इलाकों के गांव भी सड़क से जुड़ जाएंगे.


नेपाल की आपत्ति क्या है?

8 मई को जब भारत में इस सड़क का उद्घाटन हुआ, उसी दिन नेपाल ने इस सड़क को लेकर आपत्ति जताई. नेपाल ने कहा कि ये सड़क उसकी सीमा का उल्लंघन कर रही है. अगले ही दिन नेपाल के विदेश मंत्रालय ने काठमांडू में भारत के प्रतिनिधि को तलब किया और आपत्ति जताई. नेपाल का कहना है कि लिपुलेख दर्रे का दक्षिणी हिस्सा कालापानी क्षेत्र में आता है और कालापानी नेपाल में है. जबकि साल 1962 से ही कालापानी इलाके पर भारत का कब्जा है और नेपाल से हमेशा इसके लिए टकराव होता रहता है.

भारत ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि जब ये सड़क बन रही थी तो नेपाल ने आपत्ति क्यों नहीं जताई थी. और अब जब सड़क बनकर तैयार है, उसका उद्घाटन हो गया है तो नेपाल आपत्ति जता रहा है. भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने साफ कर दिया है कि पिथौरागढ़ में जिस सड़क का उद्घाटन हुआ है, वो पूरी तरह से भारतीय क्षेत्र में है और कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने वाले यात्री इसी रास्ते का उपयोग करते हैं.

नेपाल के साथ 60 साल पुराना है सीमा विवाद

काठमांडू का कहना है कि भारत के साथ सीमा विवाद को पहले भी कई बार उठाया जा चुका है. नवंबर, 2019 में भी जब भारत सरकार की ओर से जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने के बाद भारत का नया राजनीतिक नक्शा जारी किया गया था, तब भी नेपाल ने आपत्ति जताई थी. उस वक्त नेपाल की आपत्ति ये थी कि भारत के नक्शे में कालापानी भारत का हिस्सा बताया गया है, जो भारत के उत्तराखंड राज्य में है.

भारत में इस नक्शे के जारी होने के बाद नेपाल में लोग सड़कों पर उतर आए थे. नेपाल की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी और विपक्षी नेपाली कांग्रेस ने भी विरोध प्रदर्शन किया था. नेपाल सरकार का कहना था कि ये भारत का एकपक्षीय फैसला है और नेपाल अपनी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा करेगा. वहीं भारत के विदेश मंत्रालय का कहना था कि नया नक्शा भारत की संप्रभु सीमाओं को बिल्कुल ठीक तरीके से दिखा रहा है. हालांकि नेपाल और भारत के बीच का ये सीमा विवाद 1960 के दशक का ही है.


1980 में भारत और नेपाल ने द्वीपक्षीय जॉइंट टेक्निकल लेवल बाउंड्री वर्किंग ग्रुप बनाया था ताकि दोनों देशों के बीच के सीमा विवाद को सुलझाया जा सके. लेकिन ये टीम भी कालापानी के विवाद को नहीं सुलझा सकी. साल 2000 में भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और नेपाल के प्रधानमंत्री बीपी कोइराला के बीच दिल्ली में इस मसले पर बातचीत हुई और दो साल के अंदर इस मसले पर सहमति बनाने की बात हुई. लेकिन ये सहमति नहीं बन पाई. ये सहमति अब भी नहीं बन पाई है और इसी वजह से नेपाल अब भारत को आंखे दिखा रहा है.

अंग्रेजों के जमाने में हुई थी भारत और नेपाल के बीच संधि

नेपाल और भारत के बीच जो अंतरराष्ट्रीय सीमा संधि है, वो अंग्रेजों के जमाने में हुई थी. जिस कालापानी को लेकर विवाद है, वो 35 वर्ग किलोमीटर की एक ज़मीन है. साल 1816 में ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच सुगौली की संधि हुई थी. तब काली नदी को ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच रखा गया था. ये नदी कालापानी से ही निकलती है.

1962 में जब भारत और चीन के बीच लड़ाई हुई तो भारत ने कालापानी में आईटीबीपी के जवान तैनात कर दिए. और अब भी ये जवान वहां तैनात हैं, जिसको लेकर नेपाल आपत्ति जताता रहता है. 2016 में जब भारत और चीन के बीच लिपुलेख दर्रे के जरिए व्यापार की बात हुई थी, तब भी नेपाल ने भारत और चीन दोनों से अपना विरोध दर्ज करवाया था लेकिन दोनों में से किसी भी देश ने नेपाल की बात पर ध्यान नहीं दिया. अब जब सड़क बन गई है तो नेपाल भड़क गया है और प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली कह रहे हैं कि नेपाल अपने पुरखों की एक इंच ज़मीन भी छोड़ने को राजी नहीं है.


पूरे मामले में चीन की क्या भूमिका है?
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अगर सामान्य तौर पर देखें तो चीन की इस पूरे मामले में कोई भूमिका नहीं है. लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि नेपाल बिना चीन की मदद के भारत से भिड़ने को तैयार नहीं हो सकता है. खुद देश के थल सेना अध्यक्ष जनरल एमएन नरवणे ने बिना चीन का नाम लिए ये कहा था कि नेपाल किसी और के इशारे पर आपत्ति जता रहा है. हालांकि इस पूरे मसले पर चीन की ओर से कोई बयान नहीं आया है, लेकिन लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल से लगती सीमाओं पर चीन के इशारे पर कुछ विरोध प्रदर्शन हुए हैं. वहीं भारत की नज़र पहले से चीन पर थी और ये साफ दिख रहा था कि नेपाल का झुकाव चीन की ओर बढ़ता जा रहा है. इस मुद्दे पर बातचीत करने के लिए इस साल की शुरुआत में दोनों देशों के बीच विदेश सचिव स्तर की बातचीत प्रस्तावित थी, लेकिन कोरोना की वजह से ये टल गई और अब इसने दो देशों के बीच विवाद का रूप ले लिया है.

भारत के कैलाश मानसरोवर के लिए लिंक रोड के उद्घाटन को लेकर नेपाल का विरोध तेज होता जा रहा है. शुक्रवार को आर्मी चीफ एम. एम नरवणे ने बयान दिया था कि मानसरोवर के रास्ते पर लिपुलेख पास पर बन रही सड़क का विरोध नेपाल किसी और के इशारे पर कर रहा है. आर्मी चीफ के बयान के बाद नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने कहा कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा नेपाल का अभिन्न हिस्सा हैं और इन पर दावा पेश करने के लिए ठोस कूटनीतिक कदम उठाए जाएंगे.

नेपाल की संसद की संयुक्त समिति में सरकार की नीतियों और कार्यक्रम पर चर्चा के दौरान भंडारी ने कहा कि इन इलाकों पर दावा पेश करते हुए नेपाल एक नया राजनीतिक नक्शा जारी करेगा.

 

लिपुलेख: भारत के सेना प्रमुख के बयान के बाद नेपाल ने उठाया ये कदम

नई दिल्ली में मनोहर पर्रिकर इंस्टिट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज ऐंड एनालिसिस के एक कार्यक्रम में आर्मी चीफ एम.एम. नरवणे ने लिपुलेख विवाद में चीन की भूमिका होने की तरफ इशारा किया था. नरवणे ने कहा, यह मानने की पूरी वजह है कि नेपाल ने किसी और के इशारे पर इस मामले को उठाया होगा. इस बात की संभावना बहुत ज्यादा है.

उन्होंने कहा कि हमने जो सड़क बनाई है वह नदी के पश्चिम में है और नदी के पूर्व की जमीन उन लोगों की है. उसमें कोई विवाद ही नहीं है. मुझे नहीं समझ में आ रहा है कि वे किस बारे में आंदोलन कर रहे हैं. ट्राइजंक्शन को लेकर कोई संशय नहीं है, अतीत में कभी ऐसी कोई दिक्कत नहीं हुई है. आर्मी चीफ ने लद्दाख और सिक्किम में भारतीय-चीनी सेना के बीच संघर्ष की घटनाओं और लिपुलेख के बीच किसी तरह का संबंध होने से इनकार कर दिया.

8 मई को भारत ने भारत-नेपाल-चीन ट्राइजंक्शन के नजदीक उत्तराखंड के लिपुलेख पास से 80 किमी लंबी सड़क का उद्घाटन किया था जिसे लेकर नेपाल आपत्ति जता रहा है. यह सड़क भारत-चीन सीमा से सिर्फ 5 किमी की दूरी पर है. सड़क बनने से कैलाश मानसरोवर तक की तीर्थयात्रा पूरी करने में अब भारतीयों को काफी कम वक्त लगेगा. भारत-चीन के व्यापार के लिए भी इस सड़क का इस्तेमाल होगा.

चीन लगातार नेपाल में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. इस नए विवाद में भी चीन की भूमिका होने की आशंका जताई जा रही है. नरवणे के बयान से कुछ घंटे पहले ही नेपाल के विदेश सचिव शंकर दास बैरागी ने चीनी राजदूत हू यंकी से लिपुलेख विवाद को लेकर मुलाकात की थी. पिछले कुछ दिनों में चीनी राजदूत नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल और माधव कुमार नेपाल के साथ कई बैठकें कर चुके हैं.

नेपाल लिपुलेख विवाद पर भारत के साथ-साथ चीन से भी वार्ता करेगा. नेपाल का कहना है कि कैलाश मानसरोवर लिंक रोड लिपुलेख से होते हुए चीन के स्वायत्त क्षेत्र तिब्बत तक जाती है और सड़क निर्माण को लेकर भारत-चीन के बीच समझौता हुआ था इसलिए चीन के साथ भी बातचीत जरूरी है.

 

कम्युनिस्टप्रति भारत कठोर बन्न लागेको हो ?

23 May, 2020

समाचार विश्लेषण । नेपालमा झण्डै दुई तिहाईको कम्युनिस्ट सरकार भएकै बेलामा नयाँ नक्शा जारी भएको छ । कालापानी, लिम्पियाधुरा र लिपुलेक समावेश गरी नेपालले नयाँ नक्शा जारी गरेपछि नयाँ दिल्लीमा तरंग आएको छ ।

भारतले लिपुलेक हुँदै चीनको सीमासम्म जोडिने लिंकरोड खोलेपछि नेपालले आपत्ती जनाउँदै कडा कदम चाल्यो । योसँगै भारतमा कम्युनिस्टहरुको विगत र वर्तमानबारे विश्लेषण हुन थालेको छ ।

भारतका पूर्व सैनिक जनरल गगन दीप बक्सीले भारतले विगतमा नेपालमा हिन्दु राष्ट्र ध्वस्त पारेर माओवादीलाई स्थापित गर्नु ठुलो गल्ती भएको अभिव्यक्ति दिएका छन् । उनले एबीपी न्युजसँग यसै हप्ता अन्तवार्तामा भने, ‘हिन्दु राज्य ध्वस्त पारेर माओवादीलाई स्थापित गर्नु हाम्रो ठुलो गल्ती थियो ।’ माओवादीलाई समर्थन गर्दा सेल्फ गोल गरेको उल्लेख गर्दै कम्युनिस्टहरुले नै नेपालमा चीनलाई ल्याएर भारतलाई चुनौती दिएको आरोप लगाए ।

भारतको सत्तारुढ भारतीय जनता पार्टीका प्रवक्ता प्रेम शुक्लाले माओवादीलाई विगतमा पालेर राजनीतिक प्रबलता दिइएको बताए । उनले साम्यवादी शक्तिलाई पालेर राजनीतिक प्रबलता दिनुलाई गम्भीर गल्ती समेत भनेका छन् । भारतको टेलिभिजन च्यानल एबीपी न्युजसँगको अन्तवार्तामा भाजपा प्रवक्ता शुक्लाले भने, ‘प्रचण्ड जस्ता साम्यवादी शक्तिलाई जेएनयुमा पालेर राजनीतिक प्रबलता दिइयो ।’ कँग्रेस आईको पालामा राजीब गान्धीलाई पशुपतिनाथको दर्शन गर्न नदिइएको विषय उल्लेख गर्दै त्यसपछि हिन्दु शासकहरुप्रति फरक धारणा पैदा गरिएको समेत आरोप लगाए ।

कम्युनिस्ट सरकारले सिमा विवादमा तेस्रो पक्षका रुपमा चीनलाई ल्याएको भन्दै यो स्वीकार्य नहुने स्पष्ट पारे । उनले भने, ‘चीनलाई ल्याउनु दुर्भाग्यपूर्ण छ ।’ उनले अहिले नेपालमा साम्राज्यवादी शक्तिको नांगो नाँच चलिरहेको समेत बताए ।

नेपाल मामलाका जानकार जनरल अशोक मेहताले तत्काल वार्ता हुनुपर्नेमा जोड दिए । उनले एक हप्ताभित्र अनलाइनमै भएपनि वार्ता हुनुपर्ने बताए । अर्का भारतीय विद्धान प्राध्यापक महेन्द्र पी लामाले पनि वार्ताको विकल्प नभएको बताए । नेपाल मामलाका जानकार प्राध्यापक एस डी मुनीले भारत नेपाल मामलामा असफल हुँदै गएको आरोप लगाएका छन् ।

भारतमा एकपक्ष वार्तामा जोड दिइरहेको छ । एउटा तप्का चीनलाई नेपालको कम्युनिस्ट सरकारले ठाउँ दिएको भन्न थालेका छन् । उनीहरु विगतमा हिन्दु राष्ट्रको अन्तमा भारतको भुमिकाप्रति प्रश्न उठाइरहेका छन् । यसलाई जनरल बक्सीले सेल्फ गोल भनेका छन् । यो सेल्फ गोलले चीनलाई निकै ठाउँ दिएको उनको तर्क छ । जनरल अशोक मेहताले चीनको नेपाल मामलामा निकै बदलाव आइसकेको बताए । चीनले सत्तारुढ नेकपाको आन्तरिक विवादमा सम्झौता गराइदिएको उनको भनाई छ । नेपालमा भारतको प्रभाव रहेकोमा अहिले चीनले जितिसकेको बताए । उनले भने, ‘चीनले वामपन्थी एलाइन्स बनायो ।’ नेकपा एकीकरण चीनले गराएको बताए ।

चीनको बढ्दो प्रभाव बढिरहँदा भारतमा कम्युनिस्ट शक्तिलाई सघाएकोमा गम्भीर विश्लेषणहरु हुन थालेको छ । जनरल बक्सीको भनाईलाई दृष्टिगत गर्ने हो भने भारतभित्र कम्युनिस्ट शक्तिलाई विगतमा साथ दिनुलाई गम्भीर गल्ती भनिएको छ । यदि भारत यस्तो निष्कर्षमा पुगेमा नेपालको राजनीतिमा कस्तो असर पर्छ ? यो प्रश्न चासोको विषय बन्नसक्छ ।

भारतको सत्तारुढ दल भारतीय जनता पार्टीमाथि धर्मको राजनीति गरेको आरोप लाग्दै आएको छ । उसले नेपालमा हिन्दु राष्ट्र पुर्नस्थापनाको चाहना राखेको विषय चर्चामा आउनेगर्छ । भाजपाका केही नेताहरुको भनाई र दबाब त्यसैतर्फ छ । घटनाक्रम यसरी विकास हुँदैछ कि यसले राजनीतिमा नयाँ दुर्घटनाको सम्भावना बढेको छ । भारतमा नेपाल मामलामा पुर्नविचारको विषय उठ्न थालेको छ । जसलाई भाजपा नेता प्रमोद शुक्लाले पनि संकेत गरेका छन् । घटनाक्रमले भारतले विगतमा परिवर्तनका लागि दिदै आएको साथलाई फर्केर हेर्न थालेको छ । यसले राजनीतिमा नयाँ सम्भावनाको मार्ग कोर्दै लानसक्ने देखिएको छ ।-File Photo

‘नेपाल से हिंदू राजशाही उखाड़ने का राजीव गॉंधी ने बनाया प्लान, माओवादियों से की थी मिन्नतें’

रॉ के पूर्व स्पेशल डायरेक्टर अमर भूषण ने अपनी पुस्तक ‘इनसाइड नेपाल’ में किया खुलासा। बताया कूटनीतिक कामयाबी नहीं मिलने पर रॉ को दिया था राजा के पर कतरने का जिम्मा।

हिन्दू राष्ट्र रहे नेपाल की राजशाही को उखाड़ फेंकने में राजीव गाँधी के सरकार की अहम भूमिका थी। भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ ने नेपाल में एक गुप्त ऑपरेशन चलाया था जिसका उद्देश्य पड़ोसी राष्ट्र में राजशाही हटाकर लोकतंत्र की स्थापना करना था। रॉ के पूर्व स्पेशल डायरेक्टर अमर भूषण ने अपनी पुस्तक ‘इनसाइड नेपाल’ में लिखा है कि रॉ ने इस बात की पूरी कोशिश की थी कि नेपाल में अराजक तत्व राजशाही-विरोधी अभियान का फ़ायदा नहीं उठाएँ।

जनता ने राजतंत्र की अधिकारों में कटौती करने एवं लोकतंत्र की स्थापना के लिए बड़ा अभियान चलाया था। राजीव गाँधी के नेतृत्व वाली सरकार चाहती थी कि भारत इस कार्य में नेपाल की जनता का सहयोग करे। रॉ ने नेपाल के सभी राजनीतिक दलों व संगठनों के बीच एकता बनाए रखने के लिए मेहनत की। गुप्त ऑपरेशन के लिए रॉ के ईस्टर्न ब्यूरो के चीफ के रूप में भूषण ने भी अपना नाम जीवनाथन रख लिया था। इसी नाम से उन्होंने कई बहुत से लोगों को राजशाही के ख़िलाफ़ अभियान के लिए प्रशिक्षित किया।

नेपाल के राजा बीरेंद्र वीर विक्रम शाह देव पर कोई दबाव काम नहीं कर रहा था। इसके लिए भारत सरकार ने कूटनीतिक तरीके भी अपनाए लेकिन सब बेकार। इसके बाद भारत सरकार ने नेपाल में खाद्य पदार्थों की सप्लाई रोने का निर्णय लिया, ताकि राजा पर दबाव डाल कर जनता के प्रति जिम्मेदार बनाने के प्रयासों को बल मिले। नेपाल के राजा मदद के लिए चीन तक पहुँच गए थे। भारत कभी नहीं चाहता था कि पड़ोसी देशों में साम्राज्यवादी चीन का प्रभाव मजबूत हो।

इसके बाद भारत सरकार ने रॉ प्रमुख एके वर्मा को यह कार्य सौंपा। उन्होंने अपने सबसे विश्वस्त अधिकारी जीवनाथन को यह दायित्व दिया। इसके बाद जीवनाथन नेपाल में राजशाही के पर कतर कर लोकतंत्र की स्थापना का प्रयासों में जुट गए। जीवनाथन ने सरकार को भरोसा दिलाया कि जो काम कूटनीतिज्ञ और राजनयिक न कर सके, वह कार्य रॉ कर दिखाएगी। इससे पहले रॉ की ईस्टर्न यूनिट को कभी महत्व नहीं मिला था।


रॉ ने माओवादी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड को लुभाने के लिए सारी ताक़तें लगा दीं ताकि वह राजशाही के ख़िलाफ़ लड़ाई में बाकी राजनीतिक दलों का साथ दें। प्रचंड आगे चल कर 2 बार (अगस्त 2016 – जून 2017, अगस्त 2008 – मई 2009) नेपाल के प्रधानमंत्री भी बने। कई बैठकों के उपरांत रॉ प्रचंड को मनाने में कामयाब हुआ था, क्योंकि वह छिप कर रहते थे और उन तक पहुँचना मुश्किल होता था। इस प्रक्रिया में महीनों लग गए।

जीवनाथन के साथ हुई एक बैठक में प्रचंड ने सवाल भी पूछा था कि नेपाल राजशाही के अंतर्गत रहे या फिर लोकतंत्र के, इससे भारत को आख़िर क्या मतलब है? खैर, ऑपरेशन ख़त्म होते ही जीवनाथन गायब हो गए। उन्होंने अपने अंतर्गत कार्य कर रहे लोगों से साफ़ कह दिया कि वे ऐसा समझें कि कोई जीवनाथन था ही नहीं। नेपाल के कई नेता जीवनाथन को खोजते हुए भटक रहे थे लेकिन जीवनाथन तो कोई था ही नहीं।

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