विशेष

हम…जिसे पाने योग्य मानते हैं वह पाने योग्य है ही नहीं….

मुदित मिश्र विपश्यी
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“One is absolutely nothing.But we can’t face that, therefore we have images about ourselves.”
“जिसे पाने योग्य मानते हैं वह पाने योग्य है ही नहीं।पाने योग्य जो है वह तो मिला ही हुआ है।”
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हर आदमी दो चीजों में बंटा हुआ है-मैं की मान्यता और “होना”।

यह मैं अवास्तविक है, भ्रम है, विचार है, माया है।यह कुछ है ही नहीं।तथापि इसे सुख चाहिए, दुख नहीं चाहिए; लाभ चाहिए, हानि नहीं चाहिए-और बरबस कुछ न कुछ होता रहता है जिससे असमर्थता का पता चल जाता है।इसका आग्रह तो यही होता है कि मैं जो चाहता हूं वह होना चाहिए।

यह अपनी एक प्रतिमा बना लेता है।मैं कुछ हूं।सबको इस प्रतिमा के अधीन रहना चाहिए।और इस तरह असंख्य प्रतिमाओं के बीच में संघर्ष होता है।जैसे अनेक ढोलों के बीच प्रतियोगिता छिड जाय कि कौन सबसे ज्यादा तेज बजता है।उन ढोलों के भीतर देखा जाय तो वहां कुछ नहीं है।हर ढोल के भीतर पोल है।यह मैं की मान्यता है।
दूसरी चीज है आकाश जो हर ढोल के अंदर है, बाहर है, सब जगह है और यह सबको प्राप्त है।सर्वव्यापी आकाश को समझे तो यह किसे प्राप्त है?

ढोल को?

वहां फिर न ढोल है, न पोल है सिर्फ आकाश है।

यह है “होना”।सतचित आनंद स्वरूप आकाश।सिर्फ वही वही है।लेकिन चूंकि स्वयं को कुछ मानते हैं, वह असत्य है और दुख का कारण भी है इसलिए असली बात को जानना जरुरी ही नहीं, बहुत जरुरी है।

हमें लगता है हम हैं तो हमें जानना होगा कि यह “होना” सदा प्राप्त है।

इसकी तरफ ध्यान नहीं है।क्योंकि कुछ और पाने योग्य मान रखा है।

पता ही नहीं है कि पाने योग्य जिसे मानते हैं वह पाने योग्य है भी या नहीं?सुखदुख, लाभहानि, मानापमान आदि द्वंद्व तेजी से गुजरते रहते हैं।बीच में प्रतिमा बनाकर हम यह पाने,वह न पाने के द्वंद्व में व्यस्त रहते हैं और यह भूल जाते हैं कि यह सब कुछ भी इस योग्य नहीं है।

पाने योग्य है हमारा “होना” जिसे स्वयं, आत्मा, सेल्फ, अस्तित्व, चेतना, आनंद, परम सुखशांति कुछ भी कह सकते हैं।यह सदा प्राप्त है।यह है इसलिए इतनी बातें हैं, ये न हो तो कुछ भी नहीं।

चाहे जितना पाने योग्य लगे वह उस पर निर्भर है जो पहले से प्राप्त है,जो सबका आधार है।
फिर इस आधार को पाने योग्य क्यों बताया?

क्योंकि कुछ और पाने योग्य मान रखा है।बाहर और यह भीतर मौजूद है।बीच में हम खडे हैं।बाहरी को पाने योग्य मानते हैं और भीतरी को भूले रहते हैं।इसलिए कहा जाता है कि समझें क्या पाने योग्य है-बाहरी या भीतरी, वह जो परनिर्भर बनाता है या वह जो आत्मनिर्भर बनाता है,वह जो कभी सुखी कभी दुखी बनाता है या वह जो सदा के लिये स्थिरता-शांति-संतुलन का आधार बना रहता है?

जो पाने योग्य है वह सदा मिला हुआ है वह है हमारा खुद का “होना” मात्र(सेल्फ)।हमें इस सत्य का अनुभव करना होगा वर्ना हम शांति से कभी नहीं बैठ सकते।हम सदैव बाहर कुछ पाने योग्य मानेंगे और इसे भूले रहेंगे।बाहर है संघर्ष, भीतर है शांति।बाहर अभाव है, भीतर कोई अभाव नहीं क्योंकि स्वयं सदा मिला ही हुआ है सच्चिदानंद की सर्वव्यापकता के कारण।कोई ऐसी जगह नहीं जहाँ सत्य न हो।उसका कभी अभाव नहीं और असत्य का कोई अस्तित्व नहीं।वह माया है, भ्रम है, धोखा है।

तो बहिर्मुखी आदमी बाहर देखता है और सोचता है-मेरे पास यह नहीं है,वह नहीं है।मैं अभावग्रस्त हूं।

अंतर्मुखी आदमी स्वयं को देखता है और अनुभव करता है कि अरे मैं तो सदा ही मुझे प्राप्त हूँ।मेरे पास खुद मेरी क्या कमी है?

इस अनुभव में पूरी तरह से रमने पर ओम पूर्णमदः पूर्णमिदं….. सत्य प्रकट हो जाता है।

तब देहमन के असत्य तथा आत्मा के सत्य का पता चलता है।माया के तल पर धोखा है, प्रकृति के तल पर यह अपना यथार्थ लिये हुए है।देहमन अपनी कमी और पूर्ति के तथ्य में लगे रहते हैं।उसे स्वाभाविक जानना पर्याप्त है, उसमें हस्तक्षेप की जरूरत नहीं।

सवाल अपना है मैं कौन हूँ?

मैं मानता हूं कि मैं शरीरमन हूं तो फिर बाहर पाने योग्य बहुत है।मैं आत्मा हूं,सत्य हूं,स्वयं हूँ, हर समय अपने अस्तित्वबोध से युक्त हूं,भलीभांति उससे अर्थात् अपने आपसे परिचित हूं तो इसके लिए मुझे कहीं नहीं जाना है।मैं मुझे स्थायी रुप से प्राप्त हूं।कोई भी छीन नहीं सकता।मौत भी नहीं।मौत अहंकारी को डराती है,आत्मवान् को कैसे डरा सकती है?अंधकार, प्रकाश सिंह को केवल गीदडधमकी ही दे सकता है।

फिर पूर्ण संतोष है,सुख है,आनंद है स्वाभाविक।यह आत्मा का स्वभाव है।

तब देहमन जो जुडे हुए हैं उनका ध्यान रखा जा सकता है मगर बिना उनसे प्रभावित हुए।उन्हें प्रकृति की व्यवस्था के अनुकूल रखा जायेगा बिना हर्ष और कभी प्रकृति की प्रतिकूलता है तो उसे भी जान लिया जायेगा बिना शोक।आत्मस्वतंत्रता बनी रहेगी।

स्वयं को देहमन ही मान रखा है तो फिर मुश्किल है।तब झूठी अहम्मन्यता अस्तित्व में आती है।मै की मान्यता निर्मित होती है।वह होती कुछ नहीं इससे घबराहट होती है।इस घबराहट से बचने के लिए अपनी देहमन संबंधी प्रतिमा(इमेज)बनायी जाती है और पूरी तरह से उसकी रक्षा के लिए अपने को उसमें झोंक दिया जाता है।

सच को जाननेपर इसमें बदलाव आता ही है।फिर सदा स्वयं को प्राप्त आत्मा(सेल्फ)की तरह रहा जा सकता है और देहमन का ध्यान भी रख लिया जाता है।फिर एक व्यवस्था कायम होती है।स्वयं स्वयं को सदा ही प्राप्त है तो फिर अव्यवस्थित होने का कोई कारण नहीं है इसी कारण से गीता कहती है-जो आत्मा से आत्मा में संतुष्ट है उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है।”

कर्तव्य किसके लिये?देहमन के लिये,आत्मा के लिये या दोनों के बीच जो अहम्मन्यता है (मैं कुछ हूं यह भाव) उसके लिए।

यह समझना आसान है कि कर्तव्य के नाम पर अहम्मन्यता कितने बखेडे खडे करती है!देहमन तो प्रकृति के साधन की तरह हैं।

और जो आत्मा है वह तो सदा अपनी प्रज्ञाशक्ति से संपन्न है।वह सदा मुक्त है।वह कभी युद्ध भी कर सकती है,कभी क्षमा भी कर सकती है बिना कर्ताभोक्ता भाव के।यह प्रज्ञा की उच्चतम अवस्था है जो हर एक को सदा प्राप्त है।केवल उसकी ओर ध्यान नहीं है।ध्यान तो कुछ नाशवान,क्षणभंगुर को पाने में लगा हुआ है और उसे भूला हुआ है जो स्वयं के रुप में,अपने “होने” के रुप में सदा प्राप्त है।वही अपने बलबूते पर कुछ कर सकता है।प्रकृति जब देहमन के प्रतिकूल है तब भी वह स्वस्थ,अप्रभावित रह सकता है ।वह क्षणभंगुर देहमन से पृथक् शाश्वत तत्व है स्वयं।सदा परम सुगमता से अपने को उपलब्ध।आत्मविश्वास की सच्ची व्याख्या यही है।यह बात और है कि आत्म परिपूर्णता में सीमित व्याख्या देने वाला आत्मविश्वास शब्द उसके लिए विचाराधीन नहीं होता।वह जैसा भी है ठीक है।

इसलिए हम अपने “होने” के महत्व को जानें,इसे पाने योग्य है ऐसा स्वीकारें तो अंतर्गति का होना संभव है अन्यथा सारी सुखशांति, ऊर्जा, शक्ति बाहर की ओर कुछ पाने की यात्रा में व्यर्थ नष्ट होती रहती है।

अपने आप में आधाररुप से सदा आनंदित रहने के सत्य का पता ही नहीं चलता।

जिसे भी पता चल जाता है वह मैं मान्यता तथा उसकी प्रतिमा के द्वंद्व से छुटकारा पा जाता है।वह सर्वव्यापी उन्मुक्त आकाश की अनुभूति में जीता है।ढोल और ढोल की पोल में अपना निवेश करने की भूल, भूलकर भी नहीं करता।

मेरा मित्र अक्सर कहा करता-तीन ही बातें समझना जरूरी हैं।पहली चीज जो जरूरी है वह है-समझ।

दूसरी चीज जो जरूरी है वह है-समझ।

तीसरी चीज जो जरूरी है वह है-समझ।अर्थात् समझ, समझ, समझ तीनों एक ही है।

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