साहित्य

वहशतों के उस पार ज़िंदगी है— तबस्सुम….

Tabassum Fatima
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सोचने के लिए सब से बड़ी नेमत ज़िन्दगी है
( उस ख्वाब को पैदा कीजिये जो आपके अंदर दम तोड़ रहा है )
— तबस्सुम फातिमा

वहशतों के उस पार ज़िंदगी है
यह बेहतर लम्हा है
ख्वाब देखने के लिए

हम क्यों सोच रहे हैं कि दुनिया कहाँ जा रही है। भयानक महामारी ने हमें क़ैद कर लिया है ?
हम क्यों सोचते हैं कि एक दिन मर जाना ही सच है।


साँसों के चलने तक ज़िंदा रहना भी एक सच है। इस वक़्त हम ने ख्वाबों से रिश्ता तोड़ लिया है। और यह किसी बुरे सपने से भी ज़्यादा डरावना है।
कोरोना एक हक़ीक़त है, उसी तरह जैसे मर जाना, उसी तरह जैसे जीवित रहना, उसी तरह जैसे सपने देखना। हम एक नयी दुनिया में आ गए। मंदिर – मस्जिदों के लिए सैनीटाइज़ेशन टनल तैयार हुए। सोशल डिस्टैन्सिंग के लिए गोल गोल गोले बन गए। घरों में हमने सफाई अभियान शुरू कर दिया। सब्ज़ियां, फल, खाने के सामान तक एहतियात की सारी तैयारी कर ली। कुछ वीडियो देखे। जो बहुत डरावने थे। एक व्यक्ति कराहते हुए कह रहा था, मेरी मदद करो। मैं मर रहा हूँ। एक नन्हा बच्चा मुर्दा माँ का अंचल पकड़े हुआ खेल रहा था। बात आगे बढ़ती जायेगी। किसी भी घर से आगे कोरोना के एक या दो मरीज़ मिल जाएंगे। मगर एक हक़ीक़त और भी है। स्वस्थ्य होने वालों की तादाद ज़्यादा है। मरने वाले भी हैं। और वह भी जो कोरोना से बचकर ज़िन्दगी में लौट आये।

बुरे सपने हमें धराशायी करते हैं /
हसीं सपने ज़िन्दगी को रास्ता देते हैं

सिर्फ मौत सच नहीं है। ज़िन्दगी सच है। और जैसा मैं ने कहा, यह बेहतरीन समय है, ख्वाब देखने के लिए
हम ख्वाब देखें कि ज़ालिम कोरोना से निजात हासिल करने के बाद हमारी दुनिया पहले से कहीं ज़्यादा खूबसूरत हो गयी है। जैसे, न्यूज़ीलैंड में, कोरोना मुक्ति का जश्न मनाया गया। चिराग़ाँ किया गया।


हम उन के लिए चिराग़ाँ करें, जो हमारे दरमियान से चले गए
और उन ख्वाबों को आवाज़ दें, जो हमारे अंदर हैं। हमें फुरसत नहीं थी, इन खवाबों को बंद संदूक से निकालने की। हम घर को भूल गए थे। रिश्तों की गर्माहट को भूल गये थे। हम अपनों की छाँव को भूल गए थे। लॉक डाउन ने यह लम्हा हमें दिया है, नए सिरे से, रिश्तों की पहचान करने के लिए।
रेज़ा रेज़ा, कुछ और ख्वाब हैं।  जैसे हम भूल गए थे, एक दुसरे की मदद करना।

ज़िन्दगी के इन लम्हों ने बिताया कि मदद का एहसास कैसा होता है। ज़िन्दगी के इन लम्हों ने बताया कि ग़रीबों की ईद कैसी होती है। ग़रीबों का रमज़ान कैसा होता है।
गुज़रते वक़्त से हम लगातार सीख रहे हैं और आगे भी सीखते रहेंगे।
मगर। ..

सब से ज़रूरी है, ज़िंदा रहने का ख्वाब देखना
इस ख्वाब के लिए तैयारी करना

और यह सोचना, कि यह ख्वाब एहतियात की वादिओं में तैयार होते हैं। हमने फितरत पर जब्र किया था। हम इंसान होने के नशे में बहुत कुछ भूल गए थे। अब। फितरत ने याद दिलाया है कि तवाज़ुन के बग़ैर ज़िन्दगी नहीं है।
हम ख्वाबों में तवाज़ुन के क़ाइल हो गए हैं।

वहशतों के उस पार ज़िंदगी है
यह बेहतर लम्हा है
ख्वाब देखने के लिए

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