देश

ANI ने मारे 43 चीनी सैनिक : बालाकोट में भी मीडिया ने कभी 300, कभी 400 और कभी 500 पाक आतंकवादियों को मार डाला था : रिपोर्ट

भारत और चीन के रिश्ते अचानक इस स्तर तक ख़राब हो जायेंगे ऐसा किसी को उम्मीद नहीं रही होगी, हालिया दो माह से दोनों देशों के बीच लद्दाख पर तनाव बना हुआ है जो विगत दिवस खुनी टकराव तक जा पहुंचा, इस खुनी टकराव में भारत के बीस सैनिकों के मारे जाने की पुष्टि भारतीय सेना की तरफ से की जा चुकी है जबकि एजेंसी ANI ने 43 चीनी सैनिकों के मारे जाने की खबर भी दी है, दुनियां के बड़े मीडिया जैसे कि बीबीसी, CNN, अलजज़ीरा, RT, फ्रांस प्रेस आदि में से किसी ने भी चीनी सैनिकों के मारे जाने की खबर नहीं दी है जबकि इन सभी ने भारत के 20 सैनिकों के मरने की खबर को प्रकाशित किया है

भारत के अंदर सोशल मीडिया में अनेक लोग चीनी सैनिकों के मारे जाने की खबर को लेकर कंफ्यूज हैं, वो ANI के दावे पर शक जताते हुए इसे पाकिस्तान के खिलाफ बालाकोट में की गयी कार्यवाही के बाद पाकिस्तानी आतंकवादियों की फ़र्ज़ी खबर के जैसा मान रहे हैं, ज्ञात होकि भारत ने पाकिस्तान के बालाकोट में सैन्य कार्यवाही की थी जिसके बाद मीडिया ने कभी 300, कभी 400 और कभी 500 पाक आतंकवादियों के मारे जाने की खबरों को फैला कर जनता को गुमराह करने का काम किया था, जबकि बाद में जो समाचार आये थे उनके मुताबिक बालाकोट की कार्यवाही में पाकिस्तान का एक कोवा, तीन दरख़्त निशाना बने थे

Narendra Modi
@narendramodi
During today’s meeting with CMs, we had wide ranging deliberations on the COVID-19 pandemic. Our focus areas are prevention of the infection, curing of patients and at the same time boosting economic activity.

भारत-चीन सीमा विवाद : 43 चीनी सैनिक मारे गए? मीडिया आउटलेट्स और पत्रकारों का आधार क्या?

17th June 2020
Pooja Chaudhuri

16 जून को, भारत और चीन के बीच चल रहे सीमा विवाद ने हिंसक रूप धारण कर लिया. भारत की तरफ से लद्दाख की गालवान घाटी में 20 सैनिकों की मौत की रिपोर्ट आई है.

Press Trust of India

@PTI_News
Indian Army says a total of 20 Indian soldiers have died in Ladakh’s Galwan Valley

रिपोर्ट आने के तुरंत बाद, झड़प के दौरान “43 चीनी सैनिकों के मारे जाने” की ख़बर फैलनी शुरू हो गई. इस जानकारी को डीडी न्यूज़ ने ‘एजेंसी रिपोर्ट्स’ के हवाले से ट्वीट किया.

नवजीवन, इंडिया टीवी और एबीपी न्यूज़ जैसे मीडिया संस्थानों ने भी ऐसा ही दावा किया.

मेजर गौरव आर्या, इंडिया टीवी के ऐंकर रजत शर्मा और सुशांत सिन्हा, एबीपी न्यूज़ के पत्रकार सुमित अवस्थी, न्यूज़ एक्स के ऐंकर शहज़ाद पूनावाला जैसे लोग भी इसी नाव पर सवार हो गए.

ट्विटर हैंडल News Line IFE ने गौरव आर्या के हवाले से यही दावा किया. ऑल्ट न्यूज़ की पहले की गई एक फ़ैक्ट चेक रिपोर्ट में, News Line IFE पांच चीनी सैनिकों के मारे जाने के अपुष्ट दावे का सोर्स बनकर सामने आया था.

 

ऑपइंडिया, इसकी एडिटर नुपुर शर्मा और ट्विटर यूजर द स्किन डॉक्टर ने भी 43 चीनी सैनिकों की मौत की ‘न्यूज़’ को प्रसारित किया.

इंडिया टुडे के ऐंकर राजदीप सरदेसाई ने लिखा कि ANI ने “चीनी सूत्रों” के हवाले से दावा किया है कि “झड़प में 43 चीनी सैनिक मारे गए हैं”. उन्होंने आगे लिखा कि इस बारे में चीन की तरफ से कोई पुष्टि नहीं हुई है.

विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के राष्ट्रीय प्रवक्ता विजय शंकर तिवारी ने लिखा, “43 चीनी सैनिक भी मारे गए”.

फ़ैक्ट-चेक
ये दावा न्यूज़ एजेंसी ANI के ट्वीट के आधार पर किया गया था, जिसमें “सूत्रों” के हवाले से कहा गया था कि चीन की तरफ से कुल 43 (मृत और घायलों को मिलाकर) लोग हताहत हुए हैं.


ANI

@ANI
Indian intercepts reveal that Chinese side suffered 43 casualties including dead and seriously injured in face-off in the Galwan valley: Sources confirm to ANI

ANI live services के संपादक ईशान प्रकाश ने ANI के ट्वीट को क़ोट करते हुए लिखा, “चीन की तरफ़ से मरने/घायल होने वालों की संख्या की पहली पुष्टि”, जो कि ‘हताहत’ शब्द का अर्थ है’


ishaan prakash

@ishaan_ANI
First confirmation of numbers of injured/dead in the Chinese side

ध्यान देने वाली बात है कि ANI ने मारे गए चीनी सैनिकों का सटीक आंकड़ा नहीं दिया बल्कि ये लिखा कि “43” की संख्या मृत और घायलों, दोनों को मिलाकर है.

आधिकारिक आंकड़े क्या कहते हैं?

चीन की सरकार ने अपनी तरफ के हताहतों की संख्या उजागर नहीं की है. चीन के ग्लोबल टाइम्स के एडिटर-इन-चीफ़ ने आज सुबह एक ट्वीट किया था. इसके अलावा, चीन को हुए नुकसान का आधिकारिक आंकड़ा इंडियन आर्मी ने भी नहीं जारी किया है.


Hu Xijin 胡锡进

@HuXijin_GT
Chinese side didn’t release number of PLA casualties in clash with Indian soldiers. My understanding is the Chinese side doesn’t want people of the two countries to compare the casualties number so to avoid stoking public mood. This is goodwill from Beijing.

डिफ़ेंस मामलों के पत्रकार शिव अरूर ने ट्वीट किया, “चीन के नुकसान पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं आई है, हर तरफ लीक्स/सोर्स से मिली जानकारी घूम रही है.”


Shiv Aroor

@ShivAroor
*NO official word on Chinese casualty figures, all leaks/source stuff doing rounds*

इंडियन एक्सप्रेस में डिप्टी एडिटर सुशांत सिंह ने भी ट्वीट किया कि चीन को हुए नुकसान, “43 या 430 या कुछ भी” पर आर्मी की तरफ कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है.


Sushant Singh
@SushantSin
There is not a word about any Chinese casualties, fatal or non fatal, in the official army statement. 43 or 430 or whatever!

इसलिए, कथित तौर पर चीन को हुआ नुकसान बताने वाले ANI के ट्वीट में, मृत और घायल, दोनों की बात की गई थी. इसे “43 चीनी सैनिकों की मौत” बताकर ग़लत ढंग से प्रचारित किया गया. गौर करने वाली बात है कि न तो चीन ने और न ही किसी प्रतिष्ठित डिफ़ेंस जर्नलिस्ट ने पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के हताहतों की संख्या की पुष्टि की है.

source – altnews

 

संप्रभुता के लिए प्रतिबद्ध रहने का निर्णय

एलएसी पर चल रहे तनाव के बीच भारत आगामी 23 जून को रूस और चीन के विदेश मंत्रियों के साथ होने वाली आभासी बैठक से दूरी बना सकता है। रूस-भारत-चीन (आरआईसी) के विदेश मंत्रियों के बीच 23 जून को वर्चुअल मीटिंग (आभासी बैठक) होनी है।  

सोमवार रात को पूर्वी लद्दाख की गलवां घाटी में चीन के साथ हुई हिंसक झड़प में 20 भारतीय जवान शहीद हो गए और कई घायल हो गए। हालांकि चीन को काफी नुकसान पहुंचा है। हालांकि आरआईसी की बैठक में सीमा पर तनाव एजेंडे में नहीं था। मगर हिन्दुस्तान टाइम्स को सूत्रों से पता चला है कि चीन के साथ मौजूदा स्थिति को देखते हुए भारत का इस बैठक में हिस्सा लेने की संभावना बहुत ही कम है। 

अभी तक इस बैठक को लेकर कोई घोषणा नहीं हुई है। पहले इसका आयोजन मार्च में होना था, लेकिन कोरोना वायरस की वजह से इसे टाल दिया गया। रूस ने फिर से पहल करते हुए इस बैठक को 22 जून को आयोजित करने की बात कही, लेकिन बाद में इसे एक दिन बढ़ा दिया गया।

इस बैठक में कोरोना वायरस से लड़ने के लिए आपसी सहयोग को लेकर बात होनी थी और पिछले हफ्ते ही इसका एजेंडा तय हुआ है। अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति और क्षेत्रों को जोड़ने वाले प्रोजेक्ट पर भी इस बैठक में बात होनी थी। सूत्रों ने बताया कि पिछले दो दिनों से इसे लेकर बातचीत शुरू हो रही थी और भारत इसमें शायद ही हिस्सा ले। हालांकि यह भी माना जा रहा है कि रूस अंतिम क्षणों में भारत को बैठक में शामिल होने के लिए मना सकता है।

सूत्रों ने बताया कि मौजूदा स्थिति को लेकर काफी चिंता है लेकिन रूस पर दोनों ही देश भरोसा जताते हैं। ऐसे में सभी के संपर्क में रहना काफी जरूरी है, खासतौर से बहुपक्षीय मुद्दों पर ताकि वैश्विक भरोसे को ज्यादा से ज्यादा जीता जा सके। 

रूस के नई दिल्ली और बीजिंग दोनों से ही अच्छे संबंध है। हाल ही में रूसी राजदूत निकोले कुदाशेव ने कहा था कि क्षेत्रीय स्थिरता बनाने के लिए सीमा पर तनाव को कम करना बहुत जरूरी है। कुदाशेव ने कहा था कि रूस को भरोसा है कि भारत और चीन का नेतृत्व शांति स्थापित करने की दिशा में काम करेगा

– कैबिनेट बैठक में क्षेत्रीय अखंडता और देश की संप्रभुता के लिए प्रतिबद्ध रहने का निर्णय
– अभी राजनयिक और सियासी स्तर पर हैं तमाम कूटनीति के रास्ते

चीन का मंसूबा चाहे कितना खतरनाक हो, लेकिन भारत सीमा पर अपनी एक भी इंच जमीन नहीं छोड़ेगा। उच्चपदस्थ सूत्र बताते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई सुरक्षा मामलों की कैबिनेट बैठक में क्षेत्रीय अखंडता और देश की संप्रभुता के लिए प्रतिबद्ध रहने का निर्णय लिया गया है।

बताते हैं कि चीन के साथ सीमा सुरक्षा प्रबंधन और द्विपक्षीय मामले निबटाने के अभी तमाम फोरम हैं। राजनयिक और सियासी स्तर की वार्ता के दरवाजे भी है। भारत आपसी चर्चा के जरिए इसे सुलझाने का पक्षधर है।
 

समझा जा रहा है कि 17-18 जून तक एक बार फिर भारत और चीन के बीच में बातचीत के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ने की सूचना आ सकती है।

बताते हैं प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में सीसीएस की बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री एस जयशंकर, गृहमंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, एनएसए अजीत डोभाल, सीडीएस जनल रावत समेत अन्य थे।

सीसीएस से पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने विदेश मंत्री एस जयशंकर, सीडीएस जनरल रावत, तीनों सेना प्रमुखों के साथ बैठक की थी। उन्होंने और विदेश मंत्री ने अपने स्तर से प्रधानमंत्री को ताजा हालात और भावी कदमों को लेकर चर्चा की थी।

देर शाम सीसीएस खत्म होने के बाद प्रधानमंत्री और अमित शाह के बीच में भी चर्चा हुई। समझा जा रहा है कि इसमें दोनों शीर्ष नेताओं ने ताजा हालात के साथ-साथ आगे की रणनीति पर विचार किया है।


क्या है चीन की मंशा?

सैन्य सूत्रों का कहना है कि चीन गलवां नाला (नदी) के आस-पास मौजूदगी पर अड़ा है। चीन की मंशा दौलत बेग ओल्डी पर सीधे निगाह रखने की है। वह फिंगर-4 से भी पीछे हटने के पक्ष में नहीं है।

पेट्रोलिंग प्वाइंट 14 पर ही 15-16 जून को भारत-चीन के सैनिकों में हिंसक झड़प हुई थी। इसके अलावा श्योक, दुरबक, पैगांग त्सो के पास भी उसके सैनिक जमें हुए हैं। करीब 15 हजार से अधिक चीनी सैनिक भारी वाहन आदि के साथ क्षेत्र में जमें हुए हैं।

बताते हैं चीन अक्साइ चिन के पास भारत की फौज, उसकी आवाजाही नहीं होने देना चाहता। वह अक्साइ चिन को अपना बताता है और भारत इस पर अपना दावा करता है। गलवां नाला के ऊपर से तिब्बत के पहाड़ साफ दिखाई देते हैं।

दूसरे चीन को पाक अधिकृत कश्मीर की भी चिंता सता रही है। भारत ने पाक अधिकृत कश्मीर में चीनी कंपनियों के विकास की योजना और वन बेल्ट वन रोड के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की कोशिश पर लगातार विरोध जारी रखा है।

ऐसे में लद्दाख को केंद्र शासित राज्य का दर्जा, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने और भारतीय संसद में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा पाक अधिकृत कश्मीर को भारत में मिलाने के दावे के बाद से चीन चिढ़ा है।

इसलिए वह नई एलएसी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) परिभाषित करने में लगा है।

क्यों अचानक हो गई हिंसक झड़प
भारत और चीन के सैनिकों के बीच में 5 जून को संयुक्त सचिव स्तरीय वार्ता होने के बाद तनाव सामान्य होने की तरफ बढ़ने लगा था। 6 जून को लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की वार्ता के बाद और अच्छे संकेत आए थे।

बताते हैं सैन्य कमांडर स्तर पर बनी सहमतियों को अमल में लाने के लिए भी रविवार को भारतीय सैनिकों की टुकड़ी कमांडिग आफिसर कर्नल संतोष बाबू के नेतृत्व में प्वाइंट 14 के पास गई थी। इसने चीन के सैनिकों से सहमति के आधार पर पीछे हटने के लिए कहा, लेकिन चीनी सैनिकों ने इसका प्रतिवाद किया।

भारतीय सैनिक बिना हथियार के थे जबकि चीन के सैनिकों के पास कंटीली लाठियां आदि जैसे ब्लंट हथियार थे। प्राप्त जानकारी के अनुसार भारतीय सैनिकों की संख्या तुलना में काफी कम थी।

थोड़ी ही देर में बहस-मारपीट में बदल गई और चीनी सैनिकों ने भारतीय सैनिकों पर हमला बोल दिया। यह ढलाव वाला क्षेत्र है। समझा जा रहा है कि इस दौरान कुछ भारतीय सैनिक चीन के क्षेत्र में भी फिसलकर चले गए होंगे।  

 

 

होगी शांति प्रयासों की पहल

भारत और चीन के सैनिकों की हिंसक झड़प में दोनों देशों को नुकसान हुआ है। किसी को कम तो किसी को ज्यादा। लेकिन भारत ने एक बार फिर उदारता दिखाते हुए एकतरफा कार्रवाई से बचने, संवाद प्रक्रिया तेज करने की रणनीति पर आगे बढऩे का मन बनाया है।

समझा जा रहा है कि अब विदेश मंत्रालय के स्तर से पहल तेज होगी।

सेना के कमांडर भी हालात पर पूरी नजर रख रहे हैं और सीमा पर हुई हिंसक झड़प, सेना के टैक्टिकल मूव आदि की सैन्य कमांडर के स्तर पर समीक्षा की जा रही है। इसके अलावा तीनों सेनाएं अपने स्तर से स्थिति का आंकलन कर रही हैं।

समझा जा रहा है कि दोनों देशों के दूतावासों की भूमिका बढ़ गई है। संयुक्त सचिव (पूर्व) एशिया नवीन श्रीवास्तव अपने समकक्ष से बात कर सकते हैं। दोनों देशों के बीच में कूटनीतिक प्रयासों के जरिए सैन्य कूटनीति और संवाद का रास्ता अपनाया जा सकता है।

22 जून को चीन, भारत और रूस के विदेश मंत्रियों के बीच में वर्चुअल मीटिंग होनी है। यह चर्चा आरआईसी फोरम के तहत होगी। समझा जा रहा है कि विदेश मंत्री एस जयशंकर और चीन के विदेश मंत्री इस दौरान क्षेत्रीय मुद्दे को लेकर द्विपक्षीय चर्चा भी कर सकते हैं।

माना जा रहा है कि 22 जून के बाद दोनों देशों में तनाव समाप्त होने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।


चीन के कब्जे में भारतीय सैनिक 

भारत कुछ सैनिकों के चीन के कब्जे में होने की बात कह रहे हैं। हालांकि इस खबर की पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन आ रही सूचना के मुताबिक भारत के कुछ संख्या में सैनिकों के बारे में पुख्ता जानकारी नहीं है।

हिंसक झड़प की घटना सोमवार की रात में हुई थी। मंगलवार को इस दिशा में काफी प्रयास हुए हैं। समझा जा रहा है कि गायब सैनिकों के बारे में प्रयास तेज हो सकते हैं।

समझा जा रहा है कि भारत के कुछ सैनिक अभी भी चीन की सेना के कब्जे में हैं। इसलिए पहला प्रयास अपने सैनिकों की संख्या को ठीक करना भी होगा। दूसरा भारत के सामने एक चुनौती है।

चीन की तुलना में भारत का क्षेत्र ज्यादा ऊंचाई पर और दुरूह भी है। उत्तराखंड से लेकर अरुणाचल तक की सीमा पर चीन की तरफ के सैन्य आधारभूत संसाधन हमारी तुलना में काफी अच्छे हैं।

पेचीदगियां बढ़ीं

पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि पेचीदगियां बढ़ गई हैं। पूर्व विदेश सचिव ने कहा कि स्थानीय सैन्य कमांडर के स्तर से प्रयास होगा ही, इसके साथ-साथ दोनों देशों के राजदूत के बीच में संवाद बढ़ेगा।

रिश्तों की विश्वसनीयता में भी बड़ा मोड़ आ गया है। इसे बनाए रखने की चुनौती आ गई है। इस तरह से लग रहा है कि अब सैन्य कूटनीति और राजनयिक प्रयासों में तेजी आएगी। पूर्व विदेश सचिव का कहना है कि यह मुश्किल घड़ी तो है।

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