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तुर्की बनेगा दुनिया के सबसे बड़े सैन्य गठबंधन नाटो की मौत का कारण : Report

जब सैन्य सहयोगी माने जाने वाले दो देश, एक दूसरे पर बंदूक़ तान लेते हैं तो सभी जानते हैं कि किसी भी वक़्त मुश्किल खड़ी हो सकती है। नाटो को भी कुछ ऐसी ही गंभीर समस्या का सामना है।

दुनिया के सबसे बड़े सैन्य गठबंधन के दो प्रमुख सद्सयों तुर्की और फ़्रांस के बीच जारी नोक-झोंक, इस गठबंधन के लिए घातक हो सकती है।

7 जून 2020 की बात है, तंज़ांनिया का मालवाहक जहाज़ सिर्किन चुपचाप तुर्की की एक बंदरगाह से रवाना हो गया और उसने लीबिया की मिसराता बंदरगाह पर लंगर डाल दिया।

इसमें क़रीब 5,800 टन सामान लदा हुआ था और तुर्की के तीन युद्धपोत इसे एस्कोर्ट कर रहे थे, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि इसमें तुर्की के क़ालीन भरे हुए थे।

बल्कि यह लीबिया की राष्ट्रीय संधि की सरकार जीएनए की सेना के लिए हथियार ले जा रहा था। लीबिया पर राष्ट्र संघ ने हथियारों का प्रतिबंध लागू कर रखा है।

समस्या उस समय शुरू हुई जब तीन दिन की समुद्री यात्रा के बाद, यूनानी नौसेना के एक हेलिकॉप्टर ने जहाज़ की तलाशी लेने का अनुरोध किया। सिर्किन का एस्कोर्ट करने वाले जहाज़ों ने इस अनुरोध को रद्द कर दिया।

उसके बाद, एक फ्रांसीसी युद्धपोत कोर्टबेट को सिर्किन पर संदेह हुआ कि वह संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों का उल्लंघन करते हुए हथियार लेकर जा रहा है।

कोर्टबेट पर तैनात सुरक्षाकर्मियों ने जहाज़ पर चढ़ने की मांग की। तभी तुर्की के युद्धपोतों में से एक ने चेतावनी देने के लिए अपने फ़ायर कंट्रोल रडार ऑन किया, जो इस बात का संकेत था कि वह फ़ायरिंग के लिए तैयार है।

 

कोर्टबेट वापस मुड़ गया और अगले दिन सिर्किन ने मिसराता में लंगर डाला और उस पर लदा हुआ माल उतारा गया।

फ़्रांस ने तुर्की के इस क़दम की निंदा की और नाटो में औपचारिक रूप से शिकायत की। दूसरी तरफ़ तुर्की ने फ़्रांस से माफ़ी मांगने के लिए कहा, जिसकी प्रतिक्रिया में फ़्रांस ने नाटो के ऑप्रेशन सी गार्जियन से अपने सैनिकों को हटा लिया और नाटो से गंभीर कार्यवाही करने की मांग की।

नाटो के दो महत्वपूर्ण सदस्यों के बीच टकराव के कारण, जो परिस्थितियां उत्पन्न हुई हैं, उससे 71 वर्षीय नाटो का वजूद ख़तरे में पड़ता दिखाई दे रहा है।

तुर्की ने 1952 में नाटो की सदस्यता ली थी और नाटो ने इस क़दम से न केवल सोवियत संघ से लगने वाले अपने दक्षिणी किनारे को सुरक्षित किया था, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया था कि तुर्की मास्को का सहयोगी न बन जाए।

हालांकि तुर्की नाटो के लिए दो धारी तलवार साबित हुआ। ख़ास तौर पर तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोगान के सत्ता संभालने के बाद से तुर्की और नाटो में दूरी बढ़ती जा रही है।

अर्दोगान ने नाटो को उस वक़्त सबसे बड़ा झटका दिया, जब उन्होंने रूस से एस-400 मिसाइल शील्ड ख़रीदना का फ़ैसला लिया। अमरीका ने तुर्की को प्रतिबंधों की धमकी दी और उसके साथ मिलकर एफ़-35 लड़ाकू विमानों के निर्माण की परियोजना को बंद कर दिया।

तुर्की और फ्रांस के बीच मौजूदा टकराव से यह स्पष्ट हो गया है कि कमज़ोर पड़ चुके दुनिया के सबसे बड़े सैन्य गठबंधन की क़ब्र तुर्की के हाथों खुदने जा रही है

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