साहित्य

एक सवाया आदमी…कैमरा की ओर देखकर मुस्करा रहे हैं

Hindinama
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एक सवाया आदमी
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मुंशी प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद की एक तस्वीर है। दोनों साथ खड़े हैं, कैमरा की ओर देखकर मुस्करा रहे हैं।

तस्वीर में प्रेमचंद के जूतों को देखकर मेरे मन में सवाल उठता है कि क्या ये वही जूते हैं, जो फट गए थे?

और यह कि अगर मैं उस चित्र में मुंशीजी और प्रसाद जी की पादुकाओं पर चिंतन करने लगूँ तो कहीं इसे हरिशंकर परसाई के जूते में पैर डालने की कोशिश तो नहीं समझ लिया जाएगा?

लिहाज़ा मैं अपना ध्यान इन दोनों मूर्धन्यों के मुखमण्डल पर केंद्रित कर लेता हूँ। मैं पाता हूँ कि मुंशीजी अत्यंत अलमस्त अदा से हमारी ओर देखकर मुस्करा रहे हैं। यह ठीक-ठीक वैसी ही निर्लिप्त और अनौपचारिक मुस्कान है, जो फटे जूते वाली तस्वीर में भी दिखाई देती है। किंतु प्रसाद जी उनके समक्ष कुछ-कुछ सहमे हुए-से जान पड़ते हैं।

अगर वैसा है तो वह केवल इसलिए नहीं होगा कि प्रसाद जी मुंशी जी से पूरे नौ साल छोटे थे। बल्कि वैसा इसलिए भी हो सकता है कि मुंशी जी प्रसाद जी को जब-तब अधिकारपूर्वक डपट देने में कोताही नहीं बरतते थे।

मिसाल के तौर पर जब प्रसाद जी का नाटक “स्कन्दगुप्त” प्रकाशित हुआ तो “माधुरी” पत्रिका के अक्तूबर 1929 के अंक में उसका रिव्यू करते हुए प्रेमचंद ने लताड़ लगाते हुए कहा-

“प्रसादजी के और नाटकों की भांति यह भी प्राचीन संस्कृत का अनुवाद होकर रह गया है। भाषा निर्जीव। ऐसी भाषा का व्यवहार करना साहित्य के गले पर छुरी फेरना है। हम प्रसादजी से निवेदन करेंगे कि ईश्वर ने आपको जो शक्ति दी है, उसका उपयोग वर्तमान समस्याओं को हल करने में कीजिए। गड़े मुर्दे उखाड़ने से आज कोई फ़ायदा नहीं।”

इसके एक साल बाद प्रसाद जी का नॉविल “कंकाल” आया तो अब उससे मुंशीजी बहुत मुतमईन हुए। “हंस” पत्रिका में नवम्बर 1930 में प्रकाशित अपने एक रिव्यू में उन्होंने कहा-

“आज हिंदी में बहुत कम ऐसे उपन्यास हैं, जो इसके सामने रखे जा सकें। मुझे अब तक प्रसादजी से यह शिक़ायत थी कि आप क्यों प्राचीन वैभव का राग अलापते हैं? शायद यह मेरी प्रेरणा का फल है कि प्रसादजी ने इस उपन्यास में समकालीन समस्याओं को हल करने की चेष्टा की है। मेरी शिक़ायतों पर कुछ लोगों ने मुझे ख़ूब आड़े हाथों लिया था पर अब मुझे वह कठोर बातें बहुत प्रिय लग रही हैं। अगर ऐसी दस-पांच लताड़ों के बाद ऐसी सुंदर वस्तु निकल आए तो मैं आज भी उनको सहन करने को तैयार हूँ।”

आप देख सकते हैं कि मुंशी जी अत्यंत ही भोलेपन से “कंकाल” की यथार्थवादी भावभूमि पर प्रतिष्ठा का श्रेय स्वयं की आलोचना को देते मालूम होते हैं।

यह प्रसंग जानने के बाद अब आप शायद उस चित्र में दिखाई दे रही मुंशीजी की मुस्कराहट और प्रसाद जी की किंचित संकोचपूर्ण देहभाषा का रहस्य बूझ सकें।

मुंशी जी और प्रसाद जी का जन्मस्थान वाराणसी में कोई चार मील के फ़ासले पर था, किंतु इन दोनों की भावभूमि में जैसे दो युगों का अंतर था। मुंशी जी विशुद्ध कथाकार थे। प्रसाद जी कवि और दार्शनिक थे। कहानियाँ प्रसाद जी ने भी लिखी हैं और कुछ तो बहुत ही उत्कृष्ट। उनकी श्रेष्ठ कहानियों का संकलन बनाएं तो वह हिंदी के सर्वश्रेष्ठ संकलनों में से एक होगा। लेकिन ज़ाहिर है, प्रेमचंद के “मानसरोवर” के आठ खंड सम्पूर्ण हिंदी कथा साहित्य पर भारी हैं।

मुंशी जी के साहित्य में गांधीवाद और मार्क्सवाद के स्रोत तलाशे जाते थे, प्रसाद जी के साहित्य पर शैव और बौद्ध दर्शन का प्रभाव। मुंशी जी आदर्शोन्मुख यथार्थवादी थे, प्रसाद जी छायावादी। इसके बावजूद हिंदी साहित्य में दो विश्वयुद्धों के बीच के दो दशक — यानी 1918 से 1938 तक का कालखंड — “प्रसाद-प्रेमचंद काल” कहलाता है। कविता, उपन्यास, निबंध, नाटक और कहानियाँ – साहित्य के इन सभी क्षेत्रों में उस ज़माने में ये दोनों केंद्रीय व्यक्तित्व के रूप में उपस्थित थे।

मुंशी जी प्रसाद जी से एक वर्ष पूर्व चले गए। वर्ष 1936 में। उनसे नौ साल छोटे होने के बावजूद प्रसाद जी को भी 1937 में इस नश्वर संसार को विदा कह देना था। 8 अक्टूबर 1936 को जब मुंशी जी का देहांत हुआ, तब हिंदी के एक अन्य मूर्धन्य कथाकार जैनेन्द्र कुमार उनके समीप थे। वे ही उनके लिए डॉक्टर को बुलाने दौड़े, किंतु मुंशी जी को बचाया नहीं जा सका था। उनकी अंतिम यात्रा में प्रसाद जी सम्मिलित हुए थे। प्रेमचंद की अंतिम यात्रा में सम्मिलित प्रसाद का एक मार्मिक चित्र एक निबंधकार ने अपने निबंध “प्रसाद की एक झलक” में खींचा है।

मेरा मत है कि भाषा हमारे निजत्व का मूल संदर्भ होती है और हमारी भावभूमि का निर्धारण भी गहरे अर्थों में भाषा से ही होता है। तिस दृष्टि से देखें तो आप पाएंगे कि मुंशी जी और प्रसाद जी के भाषाई संस्कारों में ही बुनियादी अंतर था। प्रसाद जी ने ब्रजभाषा की “समस्यापूर्ति” से काव्यरचना का आरम्भ किया था। कविवर सुमित्रानंदन पंत ने “पल्लव” की भूमिका में जिस “खड़ी बोली” का जयघोष किया था, उसके सर्वोत्कृष्ट साधक उस काल में प्रसाद जी पहले ही बन चुके थे। तत्सम, अलंकृत, संस्कृतनिष्ठ और नाटकीय भाषा।

दूसरी तरफ़ मुंशी जी की भाषा सरल, सपाट, गतिशील, मुहावरेदार। उस भाषा के बिना वे अपनी श्रेष्ठ कहानियां नहीं कह सकते थे। वह भाषा ही उनके कथाकर्म का बुनियादी छंद था। तिस पर फ़ारसी का प्रभाव। उनके पिता अजायब राय एक डाकमुंशी थे, इसलिए हुक़ूमती दफ़्तरों में उस ज़माने में इस्तेमाल की जाने वाली फ़ारसीप्रधान भाषाशैली मुंशी जी को विरासत में मिली थी।

हिंदी के अग्रणी कथाकार के रूप में मुंशीजी की आज इतनी प्रतिष्ठा है कि यह जानकर नई पीढ़ी को अचरज हो सकता है कि वास्तव में मुंशी जी प्रथमतया उर्दू के कथाकार थे। उनकी प्राथमिक पढ़ाई भी मदरसे में हुई थी।

“रंगभूमि” तक उनके आरम्भिक आठ उपन्यास उर्दू में ही लिखे गए थे। केवल बाद के सात उपन्यास हिंदी में लिखे गए हैं। उनका पहला उपन्यास था : “असरारे मआबिद।” अलबत्ता मुंशी जी अंग्रेज़ी भी बहुत अच्छी जानते थे और गाल्सवर्दी, तॉलस्ताय और नेहरू की किताबों के अनुवाद उन्होंने किए हैं।

उर्दू में लिखे गए “सोज़े-वतन” की कहानी तो ख़ैर जगविख्यात है ही, जिसकी सरकारी ज़ब्ती ने मुंशी जी को तब एक चर्चित कथाकार बना दिया था। “जीवन सार” में मुंशी जी ने लिखा है कि हमीरपुर के कलेक्टर ने उन्हें तलब किया तो वे बैलगाड़ी पर सवार होकर रातों-रात कुलपहाड़ पहुंचे, जहां कलेक्टर के सामने पेशी हुई। कलेक्टर बहादुर की मेज़ पर “सोज़े-वतन” की प्रति रखी थी। मुंशी जी पलक झपकते ही पूरा माजरा समझ गए। कलेक्टर ने फटकार लगाई- “अपने भाग्य को बखानो कि अंग्रेज़ी अमलदारी में हो। मुग़लों का राज होता तो हाथ काट दिए जाते।”

“सोज़े-वतन” के इंक़लाबी स्वर के कारण उसकी 700 प्रतियां ज़ब्त करके भस्मीभूत कर दी गई थीं। तब मुंशीजी “नवाब राय” और “धनपतराय” के नाम से लिखते थे। यह नाम तो बदनाम हो गया, आगामी पुस्तकों का यह हश्र ना हो, इसलिए मजबूरन उन्हें “प्रेमचंद” नाम अपनाना पड़ा था।

मुंशी दयानारायण निगम को 13 मई 1910 को एक पत्र में उन्होंने लिखा- “मुझे छटे-छमासे तो लिखना नहीं है, यह तो मेरा रोज़ का धंधा ठहरा। हर माह कहानी-क़िस्सों का मज़मून साहिबे वाला की ख़िदमत में पहुंचेगा तो वह समझेंगे मैं नौकरी में मन नहीं लगा रहा और मेरे सिर पर और काम थोप दिया जायेगा,

इसलिए अब नवाबराय मरहूम हुए।”
और इसी के साथ “प्रेमचंद” जन्मे।

नाम बदलकर लिखते, किताबें ज़ब्त होते देखते, फटे जूते पहनकर चलते, छपाई में इस्तेमाल होने वाले काग़ज़ के सौदागरों के क़र्ज़ तले गले-गले तक दबे हुए और मूर्धन्यों को देखते ही उनकी पीठ पर धौल जमाकर ठहाके से मिलने वाले मुंशी जी जिस भारत में रहकर कहानियां लिख रहे थे, वो भारत ही अब कहां बचा?

भारतभूमि के मर्म को बूझने वाला वैसा कोई कथाकार दूसरा नहीं हुआ है। तब भी आज रंज इस बात का नहीं कि जिन सुखों और संतोषों की तस्‍दीक़ मुंशी जी अपनी कहानियों में करते थे, उन्‍हें टोह पाना तक हम भूल गए, रंज इस बात का है कि हम अपने उन दु:खों को भी खो बैठे, रूई की तरह जो हमें चींथते थे, पूस के पाले की तरह जमे रहते थे हमारे भीतर। कि हम अपना वो आपा भी गंवा बैठे।

प्रेमचंद आज होते तो उनसे कहता कि मुंशीजी, ऐसे दुर्भागे देश कम ही होंगे, जो अपने वस्‍तुगत यथार्थ तक से वंचित हो जाएं और एक आभासी यथार्थ सांझ-सकारे उसे छलता रहे। कभी आप लौटकर आएंगे तो भूले से भी इस देश को पहचान न सकेंगे। इस देश ने अपने से पृथक किन्‍हीं कल्पित सुखों से अपने दु:ख जो बदल लिए हैं!

किंतु मुंशी जी आज नहीं हैं, केवल बेपरवाह मुस्कराहटों से भरी उनकी तस्वीरें हैं। फटे जूतों से झांकते उनके पैर के अंगूठे हैं। और इकतीस जुलाई का दिन है, जब आज से एक सौ अड़तीस साल पहले बनारस ज़िले के लमही गांव में नियति ने उन्हें यह कहकर भेजा था–

“धरती के धनी, जा, अपने गांव-जवार और देश-मुलुक को उसके अंतर्तम की ख़ूब कहानियाँ सुना। अपने क़िस्सों से लोगों को रुला, उनका मन बहला, उन्हें जगा और समझा-बूझा। बिगाड़ के डर से ईमान की बात करना मत छोड़ना, यह बतला। और उन्हें अपने से एक सवाया आदमी बना।”
…और मुंशीजी ने ठीक वैसा ही किया!

~ सुशोभित

#प्रेमचंद_सप्ताह #प्रेमचंद

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