विशेष

मैं इंतज़ार कर रहा हूं कि कब कोई आएगा : किसी मुस्लिम का वैज्ञानिक या विद्वान होना हमे स्वीकार्य नहीं!

Saleem Akhter Siddiqui
===============
अब समझ में यह नहीं आ रहा है कि कोरोना के साथ जीने में फायदा है या मर जाने में फायदा है? मैं इंतजार कर रहा हूं कि कब कोई आएगा और मरने के फायदे गिनाएगा। कहेगा, देखिए मरने के बाद आपका डर-डर कर जीने का डर खत्म हो जाएगा। अनलॉक करने का फायदा है कि आओ मेरे घर का सामान उठा ले जाओ। जब देश अनलॉक रहेगा, आप घरों से बाहर निकलेंगे, तभी तो कोरोना के साथ जीने की आदत पड़ेगी। एक बार आदत पड़ जाएगी तो बस पड़ जाएगी। फिर आपका पड़ोसी भी कोरोना पोाजिटव हुआ तो आप सीधे अपने काम पर चले जाएंगे। बस यही पूछेंगे, कितनी उम्र है? डायबिटिक तो नहीं है? किडनी विडनी फेलियर तो नहीं है? हॉर्ट पैशेंट तो नहीं है? इनमें से एक सवाल का जवाब भी हां में हुआ तो यह कह कर निकल लेगा कि इसे तो मरना ही था। अगर जवान हुआ तो कहेगा, कुछ नहीं होगा, रिकवर हो जाएगा। काढ़ा-वाढ़ा पिलाओ। सरकार ने बिना दवा के लाखों कोरोना मरीज सही कर दिए। पहले लगता था कि कोरोना जिसको हुआ, उसका मरना तयह है। अमेरिका, स्पेन, इटली की वीडियो देख देखकर दिमाग खराब हो गया था। अगर पता होता कि कोरोना मरीज रिकवर भी हो जाता है तो क्यों पब्लिक इतना टेंशन लेती। क्यों सरकार को लॉकडाउन करना पड़ता। वो तो किसी के दिमाग की घंटी बज गई, जो अनलॉक हो गया। वरना पता नहीं कितना लॉकडाउन झेलना पड़ता?

Abdul H Khan
===============
वे हमारे दिमाग़ के साथ खेलते है
बेवजह हथिनी की हत्या क्रूरता की श्रेणी मे आती है।किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता है l
लेकिन हजारों इंसानों की हत्या को नजरअंदाज करके वे हमारा ध्यान इस पर टिकाना चाहते है
कि हम देश के उन तमाम बच्चों की मौत को भूल जाएं और आँसू बहाएँ हथिनी की मौत पे

Farrukh Khan
===============
I am astonished to see how strong the “Institutions” of United States are? Not budging to pressure even from their ‘supreme leader’. This is what a well nourished democracy looks like! Something our constitution framers would have certainly dreamt for! But alas!

In our country- institutions, barring rare of the rarest exceptions, tend to dance to the tunes of power! If they are asked to bend they prefer to crawl! With institutions losing their sanctity and integrity- the very future of our democracy seems to be on peril. Something we would have never anticipated. Isn’t ironical?

Mohammed Afzal Chaudhary
===============·
आज सफूरा ज़रगर की जमानत याचिका खारिज हो गई। वह गर्भवती है। उसे PCOS बीमारी है जिसमें गर्भ के गिरने की आशंका रहती है। जेल के अंदर उसे इन्फेक्शन भी हो चुका है। उसका जुर्म है देश को धर्म के आधार पर बाँटने वाले कानून का विरोध करना। अब जब तक ऊपर की कोई अदालत फैसला न पलट दे वह जेल में ही अपनी गर्भावस्था बिताएगी।
मोदी सरकार का कोरोना संबंधी लेटेस्ट नोटिफिकेशन भी 10 साल से छोटे बच्चों और गर्भवती महिलाओं का घर से निकलना निषेध करता है। सफूरा और उसके होने वाले बच्चे का घर जेल है।
सौजन्य-Pyoli Swatija जी

Khushi Khan
===============
جون 1923 وہ سیاہ سال اور مہینہ تھا جس کا ازالہ قیامت تک نا ہو گا ،،،

اسی سال ایک عظیم الشان سلطنت ختم کی گئی ،،
اس دن سے مسلمان خستہ حال ہیں ،، یہ ایسا زخم تھا مسلمان اب تک سنبھل نا سکے ،،،جب سلطنت عثمانیہ توڑی گئی ،، پانچ بڑے معاہدے کیے گئے یہ معاہدہ لوزان میں ہوا (لوزان سوئٹزر لینڈ کا ایک علاقہ ہے )
دنیا اس معاہدے کو معاہدہ لوزان کہتی ہے ،،
یہ معاہدہ اتنا خطرناک معاہدہ تھا ،،ترکی کی خستہ حالت اس معاہدے سے جڑی تھی ،،یہ پانچ بڑے معاہدے تھے ،،جو آج بھی فرینچ زبان میں فرانس میں درج ہیں ،،

معاہدے :
1: سلطنت عثمانیہ ختم کر دی جائے گی ،، (اور اسکے سلطان اور خاندان کچھ لا پتہ کر دیے گئے کچھ کو شہید کر دیا گیا ،،اور کچھ کو جلا وطن کر دیا گیا) ،،،

2:ترکی میں اسلام پر پابندی لگا دی گئی ہے وہاں عربی میں آزان نہیں دی جائے گی ،، نماز گھروں کے اندربرقعہ ختم ،،اسلام کی بات کوئی کھل کر نہیں کرے گا ،،،

3 :ترکی کو سیکولر ریاست بنا دیا جائے گا
اور خلافت کے اثاثے جو تین بر اعظموں تک پھیلے ریاست کے اثاثے تھے ضبط کر لیے گئے

4 : ترکی اپنی ہی زمین سے معدنیات نہیں نکلا سکے گا اسے ہر چیز خریدنی پڑے گی ،،
ڈرلنگ بھی نہیں کر سکے گا ،، تیل وغیرہ بھی نہیں نکال سکے گا ،،،
(کہتے ہیں یہ پابندی سب سے زیادہ خطرناک تھی،،
کسی ملک میں معدنیات ہوں اور وہ نکال نا سکے )

5 : سب سے خطرناک جس سے ترکی کی معیشت کو بہت نقصان پہنچا،،
ترکی میں ایک سمندر ہے باسفورس ہے جو دنیائے تجارت کے لیے ریڈ کی ہڈی سمجھا جاتا ہے ،،
پوری دنیا کا سامان وہاں سے گزرتا ہے ،،

معاہدہ میں لکھا گیا کے ،، ترکی کسی بھی بحری جہاز سے ٹیکس وصول نہیں کر سکے گا ،،

یہ تھے وہ پانچ بہت خطرناک معاہدے ،،

جسے معاہدہ لوزان کہا جاتا ہے ،،،

سلطنتِ عثمانیہ 3 بر اعظموں تک پھیلی ہوئی تھی ،،

سلطنت کا سارا مال حزف کر لیا گیا
برطانیہ اور اسکے اتحادی کھا گئے ،، اور ترکی جو تین بر اعظموں پر مشتمل تھا ایک چھوٹا سا ترکی بچ کر رہہ گیا ،،

یہ وہ سال تھا جہاں سے مسلمانوں کی خستہ حالی شروع ہوئی ،،،

جو اب تک جاری ہے ،،
پوری دنیا میں اگر کوئی مظلوم ہیں تو ہم مسلمان ہی ہیں ،،

بہر حال یہ تو تھا معاہدہ لوزان جو کے 2023 میں ختم ہو جائے گا ،،

اور ترکی سے ساری پابندیاں اٹھ جائیں گیں ،،
🇹🇷💖✌️

 

अमेरिका में प्रोटेस्ट के दौरान नमाज़ पढ़ने और अल्लाहो अकबर का नारा लगाने की कई तस्वीर और वीडियो देख चुका हूँI सिर्फ इंडिया में यहाँ के गंगा-जमुना तहज़ीब बचाने वाले सेल्फ हेटर्स को ऐसी बातें पसंद नहीं है , अमेरिका में ऐसा मुमकिन हो रहा है क्योंकि वहां मिसीसिपी- मिसोरी तहज़ीब की चोंचलेबाज़ी नहीं है
Via Md Iqbal

Mohammed Afzal Chaudhary
===============
सफूरा ज़रगर के गर्भ में जो बच्चा है उसकी चिंता करना अब हम सब का दायित्व है । सफूरा की प्रेगनेंसी इस समय अपने इक्कीसवें हफ्ते पर है और ऐसे समय में उन्हें अब जेल में रखना मानवता के विरुद्ध है । कल को अगर सफूरा के बच्चे को जेल में कुछ हो जाता है तो हम अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या जवाब देँगे । कल एक गर्भवती हथनी की दुखद हत्या पर हम सबका मन बहुत दुखी था उसे तो हम नहीं बचा पाए लेकिन अब कम से कम मानवता के लिए हमारा दायित्व है कि गर्भवती सफूरा के बच्चे के लिए हम आवाज़ उठाएं । सफूरा को जेल से फौरन रिहा करना चाहिए जिससे कि वह और उनका होने वाला बच्चा स्वस्थ रहे । सभी मानव अधिकार संस्थाओं को साथ आकर सफूरा के लिए आवाज़ उठानी चाहिए । आप सब से सफूरा के लिए प्रार्थना और दुआ की भी गुज़ारिश है ।
राहुल कपूर की वॉल से

 

Joher Siddiqui
===============
ज़िया उल हक की राह

पाकिस्तान का सबसे बदनाम तानाशाह जिसके कूकृत्यो को वहां की जनता ने 50 साल भुगता और आज भी उसके बोए जहर से बाहर नहीं निकल पाए।

उसे काम में कम और नाम बदलने में ही विकास नजर आता था क्योंकि मूर्खो को मूर्ख बनाने का यह सबसे आसान तरीका होता है।

उसने लायलपुर को फैसलाबाद कर दिया, सर गंगाराम अस्पताल और टोबा टेक सिंह सहित कई अन्य स्थानों के नाम बदलने चाहे लेकिन समझदार और निडर जनता ने होने नहीं दिया।

उसके समय में जहां पाकिस्तान को अल बाकिस्तान कहने की रिवायत चली थी वहीं इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट तक केस गया था, वैसे भारत बनाम इंडिया की सुनवाई भी हो रही हैं।

ऐसे ही नागपुरी फलसफे में हम एक नाम भूल जाते है वो है अल बरुनी

ये मूल रूप से वर्तमान उज़्बेकिस्तान के बरूनी शहर में जन्मे थे और महमूद गजनवी के साथ भारत आए थे।

इनकी मातृ भाषा फ़ारसी थी लेकिन अरबी, रोमन और सीरियन संस्कृत के भी अच्छे जानकार थे।

इन्हे हिंदुस्तान का पहला इतिहासकार भी कहा जा सकता है क्योंकि इन्होंने किताब उल हिन्द में उस समय के हिंदुस्तान और सामाजिक व्यवस्था के बारे में विस्तार से लिखा है।

जिला चकवाल के कटासराज के निकट रहकर इन्होंने खागोल विज्ञान के सम्बन्ध में बहुत उल्लेखनीय कार्य किए जिन्हे हम इसलिए याद नहीं करते क्योंकी ऐसा करने से हमारे मन में मुस्लिम की कट्टरवादी छवि को धक्का लगता है और किसी मुस्लिम का वैज्ञानिक या विद्वान होना हमे स्वीकार्य नहीं होता जिसके पीछे का मनोविज्ञान हमे बचपन से समझाया गया है।

बेहतर होगा कि किताब उल हिन्द की प्रति प्राप्त करके पढ़ी जाए।।

― Parmod Pahwa सर

डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. लेख सोशल मीडिया फेसबुक पर वायरल है, इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति तीसरी जंग हिंदी उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार तीसरी जंग हिंदी के नहीं हैं, तथा तीसरी जंग हिंदी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *