इतिहास

शेरशाह सूरी : बिहार के सूबेदार बहार खां लोहानी के आदेश पर उसने शेर के जबड़े को फाड़कर दो भागोंं में बांट दिया था : तारीख़-ए-शेरशाही!

उत्तर भारत का सम्राट

शासनावधि – 1540–1545
राज्याभिषेक – 1540
पूर्ववर्ती – हुमायूँ
उत्तरवर्ती – इस्लाम शाह सूरी
जन्म – 1472
बजवाड़ा, होशियारपुर ज़िला, भारत
निधन – २२ मई, १५४५
कलिंजर, बुन्देलखण्ड
समाधि शेर शाह का मक़बरा, सासाराम
संतान – इस्लाम शाह सूरी
घराना – सूरी वंश
पिता – मियन हसन खान सूर
धर्म – इस्लाम

शेरशाह सूरी का बनवाया हुआ कुआं

उत्तर प्रदेश के भदोही जिले के औराई में राष्ट्रीय राजमार्ग पर सैकड़ों वर्ष पूर्व मुगल शासक शेरशाह सूरी की तरफ से बनवाया गया ऐतिहासिक कुआं आज भी मौजूद है। कहा जाता है कि इस कुएं को शेरशाह ने यात्रियों की प्यास बुझाने के लिए बनवाया था। इस कुएं का अस्तित्व खत्म हो रहा था, लेकिन भदोही पुलिस ने इसका संरक्षण करवा है। इसके ऐतिहासिक गौरव और विरासत को देखते हुए इसे संरक्षित कर दिया गया है।

 

शेरशाह सूरी (1472 – मई 1545) (फारसी/पश्तो: فريد خان شير شاہ سوري, जन्म का नाम फ़रीद खाँ) भारत में जन्मे पठान थे, जिन्होंने हुमायूँ को 1540 में हराकर उत्तर भारत में सूरी साम्राज्य स्थापित किया था। शेरशाह सूरी ने पहले बाबर के लिये एक सैनिक के रूप में काम किया था जिन्होंने उन्हें पदोन्नत कर सेनापति बनाया और फिर बिहार का राज्यपाल नियुक्त किया। 1537 में, जब हुमायूँ कहीं सुदूर अभियान पर थे तब शेरशाह ने बंगाल पर कब्ज़ा कर सूरी वंश स्थापित किया था। सन् 1539 में, शेरशाह को चौसा की लड़ाई में हुमायूँ का सामना करना पड़ा जिसे शेरशाह ने जीत लिया। 1540 ई. में शेरशाह ने हुमायूँ को पुनः हराकर भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया और शेर खान की उपाधि लेकर सम्पूर्ण उत्तर भारत पर अपना साम्रज्य स्थापित कर दिया।

एक शानदार रणनीतिकार, शेर शाह ने खुद को सक्षम सेनापति के साथ ही एक प्रतिभाशाली प्रशासक भी साबित किया। 1540-1545 के अपने पांच साल के शासन के दौरान उन्होंने नयी नगरीय और सैन्य प्रशासन की स्थापना की, पहला रुपया जारी किया है, भारत की डाक व्यवस्था को पुनः संगठित किया और अफ़गानिस्तान में काबुल से लेकर बांग्लादेश के चटगांव तक ग्रांड ट्रंक रोड को बढ़ाया। साम्राज्य के उसके पुनर्गठन ने बाद में मुगल सम्राटों के लिए एक मजबूत नीव रखी विशेषकर हुमायूँ के बेटे अकबर के लिये। 

 

प्रारंभिक जीवन
शेरशाह का जन्म पंजाब के होशियारपुर शहर में बजवाड़ा नामक स्थान पर हुआ था, <डॉ0 विजय श्रीवास्तव=”भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण” /> उनका असली नाम फ़रीद खाँ था पर वो शेरशाह के रूप में जाने जाते थे क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर कम उम्र में अकेले ही एक शेर को मारा था। उनका कुलनाम ‘सूरी’ उनके गृहनगर “सुर” से लिया गया था। उनके दादा इब्राहिम खान सूरी नारनौल क्षेत्र में एक जागीरदार थे जो उस समय के दिल्ली के शासकों का प्रतिनिधित्व करते थे। उनके पिता पंजाब में एक अफगान रईस ज़माल खान की सेवा में थे। शेरशाह के पिता की दो पत्नियाँ और आठ बच्चे थे।

शेरशाह को बचपन के दिनो में उसकी सौतेली माँ बहुत सताती थी तो उन्होंने घर छोड़ कर जौनपुर में पढ़ाई की। पढ़ाई पूरी कर शेरशाह 1522 में ज़माल खान की सेवा में चले गए। पर उनकी सौतेली माँ को ये पसंद नहीं आया। इसलिये उन्होंने ज़माल खान की सेवा छोड़ दी और बिहार के स्वघोषित स्वतंत्र शासक बहार खान नुहानी के दरबार में चले गए।[5] अपने पिता की मृत्यु के बाद फ़रीद ने अपने पैतृक ज़ागीर पर कब्ज़ा कर लिया। कालान्तर में इसी जागीर के लिए शेरखां तथा उसके सौतेले भाई सुलेमान के मध्य विवाद हुआ

 

बंगाल और बिहार पर अधिकार
बहार खान के दरबार मे वो जल्द ही उनके सहायक नियुक्त हो गए और बहार खान के नाबालिग बेटे का शिक्षक और गुरू बन गए। लेकिन कुछ वर्षों में शेरशाह ने बहार खान का समर्थन खो दिया। इसलिये वो 1527-28 में बाबर के शिविर में शामिल हो गए। बहार खान की मौत पर, शेरशाह नाबालिग राजकुमार के संरक्षक और बिहार के राज्यपाल के रूप में लौट आया। बिहार का राज्यपाल बनने के बाद उन्होंने प्रशासन का पुनर्गठन शुरू किया और बिहार के मान्यता प्राप्त शासक बन गया।

1537 में बंगाल पर एक अचानक हमले में शेरशाह ने उसके बड़े क्षेत्र पर कब्जा कर लिया हालांकि वो हुमायूँ के बलों के साथ सीधे टकराव से बचता रहा।

शेर शाह सूरी के शासनकाल में विकास और महत्पूर्ण काम
शेर शाह सूरी जनता की भलाई के बारे में सोचने वाला एक लोकप्रिय और न्यायप्रिय शासक था, जिसने अपने शासनकाल में जनता के हित में कई भलाई के काम किए जो कि इस प्रकार है –
शेरशाह सूरी ने की पहले की रुपए की शुरुआत भारत में सूरी वंश की नींव रखने वाला शेरशाह ही एक ऐसा शासक था, जिसने अपने शासनकाल में सबसे पहले रुपए की शुरुआत की थी। वहीं आज रुपया भारत समेत कई देशों की करंसी के रुप में भी इस्तेमाल किया जाता है।

भारतीय पोस्टल विभाग
मध्यकालीन भारत के सबसे सफल शासकों में से एक शेरशाह सूरी ने अपने शासनकाल में भारत में पोस्टल विभाग को विकसित किया था। उसने उत्तर भारत में चल रही डाक व्यवस्था को दोबारा संगठित किया था, ताकि लोग अपने संदेशों को अपने करीबियों और परिचितों को भेज सकें।

शेरशाह सूरी ने विशाल ‘ग्रैंड ट्रंक रोड’ का निर्माण – The Grand Trunk Road, built by Sher Shah Suri

शेरशाह सूरी एक दूरदर्शी एवं कुशल प्रशासक था, जो कि विकास के कामों का करना अपना कर्तव्य समझता था। यही वजह है कि सूरी ने अपने शासनकाल में एक बेहद विशाल ग्रैंड ट्रंक रोड का निर्माण करवाकर यातायात की सुगम व्यवस्था की थी। आपको बता दें कि सूरी दक्षिण भारत को उत्तर के राज्यों से जोड़ना चाहते थे, इसलिए उन्हें इस विशाल रोड का निर्माण करवाया था।

ग्रांड ट्रक रोड जिसे जीटी रोड या राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या नम्बर के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत में हावड़ा से लेकर बर्धमान, पानागड़, दुर्गापुर, आसनसोल, धनबाद, औरंगाबाद, डेहरी आन सोन, सासाराम, मोहानिया, मुग़लसराय, वाराणसी, इलाहाबाद, कानपुर, कलियाणपुर, कन्नौज, एटा, अलीगढ़, ग़ाज़ियाबाद, दिल्ली, पानीपत, करनाल, अम्बाला, लुधियाना, जालंधर और अमृतसर तक को जोड़ता है।

 

ग्रांड ट्रंक रोड बहुत पुरानी है. प्राचीन काल में इसे उत्तरापथ कहा जाता था. ये गंगा के किनारे बसे नगरों को, पंजाब से जोड़ते हुए, ख़ैबर दर्रा पार करती हुई अफ़ग़ानिस्तान के केंद्र तक जाती थी. मौर्यकाल में बौद्ध धर्म का प्रसार इसी उत्तरापथ के माध्यम से गंधार तक हुआ. यूँ तो यह मार्ग सदियों से इस्तेमाल होता रहा लेकिन सोलहवीं शताब्दी में दिल्ली के सुल्तान शेरशाह सूरी ने इसे पक्का करवाया, दूरी मापने के लिए जगह-जगह पत्थर लगवाए, छायादार पेड़ लगवाए, राहगीरों के लिए सरायें बनवाईं और चुंगी की व्यवस्था की. ग्रांड ट्रंक रोड कोलकाता से पेशावर (पाकिस्तान) तक लंबी है.

सूरी द्दारा बनाई गई यह विशाल रोड बांग्लादेश से होती हुई दिल्ली और वहां से काबुल तक होकर जाती थी। वहीं इस रोड का सफ़र आरामदायक बनाने के लिए शेरशाह सूरी ने कई जगहों पर कुंए, मस्जिद और विश्रामगृहों का निर्माण भी करवाया था।

इसके अलावा शेर शाह सूरी ने यातायात को सुगम बनाने के लिए कई और नए रोड जैसे कि आगरा से जोधपुर, लाहौर से मुल्तान और आगरा से बुरहानपुर तक समेत नई सड़कों का निर्माण करवाया था।

भ्रष्टाचारियों पर नियंत्रण :
शेर शाह सूरी ( Sher Shah Suri )एक न्यायप्रिय और ईमानदार शासक था, जिसने अपने शासनकाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की और भ्रष्ट्चारियों के खिलाफ कड़ी नीतियां बनाईं।

शेरशाह ने अपने शासनकाल के दौरान मस्जिद के मौलवियों एवं इमामों के द्धारा इस्लाम धर्म के नाम पर किए जा रहे भ्रष्टाचार पर न सिर्फ लगाम लगाई बल्कि उसने मस्जिद के रखरखाव के लिए मौलवियों को पैसा देना बंद कर दिया एवं मस्जिदों की देखरेख के लिए मुंशियों की नियुक्ति कर दी।

सूरी ने अपने विशाल सम्राज्य को 47 अलग-अलग हिस्सों में बांटा :
इतिहासकारों के मुताबिक सूरी वंश के संस्थापक शेरशाह सूरी ने अपने सम्राज्य का विकास करने और सभी व्यवस्था सुचारू रुप से करने के लिए अपने सम्राज्य को 47 अलग-अलग हिस्सों में बांट दिया था। जिसे शेरशाह सूरी ने सरकार नाम दिया था।

वहीं यह 47 सरकार छोटे-छोटे जिलों में तब्दील कर दी गई, जिसे परगना कहा गया। हर सरकार, के दो अलग-अलग प्रतिनिधि एक सेना अध्यक्ष और दूसरा कानून का रक्षक होता था, जो सरकार से जुड़े सभी विकास कामों के लिए जिम्मेदार होते थे।

द्वितीय अफ़ग़ान साम्राज्य
अभी तक शेरशाह अपने आप को मुगल सम्राटों का प्रतिनिधि ही बताता था पर उनकी चाहत अब अपना साम्राज्य स्थापित करने की थी। शेरशाह की बढ़ती हुई ताकत को देख आखिरकार मुगल और अफ़ग़ान सेनाओं की जून 1539 में बक्सर के मैदानों पर भिड़ंत हुई। मुगल सेनाओं को भारी हार का सामना करना पड़ा। इस जीत ने शेरशाह का सम्राज्य पूर्व में असम की पहाड़ियों से लेकर पश्चिम में कन्नौज तक बढ़ा दिया। अब अपने साम्राज्य को वैध बनाने के लिये उन्होंने अपने नाम के सिक्कों को चलाने का आदेश दिया। यह मुगल सम्राट हुमायूँ को खुली चुनौती थी।

अगले साल हुमायूँ ने खोये हुये क्षेत्रो पर कब्ज़ा वापिस पाने के लिये शेरशाह की सेना पर फिर हमला किया, इस बार कन्नौज पर। हतोत्साहित और बुरी तरह से प्रशिक्षित हुमायूँ की सेना 17 मई 1540 शेरशाह की सेना से हार गयी। इस हार ने बाबर द्वारा बनाये गये मुगल साम्राज्य का अंत कर दिया और उत्तर भारत पर सूरी साम्राज्य की शुरुआत की जो भारत में दूसरा पठान साम्राज्य था लोधी साम्राज्य के बाद।

सरकार और प्रशासन

1540–1545 ईस्वी में शेरशाह सूरी द्वारा जारी सबसे पहला रुपया। सिक्के में देवनागरी और फ़ारसी में लिखा है।
शेरशाह सूरी एक कुशल सैन्य नेता के साथ-साथ योग्य प्रशासक भी थे। उनके द्वारा जो नागरिक और प्रशासनिक संरचना बनाई गयी वो आगे जाकर मुगल सम्राट अकबर ने इस्तेमाल और विकसित की। शेरशाह की कुछ मुख्य उपलब्धियाँ अथवा सुधार इस प्रकार है:

तीन धातुओं की सिक्का प्रणाली जो मुगलों की पहचान बनी वो शेरशाह द्वारा शुरू की गई थी।
पहला रुपया शेरशाह के शासन में जारी हुआ था जो आज के रुपया का अग्रदूत है। रुपया आज भारत, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, इंडोनेशिया, मॉरीशस, मालदीव, सेशेल्स में राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में प्रयोग किया जाता है।
ग्रैंड ट्रंक रोड का निर्माण जो उस समय सड़क-ए-आज़म या सड़क बादशाही के नाम से जानी जाती थी।
डाक प्रणाली का विकास जिसका इस्तेमाल व्यापारी भी कर सकते थे। यह व्यापार और व्यवसाय के संचार के लिए यानी गैर राज्य प्रयोजनों के लिए प्रयोग किया जाने वाली डाक व्यावस्था का पहला ज्ञात रिकॉर्ड है।

निधन
सासाराम में शेर शाह का मक़बरा
22 मई 1545 में चंदेल राजपूतों के खिलाफ लड़ते हुए शेरशाह सूरी की कालिंजर किले की घेराबंदी की, जहां उक्का नामक आग्नेयास्त्र से निकले गोले के फटने से उसकी मौत हो गयी।

शेरशाह ने अपने जीवनकाल में ही अपने मक़बरे का काम शुरु करवा दिया था। उनका गृहनगर सासाराम स्थित उसका मक़बरा एक कृत्रिम झील से घिरा हुआ है।[यह मकबरा हिंदू मुस्लिम स्थापत्य शैली के काम का बेजोड़ नमूना है।इतिहासकार कानूनगो के अनुसार” शेरशाह के मकबरे को देखकर ऐसा लगता है कि वह अन्दर से हिंदू और बाहर से मुस्लिम था”।

मुख्य तिथियाँ
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1472, शेर शाह सूरी का जन्म।
1522, शेर खाँ ने बहार खान के यहाँ काम करना शुरु किया।
1527 – 1528, शेर ख़ान ने बाबर की सेना में काम किया।
1539, शेर ख़ान ने हुमायूँ को चौसा में परास्त किया।
1540, शेर ख़ान ने हुमायूँ को कन्नौज में परास्त किया।
मई 1545, शेर शाह सूरी का निधन।
सूरी सम्राटों का कालक्रम

सेेरशाह सूूूरी -1540-1545

सिकंदर सूरी -1545-1555

 

शेरशाह सूरी से जुड़ी दिलचस्प बातें
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शेरशाह सूरी इतिहास के पन्नों में दर्ज वह नाम है, जिसे उसकी वीरता, अदम्य साहस और परिश्रम के बल पर दिल्ली के सिंहासन पर क़ब्ज़ा करने के लिए जाना जाता है. उन्होंने चौसा की लड़ाई में हुमायूं जैसे शासक को न सिर्फ धूल चटाई बल्कि, आगे चलकर उसे मैदान छोड़कर भागने के लिए मजबूर कर दिया था. शेर खां की उपाधि पाने वाले इस शासक के इरादे कितने फौलादी रहे होंगे, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दक्षिण बिहार के सूबेदार बहार खां लोहानी के आदेश पर उसने शेर के जबड़े को फाड़कर दो भागोंं में बांट दिया था.

बताते हैं इस वीर शासक से जुड़े दिलचस्प पहलू

इस तरह फरीद बन गया ‘शेर खां‘
शेरशाह सूरी के बचपन का नाम फरीद खान हुआ करता था. वह युवावस्था में अमीर बहार खान लोहानी की सेवा में रहा करते थे. इसी दौरान एक बार बहार खान ने उसे एक शेर का शिकार करने को कहा, जिसे पूरा करने कि लिए फरीद ने एक पल भी नहीं सोचा और शेर से लड़ते हुए उसके जबड़े को दो हिस्सों में फाड़कर अलग कर दिया था. उनकी इस वीरता से बहार खान बहुत प्रभावित हुआ और उसने फरीद को शेर खां की उपाधि से सम्मानित किया.

हुनर ने पैदा किए दुश्मन और…
शेरशाह की तेजी से बढ़ती लोकप्रियता से लोहानी शासन के बड़े लोग उनके दुश्मन बन बैठे. इसी कारण वह तरह-तरह के उपाय सोचने लगे, ताकि किसी तरह से उन्हें राज्य से शासन से बाहर किया जा सके. अतत: वह सफल हुए और उन्हें लोहानी शासन के दरबार से बाहर निकाल दिया गया. इसके बाद वह मुगल शासक बाबर के दरबार में चले गए और वहां अपनी सेवा के दम पर जागीर भी हासिल की.

पैनी नज़र के उस्ताद शेरशाह
लोहानी शासन के दरबार से शेरशाह बाहर जरुर हुए थे, लेकिन उनकी नज़र हमेशा लोहानी की सत्ता पर थी. वह जानते थे कि अमीर बहार खान लोहानी के बाद कोई भी काबिल व्यक्ति नहीं है, जो उसे बढ़ा सके. ऐसे में वह पूरे शासन को अपनी गिरफ्त में ले सकते थे. इसलिए उन्होंने बाबर की सेवा के दौरान मुगल शासक और उनकी सेनाओं की ताकत और कमियों का आंकलन भी करते रहे. उन्हें जब यकीन हो गया कि वह तैयार हैं तो पहले मुगलों को छोड़कर वह लोहानी के मालिक बने और बाद में मुगलों के गले के हड्डी.

चौसा के युद्ध में हुमायूं को धूल चटाई
बंगाल एक बहुत ही महत्वपूर्ण जगह मानी जाती थी और उसे जीतने के लिए हुमायूं और शेरशाह दोनों ही बेताब थे. इसी के चलते दोनों के बीच जंग छिड़ गई. दोनों के बीच लड़े गए इस युद्ध का नाम था चौसा का युद्ध, जिसमें सूरी कुछ इस तरह लड़े की हुमायूं जैसे शासकों को हथियार डालने पड़ गए थे. इस ऐतिहासिक जीत के बाद सूरी को एक और नाम से नवाज़ा गया वह था ‘फरीद-अल-दिन शेर शाह’.

जाते-जाते हुमायूं ने माना सूरी का लोहा
कहते हैं कि हुमायूं सूरी का सबसे बड़ा दुश्मन था, पर मरते समय हुमायूं ने भी सूरी का लोहा मान ही लिया था. माना जाता है कि, जब हुमायूं अपनी मौत के करीब था, उस समय उसने कहा कि सूरी ‘उस्ताद-ए-बादशाह’ यानी बादशाहों के उस्ताद हैं. इससे स्पष्ट होता है कि भले ही हुमायूं की आंख में सूरी हमेशा खटकते रहे, पर भीतरी मन से वह भी उनकी काबिलियत के मुरीद थे.

प्रजाहित को सर्वोपरि रखा
एक शासक के रूप में शेरशाह अपने पूर्ववर्ती शासकों में सबसे आगे माने जाते हैं. माना जाता है कि अकबर तथा उसके बाद के सभी बादशाहों ने सूरी की शासन-नीतियों को ही अपनाया. भारतीय साम्राज्य में उसने जनता की इच्छा के मुताबिक काम किए. स्वेच्छाचारी होते हुए भी उसने प्रजाहित को सर्वोपरि रखा.

युद्ध ही नहीं वास्तुकला में भी थे माहिर
सूरी सिर्फ एक अच्छे योद्धा ही नहीं, बल्कि एक अच्छे वास्तुकार भी थे. अपने जीवनकाल में उन्होंने कई बार वास्तुकला का काम किया पर झेलम में बने उनके रोहतास किले को उनके द्वारा की गयी सबसे अच्छी कारीगरी कहते हैं. शेर शाह के इस किले को बनने में आठ साल का वक़्त लग गया था. दिल्ली में स्थित पुराना किला का नए तरीके से निर्माण करने में भी सूरी का हाथ था.

एक सफल शासक के रुप में लोकप्रिय
वह मध्यकालीन भारत के सफल शासकों में से एक थे. अपनी न्यायप्रियता के कारण वह अपनी सेना और प्रजा दोनों का विश्वास जीतने में कामयाब रहे थे. कहा जाता है कि वह अपने कर्मचारियों को दो से तीन साल बाद तबादला कर देते थे, ताकि कोई भी भ्रष्टाचार न फैला सके. उनकी न्यायप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने सेना से कह रखा था कि युद्ध के रास्ते में पड़ने वाली फसल को नष्ट न किया जाए.

भारतीय पोस्टल विभाग की नींव डाली
प्रचलित कहानियों की मानें तो पहली बार ‘रुपया’ का चलन शेरशाह सूरी ने ही शुरु किया था. जिस समय वह सत्ता में आये उस समय ‘टनका’ नाम की मुद्रा का चलन था. सोने व चांदी के सिक्कों का चलन शुरू करने के साथ शेरशाह सूरी ने ही भारतीय पोस्टल विभाग को भी अपने शासनकाल में विकसित किया था.

पाटलीपुत्र का नाम बदलकर पटना किया
शेरशाह सूरी ने बाद में हिमायूं दिना पनाह शहर को विकसित कर उसका नाम शेरगढ़ रखा और पाटलीपुत्र का नाम पटना रखा. बाद में ग्रांट ट्रंक रोड को चित्तागोंग से विस्तृत करते हुए पश्चिमी भारत से अफगानिस्तान के काबुल तक ले गये और देशों के रास्तों को आपस में जोड़ा.

‘ग्रैंड ट्रंक रोड’ का कराया था निर्माण
सूरी ने अपने शासनकाल में एक बहुत ही बड़ी व विशाल रोड का निर्माण किया था, जिसका आज तक उदाहरण दिया जाता है. सूरी चाहते थे कि एक ऐसा रास्ता बने, जोकि दक्षिणी भारत को उत्तर के राज्यों से जोड़ सके. उनकी यह रोड बांग्लादेश से होती हुई दिल्ली और वहां से काबुल तक होकर जाती थी. उनकी बनाई इस रोड़ पर कोई भी सफ़र कर सकता था. फिर चाहे वह हिन्दू हो या मुस्लिम. रोड का सफ़र आरामदायक बनाने के लिए सूरी ने जगह-जगह पर कुंए और विश्रामगृहों का निर्माण भी करवाया था. सूरी की बनाई वह रोड आज भी है, जिसे हम ‘ग्रैंड ट्रंक रोड’ के नाम से जानते हैं.

47 हिस्सों की सरकार का गठन
माना जाता है कि शेर शाह ने अपने साम्राज्य को 47 हिस्सों में बांट दिया था, ताकि वह सुचारू रूप से काम कर सकें. इन 47 हिस्सों को सूरी ने सरकार का नाम दिया था. सूरी की इस सरकार का काम भी हमारी आज के जमाने वाली सरकार के जैसे ही था. यह 47 सरकार फिर छोटे जिलों में बांटी गयी, जिन्हें परगना कहा गया. हर सरकार को दो लोग संभालते थे, जिनमें एक सेना अध्यक्ष होता था और दूसरा कानून का रक्षक.

मरते-मरते जीता कालिंजर का किला
1545 में कालिंजर फतह के दौरान शेरशाह सूरी की मृत्यु हो गई. यहां बारूद में विस्फोट हो गया. इस हादसे में शेरशाह सूरी अपनी अंतिम सांसे ले रहे थे, पर उनका जज्बा चरम पर था. वह घायल हालत में भी दुश्मन का मुकाबला करते रहे. कहानियां बताती हैं कि जाते-जाते उन्होंने कालिंजर के किले पर अपनी जीत का यशगान लिख दिया था.

यह थे शेरशाह सूरी से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण पहलू, जो उनकी अदम्य क्षमता को दर्शाते हैं. इतिहास में भले ही अकबर जैसे बड़े शासकों की तुलना में उन्हें कम मान मिलता हो, पर सही मायने में सूरी का रुतबा उनसे किसी भी मामले में कम नहीं रहा.

शेर शाह सूरी : बहादुर लड़ाका और काबिल सुल्तान

तारीख-ए-शेरशाही में ज़िक्र है कि फरीद खान यानी शेर शाह ने अपनी सौतेली मां के कहने पर जागीरदारी छोड़ दी थी. पर काबिल को अपनी किस्मत चमकाने के कई मौके मिलते हैं. फरीद खान हिंदुस्तान के बादशाह बाबर की नज़रों में जितनी तेज़ी से चढ़ा उतनी ही तेज़ी से गिरा भी. बताते हैं कि बाबर उसकी आंखें, उसका ज़बीं (माथा) और चलने के तेवर देखकर समझ गया था कि फरीद की तरफ से लापरवाही बरती तो हिंदुस्तान की गद्दी पर मुग़ल नहीं पठान काबिज़ हो जायेंगे. बहरहाल, यह क़िस्सा आगे के लिए. अभी फ़रीद और उसकी जागीरदारी की बात करते हैं.

बिहार और बंगाल पर कब्ज़ा

शेर शाह का ताल्लुक अफगानों की सूर जाति से था. उसके दादा इब्राहिम सूर 1542 में भारत आए थे जिनके बेटे और शेर शाह के पिता हसन सूर ने बिहार के सासाराम में एक छोटी सी जागीरदारी हासिल कर ली थी. वहीं फरीद खान का जन्म हुआ. बताते हैं कि परिवार से हुई लड़ाई के बाद फरीद खान जौनपुर के मनसबदार के यहां नौकरी करने चला गया था. वहां कुछ समय रहने के बाद वह बिहार के मनसबदार बहार खान की सेना में भर्ती हो गया. फिर एक रोज़ किसी बात पर बहार खान और फरीद खान में मनमुटाव हुआ तो वह बाबर की सेना में भर्ती हो गया. कुछ समय बाद बहार खान की मौत पर वह दोबारा बिहार आ गया और उसके नाबालिग बेटे जलाल खान का सलाहकार बन गया. कुछ समय बाद जलाल खान को रास्ते से हटाकर फरीद खान ने बिहार को अपने कब्ज़े में ले लिया. वह ताक़तवर था और बहादुर भी. उसने बाबर की सेना में रहकर ही हिंदुस्तान की गद्दी के ख़्वाब देखने शुरू कर दिए थे.

मुग़लों को खुली ललकार और हिंदुस्तान की गद्दी

बाबर की हुकमरानी फरीद खान बहुत ज़्यादा पसंद नहीं आती थी. तारीख-ए-शेरशाही में जिक्र है कि वह अक्सर अपने पठान दोस्तों के बीच कहता, ‘अगर किस्मत ने साथ दिया तो हिंदुस्तान के तख़्त पर पठान ही बैठेगा. मैं मुग़लों को इस मुल्क से बाहर निकाल फ़ेंक दूंगा. मुग़ल पठानों से जंग या कुश्ती में कमतर हैं. इन्हें हराना आसान है. बस पठान एक हो जाएं तो बाकी काम मैं कर दूंगा.’

तारीख-ए-शेर शाही में एक किस्सा दर्ज़ है कि एक बार खाने का दाशतरखान लगा हुआ था, सभी उमरा’ मंत्री’ वहां मौजूद थे, खाने में मछली भुनी हुई लायी गयी, फ़रीद खान समझ नहीं पाया कि ये क्या है. उसने फ़ौरन अपनी कटार से उसके टुकड़े कर डाले और कट्टार में फंसा के बेबाक होकर खाने लग गया. तभी बाबर ने ये माजरा देखा और अपने ख़ास सलाहकार ख़लीफा से कहा, ‘इसके तेवर देखे? मैं इसकी पेशानी पर सुल्तान बनने की लकीर देखता हूं. इससे होशियार रहना, आगे चलके ये मुग़ल हुकूमत को बहुत नुक्सान पहुंचाएगा, बाबर ने अपने खलीफा से कहा, हो सके तो इसे गिरफ्तार करलो

ख़लीफा बात को हल्के में ले गया. उसने बाबर को समझाया कि जितना वह सोच रहा है इतना कर पाना फरीद खान के बूते की बात नहीं है. लेकिन फरीद बाबर के इरादे भांप चुका था. वह काम का बहाना बनाकर अपनी जागीर, सासाराम आ गया. बताते हैं कि बाबर को जब इसकी खबर मिली तो उसने कहा, ‘मुझसे गलती हो गयी कि मैंने इसे जाने दिया. जाने अब ये क्या करेगा.’

दिसंबर, 1530 में बाबर की मौत के बाद हिंदुस्तान की गद्दी के कई ख्वाहिशमंद पैदा हो गए थे क्योंकि दूसरा मुग़ल-हुमायूं जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर की तरह काबिल न था. उनमें सूर का पठान फरीद शाह सबसे ज़्यादा काबिल था. यहां तक आते-आते फरीद ने खुद को शेर शाह सूरी कहलवाना शुरू कर दिया था.

हुमायूं बंगाल जीतना चाहता था पर बीच में शेर शाह की जागीरदारी थी. हुमायूं ने उससे दो-दो हाथ करने की सोची. 1537 में चौसा, उत्तर प्रदेश में दोनों की सेनाएं आमने-सामने थी. बेम्बर गोस्कोइग्न ने अपनी क़िताब ‘ग्रेट मुगल्स’ में एसके बनर्जी की किताब ‘हुमायूं’ के हवाले से लिखा है कि चौसा के घाट पर दोनों के बीच कूटनीतिक पहल भी हुई. हुमायूं ने अपने दूत मोहम्मद अज़ीज़ को जब शेर शाह सूरी से मिलने भेजा तो उसने देखा कि शेर शाह कुदाली लेकर अपने महल के बंदोबस्त करने में लगा हुआ था.

अज़ीज़ ने दोनों के बीच सुलह करवाई और क़रार हुआ कि मुगलिया परचम के नीचे शेर शाह सूरी को बंगाल और बिहार दे दिए जायेंगे. यह शेर शाह की जीत ही थी. इसको अपने हिस्से की जीत दिखाने के लिए हुमायूं ने एक खेल खेला. उसने शेर शाह को इस बात के लिए राज़ी किया कि दिखावे के तौर पर मुगलिया सेना शेरशाह की सेना को पीछे खदेड़ेगी और तब शेर शाह रहम की गुहार लगायेगा जिसे हुमायूं स्वीकार कर लेगा.

खेल खेला गया और बाबर की सेना के एक टुकड़े ने सूरी की सेना को पीछे धकेल दिया. रात घिर आई थी. शेर शाह सूरी ने इस खेल को बदलते हुए हुमायूं को गंगा तैरकर जान बचाने के लिए मजबूर कर दिया. शेर शाह के लिए हिंदुस्तान की गद्दी बस एक जंग ही दूर रह गयी थी. हुमायूं आगरा पहुंचा भी नहीं था कि कुछ महीने बाद मई,17, 1540 को कन्नौज में दोनों फिर भिड़े. अंजाम वही हुआ जो पहली खेलनुमा जंग का हुआ था. बस इतना फ़र्क था कि इस बार हुमायूं ने हाथी पर बैठकर गंगा पार की और अपनी जान बचाई.

हुमायूं समझ गया था कि तख़्त उसके हाथ से फिसल चुका है. शेर शाह सूरी के सर हिंदुस्तान का ताज़ चमकने लग गया था. हुमायूं भाग रहा था और पीछे-पीछे शेर शाह की सेना. सरहिंद पहुंचकर उसने शेरशाह को कहलवाया, ‘मैंने तुम्हें हिंदुस्तान दे दिया है, तुम मुझे लाहौर दे दो और सरहिन्द हमारे बीच में सरहद होगी.’ सूरी से बड़ा ही ठंडा जवाब भिजवाया, ‘काबुल छोड़ दिया तुम्हारे लिए. वहीं जाकर रहो!’

जब मुट्ठी भर बाजरे के लिए शेर शाह दिल्ली की गद्दी लगभग हार गया था.

यह बात प्रचलित हो गयी है कि राजपूत हर लड़ाई में अमूमन हार जाते थे. कुछ हद तक यह सही भी है. लेकिन राजपूतों की बहादुरी पर प्रश्नचिन्ह लगाना गलत है. सुमेल की लड़ाई, जो राजपूतों और शेर शाह सूरी के बीच हुई थी, इस बात की गवाह है.

शेर शाह राजपूताना फ़तेह करने के लिए निकला था. जोधपुर का राठौर राजा मालदेव उसके सामने था. मालदेव शेर शाह की टक्कर का लड़ाका था. खानवा की लड़ाई में राणा सांगा बाबर से हार कर अपना वैभव खो बैठा था. इधर मालदेव ने अपनी सीमाओं में बीकानेर, मेड़ता जैतारण, टोंक, नागौर और अजमेर मिला लिए थे. बढ़ते-बढ़ते मालदेव झज्जर तक आ गया था जो दिल्ली से सिर्फ 30 मील दूर है. शेरशाह और मालदेव में लड़ाई अब लाज़मी हो गयी थी. यह लड़ाई चार जनवरी 1544 में राजस्थान में पाली जिले के जैतारण में हुई. जंग भयंकर हुई थी. शेर शाह तकरीबन हार चुका था. पर तभी कुछ ऐसा हुआ कि राजा मालदेव अपने ही लोगों पर अविश्वास कर रात के अंधेरे में लड़ाई के मैदान से चला गया.

बताते हैं कि तब रणभूमि में बाकी बचे छत्तीस कौम के रणबांकुरों ने महावीर राव खीवकरण, राव जैता, राव कुंपा, राव पांचायण और राव अखेराज के नेतृत्व में मारवाड़ के मात्र 20 हजार सैनिकों के साथ शेर शाह सूरी की 80 हज़ार सेना पर हमला बोल दिया. यह इतना भयंकर हमला था कि दिल्ली की सेना में हाहाकार मच गया. शेर शाह ने मैदान छोड़ने का मन बना ही लिया ही था कि उसके सबसे काबिल सेनापति खवास खान मारवात ने राव जैता और राव कुंपा को मारकर जंग का रुख अपनी तरफ कर लिया. जंग में हुई भारी तबाही देखकर शेर शाह को कहना पडा, ‘खैर करो, वरना मुट्ठी भर बाजरे के लिए मैं अपनी दिल्ली की सल्तनत खो देता.’

सूरी की शासन प्रणाली
22 मई, 1545 को शेर शाह सूरी की कलिंजर के किले को जीतने के दौरान मौत हो गयी. इस तरह दिल्ली के तख्त पर वह बस पांच साल रह सका. शेर शाह में महानता के सारे लक्षण मौजूद थे और जानकारों का मानना है कि किस्मत अगर उसका थोड़ा और साथ देती तो यकीनन हिंदुस्तान का इतिहास कुछ और ही होता.

शेर शाह सूरी ने हिंदुस्तान भर में सड़कें और सराए बनवाईं. सडकों के दोनों तरफ आम के पेड़ लगवाए जिससे चलने वालों को छाया रहे. हर दो कोस पर एक सराय बनवाई गयी. इन सरायों में हिंदुओं और मुसलमानों के लिए अलग-अलग व्यवस्था का इंतज़ाम करवाया गया और दो घोड़े भी रखवाए गये जिन्हें हरकारे इस्तेमाल करते. शेर शाह सूरी ने ऐसी कुल 1700 सरायों का निर्माण करवाया. उसने सड़कों पर सुरक्षा व्यवस्था करवाई. मुद्रा के तौर पर उसने 11.53 ग्राम चांदी के सिक्के को एक रुपये की कीमत दी.

शेर शाह ने राज्य संचालन के लिए दीवान-ए-वज़ारत, दीवान-ए- आरिज़, दीवान-ए-रिसालत और दीवान-ए-इंशा जैसे विशेष विभाग बनाए. उसका मानना था कि राज्य में तरक्की तभी संभव है जब अमन कायम हो. उसने मनसबदारी में यह तय करवाया कि सैनिकों की संख्या निश्चित हो, उनको समय पर वेतन मिले और ज़रूरत पड़ने पर मनसबदार अपने सैनिक सुल्तान के सेवा में भेजे.

शेर शाह सूरी मानता था कि किसान ही किसी मुल्क का आधार होते हैं. उसने किसानों के लगान को कम किया और उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा सहूलियतें दीं. उन्हें यह भी आज़ादी दी गयी कि वे जो चाहे उगायें और जैसे चाहे लगान दें. लगान की राशि तय करके पटवारियों को हिदायत दी गई थी कि तयशुदा रकम से ज़्यादा लगान नहीं वसूला जायेगा. किसानों को उससे सीधे मिलकर अपनी तकलीफ सुलझाने का हुक्म सुनाया गया. शेर शाह सूरी किसानों और रियाया का हमदर्द बनकर उभरा शेर शाह सूरी की काबिलियत का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि अपने पांच साल के शासन में उसने कई ऐसे काम करवाए जिनका अकबर ने भी अनुसरण किया.

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