साहित्य

।।प्रेम जो बेशर्त होता है, वो कुछ ऐसा ही होता होगा।।

Vijay Divya Jyoti
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।। प्रेम जो बेशर्त होता है, वो कुछ ऐसा ही होता होगा ।।
(Must read at least once.) COPIED
प्रेम में डूबी हर स्त्री अमृता होती है या फिर होना चाहती है पर सबके हिस्से कोई इमरोज नहीं होता, शायद इसलिए भी कि इमरोज होना आसान नहीं।खासकर हमारी सामाजिक संरचना में एक पुरुष के लिए यह अच्छा खासा मुश्किल काम है कि किसी ऐसी स्त्री से से प्रेम करना और उस प्रेम में बंधकर जिन्दगी गुजार देना, जिसके लिए यह पता हो कि वह आपकी नहीं है।
एक बार अमृता ने
इमरोज़ से कहा था –
” तुम मुझे जिंदगी की शाम में क्यों मिले,
मिलना था तो दोपहर में मिलते”
जब इमरोज और अमृता ने साथ साथ रहने का निर्णय लिया तो उन्होंने इमरोज से कहा था,
‘एक बार तुम पूरी दुनिया घूम आओ
फिर भी तुम मुझे अगर चुनोगे
तो मुझे कोई उज्र नहीं
मैं तुम्हें यहीं इंतजार करती मिलूंगी’
इसके जवाब में इमरोज़ ने उस कमरे के सात चक्कर लगाए और कहा, ‘हो गया अब तो…’ इमरोज के लिए अमृता का आसपास ही पूरी दुनिया थी।
उनके प्यार की समझदारी देखिये कि सालो तक एक ही घर में साथ रहने के बाद भी दोनों अलग अलग कमरों में रहते थे , इमरोज़ बताते है कि अमृता को रात में लिखने कि आदत थी क्योंकि उस वक़्त ना कोई आवाज़ होती थी ना फोन बजता और ना ही कोई आता जाता।
हालांकि लिखते समय उनको चाय चाहिए होती थी।अब लिखने में मशरूफ अमृता खुद तो उठकर चाय बना नहीं सकती थी तो इमरोज़ ने रात में 1 बजे उठना शुरू कर दिया।इमरोज़ चाय बनाते और चुपचाप उनके बगल में रख आते वो लिख़ने में इतनी खोई हुई रहती कि इमरोज़ की तरफ देखती भी नहीं थी ।और ये सिलसिला इसी तरह बदस्तूर चालीस- पचास सालों तक चलता रहा।
एक किस्सा बताते हुए इमरोज़ कहते है
एक बार जब वो अमृता को अपने स्कूटर पर बैठा कर कही जा रहे थे, तो पूरे रास्ते अमृता कि उंगलियां उनके पीठ पर कुछ लिख रही थी। इमरोज़ जानते थे वो शब्द साहिर का नाम था। वो कहते इस बात से उनको कोई नराज़गी नहीं थी, वो बोले – मैं भी अमृता का, मेरी पीठ भी अमृता की।
इमरोज़ होना आसान नहीं, और मैने प्रेम में इमरोज़ होना चुना।
इसीलिए अमृता जी की अंतिम नज्म ‘मैं तुम्हें फिर मिलूंगी’ इमरोज़ के नाम थी, केवल इमरोज़ के लिए।
” मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं
शायद तेरे कल्पनाओं की प्रेरणा बन
तेरे केनवास पर उतरुँगी
या तेरे केनवास पर
एक रहस्यमयी लकीर बन
ख़ामोश तुझे देखती रहूँगी
मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं।”
•अमृता-इमरोज़•
{साभार हिन्दी पंक्तियाँ}

प्रेम शिखर है जीवन ऊर्जा का । जिसने प्रेम जाना, उसने सब जान लिया। जो प्रेम से वंचित रह गया, वह सभी कुछ से वंचित रह गया। प्रेम की भाषा भिन्न होती है, जिसे हर कोई समझ नहीं पाता। प्रेम के शास्त्र को जो कोई अगर समझ गया तो फिर सारे शब्दकोश महत्वहीन हो जाते हैं। प्रेम एक यात्रा है जो तीर्थ तक ले जा सकती है क्योंकि प्रेम की यात्रा ही तीर्थयात्रा है। जो भी परमतीर्थ तक पहुंचे वो प्रेम से ही पहुंचे। और जो नहीं पहुंचे, वो इसलिए नहीं पहुंचे कि उन्होंने जीवन को कोई और रंग दे दिया जो प्रेम का नहीं था।

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