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जब मैं ग़रीबों को खाना देता हूँ, तो वे मुझे संत कहते हैं I जब मैं पूछता हूँ कि ग़रीबों के पास खाना क्यों नहीं है, तो वे मुझे कम्युनिस्ट कहते हैं

Kavita Krishnapallavi

जब मैं ग़रीबों को खाना देता हूँ, तो वे मुझे संत कहते हैं I जब मैं पूछता हूँ कि ग़रीबों के पास खाना क्यों नहीं है, तो वे मुझे कम्युनिस्ट कहते हैं !

— डॉम हेल्डर कैमेरा (1909-1999)

(डॉम हेल्डर पेस्सोआ कैमेरा ब्राज़ील के कैथोलिक चर्च के एक आर्चबिशप थे जिन्होंने अमेरिका-समर्थित तानाशाहों के शासन काल के दौरान शोषित-उत्पीडित आम आबादी के बीच काम करते हुए, अमेरिका से ही वित्त-पोषित चर्च से जुड़े और स्वतंत्र एन जी ओ’ज़ की असली भूमिका को पहचाना था I वे इस नतीजे पर पहुँचे थे कि साम्राज्यवादी दाता एजेंसियों के वित्त-पोषण से जितने भी एन जी ओ तमाम चैरिटी और शिक्षा-स्वास्थ्य आदि के क्षेत्र में सुधार का काम कर रहे हैं, वे वस्तुतः इस सिस्टम के असली चरित्र पर ही पर्दा डाल रहे हैं, जनता की विद्रोही चेतना को कुंद कर रहे हैं, वर्ग-अंतरविरोधों को धूमिल कर रहे हैं और ‘संत’ का मुखौटा लगाकर शैतान की सेवा कर रहे हैं ! कैमेरा आगे चलकर ‘लिबरेशन थियोलॉजी’ के समर्थक हो गए थे और इस नाते साम्राज्यवादियों के साथ ही वेटिकेन के भी कोपभाजन हो गए थे I ईश्वर और चर्च में आस्था के बावजूद कैमेरा पूँजीवाद के मार्क्स द्वारा किये गए पूँजीवाद के विश्लेषण को सही मानते थे और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करना जन-समुदाय का अधिकार मानते थे I)

Kavita Krishnapallavi

परसों एक बरसों पुराने शुभचिंतक साथी मिल गये I रिटायर हो चुके हैं, बाल-बच्चों को व्यवस्थित कर चुके हैं, नया घर भी पॉश लोकैलिटी में बनवा लिया है I तन और मन से टंच और टन-मन हैं I अभी भी सुबह अपने कुत्ते के साथ रोज़ सुबह 5 कि.मी. की सैर करते हैं I पहले भी पॉलिटिक्स पर काफ़ी बात करते थे और क्रांतिकारियों को एक दर्ज़न शिक़ायतों के साथ दो दर्ज़न सुझाव दे देते थे , अब देश-दुनिया के बारे में चिंतित रहने के लिए और अधिक फुर्सत में रहते हैं I

अबकी मिले तो सामाजिक चिंताओं और ज़रूरी सलाहों-मशवरों के बाद निजी चिंताओं-सुझावों पर उतर आये, बोले,”अब अपना जीवन भी कुछ थोड़ा-बहुत व्यवस्थित कर लेने के बारे में सोचना चाहिए तुम्हें I मैंने बहुत सारे कम्युनिस्टों को बुढ़ापे में अकेले पड़ जाते, उपेक्षा झेलते, कष्ट उठाते और अवसाद-ग्रस्त होते देखा है I”

मैंने कहा,”हम उन ‘बहुत सारों’ से ज़रा अलग किस्म के हैं I” मैंने उन्हें अपनी 15-16 वर्षों पुरानी वही कविता फिर से सुना दी, जो कभी सुना चुकी थी I इस कविता का विद्रोही स्वर बेशक अराजकतावादी है, लेकिन समझौता और समर्पण करके रूढ़ि‍यों और बर्बर परम्पराओं के दुर्गंधमय कीचड़ में रेंगने-घिसटने की तुलना में तो अराजक विद्रोह भी बेहतर ही माना जाना चाहिए I आप सब भी फिर से पढ़िए यह कविता :

“अगर फिर मुझसे कहा गया
किसी कलमघसीट मुदर्रिस,
बुद्धि का चंदन घिसने वाले तुंदियल,
भत्ताभोगी क्रांतिधर्मी
या किसी थकी-हारी आत्मा के साथ
ज़िन्दगी बिताने को,
तो मैं चुनूँगी
किसी क़ब्र खोदने वाले को
और किसी अधखुदी क़ब्र में
रात बिताने के बाद
अगले दिन किसी घुमक्कड़ के साथ
दुनिया घूमने निकल जाऊँगी।”

शुभचिंतक साथी इतने से कन्विंस नहीं हुए I वह कुछ और कहना चाहते थे, लेकिन मैंने शॉर्टकट मारते हुए इक़बाल के ये दो शेर सुना दिए और फिर हम दोनों अपने-अपने रास्ते लग लिए :

“तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा
तेरे सामने आसमां और भी हैं।”

और,

“नहीं तेरा नशेमन क़स्र-ए-सुल्तानी के गुम्बद पर

तू शाहीं है बसेरा कर पहाड़ों की चटानों में “

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