साहित्य

कविता का एक रंग यह भी,,,तबस्सुम फ़ातिमा

Tabassum Fatima
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कविता का एक रंग यह भी।
टूटी हुई नथ और समय
— तबस्सुम फातिमा
जगमगाते सितारों की रौशनी
और मेरी हथेली पर रखी, टूटी नथ के दरमियान भी
एक रिश्ता है
शायद तुम इसे समझ पाओ , कि यादों की खुशनुमा छॉव में
तन्हाई के बसेरे में
तुम्हारी दी हुई सौग़ात में
कोई एक किरण है
जो मधुबन में थिरकना भूल गयी है
कोई एक जोगन है
जो मोम की तरह सुरमई आंच में पिघल रही है
कोई एक नदी है
जो गाते गाते ठहर गयी है
कोई गीत , जिसकी उदासी के झरने भी सूख गए हैं
शायद तुम इसे समझ पाओ , कि यादों की खुशनुमा छॉव में
तुम्हारे हर स्पर्श की सिहरन को
संभाल कर रखा है मैं ने
एक सपनीला चेहरा
अभी भी नथ और दिल के दरमियान
नृत्य करता है
तुम्हारी सौग़ात संभाल कर राखी है मैंने
शायद तुम इसे समझ पाओ , कि यादों की खुशनुमा छॉव में
कोई कोई चेहरा अचानक नज़रों से दूर भी हो जाता है
सपनों से बुनी हुई छाँव में
एक दिन अचानक सब कुछ गुम हो जाता है /
बेक़रारी भी, नथ भी , सपनीला चेहरा भी
जब फासले हाथ हटाते हैं
पुराने दृश्य एकदम से ग़ायब हो जाते हैं /
कहीं कोई कसक नहीं होती
नथ के टूटने पर भी /
कहीं कोई याद नहीं होती
साहिल के किनारे किनारे चलते हुए भी/
सांझ की बेला , ठहरी हुई रुत में
हम अपने चेहरे से कितने अनजान हो जाते हैं
तब एक नए चेहरे में
समाया हुआ नया दृश्य, आकार ले चूका होता है

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