इतिहास

भारत का इतिहास : सिन्धु घाटी सभ्यता- 3300-1700 ई.पू : पार्ट 5

सिंधु घाटी सभ्यता
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विवरण सबसे पहले 1927 में ‘हड़प्पा’ नामक स्थल पर उत्खनन होने के कारण ‘सिन्धु सभ्यता’ का नाम ‘हड़प्पा सभ्यता’ पड़ा। पर कालान्तर में ‘पिग्गट’ ने हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ों को ‘एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वा राजधानियां‘ बतलाया।

खोज का श्रेय इस अज्ञात सभ्यता की खोज का श्रेय ‘रायबहादुर दयाराम साहनी’ को जाता है। उन्होंने ही पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक ‘सर जॉन मार्शल’ के निर्देशन में 1921 में इस स्थान की खुदाई करवायी।

काल 1920 ईसा पूर्व के दशक में सर्वप्रथम हड़प्पाई सभ्यता का ज्ञान हुआ।

दुर्ग नगर की पश्चिमी टीले पर सम्भवतः सुरक्षा हेतु एक ‘दुर्ग’ का निर्माण हुआ था जिसकी उत्तर से दक्षिण की ओर लम्बाई 460 गज एवं पूर्व से पश्चिम की ओर लम्बाई 215 गज थी।

कला सैन्धव सभ्यता की कला में मुहरों का अपना विशिष्ट स्थान था। अब तक क़रीब 2000 मुहरें प्राप्त की जा चुकी हैं। इसमें लगभग 1200 अकेले मोहनजोदाड़ो से प्राप्त हुई हैं।

धर्म हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो में असंख्य्य देवियों की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। विद्वानों का अनुमान है कि ये मूर्तियाँ मातृदेवी अथवा प्रकृति देवी की हैं। प्राचीन काल से ही मातृ या प्रकृति की पूजा भारतीय करते रहे हैं और आधुनिक काल में भी कर रहे हैं।

सिंधु सभ्यता स्थल हड़प्पा, मोहनजोदाड़ो, चन्हूदड़ों, लोथल, रोपड़, कालीबंगा, सूरकोटदा, आलमगीरपुर (मेरठ), बणावली (हरियाणा), धौलावीरा, अलीमुराद (सिंध प्रांत) आदि

अन्य जानकारी अब तक भारतीय उपमहाद्वीप में इस सभ्यता के लगभग 1000 स्थानों का पता चला है जिनमें कुछ ही परिपक्व अवस्था में प्राप्त हुए हैं।

सिंधु घाटी सभ्यता (अंग्रेज़ी:Indus Valley Civilization) विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता थी। यह हड़प्पा सभ्यता और सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नाम से भी जानी जाती है। आज से लगभग 80 वर्ष पूर्व पाकिस्तान के ‘पश्चिमी पंजाब प्रांत’ के ‘माण्टगोमरी ज़िले’ में स्थित ‘हरियाणा’ के निवासियों को शायद इस बात का किंचित्मात्र भी आभास नहीं था कि वे अपने आस-पास की ज़मीन में दबी जिन ईटों का प्रयोग इतने धड़ल्ले से अपने मकानों के निर्माण में कर रहे हैं, वह कोई साधारण ईटें नहीं, बल्कि लगभग 5,000 वर्ष पुरानी और पूरी तरह विकसित सभ्यता के अवशेष हैं। इसका आभास उन्हें तब हुआ जब 1856 ई. में ‘जॉन विलियम ब्रन्टम’ ने कराची से लाहौर तक रेलवे लाइन बिछवाने हेतु ईटों की आपूर्ति के इन खण्डहरों की खुदाई प्रारम्भ करवायी। खुदाई के दौरान ही इस सभ्यता के प्रथम अवशेष प्राप्त हुए, जिसे इस सभ्यता का नाम ‘हड़प्पा सभ्यता‘ का नाम दिया गया।

खोज
इस अज्ञात सभ्यता की खोज का श्रेय ‘रायबहादुर दयाराम साहनी’ को जाता है। उन्होंने ही पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक ‘सर जॉन मार्शल’ के निर्देशन में 1921 में इस स्थान की खुदाई करवायी। लगभग एक वर्ष बाद 1922 में ‘श्री राखल दास बनर्जी’ के नेतृत्व में पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के ‘लरकाना’ ज़िले के मोहनजोदाड़ो में स्थित एक बौद्ध स्तूप की खुदाई के समय एक और स्थान का पता चला। इस नवीनतम स्थान के प्रकाश में आने क उपरान्त यह मान लिया गया कि संभवतः यह सभ्यता सिंधु नदी की घाटी तक ही सीमित है, अतः इस सभ्यता का नाम ‘सिधु घाटी की सभ्यता‘ (Indus Valley Civilization) रखा गया। सबसे पहले 1927 में ‘हड़प्पा’ नामक स्थल पर उत्खनन होने के कारण ‘सिन्धु सभ्यता’ का नाम ‘हड़प्पा सभ्यता’ पड़ा। पर कालान्तर में ‘पिग्गट’ ने हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ों को ‘एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वा राजधानियां‘ बतलाया।

कुल 6 नगर
अब तक भारतीय उपमहाद्वीप में इस सभ्यता के लगभग 1000 स्थानों का पता चला है जिनमें कुछ ही परिपक्व अवस्था में प्राप्त हुए हैं। इन स्थानों के केवल 6 को ही नगर की संज्ञा दी जाती है। ये हैं –

– हड़प्पा
– मोहनजोदाड़ो
– चन्हूदड़ों
– लोथल
– कालीबंगा
– हिसार
– बणावली

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कुल 6 नगर

अब तक भारतीय उपमहाद्वीप में इस सभ्यता के लगभग 1000 स्थानों का पता चला है जिनमें कुछ ही परिपक्व अवस्था में प्राप्त हुए हैं। इन स्थानों के केवल 6 को ही नगर की संज्ञा दी जाती है। ये हैं –

– हड़प्पा
– मोहनजोदाड़ो
– चन्हूदड़ों
– लोथल
– कालीबंगा
– हिसार
– बणावली

हड़प्पा
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पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में स्थित ‘माण्टगोमरी ज़िले’ में रावी नदी के बायें तट पर यह पुरास्थल है।

हड़प्पा में ध्वंशावशेषों के विषय में सबसे पहले जानकारी 1826 ई. में ‘चार्ल्स मैन्सर्न’ ने दी।
1856 ई. में ‘ब्रण्टन बन्धुओं’ ने हड़प्पा के पुरातात्विक महत्त्व को स्पष्ट किया।

‘जॉन मार्शल’ के निर्देशन में 1921 ई. में ‘दयाराम’ के पुरातात्विक महत्त्व को स्पष्ट किया। जॉन मार्शल के निर्देशन में 1921 ई. में ‘दयाराम साहनी’ ने इस स्थल को स्पष्ट किया। जॉन मार्शल के निर्देशन में 1921 ई. में दयाराम साहनी ने इस स्थल का उत्खनन कार्य प्रारम्भ करवाया।

1946 में मार्टीमर ह्वीलर ने हड़प्पा के पश्चिमी दुर्ग टीले की सुरक्षा का प्राचीर का स्वरूप ज्ञात करने के लिए यहाँ उत्खनन करवाया। इसी उत्खनन के आधार पर ह्वीलर ने रक्षा प्राचीन एवं समाधि क्षेत्र के पारस्परिक सम्बन्धों को निर्धारित किया है। यह नगर क़रीब 5 कि.मी. के क्षेत्र में बसा हुआ है। हड़प्पा से प्राप्त दो टीलों में पूर्वी टीले को ‘नगर टीला’ तथा पश्चिमी टीले को ‘दुर्ग टीला’ के नाम से सम्बोधित किया गया। हड़प्पा का दुर्ग क्षेत्र सुरक्षा- प्राचीर से घिरा हुआ था। दुर्ग का आकार समलम्ब चतुर्भुज की तरह था। दुर्ग का उत्तर से दक्षिण से लम्बाई 420 मी. तथा पूर्व से पश्चिम चौड़ाई 196 मी. है। उत्खननकर्ताओं ने दुर्ग के टीले को माउण्ट ‘AB’ नाम दिया है। दुर्ग का मुख्य प्रवेश द्वार उत्तर-दिशा में तथा दूसरा प्रवेश द्वार दक्षिण दिशा में था। रक्षा-प्राचीर लगभग 12 मीटर ऊंची थी जिसमें स्थान-स्थान पर तोरण अथवा बुर्ज बने हुए थे। हड़प्पा के दुर्ग के बाहर उत्तर दिशा में स्थित लगभग 6 मीटर ऊंचे टीले को ‘एफ‘ नाम दिया है गया है जिस पर अन्नागार, अनाज कूटने की वृत्ताकार चबूतरे और श्रमिक आवास के साक्ष्य मिले हैं। पडरी हड़प्पाई नगर, हड़प्पा पूर्व व विकसित हड़प्पा काल के दो सांस्कृतिक चरणों को स्पष्ट करता है।

अन्नागार का अवशेष
यहाँ पर 6:6 की दो पंक्तियों में निर्मित कुल बारह कक्षों वाले एक अन्नागार का अवशेष प्राप्त हुआ हैं, जिनमें प्रत्येक का आकार 50×20 मी. का है, जिनका कुल क्षेत्रफल 2,745 वर्ग मीटर से अधिक है। हड़प्पा से प्रान्त अन्नागार नगरमढ़ी के बाहर रावी नदी के निकट स्थित थे। हड़प्पा के ‘एफ‘ टीले में पकी हुई ईटों से निर्मित 18 वृत्ताकार चबूतरे मिले हैं। इन चबूतरों में ईटों को खड़े रूप में जोड़ा गया है। प्रत्येक चबूतरे का व्यास 3.20 मी. है। हर चबूतरे में सम्भवतः ओखली लगाने के लिए छेद था। इन चबूतरों के छेदों में राख, जले हुए गेहूँ तथा जौं के दाने एवं भूसा के तिनके मिले है। ‘मार्टीमर ह्रीलर’ का अनुमान है कि इन चबूतरों का उपयोग अनाज पीसने के लिए किया जाता रहा होगा। श्रमिक आवास के रूप में विकसित 15 मकानों की दो पंक्तियां मिली हैं जिनमें उत्तरी पंक्ति में सात एवं दक्षिणी पंक्ति में 8 मकानों के अवशेष प्राप्त हुए, प्रत्येक मकान का आकार लगभग 17×7.5 मी. का है। प्रत्येक गृह में कमरे तथा आंगन होते थे। इनमें मोहनजोदाड़ो के ग्रहों की भांति कुएं नहीं मिले हैं। श्रमिक आवास के नज़दीक ही क़रीब 14 भट्टों और धातु बनाने की एक मूषा (Crucible) के अवशेष मिले हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ से प्राप्त कुछ महत्त्वपूर्ण अवशेष- एक बर्तन पर बना मछुआरे का चित्र, शंख का बना बैल, पीतल का बना इक्का, ईटों के वृत्ताकार चबूतरे जिनका उपयोग संभवतः फ़सल को दाबने में किया जाता था, साथ ही गेहूँ तथा जौ के दानों के अवशेष भी मिले हैं।


सिंधु घाटी सभ्यता में स्थित एक कुआँ और स्नान घर

प्राप्त क़ब्रिस्तान
हड़प्पा के सामान्य आवास क्षेत्र के दक्षिण में एक ऐसा क़ब्रिस्तान स्थित है जिसे ‘समाधि आर-37‘ नाम दिया गया है। यहाँ पर प्रारम्भ में ‘माधोस्वरूप वत्स’ ने उत्खनन कराया था, बाद में 1946 में ह्वीलर ने भी यहाँ पर उत्खनन कराया था। यहाँ पर खुदाई से कुल 57 शवाधान पाए गए हैं। शव प्रायः उत्तर-दक्षिण दिशा में दफ़नाए जाते थे जिनमें सिर उत्तर की ओर होता था। एक क़ब्र में लकड़ी के ताबूत में लाश को रखकर यहाँ दफनाया गया था। 12 शवाधानों से ‘कांस्य दर्पण’ भी पाए गए हैं। एक सुरमा लगाने की सलाई, एक से सीपी की चम्मच एवं कुछ अन्यय से पत्थर के फलक (ब्लेड) पाए गए हैं। हड़प्पा में सन् 1934 में एक अन्य समाधि मिली थी जिसे समाधि ‘एच’ नाम दिया गया था। इसका सम्बंध सिन्धु सभ्यता के बाद के काल से था।

महत्त्वपूर्ण तथ्य
सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में पकी हुई मिट्टी के दीपक प्राप्त हुए हैं और 3500 ईसा वर्ष पूर्व की मोहनजोदड़ो सभ्यता की खुदाई में प्राप्त भवनों में दीपकों को रखने हेतु ताख बनाए गए थे व मुख्य द्वार को प्रकाशित करने हेतु आलों की शृंखला थी।
मोहनजोदड़ो सभ्यता के प्राप्त अवशेषों में मिट्टी की एक मूर्ति के अनुसार उस समय भी दीपावली मनाई जाती थी। उस मूर्ति में मातृ-देवी के दोनों ओर दीप जलते दिखाई देते हैं। इससे यह सिद्ध स्वत: ही हो जाता है कि यह सभ्यता हिन्दू सभ्यता थी।
हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से कपड़ों के टुकड़े के अवशेष, चांदी के एक फूलदान के ढक्कन तथा कुछ अन्य तांबें की वस्तुएं मिले हैं।
यहां के लोग शतरंज का खेल भी जानते थे और वे लोहे का उपयोग करते थे। इसका मतलब यह कि वे लोहे के बारे में भी जानते थे।
यहां से प्राप्त मुहरों को सर्वोत्तम कलाकृतियों का दर्जा प्राप्त है। हड़प्पा नगर के उत्खनन से तांबे की मुहरें प्राप्त हुई हैं। इस क्षेत्र की भाषा की लिपि चित्रात्मक थी। मोहनजोदड़ो से प्राप्त पशुपति की मुहर पर हाथी, गैंडा, बाघ और बैल अंकित हैं।
हड़प्पा के मिट्टी के बर्तन पर सामान्यतः लाल रंग का उपयोग हुआ है।
मोहनजोदड़ों से प्राप्त विशाल स्नानागार में जल के रिसाव को रोकने के लिए ईंटों के ऊपर जिप्सम के गारे के ऊपर चारकोल की परत चढ़ाई गई थी, जिससे पता चलता है कि वे चारकोल के संबंध में भी जानते थे।

मोहनजोदाड़ो

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विवरण मुअन जो दड़ो जिसका अर्थ ‘मुर्दों का टीला है’ 2600 ईसा पूर्व की एक सुव्यवस्थित नगरीय सभ्यता थी।
राज्य सिन्ध प्रान्त, पाकिस्तान
स्थापना मोहनजोदाड़ो के टीलों का 1922 ई. में खोजने का श्रेय ‘राखालदास बनर्जी’ को प्राप्त हुआ।
संबंधित लेख सिन्धु नदी, हड़प्पा
अवशेष मोहनजोदाड़ो से प्राप्त अवशेषों में कुम्भकारों के 6 ‘भट्टों के अवशेष’, ‘सूती कपड़ा’, ‘हाथी का कपाल खण्ड’, गले हुए ‘तांबें’ के ढेर, ‘सीपी की बनी हुई पटरी’ एवं ‘कांसे की नृत्यरत नारी’ की मूर्ति के अवशेष मिले हैं।

स्मारक इस सभ्यता का सर्वाधिक उल्लेखनीय स्मारक बृहत्स्नानागार है। इसका विस्तार पूर्व से पश्चिम की ओर 32.9 मीटर तथा उत्तर से दक्षिण की ओर 54.86 मीटर है। इसके मध्य में स्थित स्नानकुण्ड 11.89 मीटर लम्बा, 7.01 मीटर चौड़ा एवं 2.44 मीटर गहरा है।

मुअन जो दड़ो / मोहनजोदाड़ो जिसका अर्थ ‘मुर्दों का टीला है’ 2600 ईसा पूर्व की एक सुव्यवस्थित नगरीय सभ्यता थी। हड़प्पा, मेहरगढ़ और लोथल की ही शृंखला में मोहनजोदाड़ो में भी पुरातत्त्व उत्खनन किया गया। यहाँ मिस्र और मेसोपोटामिया जैसी ही प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिले है।

इतिहास
इस सभ्यता के ध्वंसावशेष पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त के ‘लरकाना ज़िले’ में सिंधु नदी के दाहिने किनारे पर प्राप्त हुए हैं। यह नगर क़रीब 5 किमी के क्षेत्र में फैला हुआ है। मोहनजोदाड़ो के टीलों का 1922 ई. में खोजने का श्रेय ‘राखालदास बनर्जी’ को प्राप्त हुआ। यहाँ पूर्व और पश्चिम (नगर के) दिशा में प्राप्त दो टीलों के अतिरिक्त सार्वजनिक स्थलों में एक ‘विशाल स्नागार’ एवं महत्त्वपूर्ण भवनों में एक विशाल ‘अन्नागार’ (जिसका आकार 150×75 मी. है) के अवशेष मिले हैं, सम्भवतः यह ‘अन्नागार’ मोहनजोदाड़ो के बृहद भवनों में से एक है। हड़प्पा सभ्यता के बने हुए विभिन्न आकार-प्रकार के 27 प्रकोष्ठ मिले हैं। इनके अतिरिक्त सभी भवन एवं पुरोहित आवास के ध्वंसावशेष भी सार्वजनिक स्थलों की श्रेणी में आते हैं। पुराहित आवास वृहत्स्नानागार के उत्तर-पूर्व में स्थित था।


दुर्ग टीला
मोहनजोदाड़ो के पश्चिमी भाग में स्थित दुर्ग टीले को ‘स्तूप टीला’ भी कहा जाता है। क्योंकि यहाँ पर कुषाण शासकों ने एक स्तूप का निर्माण करवाया था। मोहनजोदाड़ो से प्राप्त अन्य अवशेषों में, कुम्भकारों के 6 ‘भट्टों के अवशेष’, ‘सूती कपड़ा’, ‘हाथी का कपाल खण्ड’, गले हुए ‘तांबें’ के ढेर, ‘सीपी की बनी हुई पटरी’ एवं ‘कांसे की नृत्यरत नारी’ की मूर्ति के अवशेष मिले हैं। ‘राना थुण्डई’ के निम्न स्तरीय धरातल की खुदाई से ‘घोड़े के दांत’ के अवशेष मिले हैं जो संभवतः सभ्यता एवं संस्कृति से अनेक शताब्दी पूर्व के प्रतीत होते हैं। मोहनजोदाड़ो नगर के ‘एच आर’ क्षेत्र से जो मानव प्रस्तर मूर्तियां मिले हैं, उसमें से –


बौद्ध स्तूप, मोहनजोदाड़ो
दाढ़ी युक्त सिर विशेष उल्लेखनीय हैं।
मोहनजोदाड़ो के अन्तिम चरण से नगर क्षेत्र के अन्दर मकानों तथा सार्वजनिक मार्गो पर 42 कंकाल अस्त-व्यस्त दशा में पड़े हुए मिले हैं।
इसके अतिरिक्त मोहनजोदाड़ो से लगभग 1398 मुहरें (मुद्राएँ) प्राप्त हुई हैं जो कुल लेखन सामग्री का 56.67 प्रतिशत अंश है।
पत्थर के बने मूर्तियों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शैलखड़ी से बना 19 सेमी. लम्बा ‘पुरोहित’ का धड़ है।
चूना पत्थर का बना एक पुरुष का सिर (14 सेमी.),
शैलखड़ी से बनी एक मूर्ति विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
इसके अतिरिक्त अन्य अवशेषो में- सूती व ऊनी कपड़े का साक्ष्य, ‘प्रोटो-आस्ट्रोलायड’ या ‘काकेशियन’ जाति के तीन सिर मिले हैं। कुबड़वाले बैल की आकृति युक्त मुहरे, बर्तन पकाने के छः भट्टे, एक बर्तन पर नाव का बना चित्र था, जालीदार अलंकरण युक्त मिट्टी का बर्त, गीली मिट्टी पर कपड़े का साक्ष्य, पशुपति शिव की मूर्ति, ध्यान की आकृति वाली मुद्रा उल्लेखनीय हैं।
मोहनजोदाड़ो की एक मुद्रा पर एक आकृति है जिसमें आधा भाग ‘मानव’ का है आधा भाग ‘बाघ’ का है। एक सिलबट्टा तथा मिट्टी का तराजू भी मिला है।
मोहनजोदाड़ो से प्राप्त पशुपति की मुहर पर बैल का चित्र अंकित नहीं है।
मोहनजोदाड़ो से अभी तक समाधि क्षेत्र (अगर कोई था) के विषय में जानकारी नहीं है।
मोहनजोदाड़ो के नगर के अन्दर शव विसर्जन के दो प्रकार के साक्ष्य मिले हैं-
आंशिक शवाधान और
पूर्ण समाधीकरण (दफ़नाना)।

बृहत्स्नानागार

इस सभ्यता का सर्वाधिक उल्लेखनीय स्मारक बृहत्स्नानागार है। इसका विस्तार पूर्व से पश्चिम की ओर 32.9 मीटर तथा उत्तर से दक्षिण की ओर 54.86 मीटर है। इसके मध्य में स्थित स्नानकुण्ड 11.89 मीटर लम्बा, 7.01 मीटर चौड़ा एवं 2.44 मीटर गहरा है। इस जलकुंड के अन्दर प्रवेश करने के लिए दक्षिणी और उत्तरी सिरों पर 2.43 मीटर चौड़ी सीढ़ियां बनाई गई थी। फर्श पक्की ईटों का बना हुआ था। स्नानागार के फर्श की ढाल दक्षिण से पश्चिम की ओर है। कुण्ड के चारों ओर बरामदे एवं इनके पीछे अनेक छोटे-छोटे कमरे निर्मित थे। कमरे संभवतः दुमंजिले थे, क्योंकि ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां भी मिली हैं। ‘मैके’ महोदय का विचार था कि इन कमरों में पुरोहित रहते थे। कुण्ड के पूर्व में स्थित एक कमरे से ईटों की दोहरी पंक्ति से बने एक कूप का उल्लेख मिला है जो सम्भवतः स्नानागार हेतु जल की आपूर्ति करता था। ‘मैके’ ने इस ‘बृहतस्नानागार का निर्माण धार्मिक अवसरों पर जनता के स्नान हेतु किया गया’ बताया। ‘मार्शल’ ने इस निर्माण को तत्कालीन विश्व का एक ‘आश्चर्यजनक निर्माण’ बताया।

अन्नागार
स्नानागार के पश्चिम में स्थित अन्नागार सम्भवतः मोहनजोदड़ों की सबसे बड़ी इमारत थी। यह सम्पूर्ण हड़प्पा संस्कृति माला में निर्मित पकी ईटों की विशालतम संरचना है। अन्नागार 45.72 मीटर लम्बा एवं 22.86 मीटर चौड़ा है। इसमें हवा के संचरण की भी व्यवस्था थी। इसका मुख्य प्रवेश द्वार नदी की तरफ था, जिससे अनाज को लाकर रखने में सुविधा होती होगी। ‘ह्वीलर’ ने इसे अन्नागार की संज्ञा दी। कुछ इतिहासकारों ने इसे ‘राजकीय भण्डार’ कहा।


सभा भवन

प्रधान अनुष्ठानकर्ता मोहनजोदाड़ो 2000 ई.पू.
दुर्ग के दक्षिण में 27.43 मीटर वर्गाकार का एक विशाल सभा भवन के ध्वंसावशेष मिले है जिसकी छतें 20 स्तम्भों पर रूकी हैं।
सम्भवतः धार्मिक सभाओं हेतु इसका उपयोग किया जाता था।
‘मार्शल’ ने इसकी तुलना ‘बौद्ध गुफा मंदिर’ से की।
‘मैके’ ने इसका उपयोग ‘बाज़ार’ के लिए बतालाया ।
भारतीय इतिहासकार ‘दीक्षित’ ने इसका प्रयोग धर्म चर्चा के लिए बतलाया।
स्नानागार के उत्तर-पूर्व में से 70.01×23.77 मीटर आकार एक विशाल भवन का अवशेष मिला है जिसमें 10 मीटर वर्गाकार का एक आंगन एवं अनेक कमरे निर्मित हैं।
यह भवन सम्भवतः ‘पुरोहित आवास’ एवं अन्य महत्त्वपूर्ण अधिकारियों का निवास स्थान था।
‘मैके’ ने इसे ‘पुरोहित’ जैसे विशिष्ट लोगों के निवास हेतु निर्मित बताया है।

बन्दरगाह अथवा गोदी बाड़ा (Dock Yard)
बन्दरगाह लोथल की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में से है। इस बन्दरगाह पर मिस्र तथा मेसोपोटामिया से जहाज़ आते जाते थे। इसका औसत आकार 214×36 मीटर एवं गहराई 3.3 मीटर है। इसके उत्तर में 12 मीटर चौड़ा एक प्रवेश द्वार निर्मित था। जिससे होकर जहाज़ आते-जाते थे। अतिरिक्त पानी के निकास की भी व्यवस्था इस बंदरगाह में थी।

चन्हूदड़ों
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मोहनजोदाड़ो के दक्षिण में स्थित चन्हूदड़ों नामक स्थान पर मुहर एवं गुड़ियों के निर्माण के साथ-साथ हड्डियों से भी अनेक वस्तुओं का निर्माण होता था। इस नगर की खोज सर्वप्रथम 1931 में ‘एन.गोपाल मजूमदार’ ने किया तथा 1943 ई. में ‘मैके’ द्वारा यहाँ उत्खनन करवाया गया। सबसे निचले स्तर से सैंधव संस्कृति के साक्ष्य मिलते हैं। यहाँ पर गुरिया निर्माण हेतु एक कारखाने का अवशेष मिला है। यहाँ पर सैन्धवकालीन संस्कृति के अतिरिक्त ‘प्राक् हड़प्पा संस्कृति’, ‘झूकर संस्कृति’ एवं ‘झांगर संस्कृति’ के भी अवशेष मिले हैं।

चन्हूदड़ों से किलेबन्दी के साक्ष्य नहीं मिले है। यहाँ से प्राप्त अन्य अवशेषों में अलंकृत हाथी एवं कुत्ते द्वारा बिल्ली का पीछा करते हुए पदचिह्न प्राप्त हुए हैं। सौन्दर्य प्रसाधनों में प्रयुक्त लिपिस्टिक के अवशेष भी यहाँ से मिले हैं। तांबे और कांसे के औज़ार और सांचों के भण्डार मिले हैं जिससे यह स्पष्ट होता कि मनके बनाने, हड्डियों की वस्तुएं, मुद्राएं बनाने आदि की दस्तकारियाँ यहाँ प्रचलित थी। वस्तुए निर्मित व अर्द्धनिर्मित दोनों रूप में पाई गईं जिससे यह आभास होता था कि यहाँ पर मुख्यतः दस्तकार और कारीगर लोग रहते थे।

वस्तुंए जिस प्रकार चारों और फैली पड़ी थी, उससे यहाँ के निवासियों के मकान छोड़कर सहसा भागने के साक्ष्य मिलते हैं। इसके अतिरिक्त चन्हूदड़ों से जला हुआ एक कपाल मिला है। चार पहियों वाली गाड़ी भी मिली है। चन्हूदड़ों की एक मिट्टी की मुद्रा पर तीन घड़ियालों तथा दो मछलियों का अंकन मिला है। यहाँ से एक वर्गाकार मुद्रा की छाप पर दो नग्न नारियो, जो हाथ में एक-एक ध्वज पकड़े है तथा ध्वजों के बीच से पीपल की पंक्तियां निकल रही हैं। यहाँ से मिली एक ईंट पर कुत्ते और बिल्ली के पंजों के निशान मिले हैं। साथ ही मिट्टी के मोर की एक आकृति भी मिली है।

चन्हूदड़ों एक मात्र पुरास्थल है जहां से वक्रकार ईटें मिली हैं।
चन्हूदड़ों में किसी दुर्ग का अस्तित्व नहीं मिला है।


लोथल
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यह गुजरात के अहमदाबाद ज़िले में ‘भोगावा नदी’ के किनारे ‘सरगवाला’ नामक ग्राम के समीप स्थित है।
खुदाई 1954-55 ई. में ‘रंगनाथ राव’ के नेतृत्व में की गई।
इस स्थल से समकालीन सभ्यता के पांच स्तर पाए गए हैं।
यहाँ पर दो भिन्न-भिन्न टीले नहीं मिले हैं, बल्कि पूरी बस्ती एक ही दीवार से घिरी थी। यह छः खण्डों में विभक्त था।
नगर दुर्ग
लोथल का ऊपरी नगर था नगर दुर्ग विषय चतुर्भुजाकार था जो पूर्व से पश्चिम 117 मी. और उत्तर से दक्षिण की ओर 136 मी. तक फैला हुआ था।

बाज़ार और औद्योगिक क्षेत्र
लोथल नगर के उत्तर में एक बाज़ार और दक्षिण में एक औद्योगिक क्षेत्र था। मनके बनाने वालों, तांबे तथा सोने का काम करने वाले शिल्पियों की उद्योगशालाएं भी प्रकाश में आई हैं। यहाँ से एक घर के सोने के दाने, सेलखड़ी की चार मुहरें, सींप एवं तांबे की बनी चूड़ियों और बहुत ढंग से रंगा हुआ एक मिट्टी का जार मिला है। लोथल से शंख के कार्य करने वाले दस्तकारों और ताम्रकर्मियों के कारखाने भी मिले हैं।

लोथल नगर में जल पुनर्शोधित कर काम में लाया जाता था एक बूंद जल व्यर्थ नहीं जाता था
नगर दुर्ग के पश्चिम की ओर विभिन्न आकार के 11 कमरें बने थे, जिनका प्रयोग मनके या दाना बनाने वाले फैक्ट्री के रूप में किया जाता था। लोथल नगर क्षेत्र के बाहरी उत्तरी-पश्चिमी किनारे पर समाधि क्षेत्र का, जहां से बीस समाधियां मिली हैं। यहाँ की सर्वाधिक प्रसिद्व उपलब्धि हड़प्पाकालीन बन्दरगाह के अतिरिक्त विशिष्ट मृदभांड, उपकरण, मुहरें, बांट तथा माप एवं पाषाण उपकरण है। यहाँ तीन युग्मित समाधि के भी उदाहरण मिले हैं। स्त्री-पुरुष शवाधान के साक्ष्य भी लोथल से ही मिले है। लोथल की अधिकांश क़ब्रों में कंकाल के सिर उत्तर की ओर और पैर दक्षिण की ओर था। केवल अपवाद स्वरूप एक कंकाल का दिशा पूर्व-पश्चिम की ओर मिला है।

बन्दरगाह अथवा गोदी बाड़ा(Dock Yard)
बन्दरगाह लोथल की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में से है। इस बन्दरगाह पर मिस्र तथा मेसोपोटामिया से जहाज़ आते जाते थे। इसका औसत आकार 214×36 मीटर एवं गहराई 3.3 मीटर है।
इसके उत्तर में 12 मीटर चौड़ा एक प्रवेश द्वार निर्मित था। जिससे होकर जहाज़ आते-जाते थे और दक्षिण दीवार में अतिरिक्त जल के लिए निकास द्वार था।

लोथल के पुरातत्त्व स्थल
लोथल में गढ़ी और नगर दोनों एक ही रक्षा प्राचीर से घिरे हैं।
अन्य अवशेषों में धान (चावल), फ़ारस की मुहरों एवं घोड़ों की लघु मृण्मूर्तियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
इसके अतिरिक्त अन्य अवशेषों में लोथल से प्राप्त एक मृदभांड पर एक विशेष चित्र उकेरा गया है जिस पर एक कौआ तथा एक लोमड़ी उत्कीर्ण है। इससे इसका साम्य पंचतंत्र की कथा चालाक लोमड़ी से किया गया है।
यहाँ से उत्तर अवस्था की एक अग्निवेदी मिली है। नाव के आकार की दो मुहरें तथा लकड़ी का अन्नागार मिला है। अन्न पीसने की चक्की, हाथी दांत तथा पीस का पैमाना मिला है। यहाँ से एक छोटा सा दिशा मापक यंत्र भी मिला है। तांबे का पक्षी, बैल, खरगोश व कुत्ते की आकृतियां मिली है, जिसमें तांबे का कुत्ता उल्लेखनीय है।
यहाँ बटन के आकार की एक मुद्रा मिली है। लोथल से ‘मोसोपोटामिया’ मूल की तीन बेलनाकार मुहरे मिली है। आटा पीसने के दो पाट मिले है जो पूरे सिन्धु का एक मात्र उदाहरण है।
उत्खननों से लोथल की जो नगर-योजना और अन्य भौतिक वस्तुए प्रकाश में आई है उनसे लोथल एक लघु हड़प्पा या मोहनजोदाड़ो नगर प्रतीत होता है। सम्भवतः समुद्र के तट पर स्थित सिंधु-सभ्यता का यह स्थल पश्चिम एशिया के साथ व्यापार के दृष्टिकोण से सर्वात्तम स्थल था।


कालीबंगा
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विवरण कालीबंगा एक ऐतिहासिक स्थल है, जहाँ पर प्राक् हड़प्पा एवं हड़प्पाकालीन संस्कृति के अवशेष मिले हैं।
राज्य राजस्थान
ज़िला हनुमानगढ़
भौगोलिक स्थिति उत्तर- 29°28′, पूर्व- 74°08
मार्ग स्थिति कालीबंगा हनुमानगढ़ जंक्शन से लगभग 32 किमी की दूरी पर स्थित है।
प्रसिद्धि कालीबंगा प्राचीन समय में चूड़ियों के लिए प्रसिद्ध था।
कब जाएँ अक्तूबर से फ़रवरी
कैसे पहुँचें हवाई जहाज़, रेल, बस आदि
हवाई अड्डा भटिंडा हवाई अड्डा और बीकानेर हवाई अड्डा
रेलवे स्टेशन हनुमानगढ़ जंक्शन
एस.टी.डी. कोड 1552
Map-icon.gif गूगल मानचित्र
भाषा हिंदी, राजस्थानी, अंग्रेजी

अन्य जानकारी कालीबंगा की खुदाई 1953 में ‘बी.बी. लाल’ एवं ‘बी. के. थापड़’ द्वारा करायी गयी।

कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ़ ज़िले में घग्घर नदी के बाएं तट पर स्थित है। खुदाई 1953 में ‘बी.बी. लाल’ एवं ‘बी. के. थापड़’ द्वारा करायी गयी। यहाँ पर प्राक् हड़प्पा एवं हड़प्पाकालीन संस्कृति के अवशेष मिले हैं। यह प्राचीन समय में चूडियों के लिए प्रसिद्ध था। ये चूडियाँ पत्‍थरों की बनी होती थी।

सिन्धु-पूर्व सभ्यता

हड़प्पा एवं मोहनजोदाड़ो की भांति यहाँ पर सुरक्षा दीवार से घिरे दो टीले पाए गए हैं। कुछ विद्धानों का मानना है कि यह सैंधव सभ्यता की तीसरी राजधानी रही होगी। पूर्वी टीले की सभ्यता प्राक्-हड़प्पाकालीन थी। कालीबंगा में सिन्धु-पूर्व सभ्यता की यह बस्ती कच्ची ईंटों की किलेबन्दी से घिरी थी। किलेबन्दी के उत्तरी भाग में प्रवेश मार्ग था। जिससे सरस्वती नदी तक पहुँच सकते थे। मिट्टी के खिलौनों, पहियों तथा मवेशियों की हड्डियाँ के अंवेषण से बैलगाड़ी के अस्तित्व का अप्रत्यक्ष साक्ष्य प्राप्त होता है।

साक्ष्य
कालीबंगा के दुर्ग टीले के दक्षिण भाग में मिट्टी और कच्चे ईटों के बने हुए पाँच चबूतरे मिले हैं, जिसके शिखर पर हवन कुण्डों के होने के साक्ष्य मिले हैं।

दुर्ग
अन्य हड़प्पा कालीन नगरों की भांति कालीबंगा दो भागों नगर दुर्ग (या गढ़ी) और नीचे दुर्ग में विभाजित था। नगर दुर्ग समनान्तर चतुर्भुजाकार था। यहाँ पर भवनों के अवशेष से स्पष्ट होता है कि यहाँ भवन कच्ची ईटों के बने थे।

खेती
कालीबंगा में ‘प्राक् सैंधव संस्कृति’ की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि एक जुते हुए खेत का साक्ष्य है जिसके कुंडों के बीच का फासला पूर्व में पश्चिम की ओर 30 से.मी. है और उत्तर से दक्षिण 1.10 मीटर है। कम दूरी के खांचों में चना एवं अधिक दूरी के खाचों में सरसों बोई जाती थी।

यहाँ पर लघु पाषाण उपकरण, मणिक्य एवं मिट्टी के मनके, शंख, कांच एवं मिट्टी की चूड़ियां, खिलौना गाड़ी के पहिए, सांड की खण्डित मृण्मूर्ति, सिलबट्टे आदि पुरावशेष मिले हैं। यहाँ से प्राप्त शैलखड़ी की मुहरें (सीलें) और मिट्टी की छोटी मुहरे (सीले) महत्त्वपूर्ण अभिलिखित वस्तुएं थी। मिट्टी की मुहरों पर सरकण्डे के छाप या निशान से यह लगता है कि इनका प्रयोग पैकिंग के लिए किया जाता रहा होगा।

प्राप्त मुहरें व ईटें
एक सील पर किसी अराध्य देव की आकृति है। यहाँ से प्राप्त मुहरें ‘मेसोपोटामियाई’ मुहरों के समकक्ष थी। कालीबंगा की प्राक्-सैंधव बस्तियों में प्रयुक्त होने वाली कच्ची ईटें 30x20x10 से.मी. आकार की होती थी। यहाँ से मिले मकानों के अवशेषों से पता चलता है कि सभी मकान कच्ची ईटों से बनाये गये थे, पर नाली और कुओं में पक्की ईटों का प्रयोग किया गया था। यहाँ पर कुछ ईटें अलंकृत पायी गयी हैं। कालीबंगा का एक फर्श पूरे हड़प्पा का एक मात्र उदाहरण है जहाँ अलंकृत ईटों का प्रयोग किया गया है। इस पर प्रतिच्छेदी वृत का अलंकरण हैं।

क़ब्रिस्तान

पश्चिमी गढ़ के रूप में टीले, कालीबंगा
कालीबंगा के दक्षिण-पश्चिम में क़ब्रिस्तान स्थित था। यहाँ से शव विसर्जन के 37 उदाहरण मिले हैं। यहाँ अन्त्येष्टि संस्कार की तीन विधियां प्रचलित थी –

दाह संस्कार
यहाँ पर बच्चे की खोपड़ी मिले है जिसमें 6 छेद हैं, इसे ‘जल कपाली’ या ‘मस्तिष्क शोध’ की बीमारी का पता चलता है। यहाँ से एक कंकाल मिला है जिसके बाएं घुटने पर किसी धारदार कुल्हाड़ी से काटने का निशान है।


भूकम्प के साक्ष्य
यहाँ से भूकम्प के प्राचीनतम साक्ष्य के प्रमाण मिलते हैं। सम्भवतः घग्घर नदी के सूख जाने से कालीबंगा का विनाश हो गया।


पहला टीला

इस सिन्धु-पूर्व सभ्यता मैं सामान्यता मकान में एक आँगन होता था और उसके किनारे पर कुछ कमरे बने होते थे आँगन में खाना पकाने का साक्ष्य भी प्राप्त होता है, क्योंकि वहाँ भूमि के ऊपर और नीचे दोनों प्रकार के तन्दूर मिले हैं। हल के प्रयोग का साक्ष्य मिला है, क्योंकि इस स्तर पर हराई के निशान पाये गये हैं। हल चलाने के ढंग से संकेत मिलता है कि एक ओर के खाँचे पूर्व-पश्चिम की दिशा में बनाये जाते थे और दूसरी ओर के उत्तर-दक्षिण दिशा में। इस युग में पत्थर और ताँबे दोनों प्रकार के उपकरण प्रचलित थे परंतु पत्थर के उपकरणों का प्रयोग अधिक होता था। यहाँ से दैनिक जीवन प्रयुक्त होने वाली वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि कालीबंगा के इस चरण का जीवन 3000 ई.पू. के आस-पास रहा होगा।


दूसरा टीला
दूसरे बड़े टीले से जो वस्तुएँ मिली हैं, वे हड़प्पा सभ्यता के समानुरुप हैं। कालीबंगा के इस टीले में कुछ अग्नि कुण्ड भी मिले हैं। कालीबंगा से मिट्टी के बर्तनों के कुछ ऐसे टुकड़े मिले हैं, जिनसे यह निश्चय होता है कि सिन्धु सभ्यता की लिपि दाहिनी ओर से बायीं ओर लिखी जाती थी। कालीबंगा में मोहनजोदड़ो जैसी उच्च-स्तर की जल निकास व्यवस्था का आभास नहीं होता है। भवनों का निर्माण कच्ची ईंटों से किया जाता था, किंतु नालियों, कुओं तथा स्नानागारों में पकाई ईंटों प्रयुक्त की गई हैं।


हिसार

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हिसार एक शहर, जो पश्चिमोत्तर हरियाणा राज्य, पश्चिमोत्तर भारत में पश्चिमी यमुना नहर की हांसी शाखा पर स्थित है। इसकी स्थापना तुग़लक़ शासक फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ ने की थी। प्राचीन समय में यहाँ कई आदिवासी जातियाँ रहा करती थीं। हिसार हरियाणा राज्य के पर्यटन के लिए एक आकर्षक स्‍थल है। पर्यटक यहाँ पर कई ख़ूबसूरत स्थलों की सैर कर सकते हैं। यहाँ कपास, अनाज और तेल के बीजों का बड़ा बाज़ार है। इस बाज़ार के लिए यह बहुत प्रसिद्ध है।

इतिहास
इस नगर को फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ (राज्यभिषेक 1351 ई.) ने बसाया था। कहा जाता है कि हिसार के पास के वनों में फ़िरोज़ आखेट के लिए रोजाना जाया करता था और उसने यहां एक दुर्ग (हिसार दुर्ग) बनवाया था, जहां कालांतर में आबादी हो गई। हिसार के पास ‘अग्राहा’ नामक स्थान है, जो प्राचीन ‘अग्रोदक’ कहा जाता है। यह नगर महाभारत कालीन माना जाता है। अलक्षेंद्र के आक्रमण के समय (327 ई. पू.) इस स्थान पर ‘आग्रेयगण’ का राज्य था। वासुदेव शरण अग्रवाल का विचार है कि पाणिनि में उल्लिखित ‘एषुकारिभक्त’ हिसार का ही प्राचीन नाम है। इसे कुरू प्रदेश का एक बड़ा नगर कहा गया है।

18वीं शताब्दी में जनशून्य किए गए इस शहर पर बाद में ब्रिटिश अभियानकर्ता जॉर्ज थॉमस ने क़ब्ज़ा कर लिया। 1867 में हिसार की नगरपालिका का अध्ययन किया गया। यह शहर एक दीवार से घिरा है, जिसमें चार दरवाज़े हैं- ‘नागोरी गेट’, ‘मोरी गेट’, ‘दिल्ली गेट’ तथा ‘तलाकी गेट’ के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ फ़िरोज़ शाह के क़िले व महल के अवशेषों के साथ-साथ कई प्राचीन मस्जिदें हैं, जिनमें जहाज़ भी एक है, जो अब एक जैन मंदिर है। प्राचीन समय में यह हड़प्पा सभ्यता का मुख्य केन्द्र था। प्राचीन समय में यहाँ कई आदिवासी जातियाँ रहती थी। इन जातियों में भरत, पुरू, मुजावत्स और महावृष प्रमुख थी।

कृषि और खनिज
गेहूँ व कपास यहाँ की प्रमुख फ़सलें हैं। अन्य फ़सलों में चना, बाजरा, चावल, सरसों व गन्ना शामिल हैं।

उद्योग और व्यापार
उद्योगों में कपास की ओटाई, हथकरघा बुनाई और कृषि यंत्रों व सिलाई मशीनों के निर्माण से जुड़े उद्योग शामिल हैं। यहाँ पर कपास, अनाज और तेल के बीजों का बड़ा बाज़ार है। इस बाज़ार के लिए यह बहुत प्रसिद्ध है।

यातायात और परिवहन
हिसार शहर एक प्रमुख रेल व सड़क जंक्शन है।

शिक्षण संस्थान
इस शहर में सी.सी. शाहू हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, सी.सी. शाहू प्रबंधन महाविद्यालय, कृषि इंजीनियरिंग व प्रौद्योगिकी महाविद्यालय और हिसार गवर्नमेंट कॉलेज व डी.एन. कॉलेज सहित कई महाविद्यालय शामिल हैं।

पर्यटन
हरियाणा में स्थित हिसार एक ख़ूबसूरत स्थान है और हिसार पर्यटन का आकर्षक स्‍थल है। पर्यटक यहाँ पर कई ख़ूबसूरत स्थलों की सैर कर सकते हैं। यहाँ पर सम्राट अशोक के काल का एक स्तम्भ, कुषाण वंश के सिक्के व अन्य अवशेष भी मिले हैं। कुल मिलाकर हिसार बहुत ख़ूबसूरत है और पर्यटक यहाँ पर अनेक ख़ूबसूरत स्‍थान देख सकते हैं। पर्यटक स्थलों की सैर के बाद यहाँ पर अनेक ऐतिहासिक इमारतों की यात्रा की जा सकती है।

जनसंख्या
2001 की जनगणना के अनुसार इस शहर की जनसंख्या 2,56,810, ज़िले की कुल जनसंख्या 15,36,417 है।

बणावली
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बणावली (हरियाणा)

बणावली हरियाणा के हिसार ज़िले में स्थित यहाँ से दो सांस्कृतिक अवस्थाओं के अवषेश मिले हैं।

हड़प्पा पूर्व एवं हड़प्पाकालीन इस स्थल की खुदाई 1973-74 ई. में ‘रवीन्द्र सिंह विष्ट’ के नेतृत्व में की गयी।
यहाँ से संस्कृति के तीन स्तर प्रकाश में आए हैं।-
प्राक् सैंधव
विकसित सैंधव
उत्तर सैंधव
यहाँ दुर्ग तथा निचला नगर अलग-अलग न होकर एक ही प्राचीर से घिरे थे।
एक मकान से धावन पात्र के साक्ष्य मिले हैं जो किसी धनी सौदागार के आवास की ओर संकेत करता है।
एक दूसरे बड़े मकान से सोने, लजावर्द, कार्नेनियन के मनके, छोटे बटखरे मिले हैं, जिससे यह ज्ञात होता है कि यह किसी जौहरी का मक़ान रहा होगा।
इसके अतिरिक्त मिट्टी के बर्तन, गोलियाँ, मनके, तांबे के बाण्राग, हल की आकृति के खिलौने आदि मिले हैं।
बनवाली में जल निकास प्रणाली का अभाव दिखाई देता है।
बणावली की नगर योजना- शतरंज के बिसात या जाल के आकार की बनायी गयी थी।
सड़कें न तो सीधी मिलती थी न तो एक दूसरे को समकोण पर काटती थी।

 

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दुर्ग
नगर की पश्चिमी टीले पर सम्भवतः सुरक्षा हेतु एक ‘दुर्ग’ का निर्माण हुआ था जिसकी उत्तर से दक्षिण की ओर लम्बाई 460 गज एवं पूर्व से पश्चिम की ओर लम्बाई 215 गज थी। ह्वीलर द्वारा इस टीले को ‘माउन्ट ए-बी’ नाम प्रदान किया गया है। दुर्ग के चारों ओर क़रीब 45 फीट चौड़ी एक सुरक्षा प्राचीर का निर्माण किया गया था जिसमें जगह-जगह पर फाटकों एव रक्षक गृहों का निर्माण किया गया था। दुर्ग का मुख्य प्रवेश मार्ग उत्तर एवं दक्षिण दिशा में था। दुर्ग के बाहर उत्तर की ओर 6 मीटर ऊंचे ‘एफ’ नामक टीले पर पकी ईटों से निर्मित अठारह वृत्ताकार चबूतरे मिले हैं जिसमें प्रत्येक चबूतरे का व्यास क़रीब 3.2 मीटर है चबूतरे के मध्य में एक बड़ा छेद हैं, जिसमें लकड़ी की ओखली लगी थी, इन छेदों से जौ, जले गेहूँ एवं भूसी के अवशेष मिलते हैं। इस क्षेत्र में श्रमिक आवास के रूप में पन्द्रह मकानों की दो पंक्तियां मिली हैं जिनमें सात मकान उत्तरी पंक्ति आठ मकान दक्षिणी पंक्ति में मिले हैं। प्रत्येक मकान में एक आंगन एवं क़रीब दो कमरे अवशेष प्राप्त हुए हैं। ये मकान आकार में 17×7.5 मीटर के थे। चबूतरों के उत्तर की ओर निर्मित अन्नागारों को दो पंक्तियां मिली हैं, जिनमें प्रत्येक पंक्ति में 6-6 कमरे निर्मित हैं, दोनों पंक्तियों के मध्य क़रीब 7 मीटर चौड़ा एक रास्ता बना था। प्रत्येक अन्नागार क़रीब 15.24 मीटर लम्बा एवं 6.10 मीटर चौड़ा है।

विशेष इमारतें
सिंधु घाटी प्रदेश में हुई खुदाई कुछ महत्त्वपूर्ण ध्वंसावशेषों के प्रमाण मिले हैं।

हड़प्पा की खुदाई में मिले अवशेषों में महत्त्वपूर्ण थे –

दुर्ग
रक्षा-प्राचीर
निवासगृह
चबूतरे
अन्नागार आदि ।

सभ्यता का विस्तार
अब तक इस सभ्यता के अवशेष पाकिस्तान और भारत के पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर के भागों में पाये जा चुके हैं। इस सभ्यता का फैलाव उत्तर में ‘जम्मू’ के ‘मांदा’ से लेकर दक्षिण में नर्मदा के मुहाने ‘भगतराव’ तक और पश्चिमी में ‘मकरान’ समुद्र तट पर ‘सुत्कागेनडोर’ से लेकर पूर्व में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मेरठ तक है। इस सभ्यता का सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थल ‘सुत्कागेनडोर’, पूर्वी पुरास्थल ‘आलमगीर’, उत्तरी पुरास्थल ‘मांडा’ तथा दक्षिणी पुरास्थल ‘दायमाबाद’ है। लगभग त्रिभुजाकार वाला यह भाग कुल क़रीब 12,99,600 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। सिन्धु सभ्यता का विस्तार का पूर्व से पश्चिमी तक 1600 किलोमीटर तथा उत्तर से दक्षिण तक 1400 किलोमीटर था। इस प्रकार सिंधु सभ्यता समकालीन मिस्र या ‘सुमेरियन सभ्यता’ से अधिक विस्तृत क्षेत्र में फैली थी।

सिंधु सभ्यता स्थल

बलूचिस्तान
उत्तरी बलूचिस्तान में स्थित ‘क्वेटा’ तथा ‘जांब’ की धारियों में सैंधव सभ्यता से सम्बन्धित कोई भी स्थल नहीं है। किन्तु दक्षिणी बलूचिस्तान में सैंधव सभ्यता के कई पुरास्थल स्थित हैं जिसमें अति महत्त्वपूर्ण है ‘मकरान तट’। मकरान तट प्रदेश पर मिलने वाले अनेक स्थलों में से पुरातात्विक दृष्टि से केवल तीन स्थल महत्त्वपूर्ण हैं-

– सुत्कागेनडोर (दश्क नदी के मुहाने पर)
– सुत्काकोह (शादीकौर के मुहाने पर)
– बालाकोट (विंदार नदी के मुहाने पर)
– डावरकोट (सोन मियानी खाड़ी के पूर्व में विदर नदी के मुहाने पर)

उत्तर पश्चिमी सीमांत
यहाँ सारी सामग्री, ‘गोमल घाटी’ में केन्द्रित प्रतीत होती है जो अफ़ग़ानिस्तान जाने का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण मार्ग है। ‘गुमला’ जैसे स्थलों पर सिंधु पूर्व सभ्यता के निक्षेपों के ऊपर सिंधु सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

सिंधु
इनमें कुछ स्थल प्रसिद्ध हैं जैसे – ‘मोहनजोदड़ों’, ‘चन्हूदड़ों’, ‘जूडीरोजोदड़ों’, (कच्छी मैदान में जो कि सीबी और जैकोबाबाद के बीच सिंधु की बाढ़ की मिट्टी का विस्तार है) ‘आमरी’ (जिसमें सिंधु पूर्व सभ्यता के निक्षेप के ऊपर सिंधु सभ्यता के निक्षेप मिलते हैं) ‘कोटदीजी’, ‘अलीमुराद’, ‘रहमानढेरी’, ‘राणाधुडई’ इत्यादि।

पश्चिमी पंजाब
इस क्षेत्र में बहुत ज़्यादा स्थल नहीं है। इसका कारण समझ में नहीं आता। हो सकता है पंजाब की नदियों ने अपना मार्ग बदलते-बदलते कुछ स्थलों का नष्ट कर दिया हो। इसके अतिरिक्त ‘डेरा इस्माइलखाना’, ‘जलीलपुर’, ‘रहमानढेरी’, ‘गुमला’, ‘चक-पुरवानस्याल’ आदि महत्त्वपूर्ण पुरास्थल है।

बहावलपुर
यहाँ के स्थल सूखी हुई सरस्वती नदी के मार्ग पर स्थित हैं। इस मार्ग का स्थानीय नाम का ‘हकरा‘ है । ‘घग्घर हमरा’ अर्थात सरस्वती दृशद्वती नदियों की घाटियों में हड़प्पा संस्कृति के स्थलों का सर्वाधिक संकेन्द्रण (सर्वाधिक स्थल) प्राप्त हुआ है। किन्तु इस क्षेत्र में अभी तक किसी स्थल का उत्खनन नहीं हुआ है। इस स्थल का नाम ‘कुडावाला थेर’ है जो प्रकटतः बहुत बड़ा है।

राजस्थान
यहाँ के स्थल ‘बहाबलपुर’ के स्थलों के निरंतर क्रम में हैं जो प्राचीन सरस्वती नदी के सूखे हुए मार्ग पर स्थित है। इस क्षेत्र में सरस्वती नदी को ‘घघ्घर’ कहा जाता है। कुछ प्राचीन दृषद्वती नदी के सूखे हुए मार्ग के साथ- साथ भी है जिसे अब ‘चैतग नदी’ कहा जाता है। इस क्षेत्र का सबसे महत्त्वपूर्ण स्थल ‘कालीबंगा’ है। कालीबंगा नामक पुरास्थल पर भी पश्चिमी से गढ़ी और पूर्व में नगर के दो टीले, हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ों, की भांति विद्यमान है। राजस्थान के समस्त सिंधु सभ्यता के स्थल आधुनिक गंगानगर ज़िले में आते हैं।

हरियाणा
हरियाणा का महत्त्वपूर्ण सिंधु सभ्यता स्थल हिसार ज़िले में स्थित ‘बनवाली’ है। इसके अतिरिक्त ‘मिथातल’, ‘सिसवल’, ‘वणावली’, ‘राखीगढ़’, ‘वाड़ा तथा ‘वालू’ नामक स्थलों का भी उत्खनन किया जा चुका है।

पूर्वी पंजाब
इस क्षेत्र के महत्त्वपूर्ण स्थल ‘रोपड़ संधोल’ है। हाल ही में चंडीगढ़ नगर में भी हड़प्पा संस्कृति के निक्षेप पाये गये हैं। इसके अतिरिक्त ‘कोटलानिहंग ख़ान’, ‘चक 86 वाड़ा’, ‘ढेर-मजरा’ आदि पुरास्थलों से सैंधव सभ्यता से सम्बद्ध पुरावशेष प्राप्त हुए है।

गंगा-यमुना दोआब
यहाँ के स्थल मेरठ ज़िले के ‘आलमगीर’ तक फैले हुए हैं। एक अन्य स्थल सहारनपुर ज़िले में स्थित ‘हुलास’ तथा ‘बाड़गांव’ है। हुलास तथा बाड़गांव की गणना पश्वर्ती सिन्धु सभ्यता के पुरास्थलों में की जाती है।

जम्मू
इस क्षेत्र के मात्र एक स्थल का पता लगा है, जो ‘अखनूर’ के निकट ‘भांडा’ में है। यह स्थल भी सिन्धु सभ्यता के परवर्ती चरण से सम्बन्घित है।

गुजरात
1947 के बाद गुजरात में सैंधव स्थलों की खोज के लिए व्यापक स्तर पर उत्खनन किया गया। गुजरात के ‘कच्छ’, ‘सौराष्ट्र’ तथा गुजरात के मैदानी भागों में सैंधव सभ्यता से सम्बन्घित 22 पुरास्थल है, जिसमें से 14 कच्छ क्षेत्र में तथा शेष अन्य भागों में स्थित है। गुजरात प्रदेश में ये पाए गए प्रमुख पुरास्थलों में ‘रंगपुर’, ‘लापेथल’, ‘पाडरी’, ‘प्रभास-पाटन’, ‘राझदी’, ‘देशलपुर’, ‘मेघम’, ‘वेतेलोद’, ‘भगवतराव’, ‘सुरकोटदा’, ‘नागेश्वर’, ‘कुन्तासी’, ‘शिकारपुर’ तथा ‘धौलावीरा’ आदि है।

महाराष्ट्र
प्रदेश के ‘दायमाबाद’ नामक पुरास्थल से मिट्टी के ठीकरे प्राप्त हुए है जिन पर चिरपरिचित सैंधव लिपि में कुछ लिखा मिला है, किन्तु पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में सैंधव सभ्यता का विस्तार महाराष्ट्र तक नहीं माना जा सकता है। ताम्र मूर्तियों का एक निधान, जिसे प्रायः हडप्पा संस्कृति से सम्बद्ध किया जाता है, वह महाराष्ट्र और दायमादाबद नामक स्थान से प्राप्त हुआ है – इसमें ‘रथ चलाते मनुष्य’, ‘सांड’, ‘गैंडा’, और ‘हाथी’ की आकृति प्रमुख है। यह सभी ठोस धातु की है और वजन कई किलो है, इसकी तिथि के विषय में विद्धानों में मतभेद है।

अफ़ग़ानिस्तान
हिन्दुकश के उत्तर में अफ़ग़ानिस्तान में स्थित ‘मुंडीगाक’ और ‘सोर्तगोई’ दो पुरास्थल है। मुंडीगाक का उत्खनन ‘जे.एम. कैसल’ द्वारा किया गया था तथा सोर्तगोई की खोज एवं उत्खनन ‘हेनरी फ्रैंकफर्ट’ द्वारा कराया गया था। सोर्तगोई लाजवर्द की प्राप्ति के लिए बसायी गयी व्यापारिक बस्ती थी।

काल निर्धारण
सैंधव सभ्यता के काल को निर्धारित करना निःसंदेह बड़ा ही कठिन काम है, फिर भी विभिन्न विद्धानों ने इस विवादास्पद विषय पर अपने विचार व्यक्त किये हैं। 1920 ईसा पूर्व के दशक में सर्वप्रथम हड़प्पाई सभ्यता का ज्ञान हुआ।

हड़प्पाई सभ्यता का काल निर्धारण मुख्य रूप से ‘मेसोपोटामिया’ में ‘उर’ और ‘किश’ स्थलों पर पाए गए हड़प्पाई मुद्राओं के आधार पर किया गया। इस क्षेत्र में सर्वप्रथम प्रयास ‘जॉन मार्शल’ का रहा। उन्होंने 1931 ई. में इस सभ्यता का काल 3250 ई.पू. 2750 ई.पू. निर्धारित किया।

ह्वीलर ने इसका काल 2500 – 1500 ई.पू. माना है। बाद के समय में काल निर्धारण की रेडियो विधि का अविष्कार हुआ और इस विधि से इस सभ्यता का काल निर्धारण इस प्रकार है-

पूर्व हड़प्पाई चरण: लगभग 3500-2600 ई.पू.
परिपक्व हड़प्पाई चरण – लगभग 2600-1900 ई.पू.
उत्तर हड़प्पाई चरण: लगभग 1900-1300 ई.पू.

रेडियो कार्बन ‘सी-14‘ जैसी नवीन विश्लेषण पद्धति के द्वारा हड़प्पा सभ्यता का सर्वमान्य काल 2500 ई.पू. से 1750 ई.पू. को माना गया है।
विभिन्न विद्धानों द्वारा सिंधु सभ्यता का काल निर्धारण

काल विद्धान
1- 3,500 – 2,700 ई.पू. माधोस्वरूप वत्स
2- 3,250 – 2,750 ई.पू. जॉन मार्शल
3- 2,900 – 1,900 ई.पू. डेल्स
4- 2,800 – 1,500 ई.पू. . अर्नेस्ट मैके
5- 2,500 – 1,500 ई.पू. मार्टीमर ह्यीलर
6- 2,350 – 1,700 ई.पू. सी.जे. गैड
7- 2,350 – 1,750 ई.पू. डी.पी. अग्रवाल
8- 2,000 – 1,500 ई.पू. फेयर सर्विस

सिधु सभ्यता के प्रमुख स्थल एवं उसके खोजकर्ता
प्रमुख स्थल खोजकर्ता वर्ष
1- हड़प्पा माधो स्वरूप वत्स, दयाराम साहनी 1921
2- मोहनजोदाड़ो राखाल दास बनर्जी 1922
3- रोपड़ यज्ञदत्त शर्मा 1953
4- कालीबंगा ब्रजवासी लाल, अमलानन्द घोष 1953
5- लोथल ए. रंगनाथ राव 1954
6- चन्हूदड़ों एन.गोपाल मजूमदार 1931
7- सूरकोटदा जगपति जोशी 1964
8- बणावली रवीन्द्र सिंह विष्ट 1973
9- आलमगीरपुर यज्ञदत्त शर्मा 1958
10- रंगपुर माधोस्वरूप वत्स, रंगनाथ राव 1931.-1953
10- कोटदीजी फज़ल अहमद 1953
11- सुत्कागेनडोर ऑरेल स्टाइन, जार्ज एफ. डेल्स 1927

हड़प्पाकालीन नदियों के किनारे बसे नगर

नगर नदी/सागर तट
1- मोहनजोदाड़ो सिंधु नदी
2- हड़प्पा रावी नदी
3- रोपड़ सतलुज नदी
4- कालीबंगा घग्घर नदी
5- लोथल भोगवा नदी
6- सुत्कागेनडोर दाश्त नदी
7- वालाकोट अरब सागर
8- सोत्काकोह अरब सागर
9- आलमगीरपुर हिन्डन नदी
10- रंगपुर मदर नदी
10- कोटदीजी सिंधु नदी

हड़प्पा सभ्यता के पुरास्थल
पुरास्थल स्थान

1- हड़प्पा सभ्यता का सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थल सत्कागेन्डोर (बलूचिस्तान)
2- सर्वाधिक पूर्वी पुरास्थल आलमगीरपुर (मेरठ)
3- सर्वाधिक उत्तर पूरास्थल मांडा (जम्मू कश्मीर)
4- सर्वाधिक दक्षिणी पुरास्थल दायमाबाद (महाराष्ट्र)

सिधु सभ्यता के निर्माता और निवासी, यह अत्यन्त ही विवादाग्रस्त विषय है। इस विवाद में कुछ विद्धानों के प्रकार हैं-

‘डॉ. लक्ष्मण स्वरूप’ और ‘रामचन्द्र’ सिंधु सभ्यता एवं वैदिक सभ्यता दोनों के निर्माता के रूप में आर्यो को मानते हैं।
‘गार्डन चाइल्ड’ सिंधु सभ्यता के निर्माता के रूप में ‘सुमेरियन’ लोगों को मानते हैं।
‘राखाल दास बनर्जी’ इस सभ्यता के निर्माता के रूप में द्रविड़ों को मानते हैं
ह्वीलर का मानना है कि ऋग्वेद में वर्णित दस्यु एवं ‘दास‘ सिंधु सभ्यता के निर्माता थे।
इन समस्त विवादों का अवलोकन करके ‘डॉ. रमा शंकर त्रिपाठी’ का कहना है कि ‘ऐतिहासिक ज्ञान की इस सीमा पर खड़े होकर अभी इस विषय पर हमारा मौन ही सराह्य और उचित है।’

धर्म
हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो में असंख्य्य देवियों की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। विद्वानों का अनुमान है कि ये मूर्तियाँ मातृदेवी अथवा प्रकृति देवी की हैं। प्राचीन काल से ही मातृ या प्रकृति की पूजा भारतीय करते रहे हैं और आधुनिक काल में भी कर रहे हैं। मातृदेवी की पूजा फ़ारस से लेकर यूनान के निकट इजियन सागर तक के सभी देशों के प्राचीन निवासियों में प्रचलित थी। मातृदेवी की उपासना लोग किस प्रकार करते थे, इसका ज्ञान हमें हड़प्पा से पाप्त एक मुहर के चित्र से मिलता है। इस मुहर के चित्र में एक नारी बनी हुई है, जिसके पेट से एक पौधा निकलता दिखाया गया है, चाकू लिये हुए एक पुरुष का भी चित्र है और नारी अपने हाथों को ऊपर उठाये हुए है, जिसकी शायद बलि चढ़ाई जाने वाली है।

अभी तक सिन्धु घाटी की खुदाई में कोई मन्दिर या पूजा स्थान नहीं मिला, अत: इस सभ्यता के धार्मिक जीवन का एकमात्र स्रोत यहाँ पाई गई मिट्टी और पत्थर की मूर्तियों तथा मुहरें हैं। इनसे यह ज्ञात होता है कि यहाँ मातृदेवी की, पशुपति शिव की तथा उसके लिंग की पूजा और पीपल, नीम आदि पेड़ों एवं नागादि जीव जंतुओं की उपासना प्रचलित थी। मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा में खड़ी हुई अर्धनग्न नारी की बहुत मृण्मय मूर्तियाँ मिली हैं, इनके शरीर पर छोटा सा लहंगा है, जिसे कटि प्रदेश पर मेखला से बाँधा गया है। गले में हार पड़ा हुआ है तथा मस्तक पर पंखे के आकार की विचित्र शिराभूषा है। इसके दोनों ओर प्याले जैसा पदार्थ है, जिसमें लगे धुएँ के निशान से यह ज्ञात होता है कि इनमें भक्तों द्वारा देवी को प्रसन्न करने के लिए तेल या धूप जलाया जाता था। इस प्रकार की मूर्तियाँ पश्चिमी एशिया में भी मिली हैं। ये उस समय की मातृदेवी की उपासना की व्यापकता की सूचित करती हैं। आज भी भारत की साधारण जनता में देवी की उपासना बहुत प्रचलित है। इन मूर्तियों के बहुत अधिक मात्रा में पाये जाने से यह कल्पना की गई है कि वर्तमान कुल देवताओं की भाँति प्रत्येक घर में इनकी प्रतिष्ठा और पूजा की जाती थी। पुरुष देवताओं में पशुपति प्रधान प्रतीत होता है। एक मुहर में तीन मुँह वाला एक नग्न व्यक्ति चौकी पर पद्मासन लगाकर बैठा हुआ है। इसके चारों ओर हाथी तथा बैल हैं। चौकी के नीचे हिरण है, उसके सिर पर सींग और विचित्र शिरोभूषा है। इसने हाथों में चूड़ियाँ और गले में हार पहन रखा है। यह मूर्ति शिव के पशुपति रूप की समझी जाती है। पद्मासन में ध्यानावस्थित मुद्रा में इसकी नासाग्र दृष्टि शिव के योगेश्वर या महायोगी रूप को सूचित करती है। तीन अन्य मुहरें पशुपति के इस रूप पर प्रकाश डालती हैं। अनेक विद्वानों ने मोहनजोदड़ो की अति प्रसिद्ध शालधारिणी मूर्ति का भी योग से सम्बन्ध जोड़ा है।[1]

सैन्धव सभ्यता की कला में मुहरों का अपना विशिष्ट स्थान था। अब तक क़रीब 2000 मुहरें प्राप्त की जा चुकी हैं। इसमें लगभग 1200 अकेले मोहनजोदाड़ो से प्राप्त हुई हैं। ये मुहरे बेलनाकार, वर्गाकार, आयताकार एवं वृत्ताकार रूप में मिली हैं। मुहरों का निर्माण अधिकतर सेलखड़ी से हुआ है। इस पकी मिट्टी की मूर्तियों का निर्माण ‘चिकोटी पद्धति’ से किया गया है। पर कुछ मुहरें ‘काचल मिट्टी’, गोमेद, चर्ट और मिट्टी की बनी हुई भी प्राप्त हुई हैं। अधिकांश मुहरों पर संक्षिप्त लेख, एक श्रृंगी, सांड, भैंस, बाघ, गैडा, हिरन, बकरी एवं हाथी के चित्र उकेरे गये हैं। इनमें से सर्वाधिक आकृतियाँ एक श्रृंगी, सांड की मिली हैं। लोथल ओर देशलपुर से तांबे की मुहरे मिली हैं।

शंकु तथा बेलन के आकार के पत्थरों से यह ज्ञात होता है कि उस समय शिव की मूर्ति पूजा के अतिरिक्त लिंग पूजा भी प्रचलित थी। मुहरों पर उत्कीर्ण विभिन्न प्रकार के पेड़ों की तथा पशुओं की आकृति से यह ज्ञात होता है कि उस समय पीपल और नीम को पूजा जाता था। पशुओं में हाथी, बैल, बाघ, भैंसे, गैंडे और घड़ियाल के चित्र अधिक मिले हैं। आजकल इनमें से अनेक पशु देवताओं के वाहन रूप में पूजित हैं। यह कहना कठि है कि उस समय इनकी वाहनों के रूप में प्रतिष्ठा थी या स्वतंत्र रूप में। साँपों को दूध पिलाने तथा पूजा करने का विचार भी इस सभ्यता में था। वीर पुरुषों की पूजा करने का विचार भी सम्भवत: यहाँ था। दो बाघों के साथ लड़ते हुए एक पुरुष की सुमेर के प्रसिद्ध वीर गिलगमेश के साथ तुलना की गई है। सूर्य पूजा तथा स्वस्तिक के भी चिह्न यहाँ पाये गए हैं। उपर्युक्त उपास्य देवताओं के अतिरिक्त इनकी पूजा विधि के सम्बन्ध में भी कुछ मनोरंजक कल्पनाएँ की गई हैं। मिट्टी के एक ताबीज पर एक व्यक्ति को ढोल पीटता हुआ तथा दूसरे व्यक्ति को नाचते हुए दिखाया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान काल की भाँति उस समय संगीत और नृत्य पूजा के अंग थे। मोहनजोदड़ो की नर्तकी की प्रसिद्ध काँस्य मूर्ति सम्भवत: उस समय देवता के सम्मुख नाचने वाली किसी देवदासी की प्रतिमा है।

हड़प्पा

हड़प्पा 6000-2600 ईसा पूर्व की एक सुव्यवस्थित नगरीय सभ्यता थी। मोहनजोदड़ो, मेहरगढ़ और लोथल की ही शृंखला में हड़प्पा में भी पुर्रात्तव उत्खनन किया गया। यहाँ मिस्र और मैसोपोटामिया जैसी ही प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिले है। इसकी खोज 1920 में की गई। वर्तमान में यह पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में स्थित है। सन् 1857 में लाहौर मुल्तान रेलमार्ग बनाने में हड़प्पा नगर की ईटों का इस्तेमाल किया गया जिससे इसे बहुत नुक़सान पहुँचा।

मोहनजोदड़ो

प्रधान अनुष्ठानकर्ता मोहनजोदाड़ो 2000 ई.पू.
मोहन जोदड़ो, जिसका कि अर्थ मुर्दो का टीला है 2600 ईसा पूर्व की एक सुव्यवस्थित नगरीय सभ्यता थी।
हड़प्पा, मेहरगढ़ और लोथल की ही शृंखला में मोहन जोदड़ो में भी पुर्रात्तव उत्खनन किया गया।
यहाँ मिस्र और मैसोपोटामिया जैसी ही प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिले है।
इस सभ्यता के ध्वंसावशेष पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त के ‘लरकाना ज़िले’ में सिंधु नदी के दाहिने किनारे पर प्राप्त हुए हैं। यह नगर क़रीब 5 कि.मी. के क्षेत्र में फैला हुआ है। मोहनजोदड़ों के टीलो का 1922 ई. में खोजने का श्रेय ‘राखालदास बनर्जी’ को प्राप्त हुआ।

चन्हूदड़ों
मोहनजोदाड़ो के दक्षिण में स्थित चन्हूदड़ों नामक स्थान पर मुहर एवं गुड़ियों के निर्माण के साथ-साथ हड्डियों से भी अनेक वस्तुओं का निर्माण होता था। इस नगर की खोज सर्वप्रथम 1931 में ‘एन.गोपाल मजूमदार’ ने किया तथा 1943 ई. में ‘मैके’ द्वारा यहाँ उत्खनन करवाया गया। सबसे निचले स्तर से ‘सैंधव संस्कृति’ के साक्ष्य मिलते हैं।

लोथल
यह गुजरात के अहमदाबाद ज़िले में ‘भोगावा नदी’ के किनारे ‘सरगवाला’ नामक ग्राम के समीप स्थित है। खुदाई 1954-55 ई. में ‘रंगनाथ राव’ के नेतृत्व में की गई।

इस स्थल से समकालीन सभ्यता के पांच स्तर पाए गए हैं। यहाँ पर दो भिन्न-भिन्न टीले नहीं मिले हैं, बल्कि पूरी बस्ती एक ही दीवार से घिरी थी।

रोपड़
पंजाब प्रदेश के ‘रोपड़ ज़िले’ में सतलुज नदी के बांए तट पर स्थित है। यहाँ स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् सर्वप्रथम उत्खनन किया गया था। इसका आधुनिक नाम ‘रूप नगर’ था। 1950 में इसकी खोज ‘बी.बी.लाल’ ने की थी।

कालीबंगा (काले रंग की चूड़ियां)

यह स्थल राजस्थान के गंगानगर ज़िले में घग्घर नदी के बाएं तट पर स्थित है। खुदाई 1953 में ‘बी.बी. लाल’ एवं ‘बी. के. थापड़’ द्वारा करायी गयी। यहाँ पर प्राक् हड़प्पा एवं हड़प्पाकालीन संस्कृति के अवशेष मिले हैं।

सूरकोटदा

यह स्थल गुजरात के कच्छ ज़िले में स्थित है।
इसकी खोज 1964 में ‘जगपति जोशी’ ने की थी इस स्थल से ‘सिंधु सभ्यता के पतन’ के अवशेष परिलक्षित होते हैं।

आलमगीरपुर (मेरठ)

पश्चिम उत्तर प्रदेश के मेरठ ज़िले में यमुना की सहायक हिण्डन नदी पर स्थित इस पुरास्थल की खोज 1958 में ‘यज्ञ दत्त शर्मा’ द्वारा की गयी।

रंगपुर (गुजरात)
गुजरात के काठियावाड़ प्राय:द्वीप में भादर नदी के समीप स्थित इस स्थल की खुदाई 1953-54 में ‘ए. रंगनाथ राव’ द्वारा की गई।
यहाँ पर पूर्व हडप्पा कालीन सस्कृति के अवशेष मिले हैं।
यहाँ मिले कच्ची ईटों के दुर्ग, नालियां, मृदभांड, बांट, पत्थर के फलक आदि महत्त्वपूर्ण हैं।
यहाँ धान की भूसी के ढेर मिले हैं।
यहाँ उत्तरोत्तर हड़प्पा संस्कृति के साक्ष्य मिलते हैं।

बणावली (हरियाणा)

हरियाणा के हिसार ज़िले में स्थित दो सांस्कृतिक अवस्थाओं के अवषेश मिले हैं।
हड़प्पा पूर्व एवं हड़प्पाकालीन इस स्थल की खुदाई 1973-74 ई. में ‘रवीन्द्र सिंह विष्ट’ के नेतृत्व में की गयी।

अलीमुराद (सिंध प्रांत)
सिंध प्रांत में स्थित इस नगर से कुआँ, मिट्टी के बर्तन, कार्निलियन के मनके एवं पत्थरों से निर्मित एक विशाल दुर्ग के अवशेष मिले हैं।
इसके अतिरिक्त इस स्थल से बैल की लघु मृण्मूर्ति एवं कांसे की कुल्हाड़ी भी मिली है।

सुत्कागेनडोर (दक्षिण बलूचिस्तान)
यह स्थल दक्षिण बलूचिस्तान में दाश्त नदी के किनारे स्थित है।
हड़प्पाकालीन सभ्यता से सम्बन्धित कुछ नवीन क्षेत्र

खर्वी (अहमदाबाद)
अहमदाबाद से 114 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस स्थान से हड़प्पाकालीन मृदभांड एवं ताम्र आभूषण के अवशेष मिले है।

कुनुतासी (गुजरात)
गुजरात के राजकोट ज़िले में स्थित इस स्थल की खुदाई ‘एम.के. धावलिकर’, ‘एम.आर.आर. रावल’ तथा ‘वाई.एम. चितलवास’ द्वारा करवाई गई।

धौलावीरा

इस स्थल की खुदाई से विशाल सैन्धव कालीन नगर के अवशेष का पता चलता है।

कोटदीजी (सिंध प्रांत)
सिंध प्रांत के ‘खैरपुर’ नामक स्थान पर यह स्थल स्थित है।
सर्वप्रथम इसकी खोज ‘धुर्ये’ ने 1935 ई. में की ।
नियमित खुदाई 1953 ई. में फज़ल अहमद ख़ान द्वारा सम्पन्न करायी गयी।

बालाकोट (बलूचिस्तान)
नालाकोट से लगभग 90 किमी की दूरी पर बलूचिस्तान के दक्षिणी तटवर्ती पर बालाकोट स्थित था।
इसका उत्खनन 1963-1970 के बीच ‘जॉर्ज एफ.डेल्स’ द्वारा किया गया ।

अल्लाहदीनों (अरब महासागर)
अल्लाहदीनों सिन्धु और अरब महासागर के संगम से लगभग 16 किलोमीटर उत्तर-पूर्व तथा कराची से पूर्व में स्थित है।
1982 में ‘फेयर सर्विस’ ने यहाँ पर उत्खनन करवाया था।

माण्डा
चेनाब नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित यह विकसित हड़प्पा संस्कृति का सबसे उत्तरी स्थल है।
इसका उत्खनन 1982 में ‘जे.पी. जोशी’ तथा ‘मधुबाला’ द्वारा करवाया गया था।
उत्खनन से प्राप्त यहाँ से तीन सांस्कृतिक स्तर
प्राक् सैन्धव,
विकसित सैंधव, तथा
उत्तर कालीन सैंधव प्रकाश में आए।
यहाँ विशेष प्रकार के मृदभांड (मिट्टी के बर्तन), गैर हड़प्पा से सम्बद्ध कुछ ठीकरा पक्की मिट्टी की पिण्डिकाएं (टेराकोटा केक) आदि प्राप्त हुए है।

भगवानपुरा (हरियाणा)
भगवानपुरा हरियाणा के कुरुक्षेत्र ज़िले में सरस्वती नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित है।
जी.पी. जोशी ने इसका उत्खनन करवाया था।
यहाँ के प्रमुख अवशेषों में सफ़ेद, काले तथा आसमानी रंग की कांच की चूड़ियां, तांबे की चूड़ियां प्रमुख है।

देसलपुर (गुजरात)
गुजरात के भुज ज़िले में स्थित ‘देसलपुर’ की खुदाई ‘पी.पी. पाण्ड्या’ और ‘एक. के. ढाके’ द्वारा किया गया ।
बाद में ‘सौनदरराजन’ द्वारा भी उत्खनन किया गया।

रोजदी (गुजरात)
रोजदी गुजरात के सौराष्ट्र ज़िले में स्थित था।

कांस्ययुगीन धौलावीरा

हड़प्पा सभ्यता‘ के पुरास्थलों में एक नवीन कड़ी के रूप में जुड़ने वाला पुरास्थल धौलावीरा कच्छ के रण के मध्य स्थित द्वीप ‘खडीर’ में स्थित है। इस द्वीप के समीप ही ‘सुर्खाव’- शहर स्थित है। धौलावीर गांव ‘खडीर द्वीप’ की उत्तरी-पश्चिमी सीमा पर बसा है। धौलावीरा पुरास्थल की खुदाई में मिले अवशेषों का प्रसार ‘मनहर’ एवं ‘मानसर’ नामक नालों के बीच में हुआ था। धौलावीरा नामक हड़प्पाई संस्कृति वाले इस नगर की योजना समानांतर चतुर्भुज के रूप में की गयी थी। इस नगर की लम्बाई पूरब से पश्चिम की ओर है। नगर के चारों तरफ एक मज़बूत दीवार के निर्माण के साक्ष्य मिले हैं। नगर के महाप्रसाद वाले भाग के उत्तर में एक विस्तृत सम्पूर्ण एवं व्यापक समतल मैदान के अवशेष मिले हैं। इसके उत्तर में नगर का मध्यम भाग है जिसे ‘पुर’ की संज्ञा दी गयी थी। इसके पूर्व में नगर का तीसरा महत्त्वपूर्ण भाग स्थित है जिसे ‘निचला शहर’ या फिर ‘अवम नगर’ कहा जाता है

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