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ये तीन फ़ोटो सूडान में 1993 के भयंकर सूखे के हैं : कई गिद्ध हैं उनके हाथों में भारत की बागडोर है

Shailendra Agrahari
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नीचे ये तीन फ़ोटो सूडान में 1993 के भयंकर सूखे के हैं।

पहली तस्वीर को खींचने के बाद फ़ोटो जर्नलिस्ट केविन कार्टर ने कहा था- हे ईश्वर, यह देखने के बाद मैं आज से कभी खाना नहीं फेकूंगा, चाहे वह कितना भी खराब क्यों न हो।

केविन को अकाल की आपदा के बीच पूंजीवादी वीभत्सता और मानव त्रासदी को दिखाने के लिए पुलित्ज़र मिला था।

मोदी सरकार के वकील सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आज सुप्रीम कोर्ट में केविन के ऐतिहासिक काम को “प्रोफेट्स ऑफ डूम” निरूपित कर यह जताने की कोशिश की कि कोरोना काल में मोदी सरकार के महान काम को बहुत से लोग नकारात्मक तरीके से पेश कर रहे हैं।

मेरे इस पोस्ट को लिखने का कारण यह बताना है कि मोदी सरकार सोशल मीडिया पर सवाल उठाने वालों को इस गिद्ध की तरह देखती है, जो बच्ची के मरने का इंतज़ार कर रहा है।

दूसरी फ़ोटो में एक बच्चा मवेशी के निकास द्वार पर मुंह लगाकर पेशाब पीकर प्यास बुझा रहा है।

एक फैक्ट फाइंडिंग मिशन के दौरान एमपी में शिवपुरी जिले के पोहरी में मैंने सहरिया बच्चों को गोबर से बीज बीनकर खाते पाया है।

भूख-प्यास इंसान से कुछ भी करवा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने प्रवासी मज़दूरों की व्यथा पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू की है।

लेकिन मेहता आज कोर्ट में यहां तक कह गए कि कुछ लोग सिर्फ उन्हीं जजों को निष्पक्षता का प्रमाण देते हैं, जो कार्यपालिका की आलोचना करते हैं।

मोदी सरकार सिर्फ वाहवाही सुनना चाहती है। इसे पॉजिटिविटी कहते हैं। गोदी मीडिया भी यही करती है।

लेकिन खबर वही पॉजिटिव है, जो असल में नेगेटिव हो। पत्रकारिता की कोई भी किताब उठाकर देख लें।

एक पॉजिटिव न्यूज़ को बनाने के लिए झूठ, फ़र्ज़ी आंकड़े, सेलेक्टिव कमेंट्स लेकर खिचड़ी पकानी पड़ती है। फिर उसे सही साबित करना होता है।

इन्हीं तुषार मेहता ने पहले कोर्ट को बताया था कि सड़कों पर एक भी प्रवासी मज़दूर नहीं है।

आज चुप्पी साध गए। कोर्ट के सवालों पर। फिर झूठ बोला कि ट्रेनों में मज़दूरों को खाना मिल रहा है।

हैरानी की बात यह है कि मेहता कल श्रमिक स्पेशल में भूख-प्यास से मारे गए 9 मज़दूरों की लाश का बोझ उठाकर आज कोर्ट आये थे।

ग़लत केविन कार्टर नहीं हैं। ग़लत मैं भी नहीं हूँ, जिसकी रपट पर प्रशासन ने भूखे आदिवासियों के घर अनाज़ रखवाया।

ग़लत तुषार मेहता हैं। ग़लत मोदी सरकार है।

और दोनों उस गिद्ध की तरह हैं, जो दरअसल मज़दूरों के मरने का ही इंतज़ार कर रहे हैं।

फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि एक नहीं, कई गिद्ध हैं। उनके हाथों में भारत की बागडोर है।

Saumitra Roy

(फेसबुक भले इस पोस्ट को कम्युनिटी स्टैण्डर्ड के खिलाफ माने, पर सच को देखिए। बार-बार। तभी झूठ का पता चलेगा।)

डिस्क्लेमर : इस आलेख/post/twites में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. लेख सोशल मीडिया फेसबुक पर वायरल है, इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति तीसरी जंग हिंदी उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार तीसरी जंग हिंदी के नहीं हैं, तथा तीसरी जंग हिंदी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है

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