इतिहास

भाटी राजपुतों का जैसलमेर और जैसलमेर का *नाचने* गाँव!!

जैसलमेर का क्षेत्रफल 38401 किलोमीटर है जो छेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान का सबसे बड़ा जिला है यह है अंतरराष्ट्रीय सीमा के साथ भी सर्वाधिक लंबी सीमा बनाता है यह अंतरराष्ट्रीय सीमा भारत-पाकिस्तान की सीमा रेखा रेडक्लिफ के नाम से जानी जाती है जैसलमेर जिले में 4 तहसील है। जैसलमेर जिले में पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा जल स्रोत की खडीन पद्धति प्रसिद्ध है।

ज़िले का पिनकोड 345001, दूरभाष कोड 02992 और वाहन कोड RJ 15 है। सन् 2011 में साक्षरता दर 57.2% था।

जैसलमेर राजस्थान के सुदूर पश्चिम में स्थित है और क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान का सबसे बड़ा जिला है। स्वतंत्रता से पुर्व यहां पर भाटी राजपुतों का राज्य था | इसकी स्थापना भाटी राजा जैसल ने 1178 ई. में की थी। जैसलमेर को “राजस्थान का अण्डमान” भी कहा जाता है। इस जिले में सबसे कम जनसंख्या निवास करती है। साथ ही साथ यहां का जनसंख्या घनत्व भी सबसे कम है। यहां प्रति वर्ग किमी में औसतन केवल 17 व्यक्ति ही निवास करते हैं। जैसलमेर को ‘स्वर्ण नगरी’ के नाम से भी जाना जाता है। जैसलमेर का सोनार का किला अपने स्थापत्य कला के कारण विश्व प्रसिद्ध है। इस किले के निर्माण में पीले पत्थरों का प्रयोग किया गया है। जब सुर्य की किरणें किले पर पड़ती है तो वह सोने के समान चमकता है, इसीलिये इसे सोनार के किले के नाम से जाता है। यहां भारत का सबसे बड़ा मरूस्‍थल थार का मरूस्‍थल स्थित है। यहां गर्मियों में गर्मी अधिक व सर्दी में ठंडी अधिक पड़ती है।

Shamsher Ali Khan
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#नाम_का_पंगा 🤣

जैसलमेर से बीकानेर बस रुट पर….
बीच में एक बड़ा सा गाँव है जिसका नाम है *नाचने*

वहाँ से बस आती है तो लोग कहते है कि
*नाचने वाली बस आ गयी..*😎

कंडक्टर भी बस रुकते ही चिल्लाता..
*नाचने वाली सवारियाँ उतर जाएं बस आगे जाएगी..*😎

इमरजेंसी में रॉ का एक नौजवान अधिकारी जैसलमेर आया
रात बहुत हो चुकी थी,
वह सीधा थाने पहुँचा और ड्यूटी पर तैनात सिपाही से पूछा –
*थानेदार साहब कहाँ हैं ?*

सिपाही ने जवाब दिया थानेदार साहब *नाचने* गये हैं..😎

अफसर का माथा ठनका उसने पूछा डिप्टी साहब कहाँ हैं..?
सिपाही ने विनम्रता से जवाब दिया-
हुकुम 🙏🏻 *डिप्टी साहब भी नाचने* गये हैं..😎

अफसर को लगा सिपाही अफीम की पिन्नक में है, उसने एसपी के निवास पर फोन📞 किया।

एस.पी. साहब हैं ?

जवाब मिला *नाचने* गये हैं..!!

लेकिन *नाचने* कहाँ गए हैं, ये तो बताइए ?

बताया न *नाचने* गए हैं, सुबह तक आ जायेंगे।

कलेक्टर के घर फोन लगाया वहाँ भी यही जवाब मिला, साहब तो *नाचने* गये हैं..

अफसर का दिमाग खराब हो गया, ये हो क्या रहा है इस सीमावर्ती जिले में और वो भी इमरजेंसी में।

पास खड़ा मुंशी ध्यान से सुन रहा था तो वो बोला – हुकुम बात ऐसी है कि दिल्ली से आज कोई मिनिस्टर साहब *नाचने* आये हैं।
इसलिये सब अफसर लोग भी *नाचने* गये हैं..!!

दिमाग खराब । ये हो क्या रहा है इस सीमावर्ती जिले में और वो भी इमरजेंसी में। पास खड़ा मुंशी ध्यान से सुन रहा था ।और वो बोला हुकुम बात ऐसी है कि दिल्ली से आज कोई मिनिस्टर साहब नाचने आये है। इसलिये सब हाकिम लोग भी नाचने पधारे है🤣🤣

जैसलमेर को स्वर्ण नगरी क्यों कहा जाता है, इसकी सुंदरता क्या है

पश्चिमी राजस्थान का रेतीला विस्तार है थार। थार की एक स्वर्णिम कल्पना है जैसलमेर। रेतीली जमीन पर बसा होने के कारण पहले मेरू नाम से जाना जाता था।

जैसलमेर का समुद्र सा फैला यह रेतीला विस्तार ही इसे दूसरे पर्यटन स्थलों से अलग करता है।

सन 1156 में जैसलमेर की स्थापना भाटी राजा जैसल ने की थी और 12 साल तक यहां शासन किया। बाद में जैसल के नाम पर इस शहर का नाम जैसलमेर हो गया। पूरा शहर पीले पत्थरों से निर्मित होने के कारण इसे गोल्डन सिटी या स्वर्ण नगरी भी कहा जाता है। बताया जाता है सुनहरी रेत पर अठखेलियां करती जैसलमेर की धरती कभी सागर की नीली लहरों के साथ मचलती थी। छह करोड़ साल पहले अरब सागर की उत्तरी सीमा यहां तक पहुंचती थी, जो आज केवल गुजरात को छूकर रह जाती है। तब से लेकर आज तक युग बदले हैं और धरती की तस्वीर भी। लहरें गुजर गई, पर रेत पर उनकी स्मृतियां यहां मौजूद है।

यहां का मुख्य आकर्षण है सोनार किला जो कि शहर के हर कोण से दिखाई देता है।रेत में आ गिरे किसी स्वर्ण मुकुट सा लगता है यह सोनार किला।

यह किला 80 फीट ऊंची त्रिकुटा पहाड़ी पर स्थित है। पीले बलुआ पत्थरों से बना यह किला सूरज की रोशनी में सोने की तरह चमकता है। इस कारण इसका नाम सोनार किला पड़ा। यह पीले सेन्ड स्टोन (बलुआ पत्थर) से बना है। चार विशाल दरवाजों से होकर किले के अन्दर प्रवेश किया जाता है जिन्हें पोल कहते है 30 फीट ऊंची दीवार वाले इस किले में 99 प्राचीरें और चार विशाल प्रवेश द्वार हैं। इन प्रवेश द्वारों के नाम गणेश पोल, सूरज पोल, अक्षय पोल और हवा पोल हैं। किले के अंदर अनेक सुंदर हवेलियां भी हैं। इनके नाम विलास महल, रंगमहल, बादल विलास, सर्वोत्तम विलास और जनाना महल हैं। महलों के अलावा यहां आठ जैन मंदिर और चार वैष्णव मंदिर हैं। मंदिर के निर्माण में कहीं भी सीमेंट, गारा या चूना इस्तेमाल नहीं किया गया है।

यूं तो किला बेहद उपेक्षित और जीर्ण-शीर्ण है, मगर बीते दिनों की खूबसूरती की गवाह हैं इसके भीतर के महल और इमारतें। पीले सेन्ड स्टोन पर बारीक नक्काशियां यहां की इमारतों की विशेषता है, पत्थरों में नाना प्रकार के बेल-बूटे, जालियां, कंगूरेदार खिडक़ियां-गवाक्ष। किले के अन्दर कुछ खूबसूरत जैन मंदिर भी हैं। ये मंदिर 12-15वीं शताब्दी के बीच निर्मित हैं। इन मंदिरों में उकेरी मूर्तियां पौराणिक गाथाएं कहती हैं। कुछ खण्डहर हैं जो अपनी बिखरती भव्यता के साथ आकर्षित करते हैं। काश समय रहते इनका जीर्णोध्दार हो गया होता तो कुछ और महल इस किले की शोभा बढाते। किले के अन्दर ही एक हिस्सा रिहायशी भी है, जहां कई परिवार रहते हैं। कुछ लोगों ने अपने पुराने पारम्परिक घरों को थोडे फ़ेर-बदल के साथ गेस्टहाउस में बदल लिया है। यहां रहकर पर्यटक किले के भव्य सौन्दर्य को करीब से जान सकता है।

किले के परकोटे से बाहर चारों ओर शहर बसा है, पतली-संकरी गलियों में, यही पतली-संकरी गलियां हमें तीन-चार बेहद सुंदर स्थापत्य कला में बेजोड, नक्काशियों से सुसज्जित हवेलियों तक ले जाती हैं।

जैसलमेर चाहे एक छोटा शहर सही लेकिन अपने आस-पास पर्यटकों की रूचि के कई सुंदर स्थानों को सहेजे है।

पटवों की हवेली : जैसलमेर के धनी व्यापारियों द्वारा बनाई गई हवेलियों की दीवारें, खिड़कियां, छज्जों में बारीक जालियों, बारीक नक्काशी और बेलबूटों का काम एक ही पत्थर पर बारीकी और खूबसूरती से किया गया है। यह हवेलियां करीब तीन सौ साल पुरानी हैं। इनमें सबसे प्राचीन, विशाल और भव्य है पटवों की हवेली।

1805 में बनी यह हवेली पांच हवेलियों का समूह है। सरकार द्वारा संरक्षित इस हवेली को देखने के लिए 15 रुपये का टिकट लगता है। इन हवेलियों के सामने रखी बेंच पर आपकी मुलाकात धन्ना राम से होगी, जिनका नाम लिम्का बुक आफ रिकॉ‌र्ड्स में साढ़े चार फुट मूंछों लंबी मूंछों के लिए दर्ज है। इन मूंछों को बढ़ाने में उन्हें 17 साल का समय लगा। वे अपने पिता स्वर्गीय करन राम भील के पद चिन्हों पर चल रहे हैं, जिनका नाम साढ़े छह फीट लंबी मूंछों के कारण गिनीज बुक ऑफ रिकॉ‌र्ड्स में दर्ज हुआ था। आप चाहें तो धन्ना राम की मूंछें पकड़कर फोटो भी खिंचा सकते हैं, लेकिन इसके लिए आपको बीस रुपये शुल्क अदा करना पड़ेगा।

गड़ीसर झील : जैसलमेर के दक्षिणी इलाके में बनी खूबसूरत झील कभी शहर का प्रवेश द्वार हुआ करती थी। झील का निर्माण गड़ी सिंह ने कराया था, इसलिए इसका नाम गड़ीसर झील पड़ गया। झील के तट पर 652 साल पुराना शंकर जी का मंदिर भी है। यहां लगे घंटे को बजाने पर 30 सेंकेंड तक ओम की ध्वनि आती है। 1965 से पहले यह जैसलमेर का जल स्त्रोत थी

बड़ा बाग : महरावल जैत सिंह ने इसका निर्माण 16वीं सदी में शुरू कराया था। यहां पर बगीचा, टैंक और बांध दर्शनीय स्थल है। इसके अलावा यहां पर कई भाटी शासकों द्वारा पूर्वजों की याद में स्मारक बनवाए थे। इन स्मारकों को छतरी भी कहते हैं। इनमें सबसे पुरानी छतरी महाराज जैत सिंह की छतरी है। शहर से करीब छह किमी दूर इस बाग को देखने के लिए आपको ऑटो रिक्शा या किराए पर गाड़ी लेनी पड़ेगी। कैसे जाएं : जैसलमेर का सबसे नजदीकी एयरपोर्ट जोधपुर है। दोनों शहरों के बीच की दूरी करीब 300 किमी है। यहां से बस या टैक्सी से जाया जा सकता है। दिल्ली से यहां आने के लिए सीधी ट्रेन भी है। जैसलमेर घूमने का उपयुक्त समय अक्टूबर से मार्च है। इस समय यहां का मौसम सुखद होता है। जनवरी-फरवरी में यहां मरु उत्सव आयोजित किया जाता है। तीन दिवसीय इस मेले का आयोजन राजस्थान पर्यटन विकास निगम द्वारा किया जाता है। क्या खरीदें : जैसलमेर से ऊंट की खाल से बने पर्स, बैग, बेल्ट और पत्थर से बने हस्तशिल्प को खरीदा जा सकता है। सैलानियों को यहां की मशहूर घोटुवां मिठाई बहुत पसंद आती है। इसे बूंदी के लड्डूओं को घोंटकर तैयार किया जाता है। यह कई दिन खराब नहीं होती।

भारत में कितने गांव हैं

भारत में पूरे गांव की संख्या 628,221 है अगर हम बात करें कि सबसे ज्यादा गांव भारत के किस राज्य में है तो गांव के मामले में सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश है । इस राज्य में एक लाख 107,753 गांव हैं । वहीं दूसरी तरफ भारत का छेत्रफल के आधार पर सबसे छोटा राज्य गोवा है जिसमें सिर्फ 411 गांव हैं ।

भारत की गांव की बात करे तो 628140 की संख्या है मगर सरकार के आंकड़े कुछ और बहुत कुछ बता देते है

जैसलमेर किले के बारे में ऐतिहासिक तथ्य

यह किला, जैसलमेर में स्थित है, जो भारत के राजस्थान प्रांत में आता है। जैसलमेर किला एक विश्व धरोहर स्थल है। इसका निर्माण रावल जैसल ने 1156 ई। में करवाया था, इसलिए किले का नाम जैसलमेर उनके नाम पर रखा गया।

राजस्थान के गौरव में खड़ी एक ऐतिहासिक धरोहर जैसलमेर किला भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में प्रसिद्ध है। विश्व विरासत स्थल की श्रृंखला में शामिल इस किले में राजस्थान का प्राचीन इतिहास समाहित है। आज हम आपको जैसलमेर के किले से जुड़े रोचक तथ्य बताने जा रहे हैं, जो आज से पहले आपने शायद ही पढ़े हों।

जैसलमेर किला थार रेगिस्तान के त्रिकुटा पर्वत पर स्थित है, और कई ऐतिहासिक युद्ध हुए हैं। किले में, एक विशाल पीले बलुआ पत्थर की दीवार है। दिन के समय, इस किले का किला हल्के सुनहरे रंग की तरह दिखता है। इस कारण से, इस किले को सोनार किला या स्वर्ण किले के रूप में भी जाना जाता है। यह किला शहर के मध्य में स्थित है और जैसलमेर की ऐतिहासिक धरोहरों के रूप में, लोग इस किले को देखने आते हैं।

2013 में, जैसलमेर किले को शामिल किया गया, कोलंबिया के नोम पेन्ह में आयोजित 37 वीं विश्व धरोहर समिति में यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल में। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह किला दुनिया के प्राचीन दुर्गों में पहले स्थान पर है, जो पूरी तरह से संरक्षित था।


इस किले में एक तहखाना बना है जो 15 फीट लंबा है।

जैसलमेर का किला 1156 CE में रावल जैसल ने बनवाया था। किले की एक और बड़ी घटना 1276 में घटी जब जाटों के राजा ने किले पर आक्रमण किया।
यह किला 30 फुट ऊंची दीवार से घिरा हुआ है। वर्तमान में, यह शहर की एक चौथाई आबादी के लिए एक आवासीय स्थान है। किले के परिसर में कई कुएँ हैं, जो यहाँ के निवासियों के लिए पानी के नियमित स्रोत हैं। किले में राजपूत और मुगल स्थापत्य शैली के आदर्श संलयन को दिखाया गया है।

राजस्थान के अन्य किलों की तरह, इस किले में भी कई दरवाजे हैं जैसे अखई पोल, एयर पोल, सूरज पोल और गणेश पोल।

अखाई पोल (सभी द्वारों में पहला द्वार) अपनी शानदार स्थापत्य शैली के लिए प्रसिद्ध है। यह प्रवेश द्वार वर्ष 1156 में बनाया गया था और इस प्रवेश द्वार का उपयोग शाही परिवारों और निजी आगंतुकों द्वारा किया जाता था।

यह किला थार के रेगिस्तानी क्षेत्र की त्रिकुरा नामक पहाड़ी पर बना है। यह किला पीले पत्थरों से बना है और दूर से एक दीप्तिमान रूप देता है।

जैसलमेर का सोनार दुर्ग पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र है।

रात में किले की आकर्षक छवि देखने के लिए आगंतुकों की भीड़ होती है।

यह किला 1500 फीट (460 मीटर) लंबा है और 750 फीट (230 मीटर) चौड़ा है और 250 फीट (76 मीटर) ऊंचे पहाड़ पर खड़ा है।
किले में चार द्वार हैं, व्यापारियों ने विशाल भवन भी बनाया है।


कुछ इमारतें एक दशक से अधिक पुरानी हैं। जैसलमेर शहर में पीले पत्थरों से बनी कई विशाल और सुंदर इमारत है। किले में एक शानदार जल निकासी प्रणाली भी है।

13 वीं शताब्दी में, अलाउद्दीन खिलजी ने इस किले पर हमला किया और 9 साल तक किले पर कब्जा किया।

दूसरा हमला मुगल सम्राट हुमायूं ने 1541 में इस किले पर हमला किया था। इसके बाद, मुगलों के साथ संबंधों को सुधारने के लिए, रावल ने 1570 में अपनी बेटी की शादी अकबर के साथ की। मुगलों ने 1762 तक किले पर कब्जा कर लिया। इसके बाद महाराजा मूलराज ने नियंत्रण कर लिया। किला। इसके बाद, राजा मूलराज और अंग्रेजों के बीच एक संधि हुई और उनका कब्जा किले पर रहा।

1820 में मूलराज की मृत्यु के बाद, शासन गज सिंह (मूलराज के पोते) के हाथों में आया।

स्वतंत्रता के बाद, और भारत का विभाजन, प्राचीन व्यापार प्रणाली पूरी तरह से बंद हो गया था। लेकिन 1965 और 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान, जैसलमेर किले ने अपनी महानता साबित की थी।

सात जैन मंदिर: इस किले पर सात जैन मंदिर बने हैं। माना जाता है कि इन मंदिरों का निर्माण 15 वीं से 16 वीं शताब्दी के मध्य में हुआ था। 2013 में, इस किले को यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत किला घोषित किया गया था।
स्रोत:-गूगल सर्च इंजन


जैसलमेर – Jaisalmer

जैसलमेर का भौगोलिक विवरण –

जैसलमेर जिले का कुल क्षेत्रफल – 38,401 वर्ग किलोमीटर

नगरीय क्षेत्रफल – 134.27 वर्ग किलोमीटर तथा ग्रामीण क्षेत्रफल – 38,266.73 वर्ग किलोमीटर है।

जैसलमेर जिले की मानचित्र स्थिति – 26°1′ से 28°2′ उत्तरी अक्षांश तथा 69°29′ से 72°20′ पूर्वी देशान्‍तर है।

जैसलमेर जिले में कुल वनक्षेत्र – 588.17 वर्ग किलोमीटर

राजस्थान के सबसे पश्चिम में कटरा गाँव सम तहसील, जैसलमेर जिला है।

जैसलमेर का आकार सप्तबहुभुजाकार है।

जैसलमेर की सीमा अन्तर्राष्ट्रीय सीमा, पाकिस्तान के साथ लगती है। यह राजस्‍थान के जिलों में में सबसे लम्‍बी 464 किलोमीटर है।

शाहगढ़ बल्ख—राजस्थान की अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर जैसलमेर के शाहगढ़ बल्ख गाँव में 40 मीटर तक तारबंदी नहीं है। यहाँ पर सुरक्षा हेतु BSF की सेना लगी हुई है।

यह राजस्थान का सबसे बड़ा जिला –38,401 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैला हुआ है।

लाठी सीरीज क्षेत्र जैसलमेर के पोकरण से मोहनगढ़ का क्षेत्र कहलाता है। इस क्षेत्र में सेवण घास पायी जाती है, जिसे स्थानीय भाषा में लीलोण कहते हैं, इसका वानस्पतिक नाम लसियुरिस सिडीकुस है। लाठी सीरीज 60 मीटर चौड़ी एक भूगर्भिक जल पट्टी है।

जैसलमेर के प्रमुख रन क्षेत्र—कनोड़, बरमसर, भाकरी, पोकरण है।

जैसलमेर जिलें में विधानसभा क्षेत्रों की संख्‍या 2 है –

1. जैसलमेर, 2. पोकरण

उपखण्‍डों की संख्‍या – 3
तहसीलों की संख्‍या – 3
उपतहसीलों की संख्‍या – 4
ग्राम पंचायतों की संख्‍या – 128
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार जैसलमेर जिले की जनसंख्‍या के आंकड़ें –

कुल जनसंख्या—6,69,919
पुरुष—3,61,708
स्त्री—3,08,211
दशकीय वृद्धि दर—31.8%
लिंगानुपात—852
जनसंख्या घनत्व—17(न्यूनतम)
साक्षरता दर—57.2%
पुरुष साक्षरता—72%
महिला साक्षरता—39.7%

जैसलमेर का ऐतिहासिक विवरण –

जैसलमेर की नींव राव जैसल ने 1155 ई. में इंसाल ऋषि की सलाह पर रखी।

राजस्थान एकीकरण के चतुर्थ चरण (वृहत राजस्थान—30 मार्च, 1949) में जैसलमेर को राजस्थान में शामिल किया।

06.10.1949 को जैसलमेर रियासत को पृथक जिले का नाम मिला, सन् 1953 में इसे जोधपुर जिले में शामिल कर उपखण्‍ड का दर्जा मिला, सन् 1954 में जैसलमेर को पुन: जिला बनाया गया।


जैसलमेर की प्रमुख नदियाँ एवं जल स्रोत –

काकनी/काकनेय/ मसूरदी नदी—यह नदी जैसलमेर से लगभग 27 किलोमीटर दूर दक्षिण में कोठारी/कोटरी गाँव से निकलती है। यह कुछ ही किलोमीटर बहने के बाद लुप्‍त हो जाती है। यह नदी आंतरिक प्रवाह की सबसे छोटी नदी है। लेकिन प्रदेश में अच्‍छी वर्षा होने पर यह काफी दूर तक बहती है तब यह नदी स्‍थानीय भाषा में मसूरदी नदी के नाम से जानी जाती है। यह काफी दूर तक पहले उत्‍तर की दिशा में फिर पश्चिम की तरफ बहते हुए बुझ/बुज झील में गिरती है। बुझ झील का निर्माण इसी नदी के द्वारा होता है। भारी वर्षा के दिनों में यह नदी अपने सामान्‍य पथ से हटकर निरन्‍तर उत्तरी दिशा में सीधे ही लगभग 20 किलोमीटर तक बहते हुए मीठा खाड़ी में गिर जाती है। इस प्रकार काकनी नदी तीन अवस्‍थाओं में बहती है, लेकिन यह सब जल आपूर्ति पर निर्भर रहता है।


जैसलमेर की अन्‍य नदियों में लाठी, चांघण, धऊआ, धोगड़ी आदि के नाम आते है।

अन्य जलाशय—कावोद झील—यह खारे पानी की झील है, इस झील का नमक आयोडीन की दृष्टि से सबसे अच्छा नमक है।

गढ़ीसर—1340 ई. में गड़सीसिंह ने करवाया ।

जैसलमेर की अन्‍य झीले—धारसी सागर, अमरसागर, बुझ झील आदि है।

राजस्‍थान राज्‍य में सर्वाधिक बंजर भूमि—जैसलमेर जिले में है।


जैसलमेर के वन्‍य जीव अभयारण्‍य—

राष्ट्रीय मरु उद्यान—राज्‍य सरकार ने 4 अगस्‍त, 1980 को वन्‍य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अन्‍तर्गत 3162 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र (1900 वर्ग किलोमीटर जैसलमेर तथा 1262 वर्ग किलोमीटर बाड़मेर में) को राष्‍ट्रीय मरू उद्यान घोषित किया। यह जैसलमेर व बाड़मेर में विस्‍तृत है। कहने को तो यह राष्‍ट्रीय मरू उद्यान है, परन्‍तु वास्‍तव में यह एक अभयारण्‍य ही है। राज्‍य सरकार ने इसे राष्‍ट्रीय मरू उद्यान घोषित करने की इच्‍छा 8 मई,1981 को भारतीय वन्‍य जीव संरक्षण अधिनियम के अन्‍तर्गत जारी एक अधिसूचना के माध्‍यम से जरूर प्रकट की है। यह राजस्थान का क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा वन्य जीव अभयारण है। इसका क्षेत्रफल—3162 वर्ग किमी. है। इस अभयारण्‍य में प्राकृतिक वनस्‍पति को सुरक्षित रखने हेतु करोड़ों वर्ष से पृथ्‍वी के गर्भ में दबे हुए जीवाविशेषों को संरक्षण प्रदान करने तथा उनके लिये उपर्युक्‍त वातावरण प्रदान करना ही मुख्‍य उद्देश्‍य है। राष्‍ट्रीय मरू उद्यान में ‘आकल वुड फासिल पार्क’ जैसलमेर से लगभग 15 किलोमीटर दूर बाड़मेर रोड के समीप स्थित है। इस क्षेत्र में 18 करोड़ वर्ष पुराने पेड़-पौधों के ‘काष्‍ठावशेष’ फैले हुए है। मरू उद्यान को राज्य पक्षी गोडावण की शरणस्थली कहा जाता है। गोडावन के अलावा मरू उद्यान में काले हिरण, चिंकारा, चौसिंघा, वन्‍य जीव पिजरा, मरू बिल्‍ली, लोमड़ी, गोह, खरगोश, ग्रे-पेट्रीज, सेण्‍ड ग्राउज, प्रवाही पक्षियों में हुबारा बस्‍टर्ड, स्‍पेनिश स्‍पेरा, कामन केन्‍स तथा सरीसृप में कोबरा, पीवणा व रसल्‍स वाइपर आदि विचरण करते है।

वुड फोसिल्स पार्क—यह आकल गाँव जैसलमेर में है, इस पार्क में लगभग 18 करोड़ वर्ष प्राचीन 25 फॉसिल्स विद्यमान है।

जैसलमेर के शाहगढ़ बल्ख क्षेत्र को केन्द्र सरकार ने देश का प्रथम चीता अभयारण घोषित किया है।


जैसलमेर के ऐतिहासिक एवं दर्शनीय स्‍थल —

जैसलमेर दुर्ग—इसके उपनाम सोनार का किला, त्रिकूटगढ़, राजस्थान का अण्डमान, रेगिस्तान का गुलाब, गलियों का दुर्ग, गोरहरा दुर्ग, जैसाणगढ़, स्वर्णगिरि, पश्चिमी सीमा का प्रहरी आदि है। इस दुर्ग की नींव महारावल जैसलदेव ने 12 जुलाई, 1155 ई. में रखी लेकिन अधिकतर निर्माण शालिवाहन द्वितीय ने करवाया। यह दुर्ग अंगड़ाई लिए हुए सिंह के समान प्रतीत होता है। इस दुर्ग के निर्माण में चूने का प्रयोग नहीं किया हुआ है। यह दुर्ग पीले पत्‍थरों से बना होने के कारण प्रात: व सांयकाल स्‍वर्णिम आभा लिए होता है, इसलिए इसे ‘सोनार किला’ भी कहते हैं। एक मात्र ऐसा दुर्ग जिसकी छत लकड़ी की बनी हुई है। इस दुर्ग के महलों के दरवाजों व छतों को सुरक्षित रखने के लिए गौमूत्र का लेप किया जाता है। अबुल फजल—’इस दुर्ग तक पहुँचने के लिए पत्थर की टाँगे चाहिए।’ इस दुर्ग में स्थित लक्ष्‍मीनारायण मंदिर को 1437 ई. में महारावल वैरसी ने बनवाया था।

इस दुर्ग के प्रवेश द्वार अक्षयपोल, सूरजपोल, गणेशपोल, हवापोल आदि है। इस दुर्ग में जैसलू कुआँ है, जिसका निर्माण किंवदिति के अनुसार श्रीकृष्‍ण ने अपने सुदर्शन चक्र से किया था। जैसलमेर दुर्ग, चित्तौड़गढ़ दुर्ग के बाद राज्‍य का दूसरा सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट है। इस दुर्ग में 99 बुर्ज है। जैसलमेर के भाटी शासकों को उत्तरी ‘भट्किवाड़ भाटी’ उपाधि से नवाजा गया है। इस दुर्ग पर सत्‍यजीत रे ने ‘सोनार किला’ फिल्‍म बनाई थी। जैसलमेर दुर्ग को उत्तरी सीमा का प्रहरी माना जाता है। इस दुर्ग के बारे में निम्‍न दोहा प्रचलित है-

गढ़ दिल्‍ली गढ़ आगरो, अधगढ़ बीकानेर।

भलो चिणायो भाटियों, सिरे तो जैसलमेर।।

भड़ किंवाड़ उत्तरार्ध रा, भाटी झालण भार।

वचन राखो ब्रिजराज रा, समहर बाँधो सार।।

जैसलमेर के लिए अन्‍य कथन –

घोड़ा कीजे काठ का, पग कीजे पाषाण।

बख्तर कीजे लोह का, जद पहूँचे जैसाण।।

यानि लकड़ी का घोड़ा लेकर, पत्थर के पाँव और लोहे के कवच द्वारा ही मरूभूमि जैसलमेर पहुँचा जा सकता है।

प्रस्तुत पंक्तियाँ जैसलमेर जिले के प्राचीनकाल के दुर्गम जीवन के बारे में इशारा कर रही है ।

जैसलमेर दुर्ग के ढ़ाई साके प्रसिद्ध हैं।

प्रथम साका—अलाउद्दीन खिलजी व मूलराज के मध्य युद्ध हुआ। मूलराज ने केसरिया व रानियों ने जौहर किया।
द्वितीय साका—1357 में फिरोजशाह तुगलक व रावल दूदा के मध्य।
तृतीय अर्द्ध साका—1550 में कांधार के अमीर अली व लूणकरण के मध्य। लूणकरण ने केसरिया तो किया परन्तु रानियों के जौहर नहीं किया। अत: यह अर्द्धसाका कहलाया।
तनोट माता/तनोटिया माता, तनोट (जैसलमेर)— उपनाम—भोजासरी/देगराय/सैनिकों की देवी/थार की वैष्णो देवी/रूमाली माता। इस माता की पूजा सीमा सुरक्षा बल के जवान करते है। राजस्थान का एक मात्र ऐसा मन्दिर जो सेना के अधीन है। इस माता के मन्दिर के सामने भारत की पाकिस्तान पर 1965 के युद्ध की विजय का विजय स्तम्भ लगा हुआ है।

स्वांगिया/सांगिया/सुग्गा माता—जैसलमेर के भाटी राजवंश की कुल देवी।

हिंग्लाज माता—गड़सीसर (जैसलमेर) इस माता की पूजा राजस्थान का क्षत्रिय व चारण समाज करता है। इस माता का मूल मंदिर ब्लूचिस्तान (पाकिस्तान) में है। यह माता चर्म रोग दूर करती है।

रामदेवरा—साम्प्रदायिक सद्भावना के लोक देवता, पीरों के पीर, रुणेचा रा धणी रामदेवजी का स्थल।

मुख्य बातें—रामदेवजी ने कामडि़य़ा पंथ चलाया, भैरव राक्षस का वध किया, रुणेचा/रामदेवरा बसाया। मुस्लिमों को पुन: हिन्दु बनाने के लिए शुद्धि/परावर्तन आन्दोलन चलाया। रामदेवजी का गीत लोकदेवताओं में सबसे लम्बा (48 मिनट) है। 5 रंगों की ध्वजा-नेजा, पुजारी-रिखिया, जागरण-जम्मा, कहलाता है।

मेला-भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी। रामदेवजी की फड़ ब्यावले भक्तों द्वारा बांची जाती है। कदम्ब वृक्ष के नीचे रामदेवजी का थान होता है।

एकमात्र लोकदेवता जो कवि थे (ग्रन्थ-24 वाणियां) तथा एकमात्र लोकदेवता जिन्होंने जीवित समाधि ली।

लोद्रवा के पार्श्‍वनाथ मन्दिर—लोद्रवा, यह प्राचीन युगल प्रेमी मूमल व मेहन्द्रा का प्रणय स्थल है।

पटुवों की हवेली—यह 5 मंजिला है। यह हवेली पत्थरों की जाली व कटाई के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

नथमल की हवेली—इसका निर्माण 1881 से 1885 के बीच लालू व हाथी नामक दो भाइयों ने करवाया।

सालिम सिंह की हवेली—यह 9 मंजिला है, इसे कमल महल व रूप महल के नाम से भी जाना जाता है, इसकी 8वीं व 9वीं मंजिल लकड़ी से बनी हुई हैं।

जैसलमेर की अन्य हवेलियाँ—सोढ़ों की हवेली, राव राजा बर्सलपुर की हवेली, दीवान आचार्य ईश्वरलाल की हवेली।

बादल विलास महल—यह पाँच मंजिला इमारत जैसलमेर दुर्ग में है। इस महल पर ब्रिटेन की वास्तुकला की छाप दिखाई पड़ती है।

लक्ष्मीनारायण का मन्दिर—1437 में महाराजा बैरीशाल ने करवाया। जैसलमेर के शासक लक्ष्मीनारायण जी को जैसलमेर का शासक मानते थे एवं स्वयं को उनका दीवान मानते थे।

जिनभद्र सूरी भण्डार—जैसलमेर दुर्ग में जैन पाण्डु लिपि (ताड़ के पतों पर) हस्तलिखित ग्रन्थों का सबसे बड़ा भण्डार है। जिनके लेखक जिनभद्र सूरी है।

जैसलमेर दुर्ग के बारे में कथन—”गढ़ दिल्ली, गढ़ आगरो अधगढ़ बीकानेर, भलो चिणायो भाटियों सिरें तो जैसलमेर।”

फिल्म निर्देशक सत्यजीत रे ने जैसलमेर दुर्ग पर सोनार किला नामक फिल्म बनाई।

जैसलमेर दुर्ग की आकृति—रेत के समुद्र में लंगर लिए हुए जहाज के समान है।


जैसलमेर जिले के अन्‍य महत्त्वपूर्ण तथ्‍य-

सागरमल गोपा—प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी गोपाजी का जन्म 3 नवम्बर 1900 ई. को जैसलमेर में हुआ। 4 अप्रैल, 1946 को अमानवीय व्यवहार (केरोसीन द्वारा जलाया गया) के कारण जेल में निधन। इनकी पुस्तकें—आजादी के दीवाने, जैसलमेर में गुण्डाराज।
जैसलमेर में गणगौर पर केवल गौर की पूजा की जाती है। ईसर की नहीं तथा यहाँ पर गणगौर की सवारी चैत्र शुक्ल तीज की जगह चतुर्थी को निकाली जाती है।
मरु महोत्सव—जैसलमेर में जनवरी-फरवरी में मनाया जाता है।
पोकरण पॉटरी, ऊनी कम्बल, रामदेव जी के घोड़े जैसलमेर के प्रसिद्ध है।
बड़ा बाग की छतरियाँ—भाटी वंश के शासकों की छतरियाँ।
जैसलमेर में ‘मूमल’ गीत सर्वाधिक लोकप्रिय है।
रम्मत लोकनाट्य—उद्गम-जैसलमेर।
भारत सरकार ने अपना पहला परमाणु परीक्षण (बुद्ध मुस्कराये, Smiling Buddha) 18 मई, 1974 को तथा दूसरा 11 व 13 मई, 1998 को पोकरण में किया।
जैसलमेर चित्रशैली के आकर्षण का केन्द्र—मूमल।
एशिया का सबसे ऊँचा टी.वी.टावर (300 मीटर)—रामगढ़।
केक्टस गार्डन—कुलधरा गाँव (जैसलमेर)।
राजस्थान का पहला सौर ऊर्जा संयंत्र—जैसलमेर।
भाटी शासकों की प्राचीन राजधानी-लोद्रवा।
राज्य का सम्पूर्ण वनस्पति रहित क्षेत्र—सम गाँव।
राज्य का प्रथम खनिज तेल कुआँ—तनोट (प्राकृतिक गैस के लिए भी प्रसिद्ध)।
चाँदन गाँव सम तहसील में नलकूप खोदा गया जहाँ कम गहराई में काफी मात्रा में मीठा जल प्राप्त हुआ। इसलिए इसे थार का घड़ा/चाँदन नलकूप कहते हैं।
इंदिरा गाँधी मुख्य नहर का अंतिम छोर मोहनगढ़ जैसलमेर तक है।
भैरूदान चालानी लिफ्ट नहर (इंदिरा गांधी नहर पर) जैसलमेर में प्रस्तावित है।
थारपारकर नस्ल की गौवंश का प्रजनन केन्द्र-चाँदन।
जैसलमेरी भेड़ का प्रजनन व अनुसंधान केन्द्र—पोकरण।
जैसलमेरी ऊँट—सवारी व तेज दौडऩे में प्रसिद्ध है।
नाचना (जैसलमेर) का ऊँट अपनी सुंदरता के कारण सम्पूर्ण भारत में प्रसिद्ध। भारतीय सेना के जवानों द्वारा प्रयुक्त।
राजस्थान की प्रथम गैस आधारित परियोजना-रामगढ़।
राज्य में सबसे बड़ा पवन ऊर्जा संयत्र—सोढ़ा बंधन।
पोकरण में विश्व का सबसे बड़ा भूमिगत पुस्तकालय है।
देश का पहला चारा बैंक-जैसलमेर।
विलेज रिर्सोट सेन्टर—राज्य का प्रथम व भारत का आठवाँ।
कुण्डा—यहाँ 500 वर्ष पुरानी सभ्यता के अवेशष।
सातलमेर पोकरण की प्राचीन राजधानी है, जहाँ भैरव राक्षस का वध हुआ।
पनराजजी का मेला पनराजसर जैसलमेर में लगता है।
डेजर्ट सफारी—कैप्टन संदीप यादव के नेतृत्व में सेना का अभियान सम के टीलों में।
पर्यटन को बढ़ावा हेतु जैसलमेर में सिविल एयरपोर्ट की स्थापना।

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