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कोरोना वायरस काल के पिछले दो महीनों में पड़ोस के दो ‘डायनासोर’ दुनिया को अलविदा कह गए!

Pratima Jaiswal
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90 के दशक में जाहिर है हर हाथ में फोन का दौर नहीं था लेकिन कलर टीवी और वो भी केबल कनेक्शन के साथ यह कोई वरदान था।

उस दौर में माता-पिता के अलावा पड़ोस के अंकल-आंटियों का बच्चों पर इतना होल्ड था कि अपना बच्चा समझकर जोरदार डांट लगा देते थे और हम टीवी बंद करके बाहर चले जाने में ही अपनी भलाई समझते थे।

90 के दशक में मनमानी सिर्फ बड़े-बुजुर्गों तक सीमित थी, वो बच्चों की पहुँच से दूर थी। टीवी देखने का कितना ही क्रेज हो लेकिन बाहर गली में खेलने का नशा सबसे ऊपर था। उस पर भी शाम के समय अपने साथी पड़ोसी बच्चों के घर चले जाना छोटी-मोटी पिकनिक थी।

पड़ोसी बच्चों के घर डेरा तब तक ही जमा रहता था, जब तक कि उनके पापा ऑफिस से घर नहीं आ जाते। जैसे ही दोस्तों के पापा घर आते दिखते हम बच्चे ऐसे भागना शुरू करते जैसे डायनासोर इंसानी बस्तियों पर चढ़ाई के इरादे से आ रहा हो।

उस दौर में अपने दोस्तों के पापा या पड़ोस में रहने वाले अंकल से सिर्फ ‘नमस्ते’ तक की दोस्ती थी। न हमें पता था कि वो किस ऑफिस में काम करते हैं और न ही वो यह जानते थे कि हम किस क्लास में पढ़ते हैं बल्कि कई अंकल तो अपने बच्चों की क्लास तक याद नहीं रखते थे, यह सारा जिम्मा मांओं का था।
कभी-कभी जब किसी दोस्त के पापा उसे लेने आते थे, तो सब बच्चे ब्रेकिंग न्यूज की तरह क्लास में चिल्लाते फिरते कि तेरे पापा आए हैं, तेरे पापा लेने आए हैं। इसके बाद पूरी क्लास ‘अंकल जी नमस्ते’ से गूंज जाती थी।

हम बच्चों ने पड़ोस के उन अंकलों को कभी मन भरकर हंसते नहीं देखा। हां, कभी-कभी संडे को ‘पापा-अंकल ग्रुप’ एक दूसरे के घर जाते थे, चाय पर गपशप हो जाया करती थी।

उन्हें देखकर मुझे लगता था कि ये सभी अंकल आपस में बात करके हंसते तो है फिर वैसे क्यों गुस्से में बैठे रहते हैं?

वहीं, कभी-कभी हद से ज्यादा हुड़दंग मचाने पर हमें हक से डांट दिया करते थे। हम स्कूल जाते टाइम इनके सामने आते ही नमस्ते करते थे। जवाब में बिना मुस्कान बिखेरे एक कड़क आवाज में नमस्ते स्वर गूँजता और फिर आंखें अखबार में जुट जाया करती थीं।

पड़ोस के सभी अंकल बहुत कम मौकों पर एक-दूसरे से मिलते थे लेकिन जब भी मिलते हमेशा ठहाकों से माहौल गूंज जाता। मुझे समझ नहीं आता था कि यह अपनी आत्मीयता किस जेब में छुपाकर रखते थे?

खैर, वक्त बीता। आसपास बहुत से नए लोग आए और यह पुराने लोग लगभग दिखना ही बंद हो गए। सभी अपनी लाइफ में बिजी हो गए।

अब कोरोना वायरस काल शुरू हुआ, तो फिर से सभी पुराने अंकलों के चेहरे दिखने शुरू हो गए। किसी के हेयर डाई की पोल कान के पीछे छुपी सफेदी खोलती दिखती तो किसी की आंखें चश्में की शील्ड के पीछे चमकती नजर आईं।

फिर से पुराने लोग मास्क के पीछे से भी वही आत्मीयता के साथ बात करते दिखाई दिए। सभी ने पुराने दिन याद किए।

लेकिन कहते हैं न Nothing lasts forever! कुछ ऐसा ही यहां भी हुआ। पिछले दो महीनों में पड़ोस के दो पुराने लोग, दो पुराने अंकल और हमारे बचपन के ‘डायनासोर’ दुनिया को अलविदा कह गए।

वो इस जल्दबाजी में गए कि उनका कोई दोस्त उनसे आखिरी बार बात भी नहीं कर पाया। कठोर से दिखने वाले यह लोग किसी के पुराने दोस्त थे। पुराने लोगों में चाहें रोजाना बातें न होती हो लेकिन इनमें बरसों बाद भी आत्मीयता बनी रहती है। अपने पुराने दोस्तों को जाता देख पापा के आंसू निकल आए हैं। उन्हें देखकर मेरे दिल के आसपास हल्का-सा दर्द उठता है।

फ्लैशबैक में 90 के दशक की यादों का ज्वार-भाटा उठ रहा है। पुराना दौर जा चुका है, पुराने लोग जा रहे हैं।
-प्रतिमा

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