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एम्स में अब तक 47 नर्सों समेत 329 से अधिक कर्मचारी संक्रमित पाए जा चुके हैं : महिला और पुरुष नर्स हड़ताल पर!

“पीपीई किट में काम करना , एक पॉलिथीन में पैक होकर काम करने जैसा है. आप ना कुछ खा सकते हो, ना बाथरूम जा सकते हो और इंफ़ेक्शन का ख़तरा अलग बना रहता है.”

“माहवारी में पैड इस्तेमाल नहीं कर सकते क्योंकि वो बदल नहीं सकते इसलिए एडल्ट डायपर पहनना पड़ता है. यूटीआई से लेकर स्किन इंफ़ेक्शन तक से परेशान हैं.”

दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में काम करने वाले महिला और पुरुष नर्स आजकल इन सभी परेशानियों से दो चार हो रहे हैं.

उन्होंने इन परेशानियों के संबंध में एम्स प्रशासन को भी जानकारी दी लेकिन कोई समाधान नहीं निकला. इसके बाद एम्स नर्सेज़ यूनियन ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है.

एम्स नर्सेज़ यूनियन एक जून से अस्पताल में विरोध प्रदर्शन कर रही हैं. यूनियन की माँग है कि पीपीई किट के साथ काम के घंटों को चार घंटे तक सीमित किया जाए. लंबे समय तक पीपीई किट पहनकर रखने से उन्हें कई स्वास्थ्य समस्याएं हो रही हैं.

नर्सेज़ यूनियन के अध्यक्ष हरीश काजला ने बताया कि 29 मई को एम्स के डायरेक्टर रणदीप गुलेरिया को चिट्ठी लिखकर नर्सों की समस्या से अवगत कराया गया था. लेकिन, विरोध प्रदर्शन के चार दिन बीत जाने के बाद भी उन्हें एम्स प्रशासन की तरफ़ से कोई जवाब नहीं मिला है.

यूनियन का कहना है कि विरोध प्रदर्शन जारी रहेगा. सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखा जा रहा है. साथ ही नर्सें अपनी शिफ़्ट पूरी करने के बाद प्रदर्शन में शामिल हो रही हैं ताकि इलाज में बाधा ना आए.


महिला नर्सों की परेशानियां

पीपीई किट पहनने के बाद कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना होता है. इसे पहनकर बाथरूम नहीं जा सकते. इसके कारण महिला नर्सों के लिए परेशानियां दोगुनी हो गई हैं.

एम्स में कोविड आईसीयू इंचार्ज रंजना बताती हैं, “पीपीई किट पहनने पर हमें एडल्ट डायपर का इस्तेमाल करना होता है. जो यूरिन रोक सकता है वो डाइपर नहीं पहनता. महिलाएं यूरिन भले ही रोक लें लेकिन माहवारी का रक्त तो नहीं रोक सकतीं. पर वो सैनिटरी पैड का इस्तेमाल भी नहीं कर सकतीं क्योंकि हैवी फ्लो में उसे बार-बार बदलना पड़ता है. हमें माहवारी और यूरिन दोनों के साथ उस डायपर में रहना होता है. छह से सात घंटे इस तरह गीलेपन में बिताना कई बीमारियों को न्योता देने जैसा है.”

यूनियन में शामिल नर्सें बताती हैं कि दो महीने से इसी तरह काम करते-करते उन्हें यूरिनरी ट्रैक्ट इंफ़ेक्शन (यूटीआई) , रेशेज़ और खुजली जैसी परेशानियां होने लगी हैं. कई नर्सों का वज़न भी कम हुआ है. लगातार मास्क पहनने से नाक और कान के पीछे लाल निशान पड़ गये हैं. अगर ये निशान ज़्यादा गहरे हो गए तो हमेशा के लिए रह भी सकते हैं.

वहीं, नर्सें सिर्फ़ शारीरिक समस्याओं का सामना नहीं कर रहीं बल्कि उनमें तनाव का स्तर भी बढ़ गया है.

रंजना बताती हैं कि अगर आठ बजे कि शिफ़्ट हो तो उसके लिए 7:30 बजे आना होता है. फिर शिफ़्ट ख़त्म होने के बाद एक घंटा रुकना ही पड़ जाता है. फिर जब हम घर पहुंचते हैं तो घरवालों से दूरी बनाकर रखनी होती है. थोड़ा भी खांसी ज़ुकाम हो जाए तो डर लगने लगता है. हमें ठीक होने और सहज होने का समय भी नहीं मिलता और अगले दिन शिफ़्ट शुरू हो जाती है.

लंबी होती शिफ़्ट

एम्स में लगभग 5000 महिला और पुरुष नर्स काम करते हैं. कोविड-19 के इलाज के लिए उन्हें पीपीई किट पहनकर काम करना होता है. उनकी मुख्य समस्या पीपीई किट पहनकर काम के घंटों को लेकर है. लंबे समय तक पीपीई किट पहनने से उनकी सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है.

हरीश काजला बताते हैं, “नर्सों की छह घंटे की शिफ़्ट होती है जिसे ख़त्म करते-करते सात से आठ घंटे लग जाते हैं. पीपीई किट को पहनने और उतराने में काफ़ी समय लगता है. इसे पहनना फिर भी आसान है उसमें 15 से 20 मिनट लगते हैं लेकिन उतारते वक़्त ज़्यादा ध्यान रखना होता है. उस वक़्त इंफ़ेक्शन होने का ख़तरा भी हो सकता है. पीपीई किट उतारने के लिए लाइन लगानी होती है. इसे किसी और की मदद से उतारा जाता है और उसमें आधा घंटा से लेकर 45 मिनट तक लग जाते हैं. इस तरह छह घंटे की शिफ़्ट सात से आठ घंटे की हो जाती है.”

हरीश कहते हैं कि पीपीई किट एक पॉलिथीन की तरह है जिसमें आप बंद होते हैं. वो धीरे-धीरे पसीने से भर जाती है. कुछ घंटों बाद चश्मे में धुंध भर जाने से धुंधला दिखाई देने लगता है. घुटन के कारण किसी को उल्टी भी आ जाए तो वो ख़ुद अपनी किट नहीं उतार सकता. उसे दूसरे व्यक्ति के आने तक उसी हालत में रहना पड़ता है. ऐसे में कोई आदमी कितनी देर काम कर सकता है.

बीमार हो रहे स्वास्थ्यकर्मी

कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज़ों का इलाज करते हुए पिछले कुछ महीनों में स्वास्थ्यकर्मी ख़ुद भी कोरोना से संक्रमित हो गए हैं.

न्यूज़ एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ एम्स में अब तक 47 नर्सों समेत 329 से अधिक कर्मचारी कोविड-19 से संक्रमित पाए जा चुके हैं.

हरीश काजला का कहना है कि अगर स्वास्थ्यकर्मी ही बीमार हो गए तो मरीज़ों का इलाज कौन करेगा. वो लगातार कमज़ोर हो रहे हैं जिससे उन्हें बीमारी पकड़ने का ख़तरा भी बढ़ रहा है. इसलिए स्वास्थ्यकर्मियों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. कोविड-19 की समस्या अब जल्दी ख़त्म होती नज़र नहीं आती. प्रधानमंत्री मोदी भी स्वास्थ्यकर्मी को सहयोग और सम्मान की बात कहते रहे हैं, तो फिर हमारी कोई सुनवाई क्यों नहीं होती.

एम्स नर्सेस यूनियन के जनरल सेक्रेटरी कहते हैं, “पहले के सिस्टम में हम सात दिन काम करते थे और अगले सात दिन छुट्टी होती थी. काम वाले सात दिनों में पाँच दिन कोविड-19 के लिए ड्यूटी लगती थी और बाक़ी दो दिन अन्य कामों में. दूसरे कामों के लिए हमें पीपीई किट नहीं पहननी होती है. ऐसे में पीपीई किट के कारण हुई स्वास्थ्य समस्याओं को ठीक होने का वक़्त मिल जाता था. लेकिन, अब तो रोज़ हमें कोविड-19 के इलाज के लिए ही काम करना होता है.”

“इसलिए हम चाहते हैं कि पीपीई किट के साथ हमारी शिफ्ट चार घंटे कर दी जाए. भले ही बाक़ी के दो घंटे कुछ और काम करवा लिया जाए. हम काम के घंटे कम नहीं कराना चाहते बल्कि पीपीई किट पहनने के घंटे कम कराना चाहते हैं.”

एम्स नर्सेस यूनियन का कहना है कि अगर उनकी समस्याओं का कोई समाधान नहीं निकाला जाता है तो 10 जून को यूनियन एक दिन की हड़ताल बुलाएगी. इसके बावजूद भी सुनवाई नहीं होती तो 15 जून को अनिश्चितकालीन हड़ताल कर दी जाएगी.

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