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‘जय श्री राम’ न कहने पर उन्होंने नौ मुसलमानों को मार डाला…’कट्टर हिंदुत्व एकता’

‘जय श्री राम’ न कहने पर उन्होंने नौ मुसलमानों को मार डाला दिल्ली में मुसलमानों का क़त्ल_ऐ_आम और ‘कट्टर हिंदुत्व एकता’

भाषा-नई दिल्ली : — दिल्ली पुलिस ने एक अदालत में दाखिल अपने आरोपपत्र में कहा है कि फरवरी में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के दौरान कुछ दंगाई व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए आपस में संपर्क में थे और ‘जय श्री राम’ नहीं कहने पर उन्होंने नौ मुसलमानों को मार डाला.

आरोपपत्र में कहा गया है कि सभी आरोपी मुस्लिमों से ‘बदला’ लेने के लिए 25 फरवरी को बनाए गए एक व्हाट्सएप ग्रुप ‘कट्टर हिंदुत्व एकता’ से जुड़े थे. इस ग्रुप का इस्तेमाल इन लोगों ने आपस में संपर्क में रहने और एक दूसरे को लोग, हथियार और गोलाबारूद मुहैया कराने के लिए किया.

आरोपपत्र में कहा गया है कि व्हाट्सएप ग्रुप बनाने वाला अभी भी फरार है

इसमें कहा गया है कि 25 फरवरी को 12 बजकर 49 मिनट पर ‘कट्टर हिंदुत्व एकता’ ग्रुप को बनाया गया. आरंभ में इस समूह में 125 सदस्य थे. इन 125 लोगों में 47 लोग आठ मार्च को ग्रुप से बाहर हो गए

नौ लोगों- हमजा, अमीन, भूरे अली, मुर्सलीन, आस मोहम्मद, मुशर्रफ, अकील अहमद और हाशिम अली तथा उनके बड़े भाई आमिर खान को मौत के घाट उतारने के मामले में अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट विनोद कुमार गौतम के समक्ष 29 जून को आरोप पत्र दाखिल किया गया था

पुलिस ने आरोप पत्र में कहा, ‘जांच के दौरान यह साबित हुआ कि 25 फरवरी की सुबह से लेकर 26 फरवरी की मध्यरात्रि तक हिंदुओं का एक समूह सक्रिय हुआ था. आरोपी जतिन शर्मा, ऋषभ चौधरी, विवेक पंचाल, लोकेश सोलंकी, पंकज शर्मा, प्रिंस, सुमित चौधरी, अंकित चौधरी और हिमांशु ठाकुर ने अन्य ज्ञात और अज्ञात दंगाइयों के साथ मिलकर भागीरथी विहार इलाके और अन्य स्थानों पर नौ मुस्लिम लोगों को मौत के घाट उतारा और कई अन्य को घायल कर दिया.’

दाखिल रिपोर्ट में आगे कहा गया, ‘यह दिखाता है कि वे दंगा करने में और मुसलमानों पर हमला करने में संलिप्त थे और उन्होंने दंगों के दौरान कई लोगों की हत्या की.’

आरोपपत्र में कहा गया, ‘वे नाम, पता पूछकर वे लोगों को पकड़ते थे और पहचान पत्र दिखाने के लिए कहते थे. कई बार उन्हें ‘जय श्री राम’ कहने के लिए भी मजबूर किया गया’

इसमें कहा गया, ‘जो लोग ‘जय श्री राम’ नहीं बोलते थे या उनकी मुस्लिम पहचान साबित होने पर, बेरहमी से उन पर हमला कर दिया जाता था और शव को भागीरथी विहार में मुख्य गंदा नाला में फेंक दिया जाता था’

अदालत मामले पर 13 जुलाई को सुनवाई करेगी

पुलिस की रिपोर्ट के मुताबिक एक आरोपी लोकेश सोलंकी ने 25 फरवरी को व्हाट्सएप ग्रुप में मैसेज किया, ‘गंगा विहार क्षेत्र के इस तरफ भाई लोकेश सोलंकी है, अगर किसी भी हिंदू को जरूरत हो तो संपर्क करे. हमारे पास आदमी, हथियार और कारतूस हैं, भागीरथी विहार क्षेत्र में मैंने दो मुसलमानों को मार डाला और अपने साथियों की मदद से उन्हें नाले में फेंक दिया’

पुलिस ने कहा कि पहले मामले में 26 फरवरी को दंगाइयों ने हमजा की हत्या की. घटना रात में सवा नौ बजे के करीब हुई जब वह मुस्तफाबाद से भागीरथी विहार की ओर आ रहे थे.

भागीरथी विहार के ई-ब्लॉक के पास नाले में उन्हें फेंक दिया गया. इस संबंध में गोकलपुरी थाने में तीन मार्च को प्राथमिकी दर्ज हुई.

दूसरे मामले में 25 फरवरी को दंगाइयों ने अमीन को मार डाला और शव को भागीरथी विहार के सी-ब्लॉक के पास नाले में फेंक दिया.

तीसरे मामले में 26 फरवरी को भागीरथी विहार के सी ब्लॉक के पास भूरे अली की हत्या कर दी गयी.

पुलिस के मुताबिक, 25 फरवरी को शाम चार-साढ़े चार बजे के बीच मुर्सलीन की हत्या कर दी गयी और जौहरीपुरी पुलिया के पास नाले में शव को फेंक दिया गया और उनके स्कूटर में आग लगा दी गयी.

पुलिस ने कहा है कि 25 फरवरी को शाम सात-साढ़े सात बचे के बीच दंगाइयों ने आस मोहम्मद की हत्या कर दी और शव को नाले में फेंक दिया.

उसी रात आठ बजे के करीब दंगाइयों ने बिजली काट दी और अंधेरे में मुशर्रफ के घर पर हमला कर दिया. उन्हें घर से खींच कर निकाला गया और मौत के घात उतार दिया गया. शव को नाले में फेंक दिया गया.

पुलिस ने कहा है कि 26 फरवरी को रात साढ़े नौ बजे अकील अहमद को दंगाइयों ने मार डाला. उसी दिन रात नौ बजकर 40 मिनट के करीब हाशिम अली और उनके बड़े भाई आमिर खान को दंगाइयों ने मार डाला.

 

Syed Riyasat Nawab Rizvi
@NawabRiyasat1

दिल्ली दंगो के बारे में अमित शाहजी ने सच कहा कि उ प्र से 300 लोग दिल्ली बुलाये गए थे और UP दंगे भी RSS ने कराये एव कानपुर में आतंकवादी हमला पुलिस प्रशासन पर जिस में 8 मारे गए 7 पुलिस कर्मी घायल ये तीनो हमलों में कुल 95 हत्याओ का दोषी है RSS प्रमुख मोहन भागवत हत्यारा है जयहिंद

AABID IMAM VSGT 2.0
@AABIDFORINC
दिल्ली पुलिस ने अदालत में दाखिल अपने आरोपपत्र में बताया कि फरवरी में हुए दिल्ली दंगों के दौरान कुछ दंगाई कट्टर हिंदुत्व एकता नामक व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए आपस में संपर्क में थे और ‘जय श्री राम’ नहीं कहने पर 9 मुसलमानों को मार डाला ।

Vijay Shankar Tiwari
@VijayVst0502
दिल्ली पुलिस ने अदालत में अपनी जांच रिपोर्ट में कहा है कि पूर्वी दिल्ली के दंगों के लिए सऊदी अरब और देश के अलग-अलग हिस्सों से मोटी रकम आई थी.दंगे भड़काने की योजना पहले ही बन चुकी थी,इसमें निलंबित पार्षद ताहिर हुसैन, जामिया के छात्र मीरान हैदर और गुलिफ्सा खातन के नाम शामिल हैं।

 

दिल्ली दंगा, मुस्लिम और संघ की राजनीति

 

BY – सिद्धार्थ भाटिया
15/03/2020

समाज में मुस्लिम विरोधी पूर्वाग्रह तो पहले से ही मौजूद था, संघ की छत्रछाया में उनके ख़िलाफ़ सतत तरीके से चलाए गए अभियान को अब लहलहाने के लिए उपजाऊ ज़मीन मिल गई है.

बड़े पैमाने पर होनेवाली जन-हिंसा के बारे में लिखना काफी जटिलता भरा काम है. खबरनबीसों के लिए, खासतौर पर जो निष्पक्ष और सटीक तरीके से ‘वाजिब’ शब्दों का इस्तेमाल करते हुए रिपोर्ट करना चाहते हैं, उनके लिए यह एक कठिन स्थिति है.

रिपोर्टर के लिए भी सतत तरीके से ऐसी पदावली का इस्तेमाल कर पाना कठिन होता है, जो पाठकों की मनोवृत्ति के अनुरूप और विचारधारा से मुक्त हो. ज्यादातर समय कोशिश इस तरह से लिखने की होती है कि उसमें वैचारिकता से लदे हुए शब्द जरूरत से ज्यादा न हों.

सोशल मीडिया पर इस बात को लेकर टिप्प्णियां की गई हैं कि क्यों दिल्ली की हिंसा को ‘दंगा’ नहीं कहा जाना चाहिए. एक ने कहा कि सार्वजनिक हिंसा के लिए दंगा शब्द का इस्तेमाल उपनिवेशी शक्तियों द्वारा किया जाता था.

एक पाठक ने कहा कि अपने बड़े हिस्से में यह हिंसा एकतरफा थी और मुसलमानों को इसका खासतौर पर निशाना बनाया गया. इसलिए इसे सिर्फ हिंदुत्ववादियों द्वारा की गई हिंसा का नाम दिया जाना चाहिए.’

कुछ लोगों द्वारा ‘नरसंहार’ शब्द का भी इस्तेमाल किया गया है. ये सब दिलचस्प टिप्पणियां हैं, मगर इनमें से कोई भी समस्याओं से खाली नहीं है.

दरअसल मीडिया रिपोर्टिंग में संक्षेपीकरण से काम चलाया जाता है और दंगा सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला पद है, भले ही इस शब्द से पुलिस-प्रशासन द्वारा बीच-बचाव की कोशिशों के बावजूद दो पक्षों द्वारा आपस में मारकाट करने की छवि उभरती है. लेकिन हमें मालूम है कि दिल्ली में ऐसा नहीं हुआ.

कोई भी अनुभवी पुलिसकर्मी आपको यह बताएगए कि अगर पुलिस चाहे तो वह चंद घंटों के भीतर ऐसी हिंसा पर काबू पा सकती है. इस मामले में- और भारत में अतीत में हुए ऐसे कई मामलों में- पुलिस बस तमाशबीन बनकर नहीं रही है बल्कि बेबस और बेकसूर लोगों के खिलाफ हिंसा करने वालों का इसने खुलकर साथ दिया है.

जहां तक आम आदमियों को प्रभावित करने वाली हिंसा और संघर्ष को संक्षेप में व्यक्त करने की बात है, तो ‘दंगा’ शब्द से काम चलाया जा सकता है, हालांकि यह आदर्श नहीं है. लेकिन जरूरत महज मीडिया रपटों के परे देखने और यह विचार करने की है कि आखिर दिल्ली में हुई हिंसा का ताल्लुक किस चीज से है?

इससे पहले भी हथियारबंद समूहों द्वारा संगठित तरीके से अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ हिंसा करने की घटनाएं हुई हैं. 1984, 1992-93 और 2002 की यादें भारतीयों के जेहन से आज तक मिटी नहीं हैं.

इन सभी मामलों में, यहां तक कि उन मामलों में भी जिनमें पलटवार किया गया- जैसा कि 1992-93 में देखा गया, अंत में मौतों, घरों के ध्वंस, दुकानों/कारोबार के जलाए जाने के हिसाब से सबसे ज्यादा नुकसान अल्पसंख्यक समुदायों को उठाना पड़ा.

दिल्ली की हिंसा में भी इसी पैटर्न का दोहराव हुआ है- मकसद सिर्फ मारना या अपंग बनाना नहीं है, बल्कि उनके पूजास्थलों पर और खासतौर पर उनके कार्यस्थलों पर हमला करना और इस तरह से उन्हें आर्थिक तौर पर तबाह कर देना है. यह सब अचूक तरीके से किया जाता है- अक्सर हमलावर गिरोहों के पास मुस्लिमों घरों और दुकानों की सूची होती है.

फिर भी दिल्ली के दंगे काफी अलग भी हैं. इसे पिछले छह वर्षों में जो कुछ हुआ है, और खासतौर पर पिछले एक साल में जो हुआ है, उसके संदर्भ में भी देखे जाने की जरूरत है.

यह ‘मुसलमानों की समस्या’ का हमेशा के लिए इलाज करने की बड़ी कोशिश का हिस्सा है, जो संघ परिवार और उसके अधीनस्थ काम करने वाली हिंदुत्ववादी शक्तियों और उनके अनगिनत समर्थको का एक वर्षों से संजोया हुआ सपना है.

लगभग एक सदी से आरएसएस नेताओं की सारी सोच इस बात पर केंद्रित रही है कि मुसलमानों को किस तरह से अधीन बनाया जाए कि वे दोयम दर्जे के अधिकारविहीन नागरिक बन जाएं क्योंकि अपनी तमाम चाहतों के बावजूद उनसे पूरी तरह से छुटकारा पाना मुश्किल है.

पिछले सत्तर सालों में संघ सत्ता केंद्र से बाहर रहा, लेकिन जब और जहां इसे मौका मिला, मसलन गुजरात में, इसने उन्हें खत्म करने की भरसक कोशिश की. आज उस राज्य में मुसलमान होना रोज अपमान का दंश झेलना है. उन्हें यह निरंतर याद दिलाया जाता है कि उनकी कोई हैसियत नहीं है.

संघ परिवार को जिस घड़ी का इंतजार वर्षों से था, वह घड़ी 2014 में आई जब नरेंद्र मोदी- जिनकी छत्रछाया में गुजरात में मुस्लिम विरोधी हिंसा को बेरोक-टोक अंजाम दिया गया- प्रधानमंत्री बने.

उनके पहले कार्यकाल में बड़े पैमाने पर जनसंहार की कोई घटना तो नहीं हुई, लेकिन इस दौरान देश में लिंचिंग की अनगिनत घटनाएं हुईं और मुस्लिम विरोधी अन्य तरह हिंसा के अलावा भाजपा नेताओं द्वारा सांप्रदायिक भाषणबाजी में इजाफा साफतौर पर देखा गया.

इसने एक ऐसा माहौल बनाया जिसमें अल्पसंख्यकों के बारे में बेहद घृणित बातें करना सामान्य बात हो गयी. यहां तक कि मोदी ने भी चुनाव अभियानों के दौरान प्रधानमंत्री का अपना लिबास उतार फेंका.

मुस्लिम विरोधी पूर्वाग्रह तो थोड़ा-बहुत पहले से ही मौजूद था. ऐसे में उनके खिलाफ सतत तरीके से चलाए गए इस अभियान को लहलहाने के लिए उपजाऊ जमीन मिल गई.

2019 में भारी बहुमत के साथ मोदी की वापसी का साफतौर पर यह मतलब था कि उनके समर्थकों के लिए सांप्रदायिकता कोई समस्या नहीं थी, बल्कि उन्होंने इसे हिंदुत्ववादी परियोजना पर मुहर लगने के तौर पर देखा. और पार्टी और इसके नेताओं ने निराश नहीं किया है.

असम में नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी) जिसे मुसलमानों की छंटनी के मकसद से तैयार किया गया था, मगर जिससे बड़ी संख्या में हिंदू बाहर रह गए, से लेकर कश्मीर में 80 लाख लोगों पर बैठाई गयी पहरेदारी तक, जिसमें सभी संवैधानिक प्रावधानों की धज्जियां उड़ा दी गयीं, से लेकर अब दिल्ली की हिंसा तक- इन सभी का मकसद मुसलमानों को हाशिये पर धकेलना रहा है.

मुस्लिम पहचान वाले शैक्षणिक संस्थानों जैसे जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को निशाना बनाया गया है और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए)-एनआरसी की कवायद पूरे देश में किए जाने की योजना है.

हो सकता है कि विरोध प्रदर्शनों ने इसकी तारीख को थोड़ा आगे खिसका दिया हो, लेकिन क्या किसी को इस निजाम के आखिरी लक्ष्य को लेकर कोई संदेह हो सकता है?

घटनाओं का क्रम, अगर लोकप्रिय टर्म का इस्तेमाल करते हुए कहें, तो ‘क्रोनोलॉजी’ महत्वपूर्ण है. दिल्ली की हिंसा किसी स्थानीय मसले के हाथ से निकल जाने के कारण हुआ स्वतः विस्फोट नहीं है.

दिल्ली चुनाव प्रचार के दौरान केंद्र सरकार में मंत्री अनुराग ठाकुर ने ‘गोली मारो…’ जैसे नारों से जनता को उकसाया था, जिसका निशाना साफतौर पर शाहीनबाग के प्रदर्शनकारी थे. चुनाव के ठीक बाद कपिल मिश्रा (जो कभी आम आदमी पार्टी में थे) ने प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए दिल्ली सरकार को अल्टीमेटम दिया.

हिंसा की शुरुआत इसके ठीक बाद हुई और न ही ठाकुर और न मिश्रा की जवाबदेही तय की गई. प्रधानमंत्री ने एक पथरीली चुप्पी ओढ़ रखी है. अमित शाह का आक्रामक अंदाज कायम है और पुलिस की तरफ से मुसलमानों के खिलाफ हिंसा जारी रखने की छूट मिली हुई है.

इन सबके बीच न्याय के मंदिर के रखवालों ने हस्तक्षेप करने की कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई है और उन्होंने यह ऐलान कर दिया है कि अदालतों से हिंसा को होने से रोकने की उम्मीद नहीं की जा सकती है. उधर सरकारी मीडिया अलग-अलग तरीकों से हिंदुओं पर मुस्लिमों के अत्याचार की कहानियां सुना रहा है.

ये सब- मुसलमानों के खिलाफ एक माहौल बनाना, उनसे उनकी नागरिकता छीनने के लिए सभी विधायी उपकरणों का इस्तेमाल करना, लाखों लोगों के अधिकार और उनकी जमीन छीनकर उन पर पहरे लगाना, और अब समुदाय के सबसे निर्बल तबकों के खिलाफ योजनाबद्ध हिंसा करना- जातीय संहार की बड़ी योजना की तरफ ही इशारा करते हैं.

जातीय संहार के परंपरागत रूपों में शारीरिक हिंसा के कई चरण हो सकते हैं, जैसा कि रवांडा या बोस्निया में देखा गया, जिसकी परिणति हजारों लोगों की मृत्यु में होती है. वैश्विक समुदाय इन्हें होने से नहीं रोक पाया, लेकिन उसने इनसे सबक लिया है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तटस्थ हो सकते हैं, लेकिन कई देशों, जिनमें ईरान जैसे मित्र देश भी हैं, ने अपनी गहरी चिंता प्रकट की है. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग द्वारा भारतीय अदालत में अर्जी लगाना, भारत के इतिहास में हुई ऐसी पहली घटना है.

भारत में जो हम आज देख रहे हैं वह जातीय संहार का भारतीय संस्करण है. भारत जैसे बड़े देश में, जिसकी बुनियादी लोकतांत्रिक संस्थाओं पर टिकी है और जहां एक मजबूत संघीय ढांचा है, विविधता के बारे में कोई बात नहीं करना, 20 करोड़ मुसलमानों से छुटकारा पाना कोई आसान काम नहीं होगा.

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि संघ इस दिशा में कोशिश करना छोड़ देगा. संसद इसके काबू में है, सरकार वह चला रहा है और दूसरे संस्थान भी इसके प्रभाव में हैं. और कई राज्यों में इसके पास राजसत्ता की वास्तविक ताकत है. सबसे बड़ी बात, इसके पास धैर्य है. मीडिया इसके प्रोपगेंडा विभाग के तौर पर काम करता है. वायरस तेजी से फैल रहा है- एक दिन शायद लोग संघ के इस काम के लिए खड़े होंगे.

दिल्ली की हिंसा रुक गई है लेकिन अल्पसंख्यकों को समाप्त करने की हिंदुत्ववादी परियोजना तो अभी बस शुरू ही हुई है.

मार्च 05, 2020

दिल्ली दंगे. अब हिंसा की खबरें सामने तो नहीं आ रही हैं. लेकिन तनाव बरकरार. अब ऐसे में सिरे जोड़ने की कोशिश हो रही है. किसने क्या किया? कब कैसे और क्यों शुरू हुआ? एक बड़े हिस्से के लिए भाजपा नेता कपिल मिश्रा हैं एक सिरा. 23 फरवरी 2020 को कपिल मिश्रा मौजपुर चौक पर आए थे. भाषण दिया. दिल्ली पुलिस के सामने खुली धमकी दी. और इस जगह से कपिल मिश्रा के जाने के ठीक बाद हुआ बवाल. भीड़ आई. पत्थर उछलने शुरू हुए. गोलियां चलीं. आग लगाई गयी. लोग मरे.

लेकिन एक और सिरा है. कपिल मिश्रा के मौजपुर चौक पर पहुंचने से पहले का सिरा. इस कम सुने हुए सिरे का नाम है पिंजरा तोड़. आरोप हैं कि पिंजरा तोड़ ने सीलमपुर और ज़ाफराबाद के लोगों को भड़का दिया. CAA और NRC को लेकर हो रहे प्रदर्शनों को रुख थोड़ा बदल दिया. बार-बार सड़क को बंद करने के अपीलें करते रहे. पहले से पत्थर और बोतल सामान जुटाते रहेने के आरोप लगे. प्रदर्शन कर रही भीड़ को इतना भड़का दिया कि मामला उग्र हो गया. और कपिल मिश्रा को राजनीति करने की ज़मीन मिल गयी.

आगे बढ़ने से पहले एक लाइन मे जानिये कि क्या है पिंजरा तोड़. पिंजरा तोड़ देश के शिक्षा संस्थानों के महिला छात्रावासों में समानता को लाने का एक आन्दोलन है, जो दिल्ली विश्वविद्यालय से शुरू हुआ था.

मामला जानिए

जनवरी 2020 के तीसरा हफ्ता था. दिल्ली के इस सीमान्त इलाके में नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में प्रदर्शन शुरू हुए. इलाके के लोकल लोगों ने शुरू किया, अधिकतर समुदाय विशेष से ताल्लुक रखते थे. इसमें सीलमपुर के छियासठ फुटा रोड पर लम्बे समय से प्रोटेस्ट हो रहे थे. धीरे-धीरे करावल नगर के खुरेजी ख़ास और चांद बाग़ में भी शाहीन बाग़ के समर्थन में प्रदर्शन शुरू हो गए. चांद बाग़ में सड़क के किनारे सर्विस लेन में बाकायदे तम्बू-कनात तनवाए गए. शाहीन बाग़ की तर्ज पर.

सीलमपुर इलाके में रहने वाले सामजिक कार्यकर्ता ओवैस सुल्तान खान बताते हैं कि जैसे ही सीलमपुर में आन्दोलन शुरू हुआ, उसके कुछ दिनों के भीतर ही पिंजरा तोड़ के लोग सीलमपुर चले आए. कहते हैं,

“यहां चल रहे प्रोटेस्ट में यहां की लोकल लीडरशिप थी. लेकिन कुछ ही दिनों में पिंजरातोड़ के लोग आए. उन्होंने अपनी एक साथी को खड़ा किया. उसी साथी के नाम पर प्रोटेस्ट आगे बढ़ाया.”

ओवैस जानकारी देते हैं कि इसके बाद से आन्दोलन टूटने लगा. कहते हैं कि उन्होंने आंदोलन को हाइजैक कर लिया. यहां के लोकल लोगों के साथ मीटिंग करने लगे. कुछ ही दिनों बाद सबको बिल्ले बांटने लगे. बिल्लों पर “नादान परिंदे” का टैग लगा हुआ था. इसके कुछ ही दिनों बाद पहली बार पिंजरा तोड़ के कार्यकर्ताओं ने अपना पहला प्लान सामने रखा.

“एक सभा थी. पूर्व विधायक चौधरी मतीन उस सभा में बोल रहे थे. बोलकर उतरे तो चौधरी मतीन से पिंजरा तोड़ के लोगों ने मांग की कि वो सड़क बंद करके आदोलन करना चाहते हैं. चौधरी मतीन ने साफ़ मना कर दिया. इलाके के कई लोगों ने इसका विरोध किया.”

ओवैस दावा करते हैं कि धीरे-धीरे पिंजरा तोड़ का दखल बढ़ा. पूरे आन्दोलन की दिशा बदल गयी. आखिर में हमने और हमारे वालंटियर्स ने खुद को इस आंदोलन से 22 जनवरी को अलग कर लिया.

ओवैस बताते हैं कि दरअसल सीलमपुर के इलाके में बीते बीस सालों में कई बार विरोध और प्रदर्शन हुए हैं. कई बार हिंसा भी हुई है. और हमारा सोचना था कि इस बार इलाके के लोग प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन किसी भी कीमत पर हिंसा न हो. लोगों ने इसीलिए सड़क बंद करने सरीखी मांगों को नकार दिया. ओवैस कहते हैं,

“पिंजरा तोड़ वालों ने बंद कमरे में मीटिंग करना शुरू कर दिया. हमें कई बार मांग की कि खुले में मीटिंग करें, ताकि सबको पता चले. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. कई मीटिंग यूं ही हुईं. इसके कुछ दिनों बाद उन लोगों ने पत्थर जुटा लिए. खाली बोतलें जुटा लीं. हमने हटाने के लिए कहा, तो उन्होंने कहा कि नहीं, इसकी ज़रुरत पड़ेगी.”

कहते हैं कि 22 फरवरी की रात, जब पूरे प्रोटेस्ट को सीलमपुर से उठाकर ज़ाफराबाद मेट्रो ले जाने जुगत शुरू हुई, उस समय, बक़ौल ओवैस, उन्होने कई लोगों को मैसेज भेजे. लोगों के साथ मिलकर एक बयान जारी किया. कहा कि हम परेशान हैं, डर में हैं. बाहर के लोग तमाम चीज़ें कर रहे हैं. इसके बाद आती है 23 फरवरी. इस दिन ज़ाफराबाद मेट्रो पहुंचे. और कुछ ही देर बाद यहां पहुंचे भाजपा के नेता कपिल मिश्रा. बाद में क्या हुआ? कमोबेश सभी को पता है.

 

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