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चीन के मुक़ाबले में चुप्पी साधने वाले मोदी, लोगों का ध्यान भटकाने के लिए पाकिस्तान के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलेंगे : रिपोर्ट

भारत और चीन के बीच लद्दाख़ सीमा पर जारी टकराव के बीच, नई दिल्ली ने इस्लामाबाद स्थित अपने दूतावास में 50 प्रतिशत स्टाफ़ कम करने का फ़ैसला लिया है।

पिछली बार 2001 में भारतीय संसद पर हमले के बाद नई दिल्ली ने इसी तरह का क़दम उठाया था। 5 अगस्त 2019 को मोदी सरकार ने भारत प्रशासित कश्मीर से धारा 370 हटाकर उसका विशेष दर्जा समाप्त कर दिया था, उसी के बाद से दोनों देशों के बीच तनाव जारी है।

यहां सवाल यह है कि चीन और भारत के बीच टकराव का पाकिस्तान से क्या संबंध है? संक्षेप में लद्दाख़ में जारी भारत और चीन के बीच टकराव से भारत-पाकिस्तान के बीच नए संकट की संभावना बढ़ गई है।

इसकी पहली वजह गलवान घाटी में चीन के साथ ख़ूनी झड़प पर मोदी सरकार की मौन प्रतिक्रिया है, जिसमें 20 भारतीय सैनिकों की मौत हो गई थी। मोदी सरकार पर जनता और विपक्षी पार्टियों का भारी दबाव है, इसलिए आम लोगों का ध्यान भटकाने और चीन के मुक़ाबले में अपनी कमज़ोरी पर पर्दा डालने के लिए भारत सरकार पाकिस्तान के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल सकती है।

दूसरे यह कि मोदी सरकार आर्थिक मोर्चे पर बुरी तरह से विफल हो गई है और कोरोना वायरस महामारी ने रही सही कसर भी पूरी कर दी। इसलिए प्रधान मंत्री मोदी अपने समर्थकों को हिंदू-मुस्लिम तथा राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों में उलझाए रखना चाहते हैं। अध्ययनों से यह बात साबित हो चुकी है कि मूल मुद्दों पर नाकाम होने वाले नेता, जनता का ध्यान भटकाने के लिए पारम्परिक दुश्मनों और स्थायी प्रतिद्वंद्वियों को निशाना बनाते हैं। जब से मोदी सरकार ने कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त किया है, उनकी पार्टी के नेताओं ने पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर पर धावा बोलने का दावा करके पाकिस्तान के साथ दुश्मनी को नई ऊचांईयों पर ले जाने का प्रयास किया है।

इस साल के शुरू में ही भारत के नए सेना प्रमुख ने कहा था कि भारतीय सेना पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर पर क़ब्ज़ा करने के लिए तैयार है। इसी के फ़ौरन बाद, मोदी ने दावा किया था कि पाकिस्तान को हराने के लिए भारत को केवल 7 से 10 दिन लगेंगे। दो हफ़्ते पहले भारतीय रक्षा मंत्री ने कहा था कि अब नई दिल्ली की निगाहें सीधे पाकिस्तानी कश्मीर पर हैं।

चीनी द्वारा लद्दाख़ के कई विवादित इलाक़ों को अपने क़ब्ज़े में लेने पर मौन धारण करने वाले बीजेपी के नेता पाकिस्तान के ख़िलाफ़ बढ़चढ़कर दावे कर रहे हैं। इसका मतलब साफ़ है कि पाकिस्तान के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी से उन्हें राष्ट्रवादियों को परोसने के लिए ख़ुराक मिल जाती है, लेकिन चीन के ख़िलाफ़ बोलना भारी पड़ सकता है और स्थिति निंयत्रण से बाहर निकल सकती है। यही वजह है कि मोदी समेत हिंदुत्ववादी आरएसएस के नेता सख़्ती से अपने होंट सीकर बैठे हुए हैं। हालांकि भारतीय जनता को अपने प्रधान मंत्री से बड़ी उम्मीद थी कि वे 30 जून की शाम को टीवी पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में चीन के साथ जारी टकराव पर बीजिंग को ज़रूर खरी खोटी सुनायेंगे।

 

 

 

कहीं चीन से अनुमान की ग़लती तो नहीं हो रही है, क्या है चीन विरोधी एलायंस की बड़ी कमज़ोरी?

भारत और चीन के बीच सीमा पर गतिरोध के लंबा खिंचने के लक्षण दिखाई देने लगे हैं जबकि इस बीच अमरीका ने भी संकेत दिए हैं कि वह इस गतिरोध में भारत का साथ दे सकता है।

भारतीय सेना प्रमुख एमएम नारावणे ने इस देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को सीमा का दौरा करने के बाद हालात से आगाह किया है और भरतीय सेना का यह आंकलन है कि तनाव ज़्यादा दिनों तक जारी रह सकता है।

चीन ने इस इलाक़े में एसयू-30 युद्धक विमान और एच-6 बमबार विमान तैनात किए हैं जबकि भारत ने लद्दाख़ के इलाक़े में आकाश एयर डिफ़ेन्स सिस्टम तैनात कर दिया है।

इससे पहले अमरीका के विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो ने गुरुवार को बयान दिया था कि अमरीका ने जर्मनी में अपने सैनिकों को कम करने और उन्हें भारत के सामने चीन के ख़तरों का मुक़ाबला करने के लिए अन्य स्थानों पर तैनात करने का फ़ैसला किया है।

टीकाकार मानते हैं कि अमरीका बहुत दिनों से इस कोशिश में है कि चीन पर अंकुश लगाने के लिए भारत को कार्ड के रूप में प्रयोग करे और वह इस समय भारत के कट्टरपंथी राष्ट्रवादी हल्क़ों को इस्तेमाल कर रहा है।

भारत को यह उम्मीद है कि चूंकि चीन के साथ अमरीका कई मोर्चों पर भिड़ा हुआ है इसलिए वह इस समय भारत का साथ दे सकता है।

चीन की बात की जाए तो उसने बड़े पैमाने पर अपनी सेनाओं को तैयार कर रखा है लेकिन दोनों ही देशों की ओर से यह कहा जा रहा है कि व्यापक सैनिक टकराव की संभावना कम ही है। लेकिन यह भी तथ्य है कि जब सेनाएं आमने सामने डटी हुई हों तो कभी भी छोटी सी घटना भी हालात को बेक़ाबू कर देने के लिए काफ़ी होती है।

चीन को यह महसूस हो रहा है कि वर्तमान हालात में वह कई विरोधियों से एक साथ निपट सकता है। जहां एक तरफ़ वह अमरीका को एशिया, यूरोप, अफ़्रीक़ा और लैटिन अमेरिका में ललकार सकता है वहीं भारत को भी सफलता के साथ टक्कर दे सकता है।

चीनी विशेषज्ञों को अपनी सामरिक और आर्थिक मज़बूती का एहसास होने के साथ ही यह भी नज़र आ रहा है कि उनका मुक़ाबला जिन देशों से है वह गंभीर आर्थिक समस्याओं में उलझे हुए हैं और इन हालात में वह चीन से मुक़ाबला करने के बजाए यह चाहेंगे कि मामला किसी तरह रफ़ा दफ़ा हो जाए। मगर सवाल यही है कि कहीं चीनी नीति निर्धारिकों से अनुमान की ग़लती तो नहीं हो रही है। कहीं वह अपने विरोधियों को एकजुट तो नहीं कर रहे हैं? इन सवालों में दम तो है लेकिन यह भी सच्चाई है कि अमरीका अगर इस तरह का कोई भी एलायंस बनाता है तो वह केवल अपने हितों की रक्षा करेगा और यही रुजहान इस प्रस्तावित एलायंस के बिखराव का कारण बनेगा। यानी इस एलायंस का सबसे कमज़ोर पहलू यह है कि इसमें शामिल एक दूसरे को अपने हितों को लिए इस्तेमाल करने की कोशिश में हैं।


क्या चीन ने भारतीय इलाक़ों पर क़ब्ज़ा करने से पहले, भारत के सभी विकल्पों की समीक्षा कर ली थी?

 

पिछले दो महीनों से लद्दाख़ के विवादित इलाक़ों को लेकर भारत और चीन के बीच तनाव अपने चरम पर है और दोनों देश युद्ध के मुहाने पर खड़े हुए हैं।

भारत-चीन वास्तविक सीमा रेखा (एलएसी) पर पिछले सात वर्षों में यह सातवां लंबा खिंचने वाला संकट है।

हालांकि दोनों ही देश तनाव कम करने की कोशिश भी कर रहे हैं और दोनों में से कोई भी बड़े टकराव में अपने हित नहीं देख रहा है। 15 जून को दोनों देशों के सैनिकों के बीच गोलवान घाटी में ख़ूनी झड़प के बाद 22 यून को दोनों सेनाओं के वरिष्ठ कमांडरों के बीच 11 घंटों तक बैठक चली।

हालिया तनाव में कई ऐसे पेच फंसे हुए हैं, जिनका समाधान आसान नज़र नहीं आ रहा है। पहले तो यह कि उपग्रहों से मिलने वाली तस्वीरों में देखा जा सकता है कि गलवान में जहां 15 जून को झड़प हुई थी, उससे 100 मीटर भारत की सीमा के भीतर चीन की सेना ने रक्षा ढांचा खड़ा करके अपनी स्थिति को मज़बूत बनाने की कोशिश की है। अब यहां चीनी रक्षात्मक संरचनाएं, बंकर, सैनिकों की भारी संख्या और सैन्य वाहन दिखाई दे रहे हैं। चीन निरंतर सैनिकों की संख्या में वृद्धि कर रहा है और एलएसी के निकट देपसांग घाटी समेत दूसरे क्षेत्रों में बने ढांचों को ध्वस्त कर रहा है।

दूसरे यह कि अगर दोनों पक्ष 6 जून को बनी सहमति के रोडमैप पर की ओर लौटते हैं, जो गलवान नदी, देपसांग, गोगरा और हॉट स्प्रिंग्स जैसी कई साइटों को कवर करता है, तो भी पैंगोंग झील पर दक्षिण की ओर गंभीर टकराव की स्थिति बनी हुई है। हालिया वर्षों में झील के किनारे टिंडरबॉक्स बन गए हैं, जहां दोनों देशों के सैनिकों के बीच टकराव होता रहता है। एलएसी पर कोई परस्पर समझौता नहीं होने की वजह से फ़िंगर -4 और फ़िंगर-8 नामक कई किलोमीटर तक का इलाक़ा झड़पों का केन्द्र बन गया है, जिसपर दोनों ही देश अपना दावा ठोंकते हैं और दोनों देशों के सैनिक गश्त करने की कोशिश करते हैं। विशेष रूप से चीन ने वहां अपनी स्थिति मज़बूत कर रखी है। उसने इस इलाक़े में 1999 में एक सड़क का निर्माण कर लिया था, जबकि भारतीय सैनिक पैदल ही गश्त करने के लिए मजबूर हैं।

पिछले महीने सैकड़ों चीनी सैनिक अपनी चौकियों से निकलकर फ़िंगर-4 के उत्तर में स्थित भारतीय सेना की चौकी तक पहुंच गए और उन्होंने वहां कैम्प स्थापित कर दिया, रास्ते में कई नई संरचनाओं का निर्माण कर दिया और ऊंची चोटियों पर क़ब्ज़ा कर लिया।

भारतीय मीडिया अब इस बहस में उलझा हुआ है कि क्या चीन ने भारत द्वारा जवाबी विकल्पों की समीक्षा करते हुए भारत के इन इलाक़ों पर प्रभावी रूप से क़ब्ज़ा किया है।

चीन के जो भी इरादे हों, आने वाले वर्षों में भारत को उसके साथ बड़े टकराव के लिए तैयार रहना चाहिए।

एक रिपोर्ट के मुताबिक़, जून की शुरुआत में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को मालाबार में जापान-भारत-अमरीका त्रिपक्षीय नौसेना अभ्यास में शामिल होने का प्रस्ताव दिया था। 22 जून से, भारत की प्रमुख बंदरगाहों पर चीन से आयात की जाने वाली चीज़ों को रोक दिया गया है। यहां तक कि भारत के एक सबसे बड़े अख़बार मोदी सरकार को तिब्बत, ताइवान और हांगकांग को लेकर अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने का सुझाव दिया और शंघाई सहयोग संगठन जैसे संगठनों से बाहर निकलने के लिए तैयार रहने का आग्रह किया।

चीन, भारत के सभी विकल्पों से अवगत है, यही वजह है कि भारत को नापसंद करने के बावजूद, बीजिंग ने दिल्ली के साथ रिश्ते बने रहने की कोशिशें की हैं। लेकिन यह एक नया चीन है, जो आक्रामक नीति अपनाने में विश्वास रखता है। यह ऐसा चीन है जो युद्ध जीतने का मतलब तो जानता है, लेकिन युद्ध हारने का मतलब भूल गया है।

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