सेहत

हर्ड इम्यूनिटी भी भारत को कोरोना के प्रकोप से नहीं बचा सकती : रिपोर्ट

भारत में 30 जनवरी को कोरोना वायरस का पहला मामला सामने आया था। पहली मई को देश में लॉकडाउन का जब पांचवा हफ़्ता था, संक्रमितों की संख्या बढ़कर 37,336 हो गई तो मरने वालों की तादाद 1218 तक पहुंच गई थी।

हालांकि कोविड-19 के हॉट स्पॉट अमरीका और यूरोप की तुलना में यह आंकड़ा अपेक्षाकृत कम लग सकता है, लेकिन तस्वीर का यह सिर्फ़ एक ही रूख़ है। अब तक भारत में केवल 9 लाख 2 हज़ार 654 लोगों का टेस्ट किया गया है, जो प्रति 10 लाख लगभग 694 के बराबर है और यह दुनिया में सबसे कम दरों में से एक है।

अस्पतालों में प्रति 1,000 लोगों पर 0.55 बेड और कुल 48,000 वेंटिलेटर के साथ 1.3 अरब की आबादी वाला यह देश, कोरोना वायरस महामारी के गंभीर संकट का सामना कैसे करेगा?

भारत जैसे युवा आबादी वाले ग़रीब देशों में कोरोना से निपटने के लिए हर्ड इम्यूनिटी एक प्रभावशाली रणनीति हो सकती है। लेकिन यह एक विवादास्पद दृष्टिकोण है। हाल ही में ब्रिटेन ने इसे ख़ारिज कर दिया था। हर्ड इम्यूनिटी या प्रतिरक्षात्मक क्षमता उस समय प्राप्त होगी, जब देश की अधिकांश आबादी (60 से 80 प्रतिशत) संक्रमित होकर फिर ठीक हो जाए।

हालांकि यह खसरा जैसी बीमारियों के लिए एक सामान्य दृष्टिकोण है, लेकिन यह उपयोग एक घातक, नई और लाइलाज बीमारी के साथ एक बड़ा जोखिम हो सकता है।

भारत जैसे देश में हर्ड इम्यूनिटी के काम नहीं करने के तीन कारण हो सकते हैं, बल्कि संभावित रूप से यह इस देश के लिए ख़तरनाक भी हो सकते हैं, इसलिए कि इससे अस्पतालों में मरीज़ों की संख्या बढ़ सकती है, जिससे स्वास्थ्य प्रणाली धराशायी हो सकती है और अंत में बहुत बड़ी संख्या में मौतें हो सकती हैं।

पहला कारण यह है कि विशेषज्ञों को कोविड-19 से प्रतिरक्षा के बारे में अधिक जानकारी नहीं है, ख़ास तौर से इस बारे में कि यह रोग मुक्त क्षमता कितनी देर बाक़ी रहती है, किस प्रकार की प्रतिरक्षा हासिल हासिल होती है और फिर से संक्रमित होने की संभावना कब होती है। यह वह सवाल हैं, जिनका जवाब आजकल दुनिया भर के विशेषज्ञ तलाश करने की कोशिश कर रहे हैं।

दूसरे यह कि भारत में हर्ड इम्यूनिटी की सिफ़ारिश इस धारणा पर की जा रही है, क्योंकि देश की एक बड़ी आबादी युवा है, यानी 80 प्रतिशत आबादी 44 वर्ष की आयु से कम है। इन अधिकांश युवाओं में कोरोना वायरस की प्रतिक्रिया बहुत ख़तरनाक नहीं होती है। हालांकि यह धारणा समस्या पैदा कर सकती है, इसलिए कि भारतीय युवाओं की एक बड़ी संख्या संक्रमित होने पर गंभीर स्थिति तक पहुंची है, यहां तक कि उनमें मृत्यु दर भी ज़्यादा है।

45-54 आयु वर्ग के भारतीय नागरिकों में से क़रीब 40 प्रतिशत और 20-44 आयु वर्ग के 22 प्रतिशत उच्च रक्तचाप से ग्रस्त हैं। 15-44 वर्ष की आयु के लगभग 4 प्रतिशत लोग टाइप 2 मधुमेह की बीमारी में ग्रस्त हैं, जबकि अधिकांश मामले दर्ज नही हुए हैं। 21 लाख लोग एड्स के साथ जी रहे हैं, जिनमें से 83 प्रतिशत की आयु 15 से 45 वर्ष के बीच है। इसके अलावा, युवाओं में अस्थमा और सांस की अन्य अन्य बीमारियां 4.2 प्रतिशत हैं और लगभग एक तिहाई युवा तम्बाकू का इस्तेमाल करते हैं।

इसके बावजूद, युवा आबादी में हर्ड इम्यूनिटी की तलाश अधिक आयु वाले नागरिकों के लिए बड़ा जोखिम बन सकती है। भारत में लगभग 5 करोड़ 65 वर्ष से अधिक आयु के हैं।

यहां यह सवाल उठता है कि इन बूढ़े भारतीयों को अलग-थलग कैसे किया जाएगा। इनमें अधिकांश बड़े परिवारों में एक साथ रहते हैं, ख़ासकर देश के ग्रामीण हिस्सों में।

तीसरे यह कि हर्ड इम्यूनिटी को एक लम्बे समय तक रणनीति के रूप में लागू नहीं किया जा सकता है। यह स्वास्थ्य प्रणाली की क्षमता में वृद्धि के साथ लागू होनी चाहिए। लोगों की शारीरिक क्षमता में वृद्धि, सार्वजनिक और निजी स्वास्थ्य क्षेत्रों के बीच सहयोग में वृद्धि, परीक्षणों में वृद्धि, सामाजिक दूरी जैसे उपायों को लागू करना, फ़ेस मास्क का अनिवार्य होना तथा सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध और एक ही स्थान पर अधिक भीड़ का जमा न होना, जो भारत के शहरों में आम है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि भारत के लिए पूरी तरह से हर्ड इम्यूनिटी की रणनीति पर भरोसा करना ख़तरनाक हो सकता है।

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