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लोकतंत्र का खंभा अब सरकारी खंभा : सभी अंग धीरे-धीरे सड़ गये!

Shamsher Ali Khan
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देश की न्यायपालिका स्वतंत्र है, अब यह अपने दिल दिमाग से निकाल दीजिए। क्युँकि पिछली कुछ घटनाएँ बताती हैं कि अदालतों के जज जब भी सरकार पर सवाल उठाएँगे , उनका यह बर्ताव “सर्विस कोड” के उल्लंघन की तरह मानकर स्थानांतरण कर दिया जाएगा।

सरकारी नौकरी के लिए बना “सर्विस कोड” सरकारी कर्मचारियों को ऐसे ही दंड देता है , जो सरकार के विरुद्ध बोला , धड़ाम से उसका ट्रांसफर और बर्खास्तगी का पत्र पकड़ा दिया जाता है। यही अब भारत के जजों पर भी लागू हो गया है।

आईए देखते हैं उन घटनाओं को

दिल्ली हिंसा की सुनवाई कर रहे जज मुरलीधर का रातों रात तबादला कर दिया गया तब जबकि दिल्ली दंगे के समय दिल्ली पुलिस पर उन्होंने कड़ी फटकार लगाई थी और अगले दिन इसपर फैसला सुनाने की तीथि निश्चित की थी, उस तीथि के पहले ही उनको तबादले का फरमान सुना दिया गया।

और जस्टिस एस मुरलीधर को दिल्ली हाईकोर्ट से पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट भेजा दिया गया।

गुजरात हाईकोर्ट के जस्टिस जे बी पारदीवाला और आई जे वोरा की बेंच भी कोविड-19 को लेकर गुजरात के कोरंटाईन सेन्टर की तुलना जंगलों से की थी और जनता को आश्वस्त किया था कि अगर सरकार कोविड-19 की लड़ाई में लापरवाह है तो आम लोगों की ज़िंदगी का रखवाला अदालत है।

गुजरात सरकार के खिलाफ उनकी यह टिप्पणी “सर्विस कोड” के खिलाफ थी, जस्टिस जे बी पारदीवाला का अगले ही दिन तबादला कर दिया गया। यह भी नहीं देखा गया कि यही जे बी पारदीवाला लगातार अपने फैसले और बयानों से पूर्व में भगवा गिरोह के एजेन्डे को चलाते रहे हैं।

फिर चाहे मुसलमानों पर कुरान को गलत परिभाषित करके उनके पर्सनल लाॅ पर आक्रमण करने का इनका कारनामा रहा हो या फिर चाहे हार्दिक पटेल से जुड़े एक केस में आरक्षण के खिलाफ ‘असंवैधानिक’ टिप्पणी करने का।

इनकी ऐसी ही टिप्पणी के कारण राज्यसभा के 58 सदस्यों ने 2015 में न्यायाधीश जेबी पारदीवाला के खिलाफ राज्यसभा के तत्कालीन सभापति हामिद अंसारी के समक्ष एक याचिका दी थी और महाभियोग चलाने की माँग की थी। महाभियोग प्रस्ताव की संभावना देखते हुए न्यायमूर्ति पारदीवाला ने आरक्षण के खिलाफ अपनी टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटवा दिया था।

पर तब सरकार के भगवा एजेन्डे के पक्ष में इनकी टिप्णियाँ थीं तब सरकार की इन पर कृपा बरसती रही और इन पर महाभियोग नहीं चला।

तो समझिए कि यह पहली गलती को भी माफ नहीं करते, उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग की तरह या तो जस्टिस लोया बना देते हैं या जस्टिस मुरलीधरन और जस्टिस जे बी पारधीवाला बना देते हैं।

दरअसल, केन्द्र सरकार का कानून मंत्रालय पूरे देश भर के जजों के फैसलों और टिप्पणियों की माॅनीटरिंग करने लगा है, उसका मुख्य उद्देश यह होता है कि जजों की मानसिकता समझी जा सके और जैसे ही सरकार के लिए खतरा दिख रहे जज अपनी टिप्पणियों से सामने आते हैं कानून मंत्रालय व्यवस्था की तय प्रक्रिया के तहत ही हस्तक्षेप करके इनको निबटा देती है। इनको ना मुख्यन्याधीश बनाती है ना मुख्यन्यायधीश इनको सरकार से जुड़े मुकदमे देते हैं।

या फिर ऐसे जज जो जनता के सामने न्याय माँगने प्रेस के समक्ष सड़क पर उतरते हैं वह बाद में सरकार के साथ डील करके सरकार के साथ हो लेते हैं।

मौजूदा और निवर्तमान साहिबान उनमें से ही एक हैं।

दरअसल, तानाशाह की एक प्रवृत्ति होती है कि वह खुद के समानांतर दिख रही हर व्यवस्था को धीरे धीरे तबाह करके उसकी सारी शक्तियाँ अपने हाथ में ले लेता है। आज के दौर में वही हो रहा है।

मीडिया और न्यायपालिका डाक्टर मनमोहन सिंह की सरकार के समय उनके विरुद्ध सबसे मुखर थे, इन दोनों ने सरकार विरोधी अनर्गल झूठी टिप्पणियाँ कर करके , सरकार विरोधी फैसले सुना सुनाकर ही मनमोहन सिंह सरकार की विश्वसनीयता पाताल तक पहुँचा दी थी।

आज की सरकार ने सबसे पहली नकेल इनके ही डाली और इनके सारे अधिकार अपने हाथ में ले लिए। और लोकतंत्र के इन दोनों खंभों को सरकारी खंभा बना दिया।

अब पाकिस्तान तो यह देश है नहीं जहाँ एक तानाशाह परवेज़ मुशर्रफ उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायधीश चौधरी इफ्तेखार हुसैन के सामने सरेन्डर हो गया , एक पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ को उच्चतम न्यायालय सपरिवार जेल में ठोक देता है।

ना ही अब वह दौर है कि इसी देश की एक प्रधानमंत्री हाइकोर्ट के जस्टिस सिन्हा के एक आदेश पर पैदल हो जाती हैं।

अब यह नया युग है, जहाँ सब कुछ सरकार है और सरकार में सबकुछ मात्र 1 शख्स है।

तानाशाही इसी को कहते हैं।

Shamsher Ali Khan
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भारत में लोकतंत्र कभी रहा ही नहीं। 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता नहीं, चुनावी तंत्र मिला था जिसके सहारे सत्ता पर कब्ज़ा किया जा सके। और फिर लोकतंत्र के नाम पर देश की जनता को लोकतंत्र की लाश पकड़ा दी गयी जिसके सभी अंग धीरे धीरे 70 साल में सड़ गये।

जो पुलिस जनता के पैसों से वेतन पाती है, जनता की रक्षक कहलाती है वह पूँजीपतियों के धन से चुनावीतंत्र के सहारे सत्ता पाए तानाशाहों के इशारे पर उसी जनता को जब जहाँ चाहा लठिया देती है।

यह लोकतंत्र नहीं है। लोकतंत्र में लोग मालिक होते हैं।

जैसे अमेरिका में हैं। जार्ज फ्लोरेड और फैजान में अंतर समझ लीजिए, लोकतंत्र का अर्थ समझ में आ जाएगा।

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