साहित्य

”आप” ने प्रेम के नाम पर छल किया है

Pratima Jaiswal
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गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं होता, परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है। ट्रेलर स्विफ्ट भी Nothing lasts forever’ जैसा शाश्वत जानते हुए भी बार-बार प्यार कर बैठती हैं। इस सत्य को जानने के बाद भी उन्हें यह उम्मीद है कि उनका प्रेमी कभी न कभी उनके साथ बिताए हुए पल याद करेगा। वो अपने हर गाने में कई प्रेम कहानियां जी रही हैं।

अक्सर प्रेम कहानियों में कई ऐसी यादें भी रहती हैं, जिन्हें देखकर लगता था कि यह जोड़ा कभी अलग नहीं होगा। प्रेमियों से ज्यादा मुझे उन प्रेम भरी स्मृतियों पर भरोसा रहा। मेरे आसपास कई ऐसे साथी रहे, जिनके प्रेम और अपनेपन को देखकर मुझे लगता था कि वो कभी अलग नहीं होंगे, लेकिन फिर नियति ने भरोसा तोड़ते हुए इनके अलग होने की खबर भी सुनाई।

मुझे प्रेमी-प्रेमिका से ज्यादा याद आईं वो स्मृतियां, जो शायद हमेशा मेरे मन में बसी रहेगी। एक-दूसरे को हाथों से खाना खिलाना, एक थाली में खाते हुए एक-दूसरे को चिढ़ाना, साथी के बीमार होने पर कड़कड़ाती ठंड में बाइक चलाकर कई किलोमीटर की दूरी तय करना। टूटी प्रेम कहानियों को देखकर, मैं अक्सर सोचती शायद प्रेम में बने रहने की अब कोई वजह नहीं होगी, इसलिए दोनों ने अपना रास्ता अलग कर लिया होगा। वक्त के साथ प्रेमी आगे बढ़ गए लेकिन एक-दूसरे को निवाले खिलाने वाली स्मृति उसी प्रेमकाल में कई घटती रह गई। वो वहीं घट रही है और स्थिर खड़ी है, वो प्रेम के इस दृश्य को देखने वाले की आंखों में घर कर चुकी है।

प्रेमियों का अलग हो जाना तब और भी खलता है, जब दोनों में से एक प्रेम की स्मृतियों में विचरता रह जाए और दूसरा किसी दूसरे रास्ते निकल जाए। बिल्कुल वैसे, जैसे कोई प्रेम से भरी थाली को बीच में ही छोड़कर उठ जाए और उसका साथी हाथों में निवाला लिए उसी मुद्रा में बैठा रहे।
प्रेम इतना कोमल होकर भी मजबूत है, तो पता नहीं क्यों प्रेमी अपने साथी के प्रति इतने निर्दयी हो जाते हैं।

खुद उद्भव भी इस विरह के रहस्य को नहीं समझ पाए। उनकी नजर में श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ छल किया है। जीवन के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण रखने वाले उद्भव के लिए प्रेम और प्रेमी किसी कण से ज्यादा नहीं थे। उनके लिए प्रेम और प्रेमी दोनों छलावा थे लेकिन जब वो गोपियों से मिलकर श्रीकृष्ण के प्रति उनके प्रेम की अपरिभाषित सीमा देखते हैं, तो स्वंय को सभी तर्क से परे पाते हैं। उन्हें राधा और गोपियों की विरह अग्नि देखकर श्रीकृष्ण पर क्रोध आता है। प्रेमिकाओं के बीच आकर वो पहली बार प्रेम को जान पाते हैं। कृष्ण भक्ति को भूलकर वो राधा के आगे नतमस्तक होकर ‘राधे’ नाम में मग्न हो जाते हैं। प्रेम और स्मृतियों के दृश्य देखकर वो कृष्ण पर क्रोधित होते हैं। वो मोहन से पूछते हैं ‘आपने प्रेम के नाम पर छल किया है। आपने विरह की अग्नि में प्रेम को जलने दिया?’

श्रीकृष्ण मुस्कुराकर कहते हैं ‘प्रेम का अस्तित्व प्रेमी से बड़ा है क्योंकि प्रेमी आगे बढ़ जाते हैं लेकिन प्रेम स्मृतियों में वहीं खड़ा रहता है। हम जब भी इन स्मृतियों में जाते हैं, प्रेमी और प्रेमिकाओं को वहीं खड़े पाते हैं। प्रेम को जीने वाली इन गोपियों को मुक्ति नहीं चाहिए, इन्हें प्रेम चाहिए। तुम ज्ञानी हो उद्भव! फिर भी प्रेम और विरह की इस अनुभूति से बच नहीं पाए।’

मैं आंखें बंद करती हूँ, तो मुझे अपने दोस्तों की प्रेम कहानियों की वो स्मृतियां दिखती हैं, जिनकी मैं गवाह बनी हूँ। मैं उनकी निजता में जाकर उनसे कोई सवाल नहीं कर सकती क्योंकि मुझे यह अधिकार नहीं है। उन्हें वापस मिलाना मेरे बस में नहीं है।

शायद भौतिकता और जीवन की आपा-धापी में वो भूल गए होंगे, लेकिन वो प्रेम भरी स्मृतियां आज भी मुझे दिखती हैं। मुझे यह स्मृतियां तब और भी खलती है, जब उन दोनों में से एक हाथ में निवाला लिए विरह अग्नि में वहीं तपता-तड़पता रहता है और दूसरा कहीं ओर निकल जाए।
-प्रतिमा

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