इतिहास

14 जुलाई का इतिहास : 14 जुलाई सन 1861 को मशीन गन बनाई गयी

 

ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार 14 जुलाई वर्ष का 195 वाँ (लीप वर्ष में यह 196 वाँ) दिन है। साल में अभी और 170 दिन शेष हैं।

14 जुलाई की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ
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1996 – सं.रा. अमेरिका ने पाकिस्तान को ब्राउन संशोधन के अंतर्गत हथियार भेजने प्रारम्भ किये।
1999 – मेकरी मोरीटा पापुआ न्यू गिनी के प्रधानमंत्री नियुक्त।
2003 – रूस की येलेना इसिनबायेवा ने महिला पोल वाल्ट में नया विश्व रिकार्ड बनाया।
2007 – फ़िलिस्तीन के प्रधानमंत्री सलम फ़याद ने अपने पद से इस्तीफ़ा दिया।
2008 – नेपाल की कार्यकारी संसद ने प्रधानमंत्री के निर्वाचन वाले संविधान संशोधन विधेयक को मंजूरी दी। वेनेजुएला की डायना मेंडोजा ने मिस यूनिवर्स का ख़िताब जीता। विश्व की सबसे बुजुर्ग इंटरनेट ब्लॉगर के रूप में चर्चित आस्ट्रेलियाई महिला का निधन।

14 जुलाई को जन्मे व्यक्ति
1971 – अनिल फिरोजिया – उज्जैन से भाजपा के लोकसभा सांसद हैं।
1902 – चन्द्रभानु गुप्त – प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री।
1909 – ई. एम. एस. नमबूद्रिपद – प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेताओं में से एक और केरल के प्रथम मुख्यमंत्री।
1900 – देशबंधु गुप्त – प्रसिद्ध राष्ट्र भक्त, स्वतंत्रता सेनानी और पत्रकार।
1856 – गोपाल गणेश आगरकर – प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता।
1942 – के. कालीमुत्तु – नौवीं लोकसभा के सदस्य।

14 जुलाई को हुए निधन
1975 – मदन मोहन – हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध 1950, 1960, और 1970 के दशक के बॉलीवुड फ़िल्म संगीत निर्देशक।
2003 – लीला चिटनिस, प्रसिद्ध हिन्दी फ़िल्म अभिनेत्री
1896 – राजा लक्ष्मण सिंह – हिन्दी साहित्य के इतिहास से जुड़े सुप्रसिद्ध साहित्यकार थे।

14 जुलाई सन 1789 ईसवी को फ़्रांस की कान्ति के दौरान बास्टिल की ऐतिहासिक जेल पर पेरिस की जनता ने अधिकार करके उसके बड़े भाग को तबाह कर दिया।

1965, मंगल के पास से गुज़रने वाले नासा के अंतरिक्ष यान ने किसी दूसरे ग्रह की पहली क्लोज अप तस्वीरें खींची।

1933, नाज़ी पार्टी ने जर्मन नागरिकों का जबरन नसबंदी कार्यक्रम शुरू किया।

1976, अमरीका की डेमोक्रेटिक पार्टी ने जिमी कार्टर को राष्ट्रपति का उम्मीदवार घोषित किया।

1223, फ़िलिप द्वितीय की मृत्यु के बाद उनके बेटे लुई फ्रांस के राजा बने।

1979, यूएसएसआर ने अपना नाभिकीय टेस्ट किया था।

1945, टेक्नोलॉजी क्षेत्र के दिग्गज और भारत के बड़े उद्योगपति शिव नादर का जन्म 14 जुलाई को हुआ था।

यह इमारत सन 1369 में सैनिक प्रयोग के लिए बनाई गयी थी और कुछ समय तक इसे सैनिक दुर्ग के रुप में प्रयोग किया गया। किंतु कुछ समय बाद यह इमारत भयानक जेल में परिवर्तित हो गयी जिसमें फ़्रांस के राजनैतिक क़ैदी विशेषकर प्रजातंत्रवादी बन्द किये जाते थे। इस जेल पर जो वास्तव में फ़्रांस के तानाशाहों और राजाओं के अत्याचार का प्रतीक थी, जनता का अधिकार होने के साथ ही क्रान्ति सफलता के निकट पहुँच गयी।

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14 जुलाई सन 1861 को मशीन गन बनाई गयी। कॉट लिंग नामक अमरीकी व्यक्ति ने अतीत के अविष्कारों के अनुभवों और अनुसंधानों का प्रयोंग करके यह हथियार बनाया। पहले यह हथियार स्वचलित नहीं थ उसमें लगे एक दस्ते को घुमाने से फ़ायर होता था किंतु बाद में विकसित हुआ और अब यह हथियार स्वचलित हो गया है।

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14 जुलाई सन 1958 को इराक़ में जनरल अब्दुल करीम के विद्रोह के बाद राजशाही व्यवस्था का अंत और प्रजातंत्र की स्थापना हुई। इस विद्रोह में इराक़ नरेश फैसल द्वितीय उनके उत्तराधिकारी प्रिंस अब्दुल्ला और प्रधान मंत्री नूरी सईद मारे गये। लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना के बाद राष्ट्रवादी विचारधारा रखने वाले जनरल अब्दुल करीम क़ासिम ने सत्ता संभाली परन्तु वर्ष 1963 में अपने एक सहयोगी अब्दुस्सलाम आरिफ़ के हाथों मारे गये। आरिफ़ ने विद्रोह करके क़ासिम की सरकार को गिरा दिया और उन्हें मौत के घाट उतार कर सत्ता अपने हाथ में ले ली।

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24 तीर सन 1347 को अफ़ग़ान संघर्षकर्ता व बुद्धिजीवी इस्माईल बलख़ी को काबुल में शहीद कर दिया गया। वे अफ़ग़ानिस्तान के उत्तरी नगर बल्ख़ में वर्ष 1298 हिजरी शमसी में जन्मे थे। उन्होंने अल्प आयु से ही धार्मिक शिक्षा ग्रहण की और इसी उद्देश्य से उन्होंने ईरान और इराक़ की यात्रा की। इस्माईल बलख़ी सदैव अत्याचार तथा तानाशाही के विरुद्ध संघर्षरत रहते थे और अफ़ग़ानिस्तान की मुस्लिम जनता को अत्याचारी और तानाशाही सरकारों के विरुद्ध खड़े होने का निमंत्रण देते थे। शहीद बल्ख़ी पर सदैव अफ़ग़ानिस्तान के शासकों का दबाव रहा और लंबी अवधि तक वे कारावास में रहे।

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24 तीर वर्ष 1289 हिजरी शम्सी को संवैधानिक काल के एक स्वतंत्र प्राप्ति आंदोलन के नेता एवं ईरान के वरिष्ठ धर्म गुरू आयतुल्लाह सैय्यद अब्दुल्लाह बहबहानी आतंकवादियों द्वारा शहीद कर दिये गये। आयतुल्लाह बहबहानी ने इराक़ के पवित्र नगर नजफ़ में जन्म लिया और अपने पिता की सैय्यद इस्माईल मुजतहिद बहबहानी की छत्रछाया में कि जो एक महान धर्मगुरू थे धार्मिक शिक्षा प्राप्त करना आरम्भ किया। उन्होंने वरिष्ठ धर्मगुरू मिर्ज़ा हसन शीराज़ी से शिक्षा प्राप्त की। संवैधानिक क्रांति से पूर्व भी आयतुल्लाह बहबहानी ईरान के प्रसिद्ध धर्मगुरूओं में से एक थे और राजनीति में सक्रिय थे।

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24 तीर वर्ष 1318 हिजरी शम्सी को इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैय्यद अली ख़ामेनई का ईरान के उत्तर पूर्व में स्थित पवित्र नगर मशहद में जन्म हुआ। आपका पालन पोषण एक धार्मिक परिवार में हुआ। सैय्यद अली ख़ामेनई ने चार वर्ष की आयु में शिक्षा प्राप्त करना आरम्भ किया। माध्यामिक विद्यालय के अंतिम दिनों में आपने अपने पिताश्री से धार्मिक शिक्षा ग्रहण करना आरम्भ किया और तेज़ी से प्रगति की। वे वर्ष 1337 हिजरी शम्सी में क़ुम गये और वहां इमाम ख़ुमैनी, आयतुल्लाहिल उज़मा बुरुजर्दी एवं अल्लामा तबाबाई जैसे वरिष्ठ धर्मगुरूओं से धर्मशास्त्र एवं दर्शनशास्त्र की शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने मशहद लौटने के बाद भी धार्मिक शिक्षा की प्राप्ति और उसके पढ़ाने का सिलसिला जारी रखा। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने युवा अवस्था से ही अत्याचारी शासन पहलवी का विरोध किया और उसके विरुद्ध इमाम ख़ुमैनी के आंदोलन से जुड़ गये। आपको इस्लामी शिक्षाओ के प्रचार एवं प्रसार तथा इमाम ख़मैनी के आंदोलन में सहयोग के कारण अनेक बार जेल जाना पड़ा यहां तक कि देश निकाला भी किया गया। ईरान में इमाम ख़ुमैनी के आंदोलन की सफलता के समय आपको इमाम ख़ुमैनी ने इस्लामी क्रांति परिषद का सदस्य बनाया। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता वर्ष 1360 हिजरी शम्सी में आंतकवादी गुट एमकोओ द्वारा किये गये बम विस्फोट में गम्भीर रूप से घायल हो गये थे। इमाम खुमैनी के निधन के पश्चात वरिष्ठ नेता का चयन करने वाली परिषद ने वर्ष 1368 हिजरी शम्सी में आपको इस्लामी गणतंत्र ईरान का नेता चुना।

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22 ज़ीक़ादा सन 408 हिजरी क़मरी को ईरान के विख्यात राजनीतिज्ञ और विद्वान, ख़्वाजा निज़ामुल मुल्क का तूस नगर में जन्म हुआ। तत्कालीन राजनैतिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों पर उनका विशेष प्रभाव रहा। सलजूक़ी शासकों के काल में ख़्वाजा निज़ामुल मुल्क मंत्री बने और तीस वर्ष तक इस पद पर आसीन रहे। उन्होंने सरकारी मामलों को सुल्झाने के लिए निरंतर प्रयास किये। सलजूक़ी शासन काल के दौरान ईरान की उन्नति में ख़्वाजा निज़ामुल मुल्क की बहुत भागीदारी रही। उन्होंने कई विद्यालयों और पाठशालाओं की स्थापना की। वे एक मंझे हुए लेखक भी थे उन्होंने अपने मंत्रीकाल के अनुभवों को सियासतनामे नामक पुस्तक में दर्ज किया है। इस पुस्तक को इस समय फ़ार्सी साहित्य में विशेष महत्व प्राप्त है। उन्होंने इस पुस्तक में शासन के सही और उचित संचालन का उल्लेख किया है तथा राजनैतिक और प्रशासनिक मामलों की ओर भी संकेत किया है।

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22 ज़ीक़ादा सन 536 हिजरी क़मरी को ईश्वरीय पुस्तक कुरआने मजीद की व्याख्या पर आधारित पुस्तक मजमउल बयान की रचना आरंभ हुई। इस पुस्तक को शैख़ तबरसी नामक विख्यात धर्मगुरु ने लिखा। शैख़ तबरसी की यह पुस्तक ईरान, मिस्र और लेबनान में कई बार प्रकाशित हो चुकी है।

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