विशेष

#इख़्तिलाफ़_ए_राय

——- #Assalamu_Alaikum ——

एक बार मेरी मुलाकात एक मग़रिबी स्कॉलर से हुई। मैंने पूछा कि अहले मगरिब की तरक्की का राज क्या है? उन्होंने जवाब दिया– इख़्तेलाफ़ ए राय (dissent) को इंसान का मुकद्दस हक़ करार देना।ये बिला शुब्हा एक दुरुस्त बात है। लेकिन वह मग़रिबी फ़िक्र की बात नहीं वह फ़ितरत का एक कानून है। इस कानून को एक हदीस में इन अल्फ़ाज़ में बयान किया गया है यानी *”मेरी उम्मत का इख़्तिलाफ़ रहमत है”

इख़्तिलाफ़ ए राय का इज़हार हमेशा तनक़ीद (criticism) की सूरत में होता है।मगर तनक़ीद ख़्वाह किसी हवाले से की गई हो वो अपनी हकीकत के एतेबार से मुताले की एक सुरत होती है।तनक़ीद का असल मक़सद किसी मौज़ू पर खुले तबादला ए ख़्याल (open discussion) का आगाज़ करना होता है।तनक़ीद का मक़सद ये है कि मुख़्तलिफ़ ज़ेहन दयानतदाराना तौर पर (honestly) अपने नतीजा ए तहक़ीक़ को बताएं,और फिर दूसरे लोग दयानतदारी के साथ उस पर अपने ख़यालात का इज़हार करें।इस तरह का अज़ादाना तबादला ए ख़्याल ज़ेहनी इरतेक़ा (intellectual development) का लाज़मी तक़ाज़ा है।

ईल्म अपनी नवीयत के ऐतेबार से लामहदूद मौज़ू है।ये मज़हबी मौज़ू पर भी उसी तरह सादिक़ आती है जिस तरह सेकुलर मौज़ू पर।इख़्तिलाफ़ ए राय बिला शुब्हा रहमत है।इख़्तिलाफ़ ए राय हर हाल में मुफ़ीद है।इस मामले में अगर कोई शर्त है तो वो सिर्फ एक है,के इख़्तिलाफ़ करने वाला मुसल्लम दलील की बुनियाद पर इख्तिलाफ करे,वो इलज़ाम तरासी का तरीका इख्तियार न करे।

इख्तिलाफ ए राय के फायदे बेशुमार हैं,इससे मसला ए ज़ेरे बहस के नय पहलू सामने आते हैं।इससे तख़लीकी फ़िक्र (creative thinking) में इज़ाफ़ा होता है।इसके ज़रिए लोगों को मौक़ा मिलता है के वो दूसरे के नतीजा ए फ़िक्र से फ़ायदा उठाएं।इससे मसअला ज़ेरे बहस के मख़फ़ी गोशे सामने आते हैं,वगैरह।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *