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अमरीका और इस्राईल भयभीत हैं : इन दोनों का अंजाम भयानक होगा : रिपोर्ट

अगर आज आप अमरीका और इस्राईल के हालात का क़रीब से जायज़ा लें और दोनों की तुलनात्मक समीक्षा करें तो आपको नज़र आएगा कि दोनों की स्थिति में बड़ी समानता है।

दोनों ही शासनों का दावा है कि वह बहुत बड़े लोकतांत्रिक शासन हैं मगर दोनों के यहां सड़कों पर प्रदर्शनकारियों की भीड़ लगी है, झड़पें हो रही हैं, नस्ल परस्ती फैली हुई है और कोरोना महामारी से त्राहि त्राहि मच गई है।

अमरीका में प्रदर्शन वाइट हाउस तक पहुंच गए और हालात एसे बने कि डोनल्ड ट्रम्प को भूमिगत बंकर में जाना पड़ा।

इस्राईल में यह हालत है कि प्रदर्शन ज़ायोनी प्रधानमंत्री नेतनयाहू के आवास तक पहुंच गए हैं। वहां भी लगातार सात हफ़्तों से उपद्रव मचा हुआ है। प्रदर्शनकारी सड़कों पर हैं, झड़पें हो रही हैं। दक्षिणपंथी कहे जाने वाले धड़े और वामपंथी धड़े के बीच मार पीट के समाचार हैं। यह सब कुछ है लेकिन नेतनयाहू सत्ता से चिपके हुए हैं। सत्ता से चिपके रहना उनकी मजबूरी भी है क्योंकि जैसे ही हाथ से कुर्सी गई वह जेल पहुंच जाएंगे क्योंकि नेतनयाहू पर भ्रष्टाचार और रिश्वत के कई मुक़द्दमे चल रह रहे हैं।

दो साल में इस्राईल में तीन बार चुनाव हो चुके हैं मगर सरकार का गठन नहीं हो पाया और चौथी बार चुनाव होने की बातें शुरू हो गई हैं। प्रदर्शनों के दौरान लोगों ने नेतनयाहू के पुतले को फांसी पर चढ़ाया। इस्राईल के राष्ट्रपति रिवलीन ने कहा कि हिंसक प्रवृत्ति अब इस स्तर पर पहुंच चुकी है कि अगर किसी प्रदर्शनकारी की हत्या हो जाए या ख़ुद बिनयामिन नेतनयाहू का क़त्ल कर दिया जाए तो हैरत नहीं होगी। आंतरिक सुरक्षा विभाग के पूर्व अधिकारी कारीव ने भी कहा कि हम राजनैतिक हत्याओं की कगार पर पहुंच चुके हैं और मुझे नहीं मालूम कि जो मारा जाएगा वह दक्षिणपंथी होगा या वामपंथी।

अमरीकी समाज में गंभीर रूप से गहरा विभाजन है और इसी विभाजन के नतीजे में डोनल्ड ट्रम्प सत्ता में आए हैं और अब यही विभाजन पूरे देश में तूफ़ान मचाए हुए है। अमरीकी सेना जिसे दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना कहलवाने का बड़ा शौक़ है इराक़ की एनुल असद छावनी में भूमिगत बंकरों में छिप जाती है और ईरान के मिसाइलों की बारिश का इंतेज़ार करती है और रोचक बात यह है कि राष्ट्रपति ट्रम्प इस बात पर ईश्वर का आभार व्यक्त करते हैं कि ईरान का हमला पूरा हो गया और इसमें केवल 100 से अधिक अमरीकी सैनिकों को मानसिक झटका लगा।

अमरीकी समाज की यह हालत है कि वहां नस्ल परस्त गोरे चाहते हैं कि उनके लिए दीवार बना दी जाए ताकि दूसरे लोग वहां न आ सकें। ट्रम्प ने मैक्सिको की सीमा पर दीवार का निर्माण करवाया और अमरीका में मुसलमानों के प्रवेश पर रोक लगा दी। यह सब गोरों के उस ख़ौफ़ का नतीजा है जो उनके मन में बैठ गया और वह समझते हैं कि उनका वर्चस्व धीरे धीरे समाप्त हो रहा है।

इस्राईल की बात की जाए तो इस्राईली सेना हिज़्बुल्लाह से इतनी डरी हुई है कि अपनी परछाई से घबरा जाती है और केवल इस कल्पना में गोलबारी शुरू कर देती है कि उस पर हिज़्बुल्लाह की किसी टीम ने हमला कर दिया है। इस्राईल अब क़समें खाकर हिज़्बुल्लाह को यक़ीन दिला रहा है कि दमिश्क़ के क़रीब एक ठिकाने पर जब उसने हमला किया तो उसे पता नहीं था कि हिज़्बुल्लाह के कमांडर वहां मौजूद हैं और भविष्य में कभी भी इस तरह हिज़्बुल्लाह के किसी जवान की हत्या नहीं की जाएगी। इस्राईल हिज़्बुल्लाह के इंतेक़ाम से भयभीत है।

यह स्थिति कई साल से पैदा हो गई है जबकि इस बीच कोरोना महामारी ने अचानक हमला कर दिया तो गंभीर कमज़ोरियों पर पड़ा पर्दा भी हवा में उड़ गया और सब कुछ साफ़ साफ़ दिखाई देने लगा।

अमरीका तो जार्डन जैसे छोटे से और आर्थिक रूप से कमज़ोर देश से भी कमज़ोर साबित हुआ और करोना के सामने बेबस हो गया। महामारी ने अमरीकी अर्थ व्यवस्था की वह दुरगत कर दी कि 45 मिलियन लोग बेरोज़गार हो गए। इस समय अमरीका जिस आर्थिक मंदी में पड़ गया है वह पिछले 100 साल में कभी नहीं देखी गई।

इस्राईल का यह हाल है कि वहां बेरोज़गारों की संख्या दस लाख से अधिक हो गई है। इस्राईल के वित्त मंत्री यस्राईल काट्स ने ज़ून में कहा कि जब से इस्राईल की स्थापना हुई है आज तक इस प्रकार का आर्थिक संकट कभी नहीं आया यह बहुत कठिन समय है।

सवाल यह है कि अब इस मोड़ पर पहुंचने के बाद इस्राईल का क्या अंजाम होगा और अमरीका कहां जाएगा? यह बहुत बड़ा सवाल है जिसका जवाब आने वाले दिनों या महीनों में धीरे धीरे सामने आएगा।

डाक्टर अब्दुल हैय ज़लूम

फ़िलिस्तीनी लेखक व वरिष्ठ ऊर्जा सलाहकार

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