साहित्य

◆ स्त्री और कला ◆ : क्या स्त्री होना मनुष्य होने के पहले है!

Narendra Tiwari
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◆ स्त्री और कला ◆

क्या स्त्री होना मनुष्य होने के पहले है?

क्या काया के वार्डरोब से पहले एक ‘आत्म’ है जो तमाम किस्म के संवेदनात्मक विभेदों और प्रभावों को अतिक्रान्त करते हुए अपनी तरह से सर्वभौम है? यदि ऐसा है भी तो भी क्या इस खगोलीय सर्वात्मा के अनन्तर जिज्ञासाओं और अनुसंधानों का कोई ऐसा मैदान है जो कला, कलाकार और सौंदर्यशास्त्रीय मूल्यों के बारे में विचारों की बुनावट को जेंडर के प्रभावों के मद्देनज़र आकलित करता है या कर सकता है? क्या स्त्री अस्मिता सौंदर्यशास्त्रीय अवधारणाओं, अनुभवों और फैसलों को कतई प्रभावित नहीं करती?

आस्वाद, अभिव्यक्ति, उदात्तता, प्रतिभा, रस, ध्वनि, अलंकार, तनाव, जेस्चर छाया, प्रकृति, प्रगति, विवक्षा क्या जेंडर से निरपेक्ष रहते हैं? दर्शन जीवन के पार देखने की सार्वभौमता है, पर कला तो जीवन में है- उसके हालात, उसके ख्वाबों, उसकी सहमतियों उसकी आपत्तियों और उसकी स्मृतियों में नारी होने को कब तक छुपाया जा सकता है, या छुपाया जाए ही क्यों?

जब बिम्ब एक ऐन्द्रिक प्रत्यक्ष है और प्रतीक एक भौतिक निशानदेही- तो कला के इन्द्रियानुभवों में स्त्रीसाक्षात् कैसे न हो? कि जिसे सार्वभौमता के नाम पर धकाने की कोशिश की जा रही है, कहीं वह कोई आवृत्त पुरुषत्व ही तो नहीं? कि दर्शन भी जिसे ‘गाड’ कहता है, कहीं वो ‘गाडेस’ का ही एब्रीविएशन तो नहीं? कि ‘ही’ कहीं ‘शी’ का ही संक्षेप ही तो नहीं, कि एडम कभी ‘मैडम’ का ही ब्रीफ तो नहीं, कि वूमेन में मैन का अंतर्हित होना तो नहीं? क्यों दुर्गा सप्तशती में देवी ‘‘कलाकाष्ठादिरूपेण’’ याद की गई है? क्यों इसमें यह कहा गया कि ‘‘विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः’’- सम्पूर्ण विद्याएँ तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं?

भारत की उच्च शिक्षा अकादमियों में साहित्यालोचन के संदर्भ में नारीवादी सैद्धांतिकी का प्रवेश अभी कमतर ही है। रीतिकालीन साहित्य पढ़ाते समय नायिका भेद तो अभी भी बदस्तूर चर्चा का विषय बनता है, ‘मेल गेज’ पर कोई विमर्श नहीं होता कि दृष्टि कैसे अवमानवीकृत करती है। नखशिख सौंदर्य वर्णन में नायिका के कवि-कृत रीफिकेशन पर कोई टीप नहीं होती। बल्कि देखा जाए तो शृंगार रस या विरह-प्रसंगों आदि की घनघोर परंपरा के बावजूद काव्येतिहास में स्त्री का व्यक्तित्व वैसे कभी नहीं उभरता जैसे पवन करण की पुस्तक ‘स्त्री मेरे भीतर’ में उभरता है। क्या वहाँ किसी दमन को हृदयंगम कर लिया गया है? क्या वहाँ काया की कोई सामाजिक शक्ति नहीं है? धीरोदात्त नायक ही क्या महाकाव्य के लिए आवश्यक हुआ, धीरोदात्त नायिका क्यों नहीं?

नायक शब्द से काव्यशास्त्र में एक कर्मवीर की छवि उभरती है, लेकिन नायिका शब्द से वहाँ जो स्त्रीभेद मिलता है, उसमें कर्मशीला या वर्किंग वूमन है कहाँ? मुग्धा, नवोढ़ा, प्रोषितपतिका या पद्मिनी, शंखिनी, चित्रिणी के मानकों में वह स्त्री कहाँ है जो दरिद्रता या भूख से संघर्ष कर रही है? इस स्त्री की भौगोलिकी कहाँ है- वह किस प्रांतर, किस अंचल की रहवासी है? भूगोल तो छोड़ें – काफी बड़ी हद तक यह स्त्री इतिहास में भी गैर मौजूद है। समय की तात्कालिकता का ताप उस तक पहुँचता ही नहीं लगता। दुर्गा सप्तशती तो देवियों को एंग्री यंग वूमैन के रूप में देखती है। ‘‘देव्यः क्रोधसमाकुलाः।’’ यह क्रोध कला और साहित्य की दुनिया में क्यों नहीं रहेगा?

इस बहुत प्रचलित साहित्यशास्त्रीय छवियों में तो रोटी गूंथने वाली स्त्री तक नहीं है। लेडी-पुरानी अंग्रेजी में जिसका अर्थ होता था : रोटी गूंथने वाली। सूरदास की यशोदा जरूर कहीं अपवाद की तरह आकर इस नियम की संपुष्टि करती है। उससे भी दिलचस्प है कला में पुरुष प्रिविलेज़ की गहराई और विस्तृति के चेहरों को चीन्हने की चेष्टा। नारीवादी अन्वीक्षा सहसा कला को इतनी जीवन्तता, संभावना और स्फूर्ति से भर देती है कि जो मानकों में स्त्री की नापजोख करने वालों के अंदेशे में कभी न थी। इस अन्वीक्षा का महत्व इसमें है कि इसके सहारे कला के सौंदर्यशास्त्रीय न्यौते और कलात्मक वेश्यावृत्ति के बीच का फर्क पकड़ा जा सकता है। सप्तशती देवी को ‘‘विद्यासु शास्त्रेषु विवेकदीपेष्वाद्येषु वाक्येषु’’ खोजती है। विद्याओं में, ज्ञान को प्रकाशित करने वाले शास्त्रों में तथा वाक्यों में।

महामाहेश्वर आचार्य अभिनव गुप्त ने जगदाम्बिके को जब ‘‘सकलशब्दमयी किल ते तनुः’’ कहा था, तब वे कला/साहित्य में उनकी मूर्ति का शिल्पांकन ही कर रहे होंगे। लेकिन यह पश्चिमी तरह का फेमिनिज़्म नहीं था।

कला में नारीवादी प्रतिरोध के भी दो प्रचलित प्रकल्प या दो विकल्प हैं। क्या यह मुक्ति का नारीवाद है या शक्ति का नारीवाद? हम यहाँ इन लफ्ज़ों के माध्यम से विदेशी और अपने, पराये और सांदर्भिक का निर्वाचन नहीं मांग रहे। शायद मुक्ति का स्वप्न भी अपनी चरितार्थताओं में उतना ही अधूरा हो जितना शक्ति का स्वप्न रहा आया। लेकिन इन दो विकल्पों को आमने सामने इसलिए रखा जाना चाहिए क्योंकि कला में स्त्री का स्वर किसी एक ही परिप्रेक्ष्य से आए, यह जरूरी नहीं। शायद वह दोनों को ही अतिक्रांत कर दे। शायद उसकी आत्म-अवधारणा ऐसे बहुत से वर्गीकरणों को झुठलाकर आगे बढ़े।

यह सिर्फ ग्रीको-रोमन, एथेनियन-स्पार्टन सोच ही नहीं होगी कि जो स्त्री में ‘आत्मा’ होना ही नहीं मानती थी, बल्कि जब संत कवि कबीर ‘नारी की झांई परत अंधा होत भुजंग’ की बात कर रहे थे तो वे भी कहीं स्त्री की उस डार्क ग्रॉस मटीरियलिटी की ओर इशारा कर रहे होंगे। मुझे कई बार लगता है कि इन पंक्तियों को लिखते/कहते हुए क्या कबीर के सामने एक पल को भी जगज्योति दुर्गा का ‘मेटाफर’ नहीं कौंधा होगा?

वह दुर्गा जिसे सप्तशती शब्दस्वरूपा भी कहती है और अत्यन्त निर्मल ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा उद्गीथ के मनोहर पदों के पाठ से युक्त सामवेद का आधार भी कहती है : ‘शब्दात्मिका सुविमलर्ग्यजुषां निधानमुद्गीथ रम्यपदपाठवतां च साम्नाम्।’ और कई बार मजाक भी करने का मन होता है कि वाह कबीर तेरा तपःपूत मन, नारी की छाया से वह ईरोटिक गेज नहीं पैदा होते दिखती, अंधा होना दिखता है। दृष्टि का यह ‘पौरुष’ क्या आदमियों को कला का आदर्श आब्जर्वर बनाता है या स्त्री सहृदय वर्णन या निरूपण में जेंडर पार्टनर होने का आत्मविश्वास देता है? क्या भारत की स्त्री-रचनाकार ऐतिहासिक-पौराणिक स्त्री-पात्रों का वैसा कोई नया भाष्य तैयार कर रही हैं जैसा हिल्डा डूलिटिल न हेलेन आफ ट्रॉय का किया? या वह एने सेक्सटन की तरह अपने गर्भाशय का उत्सव मनाने वाली कविता लिख रही हैं : इन सेलीब्रेशन ऑफ माई यूटरस? या आड्रे लोर्ड की तरह वे कोई ‘योद्धा कवयित्री’ हैं जिन्होंने अपने जीवशास्त्रीय सच को इतिहास और मिथक से मिलाकर ‘बायोमाइथोग्राफी’ की कविताएँ लिखीं हैंः नेवर टेक फायर फ्रॉम अ वूमैन।

फिर भी गौर करने की बात है कि भारत में कला में नारीवादी प्रतिरोध जुगुप्सा की उन वीभत्स हदों तक नहीं गया जिसमें अकविता के नाम पर कुछ पुरुष कवि पहुँच गए थे, या जिसमें केरोल श्नीमेन अपनी कृति ‘इंटीरियर स्क्रोल’ के जरिए पहुँच गई जब उनकी कलाकार दर्शकों के सामने नग्न होकर अपने निजी अंगों के द्वार से लंबा कागज निकालती है जिस पर कोई संदेश अंकित है। 60-70 के दशकों में हिन्दी में जानबूझकर ‘डर्टी’ शब्दों का इस्तेमाल कर अपनी खुरदुरी असहमति पेश करने का जो नज्जारा तत्कालीन कविता में पुरुष कवियों ने किया, वैसा हिन्दी कवयित्रियाँ नहीं कर पाईं। अलबत्ता कृष्णा सोबती अपने कथाक्रम में जरूर ऐसा कुछ कर गईं। ज्यादातर भारतीय स्त्री का प्रतिरोध संगीत पंक रॉक का नहीं रहा। वह रूढ़ियों की जंजीरों को तोड़कर मीरा की शक्ति में बाहर निकला भी तो वह प्रतिरोध की गरिमा और महिमा को स्थापित करने वाला था।

स्त्री सृजन की पर्याय है, आत्मा है। यदि वह कभी सृजनकर्त्री नहीं है, तब भी वह सृजन की प्रेरणा तो है ही। सप्तशती कवच तो उसे ऐसी योगिनी के रूप में याद करता है जो रस, रूप, गंध, शब्द और स्पर्श में उपस्थित है- रसे रूपे च गंधे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी। कविता के रस? कविता के बिम्ब? कविता की खुशबू? कविता के शब्द? कविता का ‘टच’? सभी जगह यह मौजूदगी है। देवी सरस्वती कला देवी और कादंबरी हैं। वे वैखरी भी हैं और वाङ्मयी भी हैं। वाचा भी और वागीशा भी। सृजन और कला की विधात्री है नारी। सप्तशती उसका स्मरण ‘जगत की आधारभूता कृति देवी’ के रूप में यों ही नहीं करती- नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः लेकिन फिर ऐसा क्या है कि जब भी बड़े रचनाकारों के नाम किसी विद्यार्थी से पूछे जाते हैं तो वह हमेशा पुरुष रचनाकारों के ही नाम लेता है? इस विषय पर बैटर्सबाइ से लेकर कूस तक जो अन्तर्राष्ट्रीय अध्ययन भी हुई हैं तो उनमें यह बात उभरकर सामने आई है कि प्रतिभा की संकल्पना को पुरुषत्व से इतिहास के हर दौर में कैसे जोड़ा जाता रहा। जबकि सच्चाई यह थी कि स्त्रियों ने कला को अपनी अस्मिता की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने के लिए हर युग में लड़ाई लड़ी है। उन्हें कई बार निष्कासित किया गया है, इस तथाकथित वर्जित क्षेत्र में प्रवेश करने की चेष्टा पर। ईव का निष्कासन क्या था या पैंडोरा का? भारत में तो फिर भी वैदिक ऋषिकाएँ सृजन की पवित्र स्वतंत्रता की मधुरतम स्मृति हैं, पर कुल मिलाकर यहाँ भी क्या हम कला-इतिहास की टेक्स्ट बुकों में नारी-प्रतिभाओं को उनका वाजिब ‘स्पेस’ दिला पाये हैं? सी. फ्रैड (1966) का निष्कर्ष है कि ‘‘महिलाओं के बौद्धिक योगदान न केवल भुला दिये गये बल्कि उनका सचेत और सक्रिय दमन भी किया गया।’’

नोचलिन (1998) ने क्रोश स्तम्भी लेख लिखा, जिसका शीर्षक ही सब कुछ बता देता है : ‘‘क्यों कोई महान स्त्री कलाकार कभी नहीं हुए?’’
क्या हम अपनी स्मृति को निर्मित और संरक्षित करने वाले ‘तंत्र’ में कुछ ऐसा कर सकते हैं कि स्त्री रचनाकार भी हमारे रोल मॉडल के रूप में उभरें? कि लगे कि उनके पास एक प्रशंसनीय और अनुकरणीय वैयक्तिकता और व्यक्तित्व है, कि उसने आत्मसम्भवा अभिव्यक्ति के खतरे कम नहीं ज्यादा ही उठाये हैं और कई बार उस पर जीत हासिल भी की है, कि शास्त्रों की शास्तियों के सामने भी वह निर्भीक खड़ी रही है- भले ही उसके साथ अन्याय और अतिचार हुए हों? कि उसने अपनी अंधी नियति से भी पूरे मनोयोग के साथ मुठभेड़ की है। इतिहास से स्त्री रचनात्मकता की ‘रिकवरी’ की जानी होगी। कितनी आवाजें हैं जो इन खण्डहरों में खो गई हैं। हर बात में धर्म को दोष देकर निवृत्त हो लेने वाले कभी यह भी देखें कि दुनिया भर की सारी पौराणिकियों और मिथक शास्त्रों में कला की ‘देवियाँ’ ही मिलती हैं, देवता नहीं। देवी का अथर्वशीर्ष तो उन्हें ‘‘तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनी’’ कहता है। ज्ञान से जगमगाने वाली, दीप्तिमती। उसके अनुसार तो वह ‘कामधेनुतुल्य वाग्रूपिणी भगवती’ है। लेकिन प्लेटो, अरस्तू, पाइथोरोरस से लेकर लूथर तक जगह-जगह बुद्धिजीवी पुरुषों द्वारा स्त्री की कलाभिव्यक्ति की अवगणना की गई है। ऊपर हमने स्त्री को सृजन की आत्मा कहा लेकिन अरस्तू तो स्त्री में ‘आत्मा’ का न होना मानते थे। सृजन अपने आप में एक शुभ कर्म है, लेकिन पाइथोरोरस तो स्वयं स्त्री को ‘ईविल’ (बुराई) का प्रतीक-प्रतिनिधि मानते थे। हमने तुलसी के एक ‘जड़’ पात्र के द्वारा ‘ढोल गंवार शूद्र पशु नारी/ये सब ताड़न के अधिकारी’ कहने पर तुलसी की तो खूब लानत-मलामत की लेकिन ‘अ वूमैन, अ डॉग एंड अ वालनट ट्री/द मोर यू बीट दैम द बैटर दे बी’’ कहने वालों को कभी उधार का उलाहना भी नहीं भेजा।

स्त्री सृजनकर्म क्या सिर्फ एक ‘व्यक्ति’ का स्व-स्थापन है या वह एक अपनी तरह का सामाजिक आंदोलन भी है और रहा है? क्या स्त्री कला व्यंजना अपने समय की सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक ताकतों की तंग होती गई गलियों से नहीं गुजरी और कल्पना के राजपथ पर किसी लाल गलीचे पर पाँव धरती हुई चली? क्या स्त्री-सृजन के भीतर समय और समाज के नक्शे पा किसी लेंस से लोकेट करने की जरूरत नहीं है? पुराने समय की स्त्री रचनात्मकता प्रकाशक की रॉयल्टी से किसी तरह की अभिप्रेरणा या आश्वासन नहीं प्राप्त करती थी- वहाँ जे.के. रौलिंग की तरह ‘फनी मनी’ प्राप्त होने की संभाव्यता नहीं थी, बल्कि मीरा, सहजोबाई, महादेवी जैसे लोगों में एक तरह की उपरामता या वीतरागिता है। लेकिन इसका मतलब कहीं यह नहीं है कि वहाँ कोई आत्म-भरित एकान्त फल-फूल रहा है जिसने दरवाजे पर ‘डोन्ट डिस्टर्ब’ की तख्ती लगा दी है। दूसरे, यदि वहाँ स्त्री-व्यक्तित्व की स्थापना भी है तो भी वह एक कीमती उपलब्धि है, क्योंकि जब इसे जिम्मेदारियों, जवाबदेहियों और रिश्तों की मधुर संज्ञाओं के नीचे कहीं झाड़-पोंछ दिया जाता रहा हो, तब यह व्यक्ति-विद्रोह तो और महत्वपूर्ण हो जाता है। निर्भरता की जलवायु में स्वायत्तता का मौसम।

स्त्री सृजनकर्म कसाइयों की उदारता के कारण इतिहास और समय की दौड़ में बचा नहीं रह गया है, वह रचना की अपनी शक्ति के कारण सामने आया है। ऐसे तो हर प्रबल रचना अपने समय में प्रबल विरोध को आमंत्रित करती रही है- लेकिन स्त्री सर्जना के साथ तो यह और भी विशेष रहा है। विरोध अगर रचना में एक बाधा पैदा करता है तो उसमें एक दीप्ति भी पैदा करता है।

स्त्री मानस का संघटन क्या कोई क्रिस्टलाइज्ड पैटर्न है, जिसमें जैविक लिंग भेदों के प्रभावों की एक तयशुदा निष्पत्ति है? या कि इन भेदों की परिणतियाँ अपनी-अपनी स्वतंत्र गतिकी लेकर चलती हैं, अलग-अलग तरह के फलित? इसलिए महासरस्वती का यह विमर्श स्त्री-सृजन को किन्हीं स्ट्रेट-जेकेट्स में अपघटित करने के लिए नहीं है, बल्कि उसकी समृद्धि और सम्पन्नता को मुखर करने के लिये है। यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना होगा कि स्त्री होने के पहले भी, उसके पूर्वोत्तर भी एक ‘आत्म’ है- रचना की बुनियादी प्रतिज्ञा का वह आत्म जो काया के वार्डरोब के पहले होता है, उस संस्कृति से पहले जो सैक्स को जेण्डर में बदलती है, उस प्रकृति के पहले जहाँ देह एक सीमा है, संभावना नहीं। कृति के इस आत्म का आदिस्तोत्र इस संस्कृति और प्रकृति से पहले था।

दुर्गा सप्तशती के नवें अध्याय में देवी के उस नाद का उल्लेख है जिससे पहले के सभी शब्द शांत हो गए-तन्निनादेन प्राक्स्वनास्ते तिरोहिताः इस अध्याय में जैसे शब्द-शब्द से लड़ता नज़र आता हैः

ज्याशब्दंचापि धनुष्चकारातीव दुःसहम्
पूरयामास ककुभो निजघण्टास्वनेन च
समस्त-दैत्यसैन्यानां तेजोवधविधायिना।

देवी का यह अत्यंत दुःसह शब्द, घंटे का वह शब्द जो समस्त दैत्ये सैनिकों के तेज को नष्ट करने वाला है तथा जो संपूर्ण दिशाओं को व्याप्त कर देता है, क्या है? क्या यह वही शब्द है जिसे पतंजलि ने स्फोट कहा था, वेदों ने श्रुति, उपनिषद् ने उद्गीथ (Song of the beyond), प्लेटो ने ‘म्यूज़िक ऑफ द स्फीयर्स’ कहा था?
क्या इस शब्द का भी एक प्रतिद्वन्द्वी शब्द है? शब्द का एक समानान्तर प्रतिकार? दुर्गा सप्तशती कहती है कि हाँ। नवें अध्याय का एक परवर्ती श्लोक इस प्रतिद्वन्द्वी शब्द की ताकत भी बताता है। यह प्रतिद्वन्द्वी शब्द शुंभ का सिंहनाद हैः

‘‘सिंहनादेन शुंभस्य व्याप्तं लोकत्रयान्तरम्
निर्घातनिःस्वनो घोरा जितवानवनीपते’’

उस समय शुंभ के सिंहनाद से तीनों लोक गूंज उठे उसकी प्रतिध्वनि से वज्रपात के समान भयानक शब्द हुआ जिसने अन्य सब शब्दों को जीत लिया। स्वन और निःस्वन के बीच यह युद्ध अन्त में देवी की उस विजय के साथ समाप्त होता है जिसमें संपूर्ण दिशाओं के भयंकर शब्द शांत हो जाते हैंः शांता दिग्जनितस्वनाः।

स्त्री के ‘शब्द’ को राक्षसों के ‘प्रतिशब्द’ का सामना करना ही है। इस संग्राम से बचा नहीं जा सकता। अंतिम विजय में जरूर कोई शक नहीं है, यही दुर्गा सप्तशती का आश्वासन है।

◆मनोज कुमार श्रीवास्तव

【यह लेख प्रज्ञ मनोज कुमार श्रीवास्तव सर द्वारा लिखित है। 】

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