साहित्य

अपनी-अपनी बारिश : कहानी-1

Pratima Jaiswal
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अपनी-अपनी बारिश (कहानी-1)
‘आज का मौसम कितना रोमांटिक है ना?’
इच्छा ने आंहे भरते हुए वैभव को अपनी बांहों में भर लिया।
‘हां, ठीक है बारिश में पार्टी करने का अलग ही मजा होता है’
वैभव ने इच्छा को खींचकर बेड पर पटक दिया।
‘फिर मैं तैयारी शुरू कर दूं बाहर चलने की…आज मैं वाइन कलर की ड्रेस पहनूंगी!’
इच्छा जल्दी से बेड से उठकर अलमारी की तरफ भागी।
‘मैं तुम्हारे साथ नहीं अपने ग्रुप के साथ पार्टी करने के बारे में सोच रहा था। काया भी बहुत दिनों से ‘गेट टू गेदर’ करने की जिद कर रही है’
वैभव ने शीशे में खुद को ऊपर से नीचे तक निहारते हुए मुस्कान बिखेरी।
‘तुम्हें नहीं लगता इस बारिश में हम दोनों को साथ में होना चाहिए। छोड़ों यार! ग्रुप को हम बारिश का मजा लेते हैं। म्यूजिक, वाइन, रोमांस और हमारे पसंद का खाना। बाहर नहीं चलना चाहते, तो मैं यहां अरेंज करा देती हूं’।
इच्छा ने वैभव को मनाने की कोशिश की।
‘मैंने एक बार कह दिया कि मैं बाहर जाऊंगा, तो यह फिर्जूल की टोका-टाकी मत करो मेरे साथ। शुक्र मनाओ कि यहां की बारिश तुम्हें रोमांटिक लग रही है, बदबूदार नहीं। इसके बारे में सोचो और खुश रहो इच्छा डार्लिंग!’
वैभव ने खिसियानी-सी हंसी के साथ इच्छा को ऐसे देखा, जैसे उसे कुछ याद दिलाकर जमीन पर पटकना चाहता हो।
‘क्या मतलब है तुम्हारा! तुम्हें नहीं लगता कि तुम इतनी-सी बात पर कुछ ज्यादा ही बोल गए? प्यार करती हूं तुमसे, पार्टनर हूं तुम्हारी’
‘पार्टनर हो, वाइफ नहीं! इस बात का फर्क समझ जाओ। लिव इन रिलेशनशिप यू नो! अब मैं निकल रहा हूं, मेरा मूड मत खराब करो। रात में लेट हो जाए, तो सो जाना। मुझे आने के बाद कोई ड्रामा नहीं चाहिए’
इच्छा को बारिश में अकेला छोड़कर वैभव अपनी लग्जरी कार में निकल गया।
वैभव के यूं बेरूखी से चले जाने के बाद इच्छा फ्लैशबैक में खो गई।
***
दो साल पहले इच्छा के लिए बारिश कुछ अलग थी। आज की रोमांटिक बारिश से बिल्कुल अलग। बारिश आने का मतलब था, सारे काम छोड़कर आंगन से बारिश का पानी निकालना। कभी-कभी तो नाले का पानी भी घर में भर जाता था। इच्छा को बारिश से प्यार तो था लेकिन बारिश का पानी जमीन पर गिरते ही बदल जाता था। आसमान से धरती के बीच पहुंचने के दौरान बारिश बारिश बेहद खूबसूरत लगती थी लेकिन जमीन पर गिरते ही मोती, जैसे पत्थर में बदल जाते थे। देखा जाए, तो बारिश की अपनी कोई परिभाषा नहीं है, इसके मायने हर किसी की परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं। अपनी जिंदगी के हिसाब से सबकी अपनी-अपनी बारिश होती है। इच्छा गांव से शहर एक छोटी-सी नौकरी की तलाश में आई थी लेकिन कुछ ही महीनों में उसे नौकरी बदलनी पड़ती थी। वो कहीं भी फिट नहीं हो पा रही थी। उसे हमेशा सबकुछ पाने की इच्छा रहती। शहर में कम पैसों में घर मिलना मुश्किल था इसलिए इस किराए के मकान में एक कमरा उसका भी था। किराएदारों के लिए बनाए गए इस दस कमरों वाले घर में कई जिंदगियों की कहानी चल रही थी। इस घर में जो भी किराए पर आता था, वो आसानी से नहीं जाता क्योंकि यह सबसे सस्ती जगह थी।
यहां की बारिश में इच्छा की मुलाकात तपन से हुई थी। तपन किराए के इसी घर में रहता था। दोनों की जान-पहचान कराने वाली भी बारिश ही थी। उस रात बारिश इतनी तेज थी कि बार-बार आंगन में पानी भर रहा था। नाली ओवरफ्लो होने पर पूरे घर में बदबू फैल गई। इच्छा बड़बड़ाते हुए उठी और आंगन की तरफ बाल्टी लेकर दौड़ी। दूसरी ओर से तपन भी दौड़ते हुए आ रहा था। दोनों इतनी तेजी में थे कि एक-दूसरे को देख नहीं पाए और टकराकर आंगन में बहते हुए नाली के पानी में गिर गए।
‘छी! यह बारिश का पानी है या नाली का’?
इच्छा ने मुंह जल्दी से साफ करते हुए उठने की कोशिश की।
‘मैडम जी! पानी तो बारिश का है लेकिन नाली में मिलकर इसका अपना कोई अस्तित्व नहीं रहा।
सामने से तपन ने चंचल-सी मुस्कान बिखरेते हुए इच्छा के आगे हाथ बढ़ाया।
इच्छा की नजर तपन की चंचल की आंखों में खो गई।
इच्छा के मन में आज भी वो बारिश कहीं थम-सी गई थी। धीरे-धीरे इच्छा और तपन करीब आने लगे और साथ में जिंदगी बिताने के सपने देखने लगे लेकिन कभी-कभी इंसान अपनी कहानी का विलेन खुद बन जाता है। प्रेम कहानी के विलेन तब और भी खतरनाक होते हैं, जब वो कहानी के नायक- नायिका भी खुद ही हो। इच्छा हमेशा से अपनी बांहों में दुनिया समेटना चाहती थी। तपन का सपना भी कुछ ऐसा ही था लेकिन फर्क यह था कि दोनों के लिए दुनिया की परिभाषा अलग-अलग थी। तपन के लिए इच्छा पूरी दुनिया थी और इच्छा की दुनिया इस नाले वाले घर से परे थी।
-प्रतिमा
जारी है…
(दूसरा पार्ट कल, पूरी कहानी अभी पढ़ना चाहते हैं, तो ‘प्रतिलिपि’ पर पढ़ें।)
#अपनीअपनीबारिश

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