इतिहास

15 जुलाई का इतिहास : 15 जुलाई 1912 को नौशेरा का शेर ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का जनम हुआ : नेहरू ने दी थी अंतिम विदाई!

ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार 15 जुलाई वर्ष का 196 वाँ (लीप वर्ष में यह 197 वाँ) दिन है। साल में अभी और 169 दिन शेष हैं।

15 जुलाई की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ
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1999 – चीन द्वारा न्यूट्रान बम की क्षमता हासिल करने की स्वीकारोक्ति।
2000 – सिएरा लियोन में सैन्य कार्यवाही द्वारा सभी भारतीय सैनिक बंधक मुक्त।
2002 – अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल के हत्यारे उमर शेख़ को पाकिस्तानी अदालत द्वारा मौत की सज़ा सुनाई गई।
2004 – माओवादियों से वार्ता में नेपाल के प्रधानमंत्री ने विदेशी मध्यस्थता मंजूर की।
2005 – श्रीलंका के सुप्रीम कोर्ट ने सुनामी राहत सामग्री बंटवारे विषयक सरकार-लिट्टे समझौते को निलम्बित किया।
2008 – नेपाल में दोनों प्रमुख वामपंथी दलों के बीच देश के प्रथम राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद पर नियुक्तियाँ तथा नई सरकार के गठन पर सहमति बनी।
2011- भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने पीएसएलवी सी-17 के जरिए जीसैट-12 ए का श्रीहरिकोटा से सफल प्रक्षेपण किया।

15 जुलाई को जन्मे व्यक्ति
1883 – जमशेद जी जीजाभाई – प्रसिद्ध भारतीय जो व्यवसाय से अत्यंत धनी और दानवीर थे।
1885 – पत्तम थानु पिल्लई – आधुनिक केरल प्रदेश के प्रमुख नेता।
1903 – के. कामराज – भारत रत्न सम्मानित स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री।
1909 – दुर्गाबाई देशमुख – आंध्र प्रदेश की प्रथम महिला नेता।
1909 – गनपतराव देवजी तापसे – महाराष्ट्र काँग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी के सदस्य तथा बम्बई विधानसभा के सदस्य।
1912 – मोहम्मद उस्मान – भारतीय सेना के उच्च अधिकारी, जो भारत और पाकिस्तान के प्रथम युद्ध (1947-48) में शहीद हुए थे।
1925 – बादल सरकार – प्रसिद्ध अभिनेता, नाटककार, निर्देशक और इन सबके अतिरिक्त रंगमंच के सिद्धांतकार।
1927 – सी. एच. मुहम्मद कोया – ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ के राजनीतिज्ञ और केरल के भूतपूर्व मुख्यमंत्री थे।
1959 – रमेश पोखरियाल – भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिज्ञ और एक हिन्दी कवि हैं।
1840 – विलियम विलसन हन्टर – एक परिष्कृत शिक्षाविद, ग्रन्थकार और सांख्यिकीविज्ञ अंग्रेज़ अधिकारी।
1611 – जयसिंह – आमेर के राजा तथा मुग़ल साम्राज्य के वरिष्ठ सेनापति (मिर्ज़ा राजा) थे।

15 जुलाई को हुए निधन
2017 – मरियम मिर्ज़ाख़ानी – गणित की दुनिया का प्रतिष्ठित सम्मान ‘फील्ड्स मेडल’ पाने वाली पहली महिला गणितज्ञ थीं।
1967 – बाल गन्धर्व – मराठी रंगमंच के महान् नायक और प्रसिद्ध गायक।
2004 – बानो जहाँगीर कोयाजी – भारतीय चिकित्सा वैज्ञानिक तथा परिवार नियोजन विशेषज्ञ

15 जूलाई सन 1588 ईसवी को इंग्लिश चैनल में ब्रिटिश नव सेना और स्पेन की नव सेना के मध्य युद्ध छिड़ गया।

1916, दुनिया की सबसे बड़ी एयरोस्पेस कंपनी बोइंग आज ही के दिन शुरू हुई थी।

1984, पंजाब में सिख समुदाय के अशांत होने के बाद पंजाब को आतंकवाद प्रभावित क्षेत्र घोषित किया गया था।

1903, राजनीति के दिग्गज और सुधारवादी नेता के. कामराज का जन्म आज ही के दिन हुआ था।

1962, अल्जीरिया अरब लीग का सदस्य बना।

1948, अमरीका के राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन दूसरे कार्यकाल के लिए निर्वाचित हुए।

1910, एमिल क्रेपलिन ने एलॉइस अल्ज़ाइमर के नाम पर अल्ज़ाइमर बीमारी का नाम दिया।

1937, हिंदी के जाने-माने पत्रकार प्रभाष जोशी का जन्म आज ही के दिन हुआ था।

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स्पेन का युद्ध बोड़ा अजेय माना जाता था। इस युद्ध में स्पेन की 135 बड़े युद्धक नोकाओं ने स्कॉटलेंड की रानी मेरी स्टीवर्ट की हत्या का प्रतिशोध लेने के लिए ब्रिटेन पर आक्रमर्ण किया था। किन्तु तीन चक्रवात के कारण 85 युद्धक नोकाएं डूब गयी और स्पेन के अजेय बेड़े को भी पराजय का सामना करना पड़ा। इस घटना के बाद स्पेन की नव सेना कमज़ोर पड़ गई।

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15 जूलाई सन 1944 ईसवी को दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमरीकी सेना ने जापान पर व्यापक स्तर पर बमबारी आरम्भ की। यह बमबारी हज़ारों युद्धक विमानों द्वारा की गई और जापान की पराजय तक जारी रही। इस भयानक बमबारी के परिणाम स्वरूप जापान के हज़ार से अधिक छोटे बड़े कारख़ाने धवस्त हो गए और दसियों हज़ार व्यक्ति मारे गए।

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15 जुलाई वर्ष 1920 ईसवी को ब्रिटेन द्वारा नियुक्त सीरिया के शासक दमिश्क से भागने के बाद इराक़ के शासक बने। 15 जुलाई वर्ष 1920 को फ़्रांसिसी सैनिकों के दमिश्क़ नगर के निकट पहुंचने के पश्चात अमीर फ़ैसल, जिन का संबंध हाशिमी वंश से था और ब्रिटिश सरकार की ओर से वे सीरिया के शासक बने थे, दमिश्क़ नगर से फ़रार हो गए। सीरिया नथा लेबनान, जो उस्मानी शासन के पूर्व उपनिवेशों में गिने जाते थे, प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात फ़्रांस के उपनिवेशों में शामिल होगए और अमीर फ़ैसल के फ़रार होने के पश्चात सीरिया के लिए शासक नियुक्ति की ब्रिटेन की पहल विफल रही। उस वर्ष 18 जुलाई को फ़्रांसिसी सैनिकों ने दमिश्क़ पर नियंत्रण कर लिया और अमीर फ़ैसल , जो तीन महीनों से सीरिया के शासक थे ब्रिटेन की ओर से इराक़ के शासक नियुक्त हो गए।

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25 तीर वर्ष 1373 हिजरी शम्सी को धर्मगुरू, खगोलशास्त्री, दर्शनशास्त्री एवं कवि आयतुल्लाह शोश्तरी जज़ायरी का ईरान के दक्षिण में स्थित शोश्तर शहर में जन्म हुआ। उन्होंने क़ुरआन, गणित, एवं खगोलशास्त्र की विद्या अपने पिता से प्राप्त की और उसके पश्चात दूसरे दक्ष गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की। इसी प्रकार आयतुल्लाह शोश्तरी ने आयतुल्लाह हायरी यज़दी और क़ुम के दूसरे वरिष्ठ धर्म गुरुओं से दर्शनशास्त्र एवं दूसरे ज्ञान प्राप्त किये। उन्होंने वर्षों धर्मशास्त्र की शिक्षा प्राप्ति एवं शोधकार्यों के बाद उच्च स्थान ग्रहण किया। आयतुल्लाह जज़ायरी ने ईरान के तानाशाह की इस्लाम विरोधी नीतियों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने अनेक शिष्यों को शिक्षा दीक्षा दी। उन्होंने धर्मशास्त्र एवं खगोलशास्त्र के विषय पर पुस्तकें लिखीं।

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23 ज़ीक़ादा सन 578 हिजरी क़मरी को इराक़ के बग़दाद नगर में प्रसिद्ध साहित्यकार, इतिहासकार और धर्मगुरु इब्ने नज़्ज़ार का जन्म हुआ। उन्होंने 624 हिजरी क़मरी तक विभिन्न स्थानों की यात्राएं कीं और विभिन्न विद्वानों की सेवा में रहकर अपनी शिक्षा पूरी कर ली। इब्ने नज़्ज़ार ने जो महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं हैं। उनमें मनाक़ेबुल इमाम आदि का नाम लिया जा सकता है।

नौशेरा का शेर

पन्ना लाल
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जिन्ना के प्लान को फेल करने वाले ब्रिगेडियर उस्मान
‘नौशेरा के शेर’ को हिन्दुस्तान ने किया याद
भारत मां के जिस सपूत को नेहरू ने दी अंतिम विदाई

मुल्क तक्सीम होने की तारीख तय हो चुकी थी. पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की नजर भारत के हर अनमोल खजाने पर थी, और वो सभी में पाकिस्तान का हिस्सा चाहते थे. भारत के बरक्स पाकिस्तान को बराबरी में खड़ा करने की जिद में जिन्ना हर चीज का बंटवारा करने पर तुले थे.

ब्रिटिश इंडिया की सैन्य टुकड़ियों को भी भारत और पाकिस्तान के बीच बांटा जा रहा था. इसी सिलसिले में नंबर आया बलूच रेजिमेंट का. बलूच रेजिमेंट के ज्यादा अफसर मुस्लिम थे और वे पाकिस्तान में शामिल हो रहे थे, चूंकि देश का बंटवारा ही धर्म के आधार पर हुआ था इसलिए ये स्वभाविक भी था.

लेकिन एक आर्मी अफसर था जो इस धारा के विपरीत जा रहा था. इस ऑफिसर का नाम था ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान. मोहम्मद उस्मान का ये फैसला जिन्ना को खटक रहा था. वे उनकी काबिलियत और वीरता से परिचित थे. उस्मान द्वितीय विश्व युद्ध में बर्मा में अपनी सेवाएं दे चुके थे. मोहम्मद उस्मान में उन्हें पाकिस्तान का नायक नजर आ रहा था. लिहाजा वे उन्हें किसी भी तरह से पाकिस्तान ले जाना चाहते थे. लेकिन मोहम्मद उस्मान तो किसी और ही मिट्टी के बने थे.


पाकिस्तान आ जाओ आर्मी चीफ बना दूंगा’

मोहम्मद अली जिन्ना ने उन्हें मजहब का वास्ता दिया और उनसे पाकिस्तान में आने को कहा, लेकिन मोहम्मद उस्मान ने उनके इस ऑफर को खारिज कर दिया. जिन्ना ने उन्हें दूसरा ऑफर दिया, और भी ज्यादा आकर्षक और लुभाने वाला. जिन्ना ने मोहम्मद उस्मान से खुद कहा, ‘पाकिस्तान आ जाओ मैं तुम्हें आर्मी चीफ बना दूंगा.’ इस पर मोहम्मद उस्मान का जवाब था, मैं भारत में जन्मा हूं और इसी जमीन पर मैं आखिरी सांस लूंगा. जिन्ना का अपना जवाब मिल चुका था.

आज मोहम्मद उस्मान का जन्मदिन

उस वक्त जिन्ना नहीं जानते थे कि यही ऑफिसर कश्मीर पर कब्जे की उनकी साजिश को मिट्टी में मिला देगा. जिन्ना की साजिश को कैसे मोहम्मद उस्मान ने चूर-चूर कर दिया ये बताने से पहले हम आपको बताना चाहेंगे कि भारत माता के इस सपूत मोहम्मद उस्मान का आज (बुधवार) जन्मदिन है.

आजमगढ़ में हुई पैदाइश

मोहम्मद उस्मान की पैदाइश अविभाजित भारत के उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद में 15 जुलाई 1912 में हुई थी. उनके पिता मोहम्मद फारूक खुनाम्बिर पुलिस अफसर थे. उनकी मां का नाम जमीलन बीबी था. उनके पिता चाहते थे कि उनका बेटा सिविल सर्विस में जाए, लेकिन मोहम्मद उस्मान ने सेना को तरजीह दी.


बच्चे को बचाने कुएं में लगाई छलांग

मोहम्मद उस्मान बचपन से ही दिलेर और बहादुर थे. वे 12 साल के रहे होंगे, जब एक बच्चा कुएं में गिर गया था. लोग मदद के लिए चीख पुकार मचा ही रखे थे कि उस्मान ने कुएं में छलांग लगा दी और कुछ देर में बच्चे को लेकर कुएं से बाहर निकले. इस घटना ने कुछ कुछ उनके करियर की दिशा तय कर दी थी.

रॉयल मिलिट्री अकादमी सैंडहर्स्ट इंग्लैंड में सेना की ट्रेनिंग

गुलाम भारत में एक सामान्य भारतीय के लिए सेना में अफसर बनना आसान नहीं था. इसमें कई बाधाएं थीं. मोहम्मद उस्मान ने रॉयल मिलिट्री अकादमी सैंडहर्स्ट के लिए अप्लाई किया. 1932 में वे इंग्लैड गए. इस अकादमी की परीक्षा काफी चुनौतीपूर्ण थी, लेकिन मोहम्मद उस्मान ने लगन से तैयारी और 1 फरवरी 1934 को सैंडहर्स्ट से पास हुए.

1935 में ब्रिटिश भारत आए तो उनकी नियुक्ति बलूच रेजिमेंट की 5वीं बटालियन में हुई. ब्रिटिश भारत में वे कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ते चले गए. 30 अप्रैल 1936 को उन्हें लेफ्टिनेंट की रैंक पर प्रमोशन मिला. 1941 में कैप्टन बने. 1944 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने ब्रिटिश फौज की ओर से बर्मा में सेवाएं दी. 27 सितंबर 1945 को लंदन गैजेट में कार्यवाहक मेजर के तौर पर उनके नाम का उल्लेख किया गया.

मोहम्मद उस्मान ने 10वीं बलूच रेजिमेंट की 14वीं बलाटियन की कमान अप्रैल 1945 से अप्रैल 1946 तक संभाली. इसी दौरान जिन्ना उनके पास पाकिस्तान चलने का ऑफर लेकर आए थे. बंटवारे के बाद जब बलूच रेजिमेंट पाकिस्तान में चली गई तो मोहम्मद उस्मान का ट्रांसफर डोगरा रेजिमेंट में कर दिया गया. कहा जाता है कि डोगरा रेजिमेंट में अपने साथी सैनिकों की भावनाओं का ख्याल रखते हुए मोहम्मद उस्मान शाकाहारी हो गए थे, वे मंगलवार को बजरंगबली की पूजा करते थे.

बंटवारे के दौरान कश्मीर को हासिल न कर पाने की टीस पाकिस्तान के मन में हमेशा से थी. पाकिस्तान ने 1947 में कबायली घुसपैठियों को जम्मू-कश्मीर की रियासत में भेजा. पाकिस्तान चाहता था जम्मू-कश्मीर पर कब्जा किया जाए और पाकिस्तान में उसका विलय किया जाए.

मोहम्मद उस्मान उस वक्त 50 पैरा ब्रिगेड के कमांडर थे. इस ब्रिगेड को रणभूमि में कठिन चुनौतियों को पूरा करने का जिम्मा दिया जाता है. मोहम्मद जम्मू-कश्मीर में तैनात थे और उन्हें नौशेरा की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी.

जनवरी-फरवरी 1948 में मोहम्मद उस्मान अपने सैनिकों के साथ नौशेरा में तैनात थे. पाकिस्तान लगातार कबायली घुसपैठियों को जम्मू-कश्मीर भेज रहा था. बता दें कि उस वक्त भारत मात्र 5 महीने पहले ही आजाद हुआ था. युद्ध की तैयारी नहीं थी, सैन्य-साजो सामान बिखरे हुए थे. संसाधनों की कमी थी, लेकिन उस्मान जम्मू-कश्मीर की रक्षा का प्रण उठा चुके थे.

इसी दौरान एक वक्त 5000 हजार कबायली नौशेरा में आ चुके थे. वे मस्जिद की आड़ लेकर भारतीय सेना पर फायरिंग कर रहे थे. भारतीय सेना मस्जिद होने की वजह से कबायलियों पर जवाबी फायरिंग करने से हिचकिचा रही थी. इस दौरान ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान खुद सामने आए और कबायलियों पर पहली गोली चलाई. इसी के साथ भारतीय सैनिकों ने घनघोर बदले की कार्रवाई शुरू कर दी.

नौशेरा का शेर की उपाधि

इस लड़ाई में दुश्मन बड़ी तादाद में थे जबकि भारतीय सैनिक उनके मुकाबले कम थे. बावजूद इसके दुश्मन को काफी क्षति पहुंची. इस हमले में सिर्फ 22 भारतीय सैनिक शहीद हुए और 102 जख्मी हुए, जबकि दुश्मन के करीब 1000 लोग मारे गए और 1000 जख्मी हुए. इस दिलेरी भरे अभियान की वजह से उनको नौशेरा का शेर कहकर पुकारा जाने लगा.

इस हार से पाकिस्तानी एकदम बौखला गए. इस वक्त ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान की उम्र 36 साल भी पूरी नहीं हुई थी और वे एक पूरी ब्रिगेड संभाल रहे थे. मई 1948 में पाकिस्तान ने अपनी रेगुलर आर्मी को जम्मू-कश्मीर में भेज दिया. उस वक्त ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान नौशेरा- झांगर में तैनात थे. यहां पर पाकिस्तान ने भयंकर गोलीबारी और शेलिंग शुरू कर दी.

ये आखिरी लड़ाई होने वाली थी. इस जंग से पहले मोहम्मद उस्मान ने अपनी टुकड़ी को आदेश जारी किया जो भारतीय सेना के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया. इस आदेश में कहा गया था कि इससे अच्छी मृत्यु कहां मिलेगी कि वीर योद्धा अपने पिता के भस्म और अपने देवस्थलों की रक्षा करते हुए होम हो जाएं.

36वें जन्मदिन से 12 दिन पहले हुए शहीद

इस बाद भारत की पूरी सेना सैलाब बनकर पाकिस्तान पर टूट पड़ी. भयंकर लडाई हुई. पाकिस्तान को कुछ समझ में ही नहीं आया कि अचानक भारतीय सेना इतनी ताकतवर होकर युद्ध कैसे करने लगी है. ब्रिगेडियर उस्मान खुद युद्ध का नेतृत्व कर रहे थे. लेकिन…3 जुलाई 1948 के दिन एक तोप का गोला ब्रिगेडियर उस्मान के पास आकर गिरा और इसकी चपेट में वे आ गए. अपने 36 वें जन्मदिन के 12 दिन पहले ब्रिगेडियर उस्मान यूद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए. लेकिन तबतक भारत झांगर पर कब्जा कर चुका था. ब्रिगेडियर उस्मान को उनके जोशीले नेतृत्व और साहस के लिए मरणोपरांत ‘महावीर चक्र’ से पुरस्कृत किया गया.

ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान की शवयात्रा में खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू शामिल हुए. उनका अंतिम संस्कार दिल्ली के जामिया मिल्लिया में किया गया.

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