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चीन और रूस ने की व्यापार से डालर को आउट करने की प्रक्रिया तेज़ : रिपोर्ट

यह बात अब दुनिया के बहुत से देश करने लगे हैं के विदेशी मुद्रा भंडार और आपसी व्यापार से डालर को निकाल दिया जाना चाहिए क्योंकि अमरीका अपनी करेंसी का इस्तेमाल करके दूसरे देशों को परेशान कर रहा है। यह अभियान केवल बयानबाज़ी तक नहीं रुका बल्कि इस पर अमल होना भी शुरू हो चुका है और अब इस प्रक्रिया ने रफ़तार पकड़ ली है।

चीन और रूस बहुत तेज़ी से डालर को पूरी तरह किनारे लगा देने की दिशा में बढ़ रहे हैं। 2020 की पहली तिमाही में पहली बार एसा हुआ कि दोनों देशों के बीच व्यापार में डालर का शेयर 50 प्रतिशत तक गिर गया। यहां से यह इशारा मिल रहा है कि अब डालर के विकल्प तलाश कर लिए गए हैं। चार साल पहले दोनों देश अपना 90 प्रतिशत व्यापार डालर में करते थे।

मास्को से छपने वाले अख़बार इज़वेस्तिया ने लिखा कि अब डालर में व्यापार गिरकर 46 प्रतिशत रह गया है। इससे पहले वर्ष 2018 में भी गिरावट हुई थी लेकिन फिर भी डालर में 75 प्रतिशत व्यापार हुआ था।

डालर के प्रयोग में आने वाली कमी की एक बड़ी वजह चीन और अमरीका के बीच जारी आर्थिक युद्ध है। 2020 में दोनों देशों का तनाव और भी बढ़ गया है क्योंकि अमरीकी अधिकारी चीन पर कोरोना वायरस की महामारी के बारे में जानकारियां छिपाने का आरोप लगा रहे हैं जिस पर चीन को गहरी आपत्ति है।

रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोफ़ ने कहा कि उनका देश लगातार व्यापार में डालर से दूरी बनाता जा रहा है और जहां भी संभव है स्थानीय करेंसियों में व्यापार कर रहा है। लावरोफ़ ने कहा कि अमरीका की आर्थिक नीतियों में अनिश्चितता से निपटने का प्रभावी रास्ता यह है कि डी-डालराइज़ेशन की नीति पर काम किया जाए।

यूरोपीय संघ के साथ रूस के व्यापार को देखा जाए तो डालर से दूरी बनाने की नीति साफ़ नज़र आती है। 2016 से यूरोपीय संघ और रूस के बीच व्यापार मुख्य रूप से यूरो में हुआ है।

चीन ने दुनिया के देशों के साथ 70 से अधिक समझौते एसे किए हैं जिनमें डालर को स्थान नहीं दिया गया है।

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