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अरब डायरी : इस्राईल के साथ यूएई को भी सज़ा देगा तुर्की : पाकिस्तान तुर्की का साथ देगा!

ग़द्दारी का समझौता और सुरक्षा के क्षेत्र में उसके परिणाम

संयुक्त अरब इमारात ने ज़ायोनी शासन के साथ कूटनैतिक संबंध स्थापित करने का जो ग़द्दारी वाला समझौता किया है, सुरक्षा के क्षेत्र में उसके अनेक परिणाम सामने आएंगे।

संयुक्त अरब इमारात और इस्राईल में इससे पहले भी विभिन्न क्षेत्रों में संबंध रहे हैं और इस्राईली मीडिया का कहना है कि ज़ायोनी प्राधानमंत्री नेतनयाहू पिछले दो साल में दो बार अबू धाबी की गुप्त यात्रा कर चुके हैं लेकिन इन संबंधों का पश्चिमी एशिया में दोनों पक्षों के लिए सुरक्षा के क्षेत्र में कोई परिणाम सामने नहीं आया था जबकि अब इन संबंधों की खुल कर की गई घोषणा के सुरक्षा के क्षेत्र में अवश्य कुछ परिणाम सामने आएंगे। ग़द्दारी के इस समझौते का एक परिणाम तो यही है कि संयुक्त अरब इमारात, जो क्षेत्र में आर्थिक विकास का एक माॅडल बनने के चक्कर में है, अशांति का सामना करेगा जबकि आर्थिक विकास की मूल शर्त मज़बूत सुरक्षा है।

इस्राईल व इमारात के बीच संबंध स्थापना की घोषणा के 72 घंटे के अंदर लीबिया में इमारात के दूतावास को आग लगा दी गई। इस समझौते के विरोध में त्रिपोली में लोगों ने इमारात के दूतावास पर हमला कर दिया और उसकी इमारत के एक भाग को आग लगा दी। अन्य देशों में भी इस तरह की घटनाओं की संभावना पाई जाती है। इमारात, यमन के ख़िलाफ़ सऊदी गठजोड़ का एक अहम सदस्य है। यमन के ख़िलाफ़ अबू धाबी की कार्यवाहियों में वृद्धि के बाद पिछले साल अलफ़ुजैरा बंदरगाह में धमाका हुआ था और इसी तरह यमनी बलों ने इमारात के ख़िलाफ़ कड़े हमले किए थे जिससे इस देश की सुरक्षा ख़तरे में पड़ गई थी, इमारात के अधिकारी बहुत अधिक चिंतित हो गए थे और आंतरिक स्तर पर इस देश में बड़े गहरे मतभेद उत्पन्न हो गए थे। इसी वजह से इमारात ने यमन से अपने सैनिकों को वापस बुलाने और युद्ध में अपनी भागीदारी कम करने का फ़ैसला किया था।

ज़ायोनी शासन इस्लामी जगत के जनमत में इतना घृणित है कि उसके साथ औपचारिक रूप से संबंधों की स्थापना, इमारात में आंतरिक स्तर पर भी सुरक्षा के लिए चुनौतियां पैदा कर सकती है बल्कि सत्ता के गलियारों में भी मतभेद उत्पन्न कर सकती है। इसकी एक वजह यह है कि ज़ायोनी शासन के साथ इमारात का समझौता उस समय हुआ है जब इस्राईल ने अमरीका के समर्थन से फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ हिंसा को बहुत अधिक बढ़ा दिया है और यह समझौता ज़ायोनी शासन का समर्थन और फ़िलिस्तीनियों से ग़द्दारी समझा जा रहा है।

इमारात और इस्राईल के बीच कथित शांति समझौते का एक और परिणाम फ़िलिस्तीनी गुटों की ओर से सामने आने वाली संभावित प्रतिक्रियाएं हैं। ग़द्दारी के इस समझौते में फ़िलिस्तीनियों के पक्ष में कछ भी नहीं है और सन 1978 के कैम्प डेविड समझौते और 1974 के अरबा वैली समझौते के विपरीत, ज़मीन के मुक़ाबले में शांति नहीं है बल्कि शांति के मुक़ाबले में शांति है। बिना परिणाम वाले इस समझौते ने फ़िलिस्तीनियों को एक अहम संदेश दिया है कि पश्चिमी एशिया का क्षेत्र अब “अपनी मदद आप” के सिद्धांत के ज़्यादा क़रीब हो गया है। मतलब यह है कि इस समझौते के बाद फ़िलिस्तीनी इस नतीजे पर पहुंच गए हैं कि वे अपनी रक्षा के लिए अबर देशों पर भरोसा नहीं कर सकते क्योंकि अब इस बात की संभावना बहुत बढ़ गई है कि अन्य अरब देश भी इस्राईल के साथ संबंध स्थापित करने लगें।

हमास के पोलित ब्योरो के सदस्य ख़लील अलहय्या ने बल देकर कहा है कि संयुक्त अरब इमारात के शासकों की ओर से इस्राईल के साथ संबंधों की स्थापना का समझौता, अरब एकता को नुक़सान पहुंचाएगा। उन्होंने कहा कि इस संबंध में देश-विदेश में फ़िलिस्तीनी गुटों के बीच परामर्श जारी है कि किस तरह इस समझौते का मुक़ाबला किया जाए। इमारात के ख़िलाफ़ अशांति में वृद्धि, इमाराती शासकों के बीच मतभेद और इसी तरह फ़िलिस्तीनियों व इस्राईल के बीच तनाव में बढ़ोतरी, पश्चिमी एशिया के क्षेत्र में ख़तरों व असुरक्षा को बढ़ा देगी। अलहय्या ने चेतावनी दी है कि क्षेत्र में किसी भी समय इस्राईल के साथ टकराव शुरू हो सकता है।

यूएई के बाद, अब अमरीका सऊदी अरब को तैयार कर रहा है इस्राईल के साथ संबंध बनाने के लिए

वाइट हाउस के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने सऊदी अरब को इस्राईल के साथ संबंध सामान्य करने का निमंत्रण देते हुए कहा है कि यह सऊदी अरब के लिए बहुत अच्छा होगा।

राबर्ट ओ ब्रायन ने सीएनएन के साथ एक वार्ता में कहा कि अमरीका, सऊदी अरब के अलावा, कई अन्य देशों के साथ इस्राईल के साथ संबंध स्थापित करने के लिए बात चीत कर रहा है।

उन्होंने कहा कि हमें आशा है कि जल्द ही 2 या उससे अधिक देश इस्राईल के साथ संबंध स्थापित करने पर तैयार हो सकते हैं।

ओ ब्रायन ने यह बयान एसी दशा में दिया है कि जब यूएई और इस्राईल के मध्य संबंध स्थापना की इस्लामी जगत में जम कर आलोचना हो रही है।

ट्रम्प के सलाहकार और दामाद जेयर्ड कुशनर ने भी कहा है कि उन्हें पूरा यक़ीन है कि सऊदी अरब जल्द ही इस्राईल से संबंध स्थापित कर लेगा।

ईरान, इमारात के साथ अपने संबंधों पर पुनर्विचार करेगाः जनरल बाक़ेरी

ईरान के सशस्त्र बल के जनरल स्टाफ़ के चीफ़ ने कहा है कि संयुक्त अरब इमारात, ज़ायोनी शासन के साथ अपने संबंधों पर पुनर्विचार करे और उस रास्ते पर न चले जो क्षेत्र की सुरक्षा के लिए हानिकारक हो।

ब्रिगेडियर जनरल मुहम्मद बाक़ेरी ने रविवार को तेहरान में एक कार्यक्रम में क्षेत्र के ताज़ा हालात और इस्राईल से संबंध स्थापित करने के संयुक्त अरब इमारात के समझौते की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि आज जब दुनिया के सभी स्वतंत्र देश ज़ायोनी शासन से संबंध व दोस्ती स्थापित करने से दूरी कर रहे हैं और इस शासन से घृणा करते हैं, इस्लामी गणतंत्र ईरान का एक पड़ोसी देश बड़ी निर्लज्जता और ढिठाई से बच्चों की हत्यारी इस्राईली सरकार से संबंध स्थापित करने की घोषणा कर रहा है जो बहुत ही खेद की बात है।

उन्होंने इस बात का उल्लेख करते हुए कि ज़ायोनी शासन, यहूदी धर्म की शिक्षाओं पर ध्यान दिए बिना इस्लामी जगत बल्कि अपनी ही जनता के ख़िलाफ़ हर तरह का अत्याचार करने में संकोच नहीं कर रहा है, कहा कि एक अरब व मुस्लिम देश के रूप में संयुक्त अरब इमारात के लिए इस प्रकार का संबंध किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है कि वह मुसलमानों के पहले क़िब्ले पर क़ब्ज़ा करने वाली और फ़िलिस्तीनी जनता को उनके घरों से बाहर निकालने और उनका जनसंहार करने वाली सरकार से राजनैतिक व आर्थिक संबंध स्थापित करे और खुल्लम खुल्ला इसकी घोषणा करे।

ईरान के सशस्त्र बल के जनरल स्टाफ़ के चीफ़ ब्रिगेडियर जनरल मुहम्मद बाक़ेरी ने इस बात पर बल देते हुए कि निश्चित रूप से संयुक्त अरब इमारात के संबंध में ईरान का रुख़ पूरी तरह से बदल जाएगा, कहा कि अगर फ़ार्स की खाड़ी में कोई भी घटना होती है और ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए थोड़ा सा भी ख़तरा खड़ा होता है तो ईरान के सशस्त्र बल इसके लिए इमारात को ज़िम्मेदार समझेंगे और इसे बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं करेंगे।

हिज़्बुल्लाह की खामोशी का राज़ क्या है : रूसी न्यूज़ एजेन्सी ने बताया… पहला भाग

रूसी न्यूज़ एजेन्सी स्पूतनिक की परशियन सेवा की वेबसाइट पर लेबनान पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित हुई है जिसके कुछ भाग हम यहां पेश कर रहे हैं।

लेबनान में राजनीतिक घटनाक्रम इतनी तेज़ी से बदल रहा है कि पूरी दुनिया में राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले इस देश के हालात को ज़रूर जानना चाहते हैं। 10542 क्षेत्रफल वाला लेबनान एक छोटा सा देश है लेकिन बहुत सी वजहों ने उसे एक बेहद प्रभावशाली और महत्वपूर्ण देश बना दिया है। लेबनान तरफ से इस्राईल के साथ संयुक्त सीमा रखता है तो दूसरी ओर भूमध्य सागर है इसी लिए उसे मध्य पूर्व का दरवाज़ा कहा जाता है।

बहुत पुराने ज़माने से फ़ोनीशियाई इसी देश में रहते थे जिन्हें समुद्री यात्रा और नौका बनाने में विश्व ख्याति प्राप्त थी। लेबनान के इतिहास में हमेशा ही अवैध क़ब्ज़ा करने वाले रहे हैं। ईरानियों से फ़ोनीशियाई नागरिकों का संबंध प्राचीन है और हखामनी काल में ईरानी नौसेना को फ़ोनीशियाई लोग ही चलाते थे। जब एलेक्ज़ेंडर द ग्रेट ने पूरब पर हमला किया तो लेबनान के वर्तमान सूर नगर के फ़ोनीशियाई नागरिकों ने 6 महीनों तक उसका मुक़ाबला किया और फिर अपने सारे पानी के जहाज़ों को जला दिया जिसके बाद एलेक्ज़ेंडर ने सूर नगर को जला दिया।

ईरान के सफवी शासकों ने जब देश का औपचारिक धर्म शिया घोषित करने का फैसला किया तो लेबनान के जबल आमिल क्षेत्र से शिया धर्मगुरुओं को ईरानी जनता को शिया मुसलमानों की शिक्षा से अवगत कराने के लिए ईरान बुलाया। इस इलाक़े में शिया बहुत अधिक रहते थे उसी वजह भी यह थी कि शिया धर्म गुरु और शिया मुसलमान , तुर्की के ओटोमन शासकों की भय से लेबनान के बेहद दुर्गम पहाड़ी इलाक़े जबल आमिल में शरण लेते थे। ओटोमन साम्राज्य के बिखरने के बाद जो बंटवारा हुआ उसमें सीरिया और लेबनान फ्रांस के हिस्से में आया इसी लिए फ्रांस आज भी स्वंय को लेबनान का अभिभावक समझता है।

फ्रांस स्वंय को लेबनान का गॉड फादर समझता है और उसी के पीछे पीछे पूरा पश्चिम लेबनान पर प्रभाव जमाने के प्रयास में रहता है लेकिन पिछले संसदीय चुनाव में लेबनान में उस पार्टी को भारी वोट मिला जो हिज़्बुल्लाह के नेतृत्व में प्रतिरोध आंदोलन से जुड़ी है और जो इस्राईल के खिलाफ संघर्ष को अपना परम कर्तव्य समझती है।

लेबनान की राजीनीति व्यवस्थ में संसद की निर्णायक भूमिका है क्योंकि देश के सभी अति महत्वपूर्ण पदों के लिए संसद का फैसला ही अंतिम होता है। इसी प्रकार लेबनान में एक अलिखित परंपरा के अनुसार राष्ट्रपति, मारुनी ईसाई, प्रधानमंत्री सुन्नी मुसलमान और संसद सभापति का शिया होना ज़रूरी है। आप के लिए यह जानना रोचक होगा कि लेबनान में सारे महत्चपूर्ण पद इसी परंपरा के आधार पर बांटे जाते हैं।

उदाहरण स्वरूप बैरुत बंदरगाह जहां धमाका हुआ है पारंपरिक रूप से सुन्नी मुसलमानों के हाथ में है। लेबनान में फ्रांस ने एसी व्यवस्था बनायी थी जिससे इस देश से जाने के बाद भी सांसदों द्वारा वह इस देश पर अपना नियंत्रण रख सके जैसा कि इसी तरह की व्यवस्था अमरीका ने इराक़ में बनायी है।

 

इस तरह से लेबनान में पद धर्म के आधार पर बंटे हैं तो सरकारी प्रोजेक्ट आदि भी अधिकारी अपने अपने धर्मों से सबंधित कंपनियों और ठेकेदारों को देते हैं इस तरह से सरकार और उससे संबंधित लोगों का एक बड़ा गुट है जिससे अलग रहने वाला लेबनानी, एकदम से ही अलग होता है। यही वजह है कि लेबनान के 85 प्रतिशत लोग प्राइवेट सेक्टर से जुड़े है।

लेबनान में बहुत से काम प्राइवेट सेक्टर के हवाले हैं जैसे बिजली की आपूर्ति का काम। हर इलाक़े में कुछ लोग बड़े बड़े जनरेटरों की मदद से बिजली सप्लाई करते हैं , हर इलाक़े में किसी न किसी पार्टी के लोग यह काम करते हैं जिससे उनकी कमाई होती है अब अगर लेबनान की सरकार बड़ी परियोजना द्वारा बिजली सप्लाई करना चाहे तो इस प्रकार के लोग बाधा उत्पन्न करते हैं। यही हाल बहुत से क्षेत्रों में है।

लेबनान में बहुत पुराने ज़माने से शिया मुसलमानों को ईरान, सुन्नी मुसलमानों को सऊदी अरब और ईसाइयों को फ्रांस का समर्थन समझा जाता है इस लिए मिसाल के तौर पर अगर आप लेबनानी शिया हैं और आप को ईरान से कोई रूचि नहीं है फिर भी आप पर ईरान का समर्थक होने का ठप्पा लगा रहेगा… जारी है।

लेबनान क्यों खास है अमरीका के लिए? कैसे लेबनान में हिज़्बुल्लाह का गठन हुआ? ताएफ समझौते का लेबनान की वर्तमान परिस्थितियों से क्या है संबंध? इन सब के लिए आप इस रिपोर्ट का दूसरा भाग पढ़ें … जो सोमवार 17 अगस्त की रात अपलोड किया जाएगा।

इस्राईल कितने भी समझौते कर ले, उसे नष्ट होने से कोई नहीं बचा सकता

इराक़ के अल-नुजबा आंदोलन का कहना है कि सभी प्रतिरोधी गुटों का मूल उद्देश्य इस्राईल को नष्ट करना और अमरीकियों को इस क्षेत्र से बाहर निकालना है।

अल-नुजबा आंदोलन के डिप्टी महा सचिव नस्र अल-शम्मारी का कहना थाः आज हमारा मक़सद इधर उधर जीत हासिल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि डंके की चोट पर हमारा उद्देश्य, इस्राईल को नष्ट करना और अमरीकियों को इस पूरे क्षेत्र से बाहर निकालना है।

अल-शम्मारी ने कहाः अपना यह मक़सद हासिल करके हम जनरल सुलेमानी समेत प्रतिरोध के कमांडरों के ख़ून का बदला भी ले लेंगे।

उन्होंने कहा कि यूएई या क्षेत्र के किसी भी देश से इस्राईल के समझौते, उसके ग़ैर क़ानूनी वजूद को नहीं बचा सकेंगे और इस्राईल का अंजाम, पहले ही दिन से उसकी पेशानी पर लिख दिया गया है।

ग़ौरतलब है कि अमरीका की मध्यस्थता में गुरुवार को यूएई और इस्राईल ने कूटनीतिक संबंधों की स्थापना की घोषणा की थी।

फ़िलिस्तीनियों ने एकमत होकर यूएई के इस क़दम की कड़ी निंदा की है और इसे पीठ में छुरा घोंपना तथा विश्वासघात बताया है।

लेबनान, फ़िलिस्तीन, सीरिया, यमन और इराक़ के प्रतिरोधी आंदोलनों ने भी इस्राईल के साथ यूएई के संबंधों को ख़ारिज कर दिया है और एलान किया है कि इससे ज़ायोनी शासन के ख़िलाफ़ उनका प्रतिरोध कमज़ोर नहीं पड़ेगा, बल्कि अधिक मज़बूत होगा।

अल-शम्मारी का कहना था कि हालिया दिनों में अमरीका को मिलने वाली पराजय, भविष्य में अमरीकियों और इस्राईलियों को मिलने वाली अपमानजनक हार का केवल ट्रेलर है।

अल-नुजबा आंदोलन इराक़ की पॉपुलर मोबिलाइज़ेन यूनिट (पीएमयू) का हिस्सा है, जिसमें 40 स्वयं सेवी संगठन शामिल हैं, जिन्होंने देश में दाइश और अमरीका तथा इस्राईल समर्थनक आतंकवादियों को पराजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इस्राईल के साथ समझौता करने के लिए यूएई को सज़ा देगा तुर्की, अर्दोगान

तुर्क राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोगान ने इस्राईल के साथ तथाकथित शांति समझौता करने के लिए यूएई से कूटनीतिक संबंध तोड़ लेने की चेतावनी दी है।

शुक्रवार को राष्ट्रपति अर्दोगान ने पत्रकारों से बात करते हुए कहाः तुर्की अबू-धाबी में अपना दूतावास बंद करने और यूएई के साथ अपने कूटनीतिक संबंध तोड़ लेने पर विचार कर रहा है।

इससे पहले तुर्की के विदेश मंत्रालय ने यूएई-इस्राईल समझौते को फ़िलिस्तीनियों की पीठ में छुरा घोंपना बताया था और कहा था कि इतिहास यूएई के इस पाखंडी व्यवहार को कभी माफ़ नहीं करेगा।

तुर्क विदेश मंत्रालय ने अबू-धाबी के शासकों की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा था कि इस क्षेत्र के लोग यूएई के इस ढोंगी व्यवहार को कभी नहीं भूल पाएंगे, जिसने अपने तुच्छ हितों के लिए फ़िलिस्तीनी राष्ट्र और मस्जिदुल अक़सा की बलि चढ़ा दी है।

तुर्की के राष्ट्रपति का कहना थाः मैंने विदेश मंत्रालय को ज़रूरी दिशा-निर्देश दे दिए हैं। हम अपने कूटनीतिक रिश्ते तोड़ सकते हैं या अपने राजदूत को वापस बुला सकते हैं, इसलिए कि हम फ़िलिस्तीनी जनता के साथ खड़े हैं।

अर्दोगान ने सऊदी अरब की क्षेत्रीय नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि रियाज़ ग़लत दिशा में क़दम बढ़ा रहा है।

तुर्की के इस्राईल के साथ कूटनीतिक और आर्थिक संबंध हैं, लेकिन पिछले कई वर्षों से दोनों के संबंध ख़राब चल रहे हैं।

सैयद हसन नसरुल्लाह, अपना आक्रोश संभाल कर रखें बाद में काम आएगा?

हिज़्बुल्लाह के प्रमुख सैयद हसन नसरुल्लाह ने शुक्रवार की शाम जो भाषण दिया वह बहुत महत्वपूर्ण था। वैसे उनके सारे ही भाषण हद से ज़्यादा महत्वपूर्ण होते हैं। मगर इस भाषण में तीन बिंदु एसे थे जिन पर ठहरकर सोचना ज़रूरी है क्योंकि इसमें भविष्य की घटनाओं के इशारे मौजूद हैं।

-1 सैयद हसन नसरुल्लाह ने इस बिंदु पर अपना भाषण केन्द्रित रखा कि लेबनान की राजनैतिक व्यवस्था को ध्वस्त करने की साज़िश जारी है। हस्सान दियाब की सरकार गिराने के बाद अब यह साज़िश आगे बढ़ रही है और राष्ट्रपति मिशल औन और संसद सभापति नबीह बिर्री निशाने पर हैं।

-2 देश में पाई जाने वाली समरसता को ख़त्म करने के लिए गृह युद्ध की आग भड़काने की कोशिश हो रही है और देश को राजनैतिक शून्य की स्थिति में पहुंचाने पर काम हो रहा है।

-3 इस बात की संभावना मौजूद है कि बैरूत धमाका किसी हमले का नतीजा रहा हो। इसलिए ज़रूरी है कि इस मामले की अंतर्राष्ट्रीय जांच का विरोध किया जाए और देश के भीतर जो टीम जांच करे उसमें विदेशी पर्यवेक्षकों को शामिल न किया जाए क्योंकि विदेशी विशेषज्ञों की कोशिश होगी कि इस्राईल को हर हाल में बचाएं जिस तरह पूर्व प्रधानमंत्री रफ़ीक़ हरीरी की हत्या की जांच के मामले में हो चुका है।

इस भाषण से साफ़ ज़ाहिर है कि सैयद हसन नसरुल्लाह का ध्यान पूरी तरह उन साज़िशों पर हैं जो लेबनान की दहलीज़ तक पहुंच चुकी हैं और इन साज़िशों में देश के भीतर मौजूद कुछ गलियारे पूरी तरह साथ दे रहे हैं। उन्होंने इस साज़िश की ओर से सावधान भी किया और ठोस स्वर में कहा कि वह हर स्थिति का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

सैयद हसन नसरुल्लाह ने साफ़ कर दिया कि बैरूत धमाके में अगर इस्राईल लिप्त है तो उसे सज़ा ज़रूर दी जाएगी जबकि हिज़्बुल्लाह के कमांडर की शहादत का भी बदला ज़रूर लिया जाएगा। इससे लगता है कि सैयद हसन नसरुल्लाह के पास कुछ बहुत महत्वपूर्ण जानकारियां हैं और वह आंतरिक और बाहरी स्तर पर हर तरह के हालात से निपटने के लिए तैयार हो चुके हैं।

जब वह अपने समर्थकों से कह रहे हैं कि अभी अपना आक्रोश संभाल कर रखें क्योंकि इस आक्रोश की बाद में ज़रूरत पड़ सकती है तो इसका मतलब यह है कि बर्दाश्त करने और नज़रअंदाज़ कर देने का चरण समाप्त हो रहा है। अब हर तरफ़ से यहां तक कि हिज़्बुल्लाह के भीतर से यह मांग ज़ोर पकड़ रही है कि यह संगठन देश के भीतर होने वाले भ्रष्टाचार पर चुप न रहे बल्कि ठोस कार्यवाही करे क्योंकि भ्रष्टाचार के वातावरण में इस्राईली एजेंटों को अपना काम कर गुज़रने का मौक़ा मिल जाता है।

हमें यह लगता है कि अब हिज़्बुल्लाह नए चरण में पहुंच गया है जहां वह किसी हद तक अपनी नर्मी में कमी करेगा और साज़िश का हिस्सा बनने वालों के ख़िलाफ़ ठोस क़दम उठाएगा।

स्रोतः रायुल यौम

हम लेबनान को हथियार देने पर तैयार, ईरान का बड़ा धमाका

ईरान के रक्षा मंत्री ने कहा है कि ईरान हथियारों के उत्पादन में अच्छी पोज़ीशन रखता है इस लिए हम लेबनान की हथियारों की ज़रूरत पूरी करने पर तैयार हैं।

ब्रिगेडियर जनरल अमीर हातमी ने रविवार को लेबनान की जनता की सहायता और इस देश की तकनीकी मदद के विषय के साथ आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि लेबनान की जनता, ईरान की दोस्त है और इस्लामी गणतंत्र ईरान ने प्रतिरोध के काल में उनकी मदद की है, तेहरान आज भी लेबनान की हथियारों की ज़रूरत पूरी करने पर तैयार है लेकिन फैसला लेबनानियों के हाथ में है।

ईरान के रक्षा मंत्री ने इसी तरह यूएई और इस्राईल के मध्य होने वाले समझौते का उल्लेख करते हुए कहा यह समझौता, फिलिस्तीनी जनता और पश्चिमी एशिया की जनता के साथ गद्दारी है।

ईरान के रक्षा मंत्री ने कहा कि अगर कोई इस्राईल को हमारे इलाक़े में घुसपैठ करने की अनुमति देगा ताकि वह अशांति पैदा करे तो उसकी ज़िम्मेदारी उन पर होगी जो इस अशांति का कारण बने हैं और उसकी ज्वाला से वह लोग भी बच नहीं पाएंंगे।

रक्षा मंत्री अमीर हातमी ने इलाक़े से अमरीका के निकलने के बारे में भी कहा कि यह इलाक़े की जनता की इच्छा है और इस इलाक़े के अमरीका को खदेड़ने के लिए प्रभावशाली क़दम उठाए हैं और सुरक्षा परिषद में हालिया हार भी स्वंय को महाशक्ति समझने वाले अमरीका की हड्डियों के चटखने की आवाज थी।

याद रहे ईरान के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र संघ के हथियारों के प्रतिबंध की अवधि बढ़ाने के लिए सुरक्षा परिषद में अमरीका के प्रस्ताव पर 11 सदस्य देशों ने मतदान नहीं किया, अमरीका व डोमिनिकिन गणतंत्र ने समर्थन में और रूस व चीन ने प्रस्ताव के विरोध में मतदान किया जिसकी वजह से गत 75 वर्षों में पहली बार अमरीका को सुरक्षा परिषद में इस प्रकार से मुंह की खानी पड़ी।

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