साहित्य

मैं टॉम बॉय थी, लड़कियों से ज़यादा लड़के दोस्त थे

Pratima Jaiswal
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आप कितने ही अल्ट्रा एडवांस बन जाएं, गूगल की शरण में जाकर कितने ही ज्ञानी बनने का दावा करें लेकिन वो नहीं सीख सकते, जो हमें दादा-दादी, नाना-नानी सिखाते हैं। आमतौर पर इनके पास ज्यादा किताबी ज्ञान नहीं होता लेकिन इनके जीवन के अनुभव और विलुप्ति की कगार पर खड़ा गजब का कॉमन सेंस इन्हें दुनिया से अलग बनाता है। सबसे खास बात अनगिनत कहानियां, भूत-प्रेत, आत्मा और अलौकिक किस्सों की पोटली का होना। मेरी दादी-नानी ऐसी बातें बताया करती थीं, जो कोई किताब नहीं बता सकती। जीवन को सरल बनाने में या निराशा से निकालने में यह बातें बहुत मदद करती हैं। यह बात और है कि बचपन में ये बातें सिर के ऊपर से जाती थीं।

बचपन में सबसे शरारती बच्चे का टैग हटाने के लिए मैंने हर कोशिश की, लेकिन कुछ न कुछ ऐसा हो जाता था, जिससे दादी का गुस्सा भड़क जाता। दादी को तंग करना मेरा सबसे फेवरेट काम था। दादी भी मुझे सबक सिखाने के लिए नए-नए तरीके ढूंढ लेती थीं।

मैं टॉम बॉय थी इसलिए मुझे सब लड़कों की तरह ट्रीट करते थे। लड़कियों से ज्यादा लड़के दोस्त थे। बचपन में गोलू-मोलू, लड्डू टैग मिलना आम बात थी। दादी और मैं ‘टॉम एंड जेरी’ जैसे थे। मैं जब भी बोर होती थी, तो दादी को गुदगुदी लगाकर टाइम पास करती थी। उन्हें इतनी तेज गुदगुदी लगती थी कि चिल्ला-चिल्लाकर आसमान सिर पर उठा लेती थीं। शाम के समय बच्चे खेल जमाते तो दादी को छेड़ने का सिलसिला और भी तेज हो जाता, ऐसे में उन्होंने बच्चों के हंगामे से बचने के लिए एक उपाय ढूंढ निकाला था।


वो शाम को बच्चों को घर पर बुलाकर कीर्तन-भजन करती थीं। यकीन मानिए, बहुत सरलता थी उन दिनों में एक अलग ही रस मिलता था भजन करने में।
मेरी बड़ी बहन दादी की फेवरेट थी और गली के बच्चे भी उनसे बहुत इम्प्रेस रहते थे क्योंकि उनकी राइटिंग, डांस, पेंटिंग सब बेस्ट थे। सबसे खास बात कि उन्हें ढोलक बजाने आती थी। दादी के संयोजन शाम को कीर्तन होता जिसमें दीदी मंडली की सबसे प्रमुख सदस्य थी। कुछ बच्चे स्वंयसेवक बनकर मंजीरा ले आते थे और कुछ तालियां बजाते। मुझे न चाहते हुए भी घंटी बजाने को थमा दी जाती। भजन गायन का जिम्मा दादी अपने कंधों पर संभाले हुए थीं। एक दिन मुझे लगा कि अगर ढोलक बजाना सीख जाऊं, तो शायद दादी मुझे सबसे प्यारा बच्चा मान लें। यह सोचकर एक दिन भजन शुरू होते ही दादी से ढोलक बजाने की जिद्द की, लेकिन मुझे छोड़कर सब जानते थे कि ढोलक मेरे हाथ लगी तो फटना तय है। बहुत मनाने पर भी जब मैं नहीं मानी, तो दादी ने हंसते हुए कहा कि ढोलक संभाल नहीं पाएगा, खुद तो लुढ़ता रहता है सारा दिन।

यह सुनते ही बच्चों के बीच से हंसी का फव्वारा फूटा, जो मेरे दिल में चिंगारी की तरह लगा। मैंने गुस्से में घंटी फर्श पर पटक दी, जो पनौती बनते हुए दादी के सिर पर उछलकर लगी। अब जान कैसे बचे, यह सोचते हुए मैं छुपने के लिए बेड के नीचे भागी। दादी ने चिल्लाते हुए घर सिर पर उठा लिया। आवाज सुनते ही मम्मी दौड़ी-दौड़ी आईं। मेरी खोजबीन शुरू हुई लेकिन मेरा अता-पता नहीं। अंत में मुझे गिरफ्त में लेते हुए दो घूंसे और थोड़ी डांट खिलाकर मामला रफा-दफा किया गया।

कभी दादी के कपड़ों से कुत्तों का बिस्तर बनाना, तो कभी दादी के ऊपर गाना बनाना। इन शरारतों के बीच दादी का खौफ भी कम नहीं था। मेरी नजर में दादी पापा की गुप्तचर थीं इसलिए उनसे पंगे लेने के बाद डर भी लगता था।

जीवन के कई सबक, आजादी के किस्से, भूत-आत्मा की कहानियां सुनाने वाली दादी की अंतिम यात्रा याद आते ही आंखें नम हो जाती हैं। दादी 100 साल की उम्र में दुनिया को छोड़ गईं। पूरी उम्र जीने के बाद उनकी विदाई भजन, बैंड-बाजे के साथ की गई। अचानक गाजे-बाजे बजने शुरू हुए और हम सब बच्चे थिरकने लगे। साथ-साथ भजन गाते और नाचते जाते। इतने में एक बच्चे ने कहा ‘ओए! शोर मत मचाओ, दादी डाँटेगी, आराम से नाचो।

अचानक याद आया कि दादी तो जा चुकी हैं। यह सब इसलिए तो हो रहा है। नाचते-नाचते आंखों से आंसू बह निकले। हम बच्चों ने एक दूसरे को देखा और मेरे साथ मेरे भाई-बहन फूट-फूटकर रोने लगे। कदम थिरक रहे थे और आंखें झरना बनी हुई थीं।
दादी कहती थीं ‘बिछड़ने पर रोते नहीं, हंसकर विदा करते हैं। स्मृतियों में कभी कोई नहीं बिछड़ता।
(बचपन के किस्से जारी रहेंगे…
आपके पास भी कोई किस्सा है, तो लिखकर मुझे मेंशन कर सकते हैं। मैं जरूर पढूंगी।)
-प्रतिमा

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