विशेष

ये ज़ी न्यूज़ के पत्रकार सुखपाल चौधरी हैं, पैदल घर जा रहे मज़दूरों के सामने “मोदी” की तारीफ़ कर रहे थे, तो मज़दूरों ने इन्हें!

यह बॉलीवुड का माधवन नहीं है, आईआईटी बॉम्बे का “शरजील इमाम” है. आज तुम्हारा इंडिया को एक परिचय कराता हूं :-

Name : Sharjeel Imam
City : Patna State : Bihar Country : India

10th : St.Xavier,Patna
12th : DPS,Vasanthkunj,Delhi
Grad : B.Tech(Computer Sc.) ,IIT Mumbai
Master : M.Tech (Computer Sc.) , IIT Mumbai

Job :
1). Copenhagen Univ. – Software Programmer
2). IIT Powai,Mumbai – Assistant Professor
3). Jupitor Networks – Software Engineer

– Master in Moder History from JNU,Delhi
– Master of Philosophy from JNU,Delhi
– Doctorate of Philosophy from JNU,Delhi.

पागल थे तुम जो IIT से B.Tech,M.Tech करने के बाद Europe के सबसे सम्पन्न देश Denmark से 10,650 USD (अमेरिका डॉलर) प्रति माह यानी तकरीबन 8,00,000 INR (भारतीय रुपए) प्रति माह की Software Engineer & Programmer की नौकरी छोड़ कर ना जाने क्यों क्रांति का बीड़ा उठाने वापस आ गये?

क्या मिला क्रांति कर के जिस विदेश के वीजा के लिए लोग चन्द सेकंड में कपड़े उतार के नंगे हो जाए तुम उसे ठुकरा कर भारत देश के JNU से Phd करने लगे. आखिर क्या मिला ?

ये भारत है मेरे दोस्त !!!
यहाँ हक़ मांगोगे तो राष्ट्रविरोधी बताए जाओगे, प्रोटेस्ट करोगे तो राजद्रोह का मुकदमा लगेगा. बातो को इतना तोड़ा मरोड़ा जाएगा कि बेगुनाह होते हुए भी गुनाहगार बना दिये जाओगे.


Dr Saleem Mohammad Khan
@saleemmohdkhan
तुम लोग अगर ऐसे रास्तों से गाँव जाओगे जहाँ मुसलमान मिलें. यकीन मानो वो रोज़े से होंगे, लेकिन तुम्हे भूखा-प्यासा ना जाने देंगे
#MuslimSaviours

Ashraf Hussain
@AshrafFem
ट्विटर पर मुस्लिम नौजवान अब “आत्मनिर्भर” हो चुके हैं, इन्हें किसी और से ट्रेंड की गुजारिश नहीं करनी पड़ेगी, ये इत्तेहाद बना रहा तो खुद ही हर ट्रेंड को टॉप पर ले जाएंगे…

 

Madan Chouhan
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न माझी है, न रहबर, न हक में हवाएँ है।
न काजी है, न इबादत न हक में दुआये है।।
कातिल है, खंजर है, लहूलुहान शहर की फिजाये है।
लेकिन….!
“मन” के दिल मे हौसला है, मुरादे है, सब्र की सदाये है।।

*मदन चौहान मन*

 

 

yogesh soni (yogi)
@YogeshSoniYogi1
#ये है ज़ी न्यूज़ के पत्रकार सुखपाल चौधरी, इन्होंने नोएडा के परी चौक पर अपने घरों को पैदल जा रहे मज़दूरों के सामने”मोदीजी”की तारीफ कर डाली,फिर क्या था मज़दूरों की भीड़ ने इन्हें सुजाकर रख दिया
#ZeeNewsSealKaro

 

Mahtab Ansari‎Kanhaiya Kumar Group
#ये है ज़ी न्यूज़ के पत्रकार सुखपाल चौधरी,इन्होंने नोएडा के परी चौक पर अपने घरों को पैदल जा रहे मज़दूरों के सामने”#मोदीजी”की तारीफ कर डाली,फिर क्या था मज़दूरों की भीड़ ने इन्हें सुजाकर रख दिया🙄👇

 

 


Tanweer Ahmed Shaikh
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क्या बिहार के मुसलमान फुटानी(फिजूलखर्ची और दिखावे) में चूर हैं ?

एक कड़वा सवाल है, लेकिन धैर्यपूर्वक पढ़िए फिर प्रतिक्रिया दीजिए ….

मुझे याद पड़ता है कि जब मेरा बचपन था तब हमारे घर में चरखा हुआ करता था साथ ही ओखली, ढेकी, मूसल, हाथ चक्की, सिल बट्टे , दरांती , हसुआ, खुरपी …

मिट्टी के घर, फूंस की झोंपड़ियां जिसकी हर बरसात के बाद नवीनीकरण किया जाता था ।

हालांकि दादा/नाना जमींदारों में थे । समाज में प्रतिष्ठित … लेकिन फिर भी दिखावे जैसी कोई बात नहीं थी ।

मर्द खेतों में फसल की बोआई करते , पानी से सींचते और फसल काट कर घर लाते । दरवाजे पर एक जोड़ा विशालकाय बैल होता था । शायद उस जमाने में बड़ा बैल रखना अमीरी की इलामत समझा जाता था ।

खेती के काम भले ही मजदूरों से लिया जाता था । फिर भी देखरेख और आदेश दादा का ही चलता था ।

सबके अपने अपने काम बंटे हुए थे … खेती करवाने से लेकर अनाज घर तक लाने तक का काम मर्दों के जिम्मे था । वहीं जलावन का इंतजाम, खाना पकाना, घर की लीपापोती, अनाज की देखभाल , धान उबालना सुखाना, चावल गेंहू संग्रहित करना, दलहन की पिटाई तेलहन की कुटाई आदि कार्य महिलाओं के जिम्मेदारी थी । इन सब के साथ बच्चों का ख्याल भी महिलाएं रखती थीं ।

पुरषों को बाजार या रिश्तेदारों में जाने की छुट्टी तो मिल भी जाती थी, लेकिन घर की महिलाएं फजिर से ईशा तक पूर्णतः व्यसत रहती थी ।

महिलाओं के जिम्मे खाना पकाने के इलावे बच्चों को संवारने, ज्यूँ निकालने, नहलाने के साथ चिटाई बीनना, डलिया, मुजेली, कोठी(अनाज संग्रह करने का मिट्टी का बड़ा कॉन्टेनर) तैयार करना, उपले पाथना , बिस्तर सिलना, चावल कूट कर निकलना, चुरा कूटना, मुरमुरे बनाना , पकवान तैयार करना जैसे हजारों काम थे ।

मर्दों के जिम्मे पशुओं को खिलाना और चारे का प्रबंध करना था तो। महिलाएं गोबर उठाने और बथान की साफ सफाई थी । गरज के महिलाएं मर्दों के शाना बशाना खड़ी थीं …

युग बदला, कुछ अविष्कार हुए, कच्चे मकानों की जगह पक्के मकानों ने ले ली । बहुत से काम कम हो गए, यहां तक तो ठीक है । लेकिन धीरे धीरे हमारी महिलाओं की काम करने की प्रैक्टिस ही खत्म हो गई । यह घातक है …

हमारे दादा कभी परदेस नहीं गए कमाने के लिए, खेती करके महिलाओं के सहयोग से ही वह प्रतिवर्ष कुछ न कुछ जमीन खरीदते थे । गमारी सीमाएं दूर के गांव तक थी । लेकिन अब जबकि पैसे के खातिर हम सात समंदर पार तक चले गए लेकिन हमारी सीमाएं सिमटती जा रही हैं । आखिर किंयु ?

दादा और दादी ने जिस विरासत को संभाल कर रखा था, अब्बू और चचा ने बेचना शुरू किया, धीरे धीरे सिमटते गए … बेच कर लड़की की शादी की, बेच कर हज किया… धीरे धीरे सीमाएं सिमटती गई, विरोधी हमारे दहलीज तक आ पहुंचे है । यह मेरी ही नहीं घर घर की कहानी है ।

आखिर किंयु ? क्या हमारे या हमारी महिलाओं के हाथ में स्मार्टफोन आ जाने से हमारा शोसल स्टेटस बढ़ रहा है ? मुझे तो नहीं लगता … जब वह लोग आत्मनिर्भर थे तब लड़कियो की शादी में 4 सेर चांदी और 4 तोला सोना दादियां पोटली से निकाल कर देती थी, आज हमारी लड़कियां रोलगोल्ड के जेवर पहन कर ब्याही जा रही हैं, आखिर किंयु ?

भले ही उनकी ईद डोरी वाले पजामे में गुजर जाती थी लेकिन वह मजबूत और आत्मनिर्भर लोग थे …और हम कमजोर और दिखावटी लोग ।

सीधी सी बात है, आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया… हमारे समाज को इस परवर्ती से बाहर निकलना होगा । वरना हमें इसकी भारी कीमत चुकानी होगी …

सोंचिएगा जरूर … हम भी आप मे से ही एक हैं । अपनी बेटियों को मजबूत कीजिए, अपने आत्मसम्मान के लिए … वरना जो लोग आपकी सीमाओं में घुस रहे हैं वह आपके घरों में भी घुसेंगे 😢😢😢

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